MP Board Class 12 Animal Husbandry Foot and Mouth Disease – FMD खुरपका-मुंहपका रोग

Animal Husbandry Foot and Mouth Disease – FMD : एमपी बोर्ड कक्षा 12 पशुपालन (MP Board Class 12 Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘इकाई 4: पशुओं के सामान्य रोग – 1’ के अंतर्गत ‘खुरपका-मुंहपका रोग’ (Foot and Mouth Disease – FMD) पर एक अत्यंत विस्तृत और वैज्ञानिक लेख।

इस लेख में FMD के कारण (Virus strains), फैलने के तरीके, प्रमुख लक्षण (Symptoms), खुर और मुंह के छालों का प्राथमिक उपचार (Treatment), और टीकाकरण (Vaccination) का द्विभाषी (Bilingual) रूप में गहराई से अध्ययन किया गया है।

इकाई 4: पशुओं के सामान्य रोग – 1 (Common Diseases of Animals – 1)

अध्याय: खुरपका-मुंहपका रोग (Foot and Mouth Disease – FMD) – संपूर्ण अध्ययन (कक्षा 12 पशुपालन)

1. प्रस्तावना (Introduction)

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था और डेयरी उद्योग (Dairy Industry) को जिन पशु रोगों से सबसे अधिक आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, उनमें ‘खुरपका-मुंहपका रोग’ (Foot and Mouth Disease – FMD) सबसे प्रमुख है। इसे ग्रामीण भाषा में ‘खुरहा’, ‘मुंहखुर’ या ‘एफ.एम.डी.’ (FMD) भी कहा जाता है।

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यह जुगाली करने वाले (Ruminants) और खुर वाले पशुओं (Cloven-hoofed animals) जैसे— गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर का एक अत्यंत भयंकर, छूतदार (Contagious) और महामारी (Epizootic) का रूप लेने वाला रोग है। यद्यपि इस रोग से वयस्क पशुओं की मृत्यु दर (Mortality rate) बहुत कम (2% से 5%) होती है, लेकिन इससे होने वाली आर्थिक हानि अपार है। बीमार पशु का दूध उत्पादन अचानक शून्य हो जाता है, काम करने वाले बैल (Draft bullocks) लंगड़े हो जाते हैं और महीनों तक काम नहीं कर पाते, और गाभिन (Pregnant) गायों में अक्सर गर्भपात (Abortion) हो जाता है।

मध्य प्रदेश बोर्ड (MP Board) के कक्षा 12 ‘पशुपालन’ (Animal Husbandry) के पाठ्यक्रम में यह रोग सबसे महत्वपूर्ण है। बोर्ड परीक्षाओं में इसके लक्षण, कारण और बचाव के उपायों पर दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions) हर वर्ष पूछे जाते हैं। इस विस्तृत लेख में हम इस विनाशकारी रोग का वैज्ञानिक और व्यावहारिक (Scientific and Practical) अध्ययन करेंगे।

2. रोग का कारण (Causal Organism / Etiology)

खुरपका-मुंहपका रोग किसी जीवाणु (Bacteria) से नहीं, बल्कि एक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु (Virus) के कारण होता है।

  • विषाणु का नाम: यह ‘पिकोर्नाविरिडी’ (Picornaviridae) कुल के ‘एप्थोवायरस’ (Apthovirus) नामक विषाणु द्वारा फैलता है।
  • विषाणु के प्रकार (Strains): पूरी दुनिया में इस वायरस की मुख्य रूप से 7 प्रजातियां (Strains) पाई जाती हैं— O, A, C, SAT-1, SAT-2, SAT-3, और Asia-1।
  • भारत में यह रोग मुख्य रूप से ‘O’ (ओ), ‘A’ (ए), और ‘Asia-1’ (एशिया-1) स्ट्रेन के कारण फैलता है। इनमें भी सबसे अधिक प्रकोप ‘O’ प्रकार के वायरस का होता है।

3. रोग का प्रसार या फैलाव (Transmission of the Disease)

यह एक अत्यंत तीव्र छूतदार (Highly Contagious) बीमारी है। यदि झुंड में एक पशु को यह रोग हो जाए, तो कुछ ही दिनों में पूरा झुंड इसकी चपेट में आ जाता है। यह निम्नलिखित माध्यमों से फैलता है:

  1. सीधा संपर्क (Direct Contact): स्वस्थ पशु के बीमार पशु को छूने, चाटने या उसके साथ बंधे होने से।
  2. हवा द्वारा (Air-borne): यह वायरस हवा के माध्यम से उड़कर 50 से 60 किलोमीटर दूर तक के स्वस्थ पशुओं को संक्रमित कर सकता है।
  3. दूषित चारा और पानी (Contaminated Feed and Water): बीमार पशु की लार (Saliva) चारे की नाँद (Manger) या पानी के कुंड में गिर जाती है। जब स्वस्थ पशु उसे खाता-पीता है, तो वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है।
  4. दूषित बर्तन और मनुष्य: दूध दूहने वाले बर्तन (Milking utensils), पशुपालक के कपड़े और जूते, तथा पक्षियों और कुत्तों के माध्यम से भी यह वायरस एक फार्म से दूसरे फार्म तक फैल जाता है।

4. रोग के प्रमुख लक्षण (Symptoms of the Disease)

जब एफ.एम.डी. (FMD) का वायरस पशु के शरीर में प्रवेश करता है, तो 2 से 5 दिन के भीतर (Incubation period) इसके भयानक लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इन लक्षणों को देखकर कोई भी पशुपालक इस रोग को आसानी से पहचान सकता है:

Animal Husbandry Foot and Mouth Disease - FMD

मुंह के अंदर: मसूड़ों और जीभ पर भयंकर छाले. Source: विकिपीडिया / मुंहपका-खुरपका रोग – विकिपीडिया

Animal Husbandry Foot and Mouth Disease - FMD

लार टपकना: रोग का सबसे प्रमुख और प्रारंभिक लक्षण. Source: Reuters Photographer / REUTERS

Animal Husbandry Foot and Mouth Disease - FMD

खुर के घाव: खुरों के बीच (Cleft) फटे हुए छाले और घाव. Source: BIO PHARMACHEMIE / PREVENTION AND TREATMENT OF FOOT AND MOUTH DISEASE FMD – Technical …

  1. तेज बुखार (High Fever): बीमारी की शुरुआत में पशु को अचानक बहुत तेज बुखार (104°F से 106°F) हो जाता है। पशु सुस्त हो जाता है और चारा खाना व जुगाली करना पूरी तरह बंद कर देता है।
  2. लार टपकना (Profuse Salivation): यह इस रोग का सबसे विशिष्ट लक्षण (Classic symptom) है। पशु के मुंह से लगातार लंबी, गाढ़ी और तार जैसी लार (Ropy saliva) टपकती रहती है।
  3. मुंह में छाले (Vesicles in Mouth): पशु के मुंह के अंदर, होंठों, मसूड़ों (Dental pad) और जीभ पर पानी भरे बड़े-बड़े छाले (Blisters/Vesicles) निकल आते हैं। 2-3 दिन बाद ये छाले फूट जाते हैं और लाल रंग के दर्दनाक घाव (Ulcers) बन जाते हैं। दर्द के कारण पशु चप-चप (Smacking sound) की आवाज करता है और कुछ भी खा नहीं पाता।
  4. खुरों में छाले और लंगड़ाना (Foot Lesions and Lameness): मुंह के साथ-साथ पशु के खुरों के बीच की जगह (Cleft of hooves) में भी छाले निकल आते हैं। छालों के फूटने से खुरों में भयंकर घाव हो जाते हैं। दर्द के कारण पशु लंगड़ा कर (Limping) चलता है या जमीन पर लेट जाता है। कई बार घावों में कीड़े (Maggots) पड़ जाते हैं और खुर पैर से अलग हो जाता है।
  5. थनों पर छाले (Teat Lesions): दुधारू गायों के थनों (Teats) और अयन (Udder) पर भी छाले हो जाते हैं, जिससे दूध निकालते समय पशु को भयंकर दर्द होता है। दूध का उत्पादन अचानक 70-80% तक गिर जाता है।
  6. पैंटिंग (Panting): संकर गायों (Crossbred cows) में बीमारी ठीक होने के बाद भी पशु हाफता (Panting) रहता है, जिसे ‘पेंटिंग सिंड्रोम’ कहा जाता है।

5. खुरपका-मुंहपका रोग का उपचार (Treatment of FMD)

चूंकि यह एक विषाणु जनित (Viral) रोग है, इसलिए इसका कोई सीधा और पक्का एंटीबायोटिक इलाज नहीं है। इसमें पशु की स्थिति को सुधारने और छालों के दर्द को कम करने के लिए लक्षण आधारित चिकित्सा (Symptomatic Treatment) और प्राथमिक उपचार (First Aid) किया जाता है:

5.1 मुंह के छालों का उपचार (Treatment of Mouth Lesions)

  • पशु के मुंह के छालों और घावों को दिन में 2-3 बार लाल दवा (Potassium Permanganate / KMnO_4) के 1% हल्के घोल से या 2% फिटकरी (Alum) के पानी से धोना चाहिए।
  • धोने के बाद घावों पर ‘बोरोग्लिसरीन’ (Boric acid + Glycerine) या शहद (Honey) का लेप लगाना चाहिए। इससे पशु को दर्द में आराम मिलता है और घाव जल्दी भरते हैं।

5.2 खुर के घावों का उपचार (Treatment of Foot Lesions)

  • खुरों के घावों को फिनाइल (Phenyl) के 1% घोल या नीला थोथा (Copper Sulphate) के 1-2% घोल से धोना चाहिए।
  • एक बड़ा टब या नाली बनाकर उसमें नीले थोथे का पानी भर देना चाहिए (इसे फुट बाथ / Foot Bath कहते हैं) और बीमार पशुओं को दिन में दो बार उस पानी में से गुजारना चाहिए।
  • यदि खुर के घाव में कीड़े (Maggots) पड़ गए हों, तो उसमें ‘तारपीन का तेल’ (Turpentine oil) या ‘कपूर’ (Camphor) भर देना चाहिए ताकि कीड़े मर जाएं। इसके बाद ‘टिंचर आयोडीन’ या एंटीसेप्टिक मलहम (जैसे Topicure spray) लगाना चाहिए।

5.3 आधुनिक चिकित्सा (Modern Medicine)

  • छालों के घाव में कोई दूसरा जीवाणु संक्रमण (Secondary bacterial infection) न फैले, इसके लिए पशु चिकित्सक की सलाह से ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक (Antibiotic) जैसे— ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (Oxytetracycline) का इंजेक्शन 3-5 दिन तक लगाना चाहिए।
  • बुखार और दर्द को कम करने के लिए मेलोक्सिकैम + पैरासिटामोल (Melonex Plus) का इंजेक्शन लगाना चाहिए।

5.4 आहार प्रबंधन (Dietary Management)

मुंह में दर्द के कारण पशु कठोर चारा नहीं खा सकता। इसलिए बीमार पशु को अत्यंत मुलायम, सुपाच्य और रसीला आहार (Soft and semi-liquid diet) जैसे— मांड (Rice gruel), दलिया, उबला हुआ अनाज, और मुलायम हरा चारा देना चाहिए।

6. रोग से बचाव एवं नियंत्रण (Prevention and Control)

जैसा कि कहा जाता है “इलाज से परहेज बेहतर है”, FMD जैसे महामारी वाले रोग में बचाव (Prevention) ही सबसे बड़ा हथियार है:

6.1 टीकाकरण (Vaccination) – सबसे महत्वपूर्ण उपाय

पशुओं को इस रोग से बचाने का एकमात्र पक्का उपाय समय पर ‘टीकाकरण’ है।

  • भारत सरकार के ‘राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ (NADCP) के तहत सभी गाय-भैंसों को एफ.एम.डी. (FMD) का पॉलीवैलेंट टीका (Polyvalent Vaccine) लगाया जाता है।
  • यह टीका ‘O’, ‘A’, और ‘Asia-1’ तीनों स्ट्रेन के विरुद्ध काम करता है।
  • टीकाकरण का समय: बछड़े को पहला टीका 4 महीने की उम्र में, दूसरा टीका (बूस्टर) उसके 1 महीने बाद, और फिर हर 6 महीने के अंतराल पर (वर्ष में दो बार – सितंबर-अक्टूबर और फरवरी-मार्च में) नियमित रूप से टीका लगवाना चाहिए।

6.2 नियंत्रण के अन्य उपाय (Control Measures)

  1. अलगाव (Isolation): बीमारी का पहला लक्षण दिखते ही बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से तुरंत अलग (Isolate) कर देना चाहिए।
  2. सफाई (Sanitation): पशुशाला (Cattle shed) के फर्श और नालियों को 4% सोडियम कार्बोनेट (Washing soda) या 1-2% फिनाइल के घोल से धोकर कीटाणुरहित (Disinfect) करना चाहिए।
  3. बर्तन अलग रखना: बीमार पशु का जूठा चारा, पानी और दूध दूहने के बर्तन पूरी तरह अलग रखने चाहिए।
  4. आवागमन पर रोक (Restriction on Movement): बीमारी के समय किसी भी नए पशु को बाहर से खरीदकर नहीं लाना चाहिए और न ही अपने पशुओं को पशु-मेले (Cattle fairs) या सार्वजनिक चरागाहों में भेजना चाहिए।
  5. मृत पशु का निपटान: यदि किसी छोटे बछड़े की इस रोग से मृत्यु हो जाए, तो उसके शव (Carcass) को चूना डालकर 5-6 फुट गहरे गड्ढे में गाड़ देना चाहिए।

7. निष्कर्ष (Conclusion)

कक्षा 12 पशुपालन (Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘खुरपका-मुंहपका रोग’ (FMD) का अध्ययन मात्र एक परीक्षा का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत के डेयरी उद्योग की कमर तोड़ने वाली सबसे बड़ी चुनौती को समझने का प्रयास है।

यह रोग पशु की जान भले ही न ले, लेकिन यह उसकी उत्पादन क्षमता (Production capacity) को जीवन भर के लिए नष्ट कर देता है। एक बार FMD से ग्रसित होने के बाद संकर गाय (Crossbred cow) कभी भी अपने पिछले दूध उत्पादन स्तर पर वापस नहीं आ पाती। इसलिए, एक जागरूक पशुपालक को लार टपकना (Drooling) और मुंह में छाले जैसे लक्षणों को तुरंत पहचानना चाहिए, लाल दवा (Potassium permanganate) से त्वरित प्राथमिक उपचार (First Aid) करना चाहिए, और सबसे महत्वपूर्ण— अपने पशुधन को वर्ष में दो बार FMD का टीका (Vaccine) अवश्य लगवाना चाहिए। इसी जागरूकता से हम अपने डेयरी व्यवसाय को भारी आर्थिक नुकसान से बचा सकते हैं।

8. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्रश्न 1: खुरपका-मुंहपका रोग (FMD) किस सूक्ष्मजीव के कारण फैलता है?

उत्तर: खुरपका-मुंहपका रोग एक ‘पिकोर्नाविरिडी’ (Picornaviridae) कुल के ‘एप्थोवायरस’ (Apthovirus) नामक अत्यंत सूक्ष्म विषाणु (Virus) के कारण फैलता है। भारत में मुख्य रूप से इसके ‘O’, ‘A’, और ‘एशिया-1’ स्ट्रेन (Strains) पाए जाते हैं। यह किसी जीवाणु (Bacteria) से नहीं होता।

प्रश्न 2: खुरपका-मुंहपका रोग (FMD) के दो सबसे प्रमुख लक्षण क्या हैं?

उत्तर: इस रोग के दो सबसे विशिष्ट लक्षण हैं:

  1. मुंह से लार टपकना: पशु के मुंह से लगातार लंबी, गाढ़ी और तार जैसी लार (Ropy saliva) टपकती रहती है।
  2. मुंह और खुरों में छाले: पशु के मसूड़ों, जीभ और खुरों के बीच (Cleft) पानी भरे बड़े-बड़े छाले (Vesicles) बन जाते हैं, जो फूटकर लाल घाव में बदल जाते हैं, जिससे पशु लंगड़ाने लगता है और खाना छोड़ देता है।

प्रश्न 3: ‘फुट बाथ’ (Foot Bath) क्या है और यह किस रोग में उपयोगी है?

उत्तर: ‘फुट बाथ’ का अर्थ है पशुओं के पैरों को किसी रोगाणुनाशक दवा से धोना। खुरपका-मुंहपका (FMD) रोग में खुरों के घाव को ठीक करने के लिए एक नालीनुमा कुंड में 1-2% नीला थोथा (Copper Sulphate) या फिनाइल का घोल भर दिया जाता है। जब बीमार पशु इस कुंड से गुजरता है, तो उसके खुरों के घाव धुल जाते हैं और कीटाणु मर जाते हैं।

प्रश्न 4: बीमार पशु के मुंह के छालों को धोने के लिए किस रसायन का उपयोग किया जाता है?

उत्तर: बीमार पशु के मुंह के छालों और घावों को धोने के लिए ‘लाल दवा’ (Potassium Permanganate / KMnO_4) के 1% हल्के घोल या 2% फिटकरी (Alum) के पानी का उपयोग किया जाता है। धोने के बाद छालों पर बोरोग्लिसरीन या शहद का लेप लगाया जाता है।

प्रश्न 5: क्या खुरपका-मुंहपका रोग (FMD) में एंटीबायोटिक (Antibiotic) दवाओं का कोई लाभ है?

उत्तर: चूंकि FMD एक विषाणु (Virus) जनित रोग है, इसलिए एंटीबायोटिक दवाएं वायरस को नहीं मार सकतीं। लेकिन, मुंह और खुर के घावों में कोई अन्य जीवाणु संक्रमण (Secondary bacterial infection) न फैले, इसे रोकने के लिए पशु चिकित्सक की सलाह पर एंटीबायोटिक (जैसे ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन) का इंजेक्शन लगाया जाता है।

प्रश्न 6: FMD रोग से बचाव के लिए पशुओं को टीका (Vaccination) कब-कब लगाया जाना चाहिए?

उत्तर: FMD से बचाव के लिए बछड़े को पहला टीका 4 महीने की उम्र में और दूसरा टीका (बूस्टर) उसके 1 महीने बाद लगाना चाहिए। इसके बाद, सभी वयस्क पशुओं को वर्ष में दो बार (हर 6 महीने के अंतराल पर) नियमित रूप से एफ.एम.डी. (FMD) का पॉलीवैलेंट टीका अवश्य लगवाना चाहिए।