Animal Husbandry Veterinary Medicines and Equipment : एमपी बोर्ड कक्षा 12 पशुपालन (MP Board Class 12 Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘इकाई 3: पशु चिकित्सा’ के अंतर्गत ‘पशु चिकित्सा संबंधी औषधि और उपकरण’ (Veterinary Medicines and Equipment) पर एक अत्यंत विस्तृत और विश्लेषणात्मक Animal Husbandry Veterinary Medicines and Equipment लेख।
इस लेख में पशु औषधियों का वर्गीकरण (रोगाणुनाशक, रेचक, स्तंभक आदि), प्रमुख औषधियों के कार्य, और पशु चिकित्सा उपकरणों (जैसे ट्रोकार कैनुला, बर्डिजो कैस्ट्रेटर, प्रोबैंग) का उपयोग द्विभाषी (Bilingual) रूप में गहराई से समझाया गया है। यह बोर्ड और कृषि प्रतियोगी परीक्षाओं (PAT, ICAR) के लिए सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शिका है।
इकाई 3: पशु चिकित्सा (Veterinary Science)
अध्याय: पशु चिकित्सा संबंधी औषधि और उपकरण (Veterinary Medicines and Equipment) – संपूर्ण अध्ययन (कक्षा 12 पशुपालन)
1. प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन (Livestock) का महत्व सर्वोपरि है। एक सफल डेयरी फार्म (Dairy Farm) को लाभदायक बनाए रखने के लिए पशुओं का स्वस्थ रहना अत्यंत आवश्यक है। मौसम में बदलाव, दूषित आहार या सूक्ष्मजीवों (Microorganisms) के संक्रमण के कारण पशु अक्सर बीमार पड़ जाते हैं। कई बार पशुओं को अचानक चोट लग जाती है, पेट में गैस (आफरा) भर जाती है, या गले में कुछ अटक जाता है।
ऐसी आपातकालीन स्थितियों में जब तक कोई योग्य पशु चिकित्सक (Veterinary Doctor) फार्म पर पहुँचता है, तब तक पशु की जान बचाने के लिए पशुपालक को स्वयं प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) करनी पड़ती है। एक शिक्षित पशुपालक और कृषि छात्र के लिए यह जानना नितांत आवश्यक है कि प्राथमिक उपचार बॉक्स (First-aid Kit) में कौन-कौन सी औषधियां (Medicines) और उपकरण (Equipment) होने चाहिए, तथा उनका सही उपयोग कैसे और कब करना है।
मध्य प्रदेश बोर्ड (MP Board) के कक्षा 12 ‘पशुपालन’ (Animal Husbandry) के पाठ्यक्रम में ‘पशु चिकित्सा संबंधी औषधि और उपकरण’ एक अत्यधिक महत्वपूर्ण अध्याय है। बोर्ड परीक्षाओं में औषधियों के वर्गीकरण (Classification of medicines) और उपकरणों (जैसे ट्रोकार कैनुला, प्रोबैंग) के उपयोग से संबंधित प्रश्न हर वर्ष पूछे जाते हैं। इस विस्तृत लेख में हम इन सभी पहलुओं का वैज्ञानिक और व्यावहारिक (Scientific and Practical) अध्ययन करेंगे।
2. पशु चिकित्सा औषधियों का वर्गीकरण (Classification of Veterinary Medicines)
पशुओं की बीमारियों के इलाज में प्रयोग होने वाली औषधियों को उनके कार्य (Mode of Action) और शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। एक कृषि छात्र को इन वर्गों और उनके उदाहरणों का सटीक ज्ञान होना चाहिए:
2.1 रोगाणुनाशक या एंटीसेप्टिक (Antiseptics)
ये वे औषधियां हैं जो सूक्ष्मजीवों (जीवाणुओं/Bacteria) की वृद्धि को रोकती हैं या उन्हें मार देती हैं, लेकिन जीवित ऊतकों (Living tissues) को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती हैं। इनका उपयोग मुख्य रूप से पशुओं के घावों (Wounds) को धोने और साफ करने में किया जाता है।
- उदाहरण: लाल दवा (Potassium Permanganate /
), बोरिक एसिड (Boric Acid), डिटॉल (Dettol), आयोडीन (Iodine), एक्रीफ्लेविन (Acriflavine)।
2.2 जीवाणुनाशक या डिसइंफेक्टेंट (Disinfectants)
ये अत्यधिक तीव्र औषधियां हैं जो जीवाणुओं और उनके बीजाणुओं (Spores) को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं। ये इतनी तेज होती हैं कि जीवित ऊतकों (त्वचा) को जला सकती हैं, इसलिए इनका उपयोग पशु के शरीर पर नहीं, बल्कि पशुशाला (Cattle shed), फर्श, नाली और उपकरणों को साफ और कीटाणुरहित करने के लिए किया जाता है।
- उदाहरण: फिनाइल (Phenyl), चूना (Slaked lime), ब्लीचिंग पाउडर (Bleaching powder), कार्बोलिक एसिड (Carbolic acid / Phenol)।
2.3 रेचक या जुलाब (Purgatives / Laxatives)
वे औषधियां जो पशुओं के पेट और आंतों (Intestines) की सफाई करने, मल (Dung) को पतला करने और कब्ज (Constipation) को दूर करने के लिए दी जाती हैं, रेचक कहलाती हैं। तीव्रता के आधार पर इन्हें तीन भागों में बांटा गया है:
- हल्के रेचक (Laxatives): ये मल को केवल मुलायम करते हैं। (जैसे— हरा चारा, शीरा / Molasses, ईसबगोल की भूसी, गंधक / Sulphur)।
- मृदु रेचक (Simple Purgatives): ये मल को पतला करके पेट साफ करते हैं। (जैसे— अरंडी का तेल / Castor oil, अलसी का तेल / Linseed oil, मैग्नीशियम सल्फेट / Epsom salt)।
- तीव्र रेचक (Drastic Purgatives): ये बहुत तेज होते हैं और आंतों में मरोड़ पैदा करके दस्त (Diarrhea) लगा देते हैं। (जैसे— जमालघोटा / Croton oil, बेरियम क्लोराइड, एलोए / Aloes)।
2.4 स्तंभक या संकोचक (Astringents)
ये वे औषधियां हैं जो रक्त वाहिकाओं (Blood vessels) को सिकोड़ कर खून का बहना (Bleeding) रोकती हैं या आंतों की श्लेष्मिक झिल्ली (Mucous membrane) को सिकोड़ कर दस्त (Diarrhea/Scours) को रोकती हैं।
- बाह्य स्तंभक (External Astringents – खून रोकने वाले): फिटकरी (Alum), टिंचर आयोडीन (Tincture Iodine), बर्फ (Ice)।
- आंतरिक स्तंभक (Internal Astringents – दस्त रोकने वाले): कत्था (Catechu), खड़िया मिट्टी (Chalk / Calcium carbonate), अफीम (Opium)।
2.5 उत्तेजक (Stimulants)
वे औषधियां जो पशु के नाड़ी तंत्र (Nervous system), श्वसन तंत्र, या हृदय की गति को तेज कर देती हैं और पशु में स्फूर्ति (Energy) लाती हैं, उत्तेजक कहलाती हैं। इनका उपयोग बेहोशी (Fainting) या अत्यधिक कमजोरी में किया जाता है।
- उदाहरण: अल्कोहल (Alcohol), कपूर (Camphor), अमोनिया (Ammonia), कैफीन (Caffeine / चाय, कॉफी)।
2.6 कृमिनाशक (Anthelmintics)
पशुओं के पेट या आंतों में पाए जाने वाले हानिकारक परजीवियों (Internal parasites / Worms) जैसे फीताकृमि (Tapeworm) या गोलकृमि (Roundworm) को मारने और मल के रास्ते बाहर निकालने वाली औषधियां कृमिनाशक कहलाती हैं।
- उदाहरण: नीला थोथा (Copper sulphate), फेनोथायजीन (Phenothiazine), पिपराजिन (Piperazine), एल्बेन्डाजोल (Albendazole)।
2.7 ज्वरनाशक (Antipyretics)
वे औषधियां जो पशु के शरीर का तापमान (Body temperature) कम करके बुखार (Fever) को उतारने का काम करती हैं, ज्वरनाशक कहलाती हैं।
- उदाहरण: एस्पिरिन (Aspirin), कुनैन (Quinine), पैरासिटामोल (Paracetamol)।
2.8 पीड़ानाशक (Analgesics)
वे औषधियां जो पशुओं के शरीर के दर्द (Pain) को कम करती हैं या खत्म कर देती हैं।
- उदाहरण: नोवोकेन (Novocaine – लोकल एनेस्थीसिया), कोकीन, कपूर (Camphor)।
2.9 वातसारी या गैसनाशक (Carminatives)
ये औषधियां आंतों और पेट (Rumen) की गैस को बाहर निकालने और आफरा (Tympany / Bloat) को कम करने में मदद करती हैं।
- उदाहरण: हींग (Asafoetida), अजवाइन, सौंफ, पुदीना का अर्क, तारपीन का तेल (Turpentine oil)।
3. प्रमुख पशु चिकित्सा औषधियां एवं उनके विस्तृत उपयोग (Major Veterinary Medicines and their Uses)
बोर्ड परीक्षा में विशेष औषधियों के कार्य विस्तार से पूछे जाते हैं। आइए कुछ प्रमुख औषधियों का अध्ययन करें:
3.1 लाल दवा (Potassium Permanganate –
)
- प्रकृति: यह एक शक्तिशाली रोगाणुनाशक (Antiseptic) और दुर्गंधनाशक (Deodorant) है। यह गहरे बैंगनी (Dark purple) रंग के क्रिस्टल के रूप में होती है।
- उपयोग:
- इसका 1 से 2% का हल्का घोल पशुओं के घावों (Wounds) और गर्भाशय (Uterus) को धोने के काम आता है।
- सांप (Snake) या पागल कुत्ते के काटने पर घाव के ऊपर इसका सूखा पाउडर भर दिया जाता है, जो जहर को नष्ट कर देता है।
- विषैले पदार्थ (Poison) खा लेने पर पशु का पेट धोने (Stomach wash) के लिए इसका हल्का घोल पिलाया जाता है।
3.2 फिटकरी (Alum)
- प्रकृति: यह एक बाह्य स्तंभक (External Astringent) और रोगाणुनाशक है।
- उपयोग:
- चोट लगने पर बहते हुए खून (Bleeding) को तुरंत रोकने के लिए घाव पर फिटकरी का पाउडर लगाया जाता है (क्योंकि यह रक्त की नलिकाओं को सिकोड़ देती है)।
- मोच (Sprain) आने पर सूजन (Swelling) को कम करने के लिए फिटकरी का लेप लगाया जाता है।
- आंख आने (Conjunctivitis) पर इसके 1% घोल से पशु की आंखें धोई जाती हैं।
3.3 अरंडी का तेल (Castor Oil)
- प्रकृति: यह एक बहुत ही सुरक्षित और उत्तम ‘मृदु रेचक’ (Simple Purgative) है।
- उपयोग:
- कब्ज (Constipation) होने पर पेट साफ करने के लिए।
- चूँकि यह पेट में कोई मरोड़ (Griping) पैदा नहीं करता, इसलिए इसे गाभिन (Pregnant) पशुओं और छोटे बछड़ों को देना सबसे सुरक्षित माना जाता है।
- छोटे बछड़ों को जन्म के बाद पहला मल (Meconium) निकालने के लिए 2-3 चम्मच अरंडी का तेल पिलाया जाता है।
3.4 मैग्नीशियम सल्फेट (Magnesium Sulphate / Epsom Salt)
- प्रकृति: इसे साधारण भाषा में ‘एप्सम सॉल्ट’ कहते हैं। यह एक खारा रेचक (Saline Purgative) है।
- उपयोग:
- गाय-भैंस को कब्ज होने पर 250 से 400 ग्राम मैग्नीशियम सल्फेट पानी में घोलकर पिलाने से दस्त लग जाते हैं और पेट साफ हो जाता है।
- शरीर के किसी भाग में मोच या बाहरी सूजन (Swelling) होने पर मैग्नीशियम सल्फेट को गर्म पानी में घोलकर सेकाई (Fomentation) करने से दर्द और सूजन में आराम मिलता है।
3.5 नीला थोथा (Copper Sulphate –
)
- प्रकृति: यह नीले रंग का क्रिस्टल होता है। यह कृमिनाशक (Anthelmintic) और रोगाणुनाशक है।
- उपयोग:
- पशुओं के पेट के कीड़े (Internal parasites) मारने के लिए इसके 1% घोल (250-300 ml) को पशु को पिलाया जाता है।
- खुरपका-मुंहपका रोग (FMD – Foot and Mouth Disease): इस रोग में पशुओं के खुरों (Hooves) के घाव धोने के लिए फुट-बाथ (Foot bath) में नीले थोथे के 1% घोल का प्रयोग किया जाता है।
3.6 टिंचर आयोडीन (Tincture Iodine)
- प्रकृति: यह आयोडीन (2-3%), पोटेशियम आयोडाइड और अल्कोहल का मिश्रण है। यह एक उत्तम एंटीसेप्टिक (Antiseptic) है।
- उपयोग:
- शल्य चिकित्सा (Surgery) से पहले और बाद में घाव और त्वचा को कीटाणुरहित करने के लिए।
- नवजात बछड़े की कटी हुई नाभि (Navel cord) पर संक्रमण (Navel ill) रोकने के लिए टिंचर आयोडीन लगाया जाता है।
3.7 बोरिक एसिड (Boric Acid)
- प्रकृति: यह एक बहुत ही हल्का, सफेद रंग का रोगाणुनाशक (Mild Antiseptic) चूर्ण है।
- उपयोग: यह बहुत नरम होता है, इसलिए इसका उपयोग पशुओं की आंखों और कान के संक्रमण को धोने (Eye wash) और मुंह के छालों (Mouth ulcers) पर लगाने के लिए किया जाता है।
4. पशु चिकित्सा संबंधी प्रमुख उपकरण एवं उनके उपयोग (Major Veterinary Equipments and their Uses)
प्राथमिक चिकित्सा के लिए पशुशाला (Dairy Farm) में कुछ उपकरणों का होना नितांत आवश्यक है। कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षा में इन उपकरणों के नाम और उनके विशिष्ट उपयोग (Specific uses) पूछे जाते हैं:
4.1 ट्रोकार एवं कैनुला (Trocar and Canula)
- बनावट: यह स्टेनलेस स्टील का बना एक नुकीला उपकरण होता है। इसके दो भाग होते हैं— अंदर एक नुकीला भाले जैसा भाग (Trocar) और उसके ऊपर चढ़ी हुई एक खोखली नली (Canula)।
- उपयोग: यह उपकरण पशुओं में आफरा (Tympany / Bloat) रोग के समय जान बचाने का सबसे प्रमुख यंत्र है। जब पशु के पेट (रुमेन) में अत्यधिक गैस भर जाती है और पशु मरने की स्थिति में होता है, तो पेट के बाईं ओर (Left Paralumbar fossa) छेद करके इसे घुसाया जाता है। अंदर जाते ही नुकीले ट्रोकार को बाहर निकाल लिया जाता है और कैनुला (खोखली नली) पेट में ही रह जाती है, जिससे सारी जहरीली गैस तेजी से बाहर निकल जाती है।
4.2 बर्डिजो कैस्ट्रेटर (Burdizzo Castrator)
- बनावट: यह एक बड़े और भारी चिमटे या सरौते (Pincer) जैसा उपकरण होता है जिसके किनारे कुंद (Blunt) होते हैं।
- उपयोग: इसका उपयोग नर पशुओं (बछड़ों/बकरों) को बधिया (Castration) करने के लिए किया जाता है। यह ‘रक्तहीन बधियाकरण’ (Bloodless Castration) की सबसे उत्तम विधि है।
- कार्यप्रणाली: इसे नर पशु के अंडकोष के ऊपर स्थित ‘स्पर्मेटिक कॉर्ड’ (Spermatic cord) को दबाकर कुचलने के लिए प्रयोग किया जाता है। इससे त्वचा नहीं कटती, खून नहीं निकलता, लेकिन नस कुचल जाने से अंडकोषों को रक्त नहीं मिलता और वे सूख जाते हैं।
4.3 प्रोबैंग (Probang)
- बनावट: यह रबड़, प्लास्टिक या चमड़े की बनी लगभग 4.5 से 5 फीट लंबी एक लचीली (Flexible) और खोखली नली होती है, जिसके एक सिरे पर लकड़ी या लोहे का गुंबद (Bulb) लगा होता है।
- उपयोग: इसका उपयोग पशु के गले या आहार नली (Esophagus) में अटकी हुई किसी वस्तु (जैसे सेब, आलू, या चारे का कड़ा टुकड़ा) को धकेल कर पेट (Rumen) में पहुंचाने के लिए किया जाता है। इस अवस्था को ‘चोकिंग’ (Choking) कहते हैं।
4.4 ड्रेन्चिंग बॉटल (Drenching Bottle)
- बनावट: यह कांच या प्लास्टिक की बनी एक बोतल होती है, जिसकी गर्दन (Neck) लंबी और थोड़ी टेढ़ी (Curved) होती है।
- उपयोग: इसका उपयोग पशुओं को तरल औषधियां (Liquid medicines) या काढ़ा सुरक्षित रूप से पिलाने के लिए किया जाता है। लंबी गर्दन के कारण दवा सीधे पशु की जीभ के पीछे जाती है, जिससे दवा के श्वास नली (Trachea) में जाने का खतरा (Aspiration pneumonia) नहीं रहता।
4.5 टीट साइफन (Teat Siphon)
- बनावट: यह चांदी, स्टील या प्लास्टिक की बनी एक बहुत छोटी (लगभग 2 से 3 इंच), पतली और खोखली नली होती है जिसके एक सिरे पर छिद्र होते हैं।
- उपयोग: इसका उपयोग थनैला रोग (Mastitis) होने पर, या जब किसी चोट के कारण गाय का थन (Teat) बंद हो जाता है, तब थन के छेद (Teat canal) में डालकर दूध या मवाद को बाहर निकालने के लिए किया जाता है।
4.6 क्लिनिकल थर्मामीटर (Clinical Thermometer)
- उपयोग: इसका उपयोग पशुओं के शरीर का तापमान (Body temperature) मापने के लिए किया जाता है।
- विशेषता: पशुओं का तापमान हमेशा गुदा (Rectum) में थर्मामीटर लगाकर मापा जाता है। एक सामान्य गाय का शारीरिक तापमान लगभग 101.5°F (38.6°C) होता है।
4.7 माउथ गैग (Mouth Gag)
- बनावट: यह लोहे का बना एक छल्लेदार उपकरण होता है।
- उपयोग: जब पशु को मुंह के रास्ते कोई दवा पिलानी हो, दांतों की जांच करनी हो, या प्रोबैंग अंदर डालना हो, तो पशु के मुंह को जबरदस्ती खुला रखने (To keep the mouth open) के लिए माउथ गैग का उपयोग किया जाता है। इससे पशु जीभ नहीं काट सकता।
4.8 डॉकिंग मशीन (Docking Machine)
- उपयोग: इस उपकरण का उपयोग भेड़ों (Sheep) की पूंछ काटने (Tail amputation/Docking) के लिए किया जाता है। ऊन को गंदा होने से बचाने और परजीवियों (Parasites) के संक्रमण को रोकने के लिए भेड़ों में डॉकिंग की जाती है।
4.9 सिरिंज एवं नीडल (Syringe and Needle)
- उपयोग: इसका उपयोग पशु के शरीर में इंजेक्शन के माध्यम से तरल औषधि पहुंचाने या जांच के लिए रक्त (Blood) निकालने के लिए किया जाता है। इंजेक्शन मुख्य रूप से मांसपेशियों (Intramuscular – IM), नसों (Intravenous – IV), या त्वचा के नीचे (Subcutaneous – SC) लगाए जाते हैं।
4.10 खुर काटने की कैंची (Hoof Trimmer)
- उपयोग: पशुओं के बढ़े हुए खुरों (Hooves) को काटने और उन्हें सही आकार देने (Hoof trimming) के लिए, ताकि पशु सही ढंग से चल सके और उसे खुर के रोग न हों।
5. प्राथमिक उपचार (First Aid) का महत्व एवं सावधानियां
प्राथमिक उपचार क्या है?
पशु के बीमार होने या दुर्घटनाग्रस्त होने पर, पशु चिकित्सक (Veterinary doctor) के आने से पूर्व, पशुपालक द्वारा पशु की जान बचाने और दर्द कम करने के लिए जो भी चिकित्सा या उपाय किए जाते हैं, उसे प्राथमिक उपचार (First Aid) कहते हैं।
प्राथमिक उपचार करते समय बरती जाने वाली सावधानियां:
- धैर्य रखें (Keep Patience): पशुपालक को घबराना नहीं चाहिए। यदि पशु छटपटा रहा है तो उसे शांत करने का प्रयास करें।
- रक्तस्राव रोकें (Stop Bleeding): यदि पशु को गहरी चोट लगी है, तो सबसे पहले साफ कपड़े या ‘टिंचर आयोडीन’ और ‘फिटकरी’ की मदद से बहते हुए खून को रोकने का प्रयास करें।
- गैस निकालें (Relieve Bloat): आफरा (गैस) होने पर पशु को बैठने न दें, उसे चलाते रहें। यदि गैस बहुत अधिक हो, तो तुरंत ‘ट्रोकार कैनुला’ का प्रयोग करें।
- जबरदस्ती दवा न पिलाएं: यदि पशु बेहोश है या उसे सांस लेने में दिक्कत है, तो उसे ड्रेन्चिंग बोतल से जबरदस्ती दवा न पिलाएं, दवा फेफड़ों में जा सकती है (Aspiration pneumonia)।
- स्वच्छता (Hygiene): किसी भी उपकरण (जैसे टीट साइफन, नीडल) का प्रयोग करने से पहले उसे पानी में उबालकर (Sterilize) कीटाणुरहित अवश्य कर लें।
6. निष्कर्ष (Conclusion)
कक्षा 12 पशुपालन के छात्रों के लिए ‘पशु चिकित्सा संबंधी औषधि और उपकरण’ मात्र एक अध्याय नहीं है, बल्कि यह एक डेयरी फार्म को सुरक्षित और सुचारू रूप से चलाने का व्यावहारिक विज्ञान है।
अज्ञानतावश गलत दवा या गलत उपकरण के प्रयोग से पशु की मृत्यु हो सकती है। एक जागरूक पशुपालक को पता होना चाहिए कि आफरा (Tympany) आने पर उसे ट्रोकार कैनुला का उपयोग करना है, जबकि गले में सेब अटकने पर प्रोबैंग का। इसी प्रकार, उसे यह ज्ञान होना चाहिए कि बछड़े को कब्ज होने पर ‘तीव्र रेचक’ (जैसे जमालघोटा) न देकर ‘मृदु रेचक’ (अरंडी का तेल) देना है। पशु चिकित्सा उपकरणों की सही पहचान, उनके उपयोग की सटीक जानकारी और प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स (First-aid kit) की उपलब्धता ही पशुओं की जान बचाती है और पशुपालक को भारी आर्थिक नुकसान से रोकती है।
7. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: रोगाणुनाशक (Antiseptic) और जीवाणुनाशक (Disinfectant) औषधियों में क्या मुख्य अंतर है?
उत्तर:
- रोगाणुनाशक (Antiseptic): ये हल्की औषधियां हैं जो सूक्ष्मजीवों को मारती हैं लेकिन जीवित ऊतकों (त्वचा) को कोई नुकसान नहीं पहुंचातीं। इनका उपयोग पशुओं के घावों को धोने में होता है (जैसे- डिटॉल, लाल दवा)।
- जीवाणुनाशक (Disinfectant): ये बहुत तीव्र औषधियां हैं जो कीटाणुओं को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं, लेकिन ये जीवित त्वचा को जला सकती हैं। इनका उपयोग पशुशाला (फर्श, नाली) को धोने में होता है (जैसे- फिनाइल, कार्बोलिक एसिड)।
प्रश्न 2: पशुओं में ‘आफरा’ (Tympany/Bloat) रोग होने पर किस उपकरण का प्रयोग किया जाता है और कैसे?
उत्तर: आफरा रोग (पेट में गैस भरना) में ‘ट्रोकार एवं कैनुला’ (Trocar and Canula) का प्रयोग किया जाता है। इसे पशु के पेट के बाईं ओर (Left paralumbar fossa) के त्रिकोण में जोर से छेद कर अंदर घुसाया जाता है। नुकीला ट्रोकार बाहर निकाल लिया जाता है और कैनुला (नली) पेट में ही रहने दी जाती है, जिससे पेट की गैस बाहर निकल जाती है।
प्रश्न 3: बर्डिजो कैस्ट्रेटर (Burdizzo Castrator) का क्या उपयोग है? यह अन्य विधियों से बेहतर क्यों है?
उत्तर: बर्डिजो कैस्ट्रेटर का उपयोग नर पशुओं को बधिया (Castration) करने के लिए किया जाता है। यह रक्तहीन (Bloodless) विधि है, क्योंकि इसमें त्वचा को काटा नहीं जाता, बल्कि अंडकोष के ऊपर की नस (Spermatic cord) को कुचल दिया जाता है। इससे पशु को संक्रमण (Infection / Tetanus) का खतरा नहीं रहता और घाव जल्दी ठीक हो जाता है।
प्रश्न 4: लाल दवा (Potassium Permanganate) के कोई दो प्रमुख उपयोग लिखिए।
उत्तर: 1. इसका हल्का घोल (1-2%) पशुओं के घावों (Wounds) और गर्भाशय को धोने के काम आता है। 2. सांप या पागल कुत्ते के काटने पर घाव के ऊपर लाल दवा का सूखा पाउडर भरने से जहर नष्ट हो जाता है।
प्रश्न 5: प्रोबैंग (Probang) क्या है और इसका उपयोग कब किया जाता है?
उत्तर: प्रोबैंग रबर या प्लास्टिक की बनी एक लंबी, लचीली नली होती है जिसके एक सिरे पर गुंबद लगा होता है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब पशु के गले या आहार नली में कोई चीज (जैसे सेब, आलू, या चारा) अटक जाती है (चोकिंग)। इसे मुंह से डालकर अटकी हुई वस्तु को पेट में धकेला जाता है।
प्रश्न 6: ‘टीट साइफन’ (Teat Siphon) का उपयोग किन परिस्थितियों में किया जाता है?
उत्तर: टीट साइफन एक पतली धातु की नली होती है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब ‘थनैला रोग’ (Mastitis) के कारण या किसी चोट के कारण गाय का थन (Teat) बंद हो जाता है और दूध नहीं निकलता। इसे थन के छेद में डालकर थन में फंसा हुआ दूध या मवाद बाहर निकाला जाता है।