Common Diseases of Animals Rinderpest : एमपी बोर्ड कक्षा 12 पशुपालन (MP Board Class 12 Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘इकाई 4: पशुओं के सामान्य रोग – 1’ के अंतर्गत ‘पशु प्लेग रोग’ (Rinderpest / Cattle Plague) पर एक अत्यंत विस्तृत और ऐतिहासिक व वैज्ञानिक लेख।
इस लेख में पशु प्लेग के कारण, भयंकर लक्षण (शूटिंग डायरिया), उपचार, गोट टिश्यू वैक्सीन (GTV) द्वारा बचाव और इसके वैश्विक उन्मूलन (Global Eradication) का द्विभाषी (Bilingual) रूप में गहराई से अध्ययन किया गया है। यह बोर्ड और कृषि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शिका है।
इकाई 4: पशुओं के सामान्य रोग – 1 (Common Diseases of Animals – 1)
अध्याय: पशु प्लेग या माता रोग (Rinderpest / Cattle Plague) – संपूर्ण अध्ययन (कक्षा 12 पशुपालन)
1. प्रस्तावना (Introduction)
पशुपालन (Animal Husbandry) के इतिहास में यदि किसी एक बीमारी ने पूरी दुनिया के पशुधन (Livestock) और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक तबाही मचाई है, तो वह ‘पशु प्लेग’ (Rinderpest) है। इसे अंग्रेजी में ‘कैटल प्लेग’ (Cattle Plague) और भारतीय ग्रामीण भाषा में ‘माता रोग’, ‘पोकनी’, ‘महामारी’ या ‘सीतला’ के नाम से जाना जाता था।
यह जुगाली करने वाले खुरदार पशुओं (Cloven-hoofed ruminants) विशेषकर गाय और भैंस का एक अत्यंत भयंकर, छूतदार (Highly Contagious) और जानलेवा विषाणु जनित (Viral) रोग था। इस बीमारी की मृत्यु दर (Mortality rate) इतनी भयानक थी कि यदि यह रोग किसी गांव में फैल जाता था, तो 80% से 90% पशुओं की मौत हो जाती थी। इस रोग के कारण पशुओं के पाचन तंत्र (Digestive system) में भयंकर सूजन आ जाती थी और पशु को खूनी दस्त (Bloody diarrhea) लग जाते थे।
एक ऐतिहासिक विजय (A Historical Victory):
कृषि छात्रों के लिए यह जानना अत्यंत गर्व का विषय है कि पशु चिकित्सा विज्ञान (Veterinary Science) और व्यापक टीकाकरण (Vaccination) अभियानों की बदौलत आज पशु प्लेग को पूरी दुनिया से जड़ से मिटा दिया गया है (Globally Eradicated)। भारत 2006 में इस रोग से मुक्त हो गया था, और 2011 में ‘विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन’ (OIE) ने इसे पूरी दुनिया से समाप्त घोषित कर दिया।
यद्यपि यह रोग अब प्रकृति में मौजूद नहीं है, फिर भी कक्षा 12 के ‘पशुपालन’ पाठ्यक्रम में इसे इसलिए पढ़ाया जाता है ताकि छात्र ‘महामारी विज्ञान’ (Epidemiology) के सिद्धांतों को समझ सकें और जान सकें कि टीकों (Vaccines) के माध्यम से एक भयानक महामारी को कैसे हराया जाता है।
आइए, इस ऐतिहासिक और विनाशकारी पादप/पशु रोग का वैज्ञानिक अध्ययन करें।
2. रोग का कारण (Causal Organism / Etiology)
पशु प्लेग किसी जीवाणु या कवक से नहीं, बल्कि एक अत्यंत सूक्ष्म और आक्रामक विषाणु (Virus) के कारण होता था।
- विषाणु का नाम: यह ‘पैरामिक्सोविरिडी’ (Paramyxoviridae) कुल के ‘मॉर्बिलीवायरस’ (Morbillivirus) नामक RNA विषाणु द्वारा फैलता था।
- विषाणु की प्रकृति: यह वायरस इंसानों में ‘खसरा’ (Measles) फैलाने वाले वायरस का ही एक रूप था। यह वायरस शरीर के बाहर बहुत कमजोर होता था और धूप (Sunlight), गर्मी (Heat) या सामान्य जीवाणुनाशकों (Disinfectants जैसे फिनाइल) के संपर्क में आते ही कुछ घंटों में मर जाता था। लेकिन पशु के शरीर (विशेषकर पाचन तंत्र) के अंदर यह तबाही मचा देता था।
3. रोग का प्रसार या फैलाव (Transmission of the Disease)
पशु प्लेग एक अत्यंत तीव्र गति से फैलने वाली महामारी (Epizootic disease) थी। यह मुख्य रूप से निम्नलिखित माध्यमों से एक पशु से दूसरे पशु में फैलती थी:
- सीधा संपर्क (Direct Physical Contact): स्वस्थ पशु के बीमार पशु को छूने या उसके साथ एक ही बाड़े में बंधे होने से।
- शारीरिक स्राव (Bodily Secretions and Excretions): बीमार पशु की आंखों के आंसू (Tears), नाक का स्राव (Nasal discharge), मुंह की लार (Saliva), और सबसे महत्वपूर्ण— उसके मल-मूत्र (Dung and Urine) में यह वायरस भारी मात्रा में मौजूद होता था।
- दूषित चारा और पानी (Contaminated Feed and Water): जब बीमार पशु का मल या लार चारे या पीने के पानी के कुंड (Water trough) में मिल जाती थी, और स्वस्थ पशु उसे खाता-पीता था, तो वायरस उसके पाचन तंत्र में प्रवेश कर जाता था।
- हवा द्वारा (Air-borne): बहुत कम दूरी तक (पशुशाला के अंदर) यह वायरस छींकने या खांसने पर हवा की बूंदों (Droplets) द्वारा भी फैलता था।
- माध्यम (Fomites): ग्वाले (पशुपालक) के कपड़ों, जूतों, दूषित बर्तनों और पक्षियों (कौवे, कुत्ते) द्वारा जो बीमार पशु का मल खाते थे, उनके माध्यम से भी यह बीमारी एक गांव से दूसरे गांव फैल जाती थी।
4. रोग के प्रमुख लक्षण (Symptoms of the Disease)
पशु प्लेग (Rinderpest) का वायरस मुख्य रूप से पशु के पाचन तंत्र की श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrane of the digestive tract) को अपना शिकार बनाता था। शरीर में वायरस प्रवेश करने के 3 से 8 दिन बाद (Incubation Period) इसके भयानक लक्षण प्रकट होते थे। बीमारी को तीन मुख्य अवस्थाओं में बांटा जा सकता है:
प्रथम अवस्था: तीव्र ज्वर (First Stage: High Fever)
- तेज बुखार: बीमारी की शुरुआत में पशु को अचानक बहुत तेज बुखार (104°F से 107°F) हो जाता था।
- सुस्ती: पशु उदास और सुस्त हो जाता था, कान लटक जाते थे और रोएं (बाल) खड़े हो जाते थे।
- भूख मरना: पशु चारा खाना और जुगाली करना (Rumination) तुरंत बंद कर देता था।
- दूध गिरना: दुधारू गायों और भैंसों का दूध उत्पादन अचानक शून्य हो जाता था। थूथन (Muzzle/नाक) एकदम सूख जाती थी।
द्वितीय अवस्था: स्राव और मुंह के छाले (Second Stage: Discharges and Mouth Lesions)
- आंखों और नाक से स्राव: पशु की आंखें लाल हो जाती थीं और उनमें से लगातार आंसू और बाद में गाढ़ा कीचड़ (Purulent discharge) बहने लगता था। नाक से भी गाढ़ा बलगम निकलता था।
- मुंह के घाव (Mouth Lesions): यह सबसे विशिष्ट लक्षण था। पशु के निचले होंठ (Lower lip), मसूड़ों (Gums) और जीभ के नीचे छोटे-छोटे दाने निकल आते थे। ये दाने फूटकर घाव बन जाते थे जिन पर ‘चोकर या भूसी’ (Bran-like deposits) जैसी सफेद/स्लेटी रंग की परत जम जाती थी। (नोट: खुरपका-मुंहपका/FMD में पानी भरे छाले होते हैं, जबकि पशु प्लेग में भूसी जैसे घाव होते हैं)।
- मुंह से अत्यधिक लार (Saliva) टपकती थी और मुंह से भयानक सड़ांध (Foul odor) आती थी। पशु दर्द के कारण दांत पीसता था।
तृतीय अवस्था: शूटिंग डायरिया (Third Stage: Shooting Diarrhea)
- पिचकारी वाले दस्त: बुखार शुरू होने के 3-4 दिन बाद पशु को भयंकर दस्त लग जाते थे। मल बहुत ही पतला, बदबूदार और पानी जैसा होता था, जो पिचकारी की तरह (Shooting diarrhea) दूर तक गिरता था। इसी लक्षण के कारण इसे ग्रामीण भाषा में ‘पोकनी’ कहा जाता था।
- खूनी दस्त: दस्त के अंदर श्लेष्मा (Mucus/आंव) और खून (Blood) के थक्के आते थे।
- अत्यधिक कमजोरी (Dehydration): लगातार दस्त के कारण पशु के शरीर में पानी की भारी कमी (Dehydration) हो जाती थी। उसकी आंखें गड्ढे में धंस जाती थीं (Sunken eyes) और पेट पिचक जाता था।
- मृत्यु (Death): अंततः पशु इतना कमजोर हो जाता था कि वह जमीन पर गिर जाता था और दस्त लगने के 6 से 10 दिन के भीतर उसकी तड़प-तड़प कर दर्दनाक मृत्यु हो जाती थी।
5. खुरपका-मुंहपका (FMD) और पशु प्लेग (Rinderpest) में अंतर
चूंकि दोनों ही विषाणु जनित महामारियां हैं और दोनों में मुंह में घाव होते हैं, इसलिए छात्र अक्सर भ्रमित हो जाते हैं।
| विशेषता | पशु प्लेग (Rinderpest) | खुरपका-मुंहपका (FMD) |
| मृत्यु दर (Mortality) | बहुत अधिक (80-90% पशु मर जाते थे)। | बहुत कम (2-5%), पशु लंगड़ा हो जाता है पर मरता नहीं। |
| प्रमुख लक्षण | भयंकर ‘शूटिंग डायरिया’ (पिचकारी वाले दस्त) और खूनी मल। | मुंह से तार जैसी लंबी लार टपकना और पैरों में छाले। |
| मुंह के घाव | मसूड़ों पर भूसी (Bran) जैसे सफेद धब्बे बनते थे। | पानी भरे बड़े छाले (Vesicles) जो फूटकर लाल घाव बनते हैं। |
| खुरों की स्थिति | खुरों में कोई घाव नहीं होते थे। | खुरों के बीच छाले होते हैं, पशु लंगड़ा कर चलता है। |
6. पशु प्लेग का उपचार (Treatment of Rinderpest)
चूंकि यह एक भयंकर विषाणु जनित (Viral) रोग था, इसलिए चिकित्सा विज्ञान में इसका कोई विशिष्ट एंटीबायोटिक या पक्का इलाज (No Specific Cure) नहीं था। एक बार वायरस शरीर में घुस गया, तो उसे खत्म करने की कोई दवा नहीं थी। पशु चिकित्सक केवल ‘लक्षण आधारित चिकित्सा’ (Symptomatic Treatment) करके पशु की जान बचाने का प्रयास करते थे:
6.1 दस्त रोकने का उपचार (Treatment for Diarrhea)
पशु की मृत्यु मुख्य रूप से अत्यधिक दस्त (Dehydration) के कारण होती थी। अतः दस्त रोकने के लिए ‘आंतरिक स्तंभक औषधियों’ (Internal Astringents) का प्रयोग किया जाता था:
- खड़िया मिट्टी (Chalk / Calcium carbonate), कत्था (Catechu), और अफीम (Opium) का मिश्रण बनाकर पशु को पिलाया जाता था ताकि आंतों का सिकुड़ना कम हो और दस्त रुकें।
- पशु के शरीर में पानी की कमी दूर करने के लिए नसों के माध्यम से (Intravenous – IV) ग्लूकोज और सलाइन वाटर (Saline water) की बोतलें चढ़ाई जाती थीं।
6.2 मुंह के घावों का उपचार (Mouth Lesion Treatment)
- पशु के मुंह के छालों को दिन में 2-3 बार ‘लाल दवा’ (Potassium Permanganate –
) के 1% घोल या फिटकरी (Alum) के पानी से धोया जाता था। - धोने के बाद घावों पर बोरोग्लिसरीन (Boric acid + Glycerine) या सुहागा (Borax) लगाया जाता था ताकि पशु को दर्द में आराम मिले।
6.3 द्वितीयक जीवाणु संक्रमण रोकना (Preventing Secondary Infection)
- कमजोर पशु पर अन्य जीवाणु हमला न करें, इसके लिए उसे सल्फा डिमिडिन (Sulphadimidine) या ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (Oxytetracycline) जैसी एंटीबायोटिक दवाइयां दी जाती थीं।
- पशु को बहुत ही मुलायम और सुपाच्य भोजन (जैसे चावल का मांड, दलिया) दिया जाता था।
7. रोग से बचाव एवं नियंत्रण (Prevention and Control)
पशु प्लेग जैसी महामारी का कोई इलाज नहीं था, इसलिए इससे बचने का एकमात्र हथियार सख्त नियंत्रण और ‘टीकाकरण’ (Vaccination) ही था। इसी टीकाकरण के बल पर दुनिया ने इस बीमारी को हराया है।
7.1 गोट टिश्यू वैक्सीन (G.T.V. – Goat Tissue Vaccine) – एक ऐतिहासिक खोज
(बोर्ड परीक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण)
- खोज: भारत में पशु प्लेग के नियंत्रण में सबसे बड़ी क्रांति तब आई जब डॉ. जे. टी. एडवर्ड्स (Dr. J.T. Edwards) ने 1927 में ‘भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ (IVRI), मुक्तेश्वर में गोट टिश्यू वैक्सीन (G.T.V.) का आविष्कार किया।
- निर्माण: इस टीके को बकरी (Goat) के ऊतकों (तिल्ली/Spleen) में पशु प्लेग के वायरस को कमजोर (Attenuated) करके बनाया गया था।
- उपयोग: यह टीका गाय और भैंसों की गर्दन पर त्वचा के नीचे (Subcutaneous – SC) लगाया जाता था।
- असर: यह टीका इतना प्रभावशाली था कि इसे एक बार लगाने पर पशु के शरीर में पशु प्लेग के खिलाफ आजीवन (Life-long) रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो जाती थी। भारत में ‘पशु प्लेग उन्मूलन कार्यक्रम’ (Rinderpest Eradication Programme) इसी टीके की बदौलत सफल हुआ।
7.2 टी.सी.आर.वी. (T.C.R.V. – Tissue Culture Rinderpest Vaccine)
बाद के वर्षों में आधुनिक तकनीक से ‘टिश्यू कल्चर रेंडरपेस्ट वैक्सीन’ (TCRV) बनाई गई। यह GTV से भी अधिक सुरक्षित थी और इसे विदेशी नस्ल (Crossbred) की गायों और छोटे बछड़ों को भी आसानी से लगाया जा सकता था। इसका असर भी 3 से 5 साल या आजीवन रहता था।
7.3 बचाव के अन्य उपाय (General Preventive Measures)
जब यह बीमारी अस्तित्व में थी, तब निम्नलिखित नियम अपनाए जाते थे:
- संगरोध (Quarantine): बाहर से या पशु मेले से खरीदे गए नए पशु को तुरंत अपने झुंड में न मिलाकर, 15 से 20 दिनों तक एक अलग बाड़े में (Quarantine) रखा जाता था।
- अलगाव (Isolation): बीमारी का लक्षण दिखते ही रोगी पशु को स्वस्थ पशुओं से तुरंत मीलों दूर अलग कर दिया जाता था।
- मृत पशु का निपटान: पशु प्लेग से मरने वाले पशु की खाल (Skin) नहीं उतारी जाती थी। उसके शव (Carcass) को कम से कम 6 फुट गहरे गड्ढे में चूना (Slaked lime) डालकर गाड़ दिया जाता था, ताकि वायरस बाहर न फैले।
- विषाणुनाशन (Disinfection): बीमार पशु की पशुशाला, फर्श, और नाली को 2-3% फिनाइल (Phenyl) या कार्बोलिक एसिड से अच्छी तरह धोना अनिवार्य था।
यहाँ पशु प्लेग (Rinderpest / माता रोग) से संबंधित ऐतिहासिक और शैक्षिक चित्र (Images) दिए गए हैं, जो इस विनाशकारी बीमारी के लक्षणों और इसके वायरस को समझने में आपकी मदद करेंगे।
चूंकि यह बीमारी अब पूरी दुनिया से जड़ से मिटाई जा चुकी है (Globally Eradicated), इसलिए ये चित्र ऐतिहासिक अभिलेखागार (Historical Archives) से लिए गए हैं:

पशु प्लेग का लक्षण: मसूड़ों पर ‘भूसी’ (Bran-like) जैसे घाव. Source: The Center for Food Security and Public Health – Iowa State University / Rinderpest photos – CFSPH

मुंह के अंदर का संक्रमण: तालू (Palate) पर भयंकर घाव और सड़ांध. Source: The Center for Food Security and Public Health – Iowa State University / Rinderpest photos – CFSPH

रोग का कारण: मॉर्बिलीवायरस (Morbillivirus) की सूक्ष्मदर्शीय संरचना. Source: Wikipedia / Rinderpest – Wikipedia
दृश्य विश्लेषण (Visual Insight): जैसा कि आप पहले और दूसरे चित्र में देख सकते हैं, खुरपका-मुंहपका (FMD) की तरह इसमें पानी भरे बड़े छाले नहीं होते, बल्कि मसूड़ों और तालू पर सफेद/स्लेटी रंग के दाने और ‘चोकर’ (Bran) जैसी परत जम जाती थी। यह वायरस (तीसरा चित्र) पशु के पूरे पाचन तंत्र की श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrane) को इसी तरह छील देता था, जिससे पशु को भयंकर खूनी दस्त (Shooting diarrhea) लग जाते थे।
8. निष्कर्ष (Conclusion)
मध्य प्रदेश बोर्ड कक्षा 12 के छात्रों के लिए ‘पशु प्लेग’ (Rinderpest) का अध्ययन केवल एक पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह मानव जाति और पशु चिकित्सा विज्ञान (Veterinary Science) की सबसे बड़ी जीत की कहानी है।
एक समय था जब इस बीमारी के कारण गाँव के गाँव पशुओं से खाली हो जाते थे और किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते थे। लेकिन डॉ. जे. टी. एडवर्ड्स द्वारा खोजी गई ‘गोट टिश्यू वैक्सीन’ (GTV) और पशुपालन विभाग के निरंतर ‘टीकाकरण अभियानों’ ने इस भयंकर ‘शूटिंग डायरिया’ वाली महामारी को हमेशा के लिए पृथ्वी से मिटा दिया। वर्ष 2011 में ‘विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन’ द्वारा पशु प्लेग का वैश्विक उन्मूलन (Global Eradication) इस बात का प्रमाण है कि यदि सही वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific approach), जन-जागरूकता, और प्रभावी टीकों का उपयोग किया जाए, तो किसी भी महामारी पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: पशु प्लेग (Rinderpest) रोग किस सूक्ष्मजीव के कारण होता था?
उत्तर: पशु प्लेग एक अत्यंत सूक्ष्म और आक्रामक विषाणु (Virus) के कारण होता था। यह ‘पैरामिक्सोविरिडी’ कुल का ‘मॉर्बिलीवायरस’ (Morbillivirus) था। यह किसी जीवाणु या कवक से नहीं होता था।
प्रश्न 2: पशु प्लेग का सबसे विशिष्ट और खतरनाक लक्षण क्या था?
उत्तर: पशु प्लेग का सबसे विशिष्ट और जानलेवा लक्षण ‘शूटिंग डायरिया’ (पिचकारी जैसे दस्त) था। बुखार आने के कुछ दिन बाद पशु को भयंकर पानी जैसे पतले और बदबूदार दस्त लग जाते थे, जिनमें खून और श्लेष्मा (Mucus) आता था। इसी अत्यधिक डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) के कारण पशु की मृत्यु हो जाती थी।
प्रश्न 3: G.T.V. (गोट टिश्यू वैक्सीन) क्या है और इसकी खोज किसने की?
उत्तर: G.T.V. (Goat Tissue Vaccine) पशु प्लेग रोग से बचाव का एक अत्यंत प्रभावशाली टीका था। इसकी खोज भारत में डॉ. जे. टी. एडवर्ड्स (Dr. J.T. Edwards) ने 1927 में IVRI, मुक्तेश्वर में की थी। इस टीके को एक बार लगाने पर पशु में पशु प्लेग के प्रति आजीवन (Life-long) रोग प्रतिरोधक क्षमता आ जाती थी।
प्रश्न 4: पशु प्लेग और खुरपका-मुंहपका (FMD) के मुंह के छालों में क्या मुख्य अंतर है?
उत्तर: एफ.एम.डी. (FMD) में पशु के मुंह और जीभ पर बड़े-बड़े पानी भरे छाले (Vesicles) बनते हैं जो फूटकर लाल घाव हो जाते हैं और लंबी लार टपकती है। जबकि पशु प्लेग में पानी भरे छाले नहीं होते, बल्कि मसूड़ों और होंठों के अंदर छोटे दाने होते हैं जिन पर ‘चोकर या भूसी’ (Bran-like) जैसी सफेद-स्लेटी परत जम जाती थी।
प्रश्न 5: क्या पशु प्लेग का कोई पक्का इलाज (Cure) था?
उत्तर: नहीं। चूंकि पशु प्लेग एक वायरल (विषाणु जनित) बीमारी थी, इसलिए इसका कोई सीधा या पक्का इलाज नहीं था। पशु को केवल लक्षण आधारित चिकित्सा दी जाती थी, जैसे दस्त रोकने के लिए कत्था/अफीम (Astringents) देना और घावों को लाल दवा से धोना। इस रोग का मुख्य नियंत्रण केवल ‘टीकाकरण’ (Vaccination) ही था।
प्रश्न 6: वर्तमान में पशु प्लेग (Rinderpest) की क्या स्थिति है?
उत्तर: वर्तमान में पशु प्लेग को पूरी दुनिया से जड़ से मिटा दिया गया है (Globally Eradicated)। भारत 2006 में इस रोग से मुक्त हो गया था और 2011 में इसे वैश्विक स्तर पर समाप्त घोषित कर दिया गया है। अब प्रकृति में इस रोग का कोई भी वायरस या बीमार पशु मौजूद नहीं है।