MP Board Class 12 Classification of Animal Diseases पशु रोगों का वर्गीकरण

Classification of Animal Diseases : एमपी बोर्ड कक्षा 12 पशुपालन (MP Board Class 12 Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘इकाई 4: पशुओं के सामान्य रोग – 1’ के अंतर्गत ‘पशु रोगों का वर्गीकरण’ (Classification of Animal Diseases) पर एक अत्यंत विस्तृत और विश्लेषणात्मक लेख।

इस लेख में स्वस्थ और बीमार पशु की पहचान, रोगों का कारणों (संक्रामक व असंक्रामक), फैलाव (महामारी, स्थानिक) और अवधि (तीव्र, चिरकालिक) के आधार पर द्विभाषी (Bilingual) रूप में गहराई से वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है। यह बोर्ड और कृषि प्रतियोगी परीक्षाओं (PAT, ICAR) के लिए सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शिका है।

इकाई 4: पशुओं के सामान्य रोग – 1 (Common Diseases of Animals – 1)

अध्याय: पशु रोगों का वर्गीकरण (Classification of Animal Diseases) – संपूर्ण अध्ययन (कक्षा 12 पशुपालन)

1. प्रस्तावना (Introduction)

भारत विश्व में सर्वाधिक पशुधन (Livestock Population) वाला देश है। हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि और डेयरी उद्योग (Dairy Industry) का पूरा ढांचा इन्हीं पशुओं पर टिका है। एक पशुपालक का मुख्य उद्देश्य अपने पशुओं से अधिकतम दूध, मांस, ऊन या कृषि कार्य प्राप्त करना होता है। परंतु, पशुओं से यह अधिकतम उत्पादन तभी प्राप्त किया जा सकता है जब वे पूर्ण रूप से स्वस्थ (Healthy) हों।

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पशुपालन व्यवसाय में पशुओं की बीमारियां (Animal Diseases) सबसे बड़ी बाधा हैं। जब कोई दुधारू पशु (Milch animal) बीमार पड़ता है, तो न केवल उसका दूध उत्पादन शून्य हो जाता है, बल्कि चिकित्सा पर होने वाले भारी खर्च और कभी-कभी पशु की मृत्यु के कारण किसान को भयंकर आर्थिक नुकसान (Economic loss) झेलना पड़ता है।

मध्य प्रदेश बोर्ड (MP Board) के कक्षा 12 ‘पशुपालन’ (Animal Husbandry) विषय के अंतर्गत ‘पशुओं के सामान्य रोग’ एक अत्यंत महत्वपूर्ण इकाई है। किसी भी बीमारी का इलाज करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि वह बीमारी किस श्रेणी की है, कैसे फैलती है और उसका मूल कारण क्या है। इस विस्तृत लेख में हम पशु रोगों की परिभाषा, बीमार पशु के लक्षण और पादप/पशु चिकित्सा विज्ञान (Veterinary Science) के आधार पर पशु रोगों का वैज्ञानिक वर्गीकरण (Scientific Classification of Animal Diseases) का गहन अध्ययन करेंगे।

2. स्वास्थ्य और रोग की परिभाषा (Definition of Health and Disease)

पशु रोगों के वर्गीकरण को समझने से पहले ‘स्वास्थ्य’ और ‘रोग’ के वैज्ञानिक अर्थ को समझना आवश्यक है:

स्वास्थ्य (Health):

“स्वास्थ्य पशु शरीर की वह सामान्य अवस्था (Normal physiological state) है, जिसमें शरीर के सभी अंग (Organs) और तंत्र (Systems) सुचारू रूप से और एक-दूसरे के साथ पूर्ण सामंजस्य (Coordination) में कार्य करते हैं।” एक स्वस्थ पशु चुस्त रहता है, नियमित जुगाली (Rumination) करता है और उसकी उत्पादन क्षमता अपने अधिकतम स्तर पर होती है।

रोग या बीमारी (Disease):

“पशु के शरीर या उसके किसी अंग की सामान्य जैविक और शारीरिक क्रियाओं (Physiological functions) में उत्पन्न होने वाला वह व्यवधान या रुकावट (Deviation/Disturbance), जिसके कारण पशु अस्वस्थ हो जाता है और उसमें असामान्य लक्षण (Abnormal symptoms) प्रकट होने लगते हैं, उसे रोग (Disease) कहते हैं।”

3. स्वस्थ और बीमार पशु की पहचान (Identification of Healthy and Sick Animal)

बोर्ड परीक्षाओं में यह प्रश्न बहुत बार पूछा जाता है कि एक पशुपालक बीमार पशु को कैसे पहचानेगा।

एक स्वस्थ पशु के लक्षण (Signs of a Healthy Animal):

  1. पशु चुस्त (Active) और सतर्क रहता है। उसकी आंखें चमकीली होती हैं।
  2. उसका थूथन (Muzzle – नाक का अगला भाग) हमेशा नम (Moist) रहता है और उस पर पानी की बारीक बूंदें दिखाई देती हैं।
  3. पशु नियमित रूप से चारा खाता है और पेट भरकर बैठने के बाद जुगाली (Rumination) करता है।
  4. उसके शरीर का तापमान (Body temperature), नाड़ी की गति (Pulse rate), और श्वसन दर (Respiration rate) सामान्य होती है।
  5. कान खड़े रहते हैं और मक्खियां भगाने के लिए पूंछ हिलाता रहता है।

एक बीमार पशु के लक्षण (Signs of a Sick Animal):

  1. पशु सुस्त (Dull) हो जाता है, झुंड से अलग खड़ा रहता है या जमीन पर लेट जाता है।
  2. सबसे पहला लक्षण: पशु चारा-पानी छोड़ देता है और जुगाली (Rumination) करना बंद कर देता है।
  3. उसका थूथन (Muzzle) सूख जाता है (Dry and warm)।
  4. शरीर का तापमान (बुखार), नाड़ी और सांस की गति असामान्य (तेज या बहुत धीमी) हो जाती है।
  5. कान लटक जाते हैं (Drooping ears), आंखें लाल हो जाती हैं या उनमें से कीचड़/पानी (Discharge) आने लगता है।
  6. पशु का दूध उत्पादन अचानक बहुत गिर जाता है।

4. पशु रोगों का वर्गीकरण (Classification of Animal Diseases)

पशुओं में होने वाली बीमारियों को पशु चिकित्सा विज्ञान (Veterinary Epidemiology) में विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया गया है। कक्षा 12 के पाठ्यक्रम के अनुसार रोगों का वर्गीकरण मुख्य रूप से तीन आधारों पर किया जाता है:

  1. कारणों के आधार पर (Based on Causes)
  2. फैलने या प्रसार के आधार पर (Based on Spread / Epizootiology)
  3. रोग की अवधि और तीव्रता के आधार पर (Based on Course and Duration)

आइए इन सभी का विस्तार से अध्ययन करें।

4.1 कारणों के आधार पर वर्गीकरण (Classification Based on Causes)

बीमारी किस कारण से उत्पन्न हुई है, इस आधार पर पशु रोगों को मुख्य रूप से दो बड़े भागों में बांटा गया है:

(A) विशिष्ट या संक्रामक रोग (Specific or Infectious Diseases)

ये वे रोग हैं जो किसी न किसी जीवित सूक्ष्मजीव (Living Microorganism) के शरीर में प्रवेश करने के कारण होते हैं। इन सूक्ष्मजीवों को रोगजनक (Pathogens) कहा जाता है। ये रोग एक पशु से दूसरे पशु में आसानी से फैल जाते हैं। इन्हें आगे उप-वर्गों में बांटा गया है:

  1. जीवाणु जनित रोग (Bacterial Diseases): ये रोग बैक्टीरिया के संक्रमण से होते हैं।
    • उदाहरण: गलघोंटू (Hemorrhagic Septicemia – HS), लंगड़ी बुखार (Black Quarter – BQ), एंथ्रेक्स (Anthrax), थनैला (Mastitis)।
  2. विषाणु जनित रोग (Viral Diseases): ये रोग अत्यंत सूक्ष्म वायरस के कारण होते हैं और बहुत तेजी से फैलते हैं। इन रोगों का कोई पक्का एंटीबायोटिक इलाज नहीं होता, बचाव ही उपाय है।
    • उदाहरण: खुरपका-मुंहपका रोग (Foot and Mouth Disease – FMD), पशु प्लेग (Rinderpest), रेबीज (Rabies)।
  3. कवक जनित रोग (Fungal Diseases): ये फफूंदी (Fungi) के कारण होते हैं, जो मुख्य रूप से त्वचा (Skin) या श्वसन तंत्र को प्रभावित करते हैं।
    • उदाहरण: दाद (Ringworm), एस्परजिलोसिस (Aspergillosis)।
  4. परजीवी जनित रोग (Parasitic Diseases):
    • बाह्य परजीवी (Ectoparasites): जो शरीर के बाहर त्वचा पर रहकर खून चूसते हैं। (जैसे- जूं/Lice, पिस्सू, चिंचड़ी/Ticks)। चिंचड़ियां ‘बबेसिओसिस’ (Babesiosis) जैसी बीमारी फैलाती हैं।
    • आंतरिक परजीवी (Endoparasites): जो शरीर के अंदर (पेट या आंतों में) रहकर रक्त या पोषण चूसते हैं। (जैसे- फीताकृमि/Tapeworm, गोलकृमि, यकृत पर्णकृमि/Liver Fluke)।

(B) अविशिष्ट या असंक्रामक रोग (Non-Specific or Non-Infectious Diseases)

ये वे रोग हैं जो किसी सूक्ष्मजीव (जीवाणु/विषाणु) द्वारा नहीं फैलते, बल्कि शरीर के अंदर किसी खराबी, पोषण की कमी, या बाहरी चोट के कारण उत्पन्न होते हैं। ये रोग ‘छूतदार’ नहीं होते (अर्थात एक बीमार पशु से दूसरे स्वस्थ पशु में नहीं फैलते)।

  1. चयापचय रोग (Metabolic Diseases): ये शरीर में पोषक तत्वों (विशेषकर खनिजों) की अचानक कमी के कारण होने वाले खतरनाक रोग हैं।
    • उदाहरण:मिल्क फीवर (Milk Fever / दुग्ध ज्वर) – यह कैल्शियम की कमी से होता है। कीटोसिस (Ketosis) – यह ऊर्जा (कार्बोहाइड्रेट) की कमी से होता है।
  2. पोषण संबंधी रोग (Nutritional Deficiency Diseases): ये लंबे समय तक आहार में विटामिन या खनिज की कमी से होते हैं।
    • उदाहरण: रिकेट्स (Rickets) – विटामिन D की कमी। घेंघा (Goiter) – आयोडीन की कमी।
  3. यांत्रिक या भौतिक रोग (Mechanical or Physical Diseases):
    • उदाहरण: हड्डी टूटना (Bone fracture), मोच आना (Sprain), घाव (Wounds), आग से जलना (Burns)।
  4. विषाक्तता (Poisoning / Toxicity):
    • उदाहरण: जहरीले पौधे (जैसे छोटी ज्वार में HCN का बनना) खाने से जहर फैलना, सांप का काटना (Snake bite), या रासायनिक कीटनाशक चाट लेने से होने वाला जहर।
  5. आनुवंशिक रोग (Genetic / Hereditary Diseases): जो माता-पिता से बच्चों में आते हैं।

4.2 फैलने या प्रसार के आधार पर वर्गीकरण (Classification Based on Spread / Epizootiology)

यह वर्गीकरण बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। बीमारी एक पशु से दूसरे पशु तक कैसे और कितने बड़े क्षेत्र में फैलती है, इसके आधार पर रोगों को निम्नलिखित वर्गों में बांटा गया है:

1. छूतदार या संसर्गज रोग (Contagious Diseases)

वे बीमारियां जो एक बीमार पशु के प्रत्यक्ष संपर्क (Direct physical contact) में आने से दूसरे स्वस्थ पशु में तुरंत फैल जाती हैं, छूतदार रोग कहलाती हैं।

  • प्रसार का तरीका: बीमार पशु को छूने, उसके साथ चारा खाने, उसका जूठा पानी पीने या उसके मल-मूत्र के संपर्क में आने से।
  • उदाहरण:खुरपका-मुंहपका रोग (FMD), पशु प्लेग (Rinderpest), दाद (Ringworm)।

2. संक्रामक रोग (Infectious Diseases)

वे बीमारियां जो रोगजनकों (जीवाणु/विषाणु) से तो होती हैं, लेकिन वे प्रत्यक्ष संपर्क (Direct contact) से नहीं फैलतीं। इन्हें फैलने के लिए किसी ‘माध्यम’ (Medium) या ‘रोगवाहक’ (Vector – जैसे हवा, पानी, या कीट/मच्छर) की आवश्यकता होती है।

  • नोट: सभी छूतदार रोग संक्रामक होते हैं, लेकिन सभी संक्रामक रोग छूतदार हों यह आवश्यक नहीं है।
  • उदाहरण: टिटनेस (Tetanus – घाव के माध्यम से), बबेसिओसिस (चिंचड़ी के काटने से)।

3. स्थानिक रोग (Enzootic Diseases)

“वे रोग जो किसी एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र (Specific geographic area), राज्य या जिले में साल-दर-साल (लगातार) बने रहते हैं और वहां के पशुओं को प्रभावित करते हैं, स्थानिक या एंजूटिक (Enzootic) रोग कहलाते हैं।”

  • इन रोगों का कारण प्रायः उस क्षेत्र की मिट्टी, पानी या वातावरण में हमेशा मौजूद रहता है।
  • उदाहरण: तराई क्षेत्रों में ‘लिवर फ्लूक’ (Fascioliasis) का प्रकोप, या किसी विशेष मिट्टी में एंथ्रेक्स के बीजाणुओं का पाया जाना।

4. महामारी या एपिजूटिक रोग (Epidemic or Epizootic Diseases)

“वे रोग जो बहुत बड़े क्षेत्र (Large area/पूरे राज्य) में अचानक और बहुत तेजी से फैलते हैं और हजारों पशुओं को एक साथ अपनी चपेट में ले लेते हैं, महामारी या एपिजूटिक (Epizootic) रोग कहलाते हैं।”

  • ये रोग हर साल नहीं आते, लेकिन जब आते हैं तो भारी विनाश (Massive mortality) करते हैं।
  • उदाहरण: खुरपका-मुंहपका रोग (FMD) का अचानक फैलना, गलघोंटू (HS) का मानसून के बाद फैलना।

5. सर्वव्यापी या पेंजूटिक रोग (Pandemic or Panzootic Diseases)

“वे रोग जो किसी एक देश की सीमाओं को पार करते हुए महाद्वीपों या पूरी दुनिया (Worldwide) में फैल जाते हैं, सर्वव्यापी रोग कहलाते हैं।”

  • उदाहरण: ‘बर्ड फ्लू’ (Avian Influenza) का पूरी दुनिया के मुर्गियों में फैल जाना। अतीत में पशु प्लेग (Rinderpest) एक पेंजूटिक रोग था (जिसे अब दुनिया से मिटा दिया गया है)।

6. विरल या प्रकीर्ण रोग (Sporadic Diseases)

“वे रोग जो बहुत ही अनियमित अंतराल (Irregular intervals) पर और छुटपुट (Scattered/यहाँ-वहाँ कुछ पशुओं में) रूप से प्रकट होते हैं, विरल या स्पोरेडिक रोग कहलाते हैं।”

  • ये रोग न तो तेजी से फैलते हैं और न ही बहुत बड़े क्षेत्र को प्रभावित करते हैं।
  • उदाहरण: टिटनेस (Tetanus), रेबीज (Rabies – पागल कुत्ते के काटने पर ही होता है)।

4.3 रोग की अवधि और तीव्रता के आधार पर (Classification Based on Course and Duration)

बीमारी पशु के शरीर में कितनी जल्दी प्रकट होती है और कितने दिनों तक रहती है, इसके आधार पर रोगों को 4 भागों में बांटा गया है:

1. अतितीव्र रोग (Peracute Diseases)

ये वे रोग हैं जो शरीर में बहुत ही अचानक और भयानक तीव्रता (Extreme severity) के साथ उत्पन्न होते हैं।

  • अवधि: इनका प्रभाव कुछ घंटों (Hours) से लेकर अधिकतम 24 घंटे तक रहता है।
  • परिणाम: पशु को इलाज का कोई मौका नहीं मिलता और लक्षण प्रकट होने से पहले ही पशु की अचानक मृत्यु (Sudden death) हो जाती है।
  • उदाहरण:एंथ्रेक्स (Anthrax)। (इस रोग में पशु अचानक गिरकर मर जाता है और उसके प्राकृतिक छिद्रों से बिना जमा हुआ काला खून निकलता है)।

2. तीव्र रोग (Acute Diseases)

ये रोग भी तेजी से आते हैं और इनके लक्षण बहुत स्पष्ट (Clear symptoms) और गंभीर होते हैं, लेकिन इनमें पशुपालक को इलाज के लिए थोड़ा समय मिल जाता है।

  • अवधि: ये रोग 3 दिन से लेकर 1 सप्ताह (3 to 7 days) तक चलते हैं। यदि सही समय पर इलाज न हो, तो पशु मर सकता है।
  • उदाहरण:गलघोंटू (Hemorrhagic Septicemia – HS), लंगड़ी बुखार (Black Quarter), थनैला का तीव्र संक्रमण।

3. उप-तीव्र रोग (Sub-acute Diseases)

ये रोग ‘तीव्र’ और ‘चिरकालिक’ के बीच की अवस्था हैं। इनमें बीमारी के लक्षण बहुत अधिक गंभीर नहीं होते और बीमारी शरीर में धीरे-धीरे विकसित होती है।

  • अवधि: ये 2 सप्ताह से लेकर एक महीने (2 to 4 weeks) तक चल सकते हैं।
  • उदाहरण: हल्का निमोनिया (Pneumonia), एफ.एम.डी. (FMD) के बाद का संक्रमण।

4. चिरकालिक या दीर्घकालिक रोग (Chronic Diseases)

ये वे रोग हैं जो पशु के शरीर में बहुत धीरे-धीरे (Slowly) पनपते हैं और इनके लक्षण महीनों तक स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते।

  • अवधि: ये रोग महीनों से लेकर कई वर्षों (Months to Years) तक पशु के शरीर में बने रहते हैं। पशु धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है, उसकी उत्पादन क्षमता गिर जाती है, लेकिन वह तुरंत मरता नहीं है।
  • उदाहरण:तपेदिक या टी.बी. (Tuberculosis), जोहने का रोग (Johne’s disease), जोहड़ों का दर्द (Arthritis)।

5. रोग उत्पन्न करने वाले पूर्व-प्रवृत्त कारण (Predisposing Causes of Diseases)

पशु चिकित्सा में यह माना जाता है कि सूक्ष्मजीवों (Bacteria/Viruses) के अलावा कुछ ऐसे कारक (Factors) होते हैं जो पशु के शरीर को बीमारी के प्रति ‘संवेदनशील’ (Susceptible) बना देते हैं। इन्हें पूर्व-प्रवृत्त कारण (Predisposing Factors) कहते हैं:

  1. आंतरिक कारक (Intrinsic Factors): पशु की प्रजाति, उसकी नस्ल (Breed), आयु (Age), और लिंग (Sex)। (जैसे- कुछ रोग केवल गायों में होते हैं, भैंसों में नहीं; संकर गायें / Crossbred cows विदेशी होने के कारण भारतीय बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं)।
  2. बाहरी कारक (Extrinsic Factors): मौसम में अचानक बदलाव, बरसात में अत्यधिक नमी (जिससे गलघोंटू फैलता है), पशुशाला में गंदगी, गंदा पानी, या बाड़े में अत्यधिक भीड़ (Overcrowding)। ये सभी तनाव (Stress) पैदा करते हैं जिससे पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) गिर जाती है।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

कक्षा 12 पशुपालन (Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘पशु रोगों का वर्गीकरण’ (Classification of Animal Diseases) एक ऐसा आधारभूत अध्याय है जो भविष्य के डेयरी प्रबंधकों (Dairy Managers) और पशु चिकित्सकों को बीमारियों की प्रकृति समझने की दृष्टि प्रदान करता है।

रोगों का यह वर्गीकरण केवल सैद्धांतिक (Theoretical) नहीं है, बल्कि इसके व्यावहारिक उपयोग (Practical application) बहुत गहरे हैं। जब एक पशुपालक यह समझ जाता है कि ‘खुरपका-मुंहपका’ (FMD) एक ‘छूतदार महामारी’ (Contagious Epizootic) है, तो वह सबसे पहले बीमार पशु को अन्य पशुओं से अलग (Isolate) करता है। वहीं, जब उसे पता चलता है कि ‘मिल्क फीवर’ एक ‘असंक्रामक चयापचय रोग’ (Non-infectious Metabolic disease) है, तो वह बिना घबराए बीमार पशु का इलाज बाड़े में ही करवाता है क्योंकि वह रोग दूसरे पशु को नहीं फैलेगा। अतः, पशुधन की सुरक्षा और डेयरी फार्म को आर्थिक हानि से बचाने के लिए रोगों की पहचान, उनके कारण और फैलाव की अवधि का वैज्ञानिक ज्ञान होना नितांत आवश्यक है।

7. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्रश्न 1: छूतदार (Contagious) और संक्रामक (Infectious) रोग में क्या मुख्य अंतर है?

उत्तर: सभी छूतदार रोग संक्रामक होते हैं, लेकिन सभी संक्रामक रोग छूतदार नहीं होते। छूतदार रोग वे हैं जो एक बीमार पशु के सीधे संपर्क (Direct physical contact) या उसके जूठे चारे-पानी से दूसरे स्वस्थ पशु में तुरंत फैल जाते हैं (जैसे खुरपका-मुंहपका)। जबकि संक्रामक रोग रोगजनकों (Bacteria) से तो होते हैं, लेकिन वे सीधे संपर्क से नहीं फैलते, उन्हें फैलने के लिए हवा, पानी या किसी कीट (मच्छर/चिंचड़ी) जैसे माध्यम की आवश्यकता होती है (जैसे टिटनेस, बबेसिओसिस)।

प्रश्न 2: ‘मिल्क फीवर’ (Milk Fever) किस प्रकार का रोग है और इसका क्या कारण है?

उत्तर: मिल्क फीवर (दुग्ध ज्वर) एक ‘अविशिष्ट या असंक्रामक’ (Non-infectious) रोग है। यह मुख्य रूप से एक चयापचय रोग (Metabolic disease) है। यह रोग ब्याने (Calving) के तुरंत बाद उच्च दुग्ध उत्पादक गायों और भैंसों के शरीर (रक्त) में कैल्शियम (Calcium) की अचानक भारी कमी के कारण होता है। इसमें पशु को बुखार नहीं होता, बल्कि शरीर ठंडा पड़ जाता है।

प्रश्न 3: स्थानिक (Enzootic) और महामारी (Epizootic) रोग में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • स्थानिक (Enzootic): वह रोग जो किसी एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र (जैसे एक जिला या तराई क्षेत्र) में साल-दर-साल लगातार बना रहता है और वहां के पशुओं को प्रभावित करता है।
  • महामारी (Epizootic): वह रोग जो किसी बहुत बड़े क्षेत्र (जैसे पूरे राज्य या देश) में अचानक और बहुत तेजी से फैलता है और एक साथ हजारों पशुओं को अपनी चपेट में ले लेता है (जैसे FMD का फैलना)।

प्रश्न 4: ‘अतितीव्र’ (Peracute) और ‘चिरकालिक’ (Chronic) रोगों में क्या अंतर है? एक-एक उदाहरण दें।

उत्तर:

  • अतितीव्र रोग: ये शरीर में अचानक उत्पन्न होते हैं और कुछ घंटों (0-24 घंटे) में ही पशु की मृत्यु कर देते हैं। इलाज का मौका नहीं मिलता। उदाहरण: एंथ्रेक्स (Anthrax)।
  • चिरकालिक रोग: ये शरीर में बहुत धीरे-धीरे पनपते हैं और महीनों से लेकर कई वर्षों तक पशु के शरीर में बने रहते हैं। पशु धीरे-धीरे कमजोर होता है। उदाहरण: तपेदिक (Tuberculosis / TB)।

प्रश्न 5: बीमार पशु को पहचानने के कोई चार प्रमुख लक्षण लिखिए।

उत्तर: 1. पशु सबसे पहले चारा खाना और जुगाली (Rumination) करना बंद कर देता है। 2. पशु सुस्त होकर झुंड से अलग खड़ा रहता है या लेट जाता है। 3. पशु का थूथन (Muzzle – नाक) सूख जाता है और गर्म हो जाता है। 4. शरीर का तापमान (बुखार), सांस की गति और नाड़ी की गति असामान्य हो जाती है और दूध उत्पादन अचानक गिर जाता है।

प्रश्न 6: ‘पूर्व-प्रवृत्त कारण’ (Predisposing Factors) किसे कहते हैं?

उत्तर: पशु चिकित्सा में वे बाहरी या आंतरिक कारक (Factors) जो स्वयं बीमारी पैदा नहीं करते, लेकिन वे पशु के शरीर को कमजोर कर देते हैं जिससे रोगजनक (Bacteria) आसानी से हमला कर सकें, उन्हें पूर्व-प्रवृत्त कारण कहते हैं। उदाहरण: मौसम का अचानक बदलना, बाड़े में अत्यधिक गंदगी, भीड़ (Overcrowding), या संकर नस्ल (Crossbreed) का होना।