Common Diseases of Animals Black Quarter : एमपी बोर्ड कक्षा 12 पशुपालन (MP Board Class 12 Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘इकाई 5: पशुओं के सामान्य रोग – 2’ के अंतर्गत ‘लंगड़ी रोग’ (Black Quarter / Black Leg Disease) पर एक अत्यंत विस्तृत और विश्लेषणात्मक लेख।
इस लेख में रोग का कारण (Clostridium chauvoei), फैलने के तरीके, प्रमुख लक्षण (सूजन और चर-चर की आवाज), उपचार (Penicillin), और बी.क्यू. टीकाकरण (BQ Vaccination) का द्विभाषी (Bilingual) रूप में गहराई से वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है।
इकाई 5: पशुओं के सामान्य रोग – 2 (Common Diseases of Animals – 2)
अध्याय: लंगड़ी रोग / ज़हरबाद (Black Quarter / Black Leg Disease) – संपूर्ण अध्ययन (कक्षा 12 पशुपालन)
1. प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय कृषि और डेयरी उद्योग (Dairy Industry) में मानसून (Monsoon) का मौसम जहां एक ओर फसलों के लिए जीवनदायी होता है, वहीं दूसरी ओर पशुओं के लिए यह कई भयंकर बीमारियों का काल लेकर आता है। मानसून के दौरान या उसके ठीक बाद फैलने वाली सबसे खतरनाक और जानलेवा बीमारियों में से एक है— ‘लंगड़ी रोग’ (Black Quarter / BQ)।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस बीमारी को कई स्थानीय नामों से जाना जाता है, जैसे— लंगड़िया, ज़हरबाद, फड़सूजन, कृष्ण जंघा, चुरचुरिया रोग, या ब्लैक लेग (Black Leg)।
यह मुख्य रूप से गाय-भैंसों (विशेषकर युवा पशुओं) और भेड़ों का एक अत्यंत तीव्र (Acute), छूतदार (Infectious) और जानलेवा जीवाणु जनित (Bacterial) रोग है। इस रोग का जीवाणु मिट्टी (Soil) में पाया जाता है। जब यह जीवाणु पशु के शरीर के मांसल भागों (पुट्ठे या जांघ) में प्रवेश करता है, तो वहां भयंकर सूजन और गैस पैदा कर देता है। सूजन वाले स्थान को दबाने पर ‘चर-चर’ (Crepitating sound) की आवाज आती है और पशु लंगड़ा कर (Limping) चलने लगता है।
मध्य प्रदेश बोर्ड (MP Board) के कक्षा 12 ‘पशुपालन’ (Animal Husbandry) के पाठ्यक्रम में लंगड़ी रोग एक अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय है। बोर्ड परीक्षाओं में इसके कारण, विशिष्ट लक्षण (Specific symptoms), और शव के निपटान (Carcass disposal) से संबंधित प्रश्न निश्चित रूप से पूछे जाते हैं। इस लेख में हम केवल ‘लंगड़ी रोग’ का अत्यंत सूक्ष्म, वैज्ञानिक और व्यावहारिक अध्ययन करेंगे।
2. रोग का कारण (Causal Organism / Etiology)
लंगड़ी रोग एक विशिष्ट प्रकार के खतरनाक जीवाणु (Bacteria) के कारण होता है, जिसकी प्रकृति अन्य जीवाणुओं से बिल्कुल अलग होती है:
- जीवाणु का नाम: यह ‘क्लॉस्ट्रिडियम चौवोआई’ (Clostridium chauvoei) नामक जीवाणु के कारण होता है। (भेड़ों में यह रोग Clostridium septicum के कारण भी हो सकता है)।
- जीवाणु की प्रकृति (Nature of Bacteria):
- ग्राम-पॉजिटिव (Gram-positive): यह छड़ के आकार (Rod-shaped) का ग्राम-पॉजिटिव जीवाणु है।
- अवायवीय (Anaerobic): यह इस जीवाणु की सबसे बड़ी विशेषता है। यह जीवाणु केवल हवा (ऑक्सीजन) की अनुपस्थिति में ही जीवित रह सकता है और वृद्धि कर सकता है। जहां ऑक्सीजन होती है, वहां यह पनप नहीं सकता।
- बीजाणु निर्माण (Spore-forming): जब यह जीवाणु पशु के शरीर से बाहर मिट्टी या खुले वातावरण में आता है (जहां ऑक्सीजन होती है), तो यह अपने चारों ओर एक अत्यंत कठोर आवरण (Hard shell) बना लेता है, जिसे ‘बीजाणु’ (Spore) कहते हैं।
- बीजाणुओं का खतरा: ये बीजाणु (Spores) मिट्टी के अंदर कई वर्षों (Years) तक जीवित रह सकते हैं। इन पर तेज धूप, सर्दी, या साधारण कीटाणुनाशकों का कोई असर नहीं होता। यही कारण है कि इसे ‘मृदा जनित रोग’ (Soil-borne disease) कहा जाता है।
3. रोग का प्रसार या फैलाव (Transmission of the Disease)
लंगड़ी रोग (BQ) एक संक्रामक रोग है, लेकिन यह एक बीमार पशु से सीधे दूसरे स्वस्थ पशु को छूने (Direct contact) से नहीं फैलता। इसका फैलाव मुख्य रूप से मिट्टी और वातावरण में मौजूद बीजाणुओं (Spores) द्वारा होता है:
3.1 प्रसार के मुख्य माध्यम (Modes of Transmission)
- दूषित चारा और पानी (Ingestion): जब स्वस्थ पशु चरागाह (Pasture) में घास चरता है, तो जमीन की सतह के पास मौजूद बीजाणु चारे के साथ उसके पेट (पाचन तंत्र) में चले जाते हैं। आंतों से होते हुए ये बीजाणु खून के माध्यम से शरीर की भारी मांसपेशियों (Heavy muscles) में पहुंच कर छिप जाते हैं।
- गहरे घाव (Deep Wounds): जब पशु को कोई गहरी चोट लगती है (जैसे- कांटा चुभना, तार से कटना, या भेड़ों में ऊन कतरते समय घाव होना), तो मिट्टी में मौजूद बीजाणु सीधे घाव के रास्ते मांसपेशियों में प्रवेश कर जाते हैं। (चूंकि गहरा घाव अंदर से अवायवीय/Anaerobic होता है, इसलिए जीवाणु वहां तेजी से पनपने लगते हैं)।
3.2 संवेदनशील पशु (Susceptible Animals)
- आयु (Age Group): यह रोग मुख्य रूप से 6 महीने से लेकर 2 वर्ष की आयु वाले युवा और तगड़े बछड़े-बछड़ियों (Young and robust cattle) को सबसे अधिक शिकार बनाता है। 2 वर्ष से अधिक उम्र के पशुओं में प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता आ जाती है।
- पशु (Species): गाय, भैंस और भेड़ें इसके प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। (कुत्ते, बिल्लियां और मुर्गियां इस रोग से प्रभावित नहीं होतीं)।
- मौसम (Season): यह रोग मुख्य रूप से वर्षा ऋतु (Monsoon / जुलाई-अगस्त) में भारी बारिश के बाद अचानक फैलता है। बारिश के कारण मिट्टी के अंदर छिपे बीजाणु सतह पर आ जाते हैं और घास के साथ पशु के पेट में चले जाते हैं।
यहाँ लंगड़ी रोग / ज़हरबाद (Black Quarter / Black Leg Disease) के लक्षणों को स्पष्ट करने वाले कुछ चित्र दिए गए हैं:

लंगड़ी रोग: पुट्ठों (Hindquarters) पर भयंकर सूजन. Source: Wikipedia
दृश्य विश्लेषण (Visual Insight): जैसा कि आप चित्र में देख सकते हैं, इस रोग का जीवाणु (Clostridium chauvoei) पशु की भारी मांसपेशियों (विशेषकर जांघ और पुट्ठे) में प्रवेश कर वहां भयंकर गैस और सूजन पैदा कर देता है। सूजन के कारण पशु इस पैर पर वजन नहीं रख पाता और वह लंगड़ा कर (Limping) चलने लगता है। इसी सूजन को हाथ से दबाने पर अंदर फंसी गैस के कारण ‘चर-चर’ (Crepitating sound) की विशिष्ट आवाज आती है।

संक्रमण का मुख्य स्थान: भारी मांसपेशियां. Source: Dairyverse
4. रोग के प्रमुख लक्षण (Symptoms of the Disease)
यह एक अतितीव्र और तीव्र (Acute) प्रकृति का रोग है। जीवाणु के शरीर में प्रवेश करने के 1 से 3 दिन के भीतर (Incubation period) इसके अत्यंत भयानक और विशिष्ट लक्षण प्रकट होते हैं:
- अचानक तेज बुखार (High Fever): पशु को अचानक बहुत तेज बुखार (104°F से 106°F) हो जाता है। पशु चारा खाना और जुगाली करना (Rumination) तुरंत बंद कर देता है। पशु सुस्त होकर बैठ जाता है।
- मांसपेशियों में भयंकर सूजन (Heavy Muscle Swelling): यह इस रोग का सबसे मुख्य लक्षण है। पशु के शरीर के भारी मांसल भागों— विशेष रूप से पुट्ठों (Hindquarters / जांघ), कंधे (Shoulders), और गर्दन पर एक बहुत बड़ी, गर्म और दर्दनाक सूजन (Swelling) आ जाती है।
- लंगड़ापन (Lameness): पुट्ठे या पैर में भारी सूजन और दर्द के कारण पशु चल नहीं पाता और वह लंगड़ा कर (Limping) चलने लगता है। इसी लक्षण के कारण इस बीमारी का नाम ‘लंगड़ी रोग’ (Black Leg / Quarter) पड़ा है।
- चर-चर की आवाज (Crepitating Sound): सूजन वाले स्थान पर जीवाणु बहुत तेजी से वृद्धि करते हैं और वहां गैस (Gas) पैदा कर देते हैं। शुरुआत में यह सूजन गर्म और दर्दनाक होती है, लेकिन बाद में यह ठंडी और दर्दरहित हो जाती है। जब इस सूजन को हाथ से दबाया जाता है, तो अंदर फंसी गैस के कारण ‘चर-चर’ या ‘चुर-चुर’ (Crackling/Crepitating sound) की आवाज आती है। इसे ग्रामीण भाषा में ‘चुरचुरिया रोग’ भी कहते हैं।
- त्वचा और मांस का काला पड़ना (Blackening of Flesh): यदि सूजन वाले स्थान पर चीरा (Incision) लगाया जाए, तो वहां का खून और मांस सड़कर गहरे काले (Dark black) रंग का दिखाई देता है। वहां से काला, झागदार खून (Black frothy blood) निकलता है, जिसमें से सड़े हुए मक्खन (Rancid butter) जैसी भयंकर बदबू आती है।
- मृत्यु (Death): बीमारी का असर इतनी तेजी से होता है कि लक्षण प्रकट होने के 12 से 48 घंटे के भीतर पशु की तड़प-तड़प कर मृत्यु हो जाती है। जहर (Toxins) पूरे शरीर में फैल जाता है (Toxemia)।
5. रोग का निदान या पहचान (Diagnosis)
बीमारी का समय पर निदान करना जान बचाने के लिए अत्यंत आवश्यक है:
- लक्षणों द्वारा: युवा पशु का लंगड़ाना, भारी मांसपेशियों पर सूजन, और सूजन दबाने पर ‘चर-चर’ (Crepitating) की आवाज आना लंगड़ी रोग की पक्की पहचान है।
- चीरा लगाकर: सूजन वाले स्थान पर सुई या ब्लेड लगाने पर यदि झागदार (Frothy) काला खून निकले, तो यह BQ है।
- प्रयोगशाला परीक्षण: मरे हुए पशु के प्रभावित मांस के टुकड़े (Muscle piece) को प्रयोगशाला में भेजकर Clostridium chauvoei जीवाणु की पुष्टि की जाती है।
6. लंगड़ी रोग का उपचार (Treatment of Black Quarter)
चूंकि यह बीमारी बहुत तेजी (Acute) से फैलती है और पशु कुछ ही घंटों में मर जाता है, इसलिए इलाज का समय बहुत कम मिलता है। बीमारी की शुरुआत में (सूजन आने के शुरुआती घंटों में) ही उपचार करने पर पशु की जान बचाई जा सकती है:
6.1 जीवाणुनाशक उपचार (Antibiotic Therapy)
- Clostridium जीवाणु पेनिसिलिन (Penicillin) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील (Sensitive) होता है।
- पशु चिकित्सक द्वारा प्रोकेन पेनिसिलिन (Procaine Penicillin) का भारी डोज़ (40,000 से 50,000 यूनिट प्रति किलो शारीरिक भार) तुरंत नसों में (IV) और मांसपेशियों (IM) में लगाया जाता है।
- इसके अलावा ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (Oxytetracycline) जैसे ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का प्रयोग भी लाभकारी होता है।
6.2 शल्य चिकित्सा और ऑक्सीजन का प्रयोग (Surgical Intervention)
चूंकि यह जीवाणु ‘अवायवीय’ (Anaerobic) है और ऑक्सीजन के संपर्क में आते ही मर जाता है, इसलिए इसका एक विशिष्ट उपचार किया जाता है:
- पशु चिकित्सक द्वारा सूजन वाले स्थान (पुट्ठे) पर एक गहरा चीरा (Deep Incision) लगा दिया जाता है।
- चीरा लगाने से अंदर जमा जहरीली गैस (Gas) और काला खून बाहर निकल जाता है, और हवा (Oxygen) अंदर चली जाती है। ऑक्सीजन के अंदर जाने से जीवाणुओं की वृद्धि तुरंत रुक जाती है।
- इसके बाद घाव को ‘लाल दवा’ (Potassium Permanganate –
) या हाइड्रोजन पेरोक्साइड (
) के घोल से अच्छी तरह धोया जाता है। ये रसायन घाव में नवजात ऑक्सीजन (Nascent oxygen) छोड़ते हैं, जो इन जीवाणुओं को तुरंत मार देती है।
6.3 लाक्षणिक चिकित्सा (Symptomatic Treatment)
- दर्द और बुखार को कम करने के लिए मेलोक्सिकैम (Meloxicam) या फ्लुनिक्सिन का इंजेक्शन लगाया जाता है।
- शरीर से जहर (Toxins) को बाहर निकालने के लिए नसों में सलाइन वाटर (IV Fluids) चढ़ाया जाता है।
7. रोग से बचाव एवं नियंत्रण (Prevention and Control)
लंगड़ी रोग (BQ) एक मृदा-जनित महामारी है, इसलिए इलाज से अधिक ध्यान बचाव (Prevention) पर दिया जाना चाहिए:
7.1 टीकाकरण (Vaccination) – सबसे महत्वपूर्ण उपाय
पशुओं को इस बीमारी से बचाने का एकमात्र और सबसे सुरक्षित तरीका समय पर ‘टीकाकरण’ है।
- टीके का नाम: इसके लिए ‘बी.क्यू. वैक्सीन’ (B.Q. Polyvalent Vaccine) का प्रयोग किया जाता है। (कई बार यह गलघोंटू/HS के साथ मिलाकर ‘HS+BQ Combined Vaccine’ के रूप में भी आती है)।
- टीकाकरण का समय: चूँकि यह बीमारी मानसून (बारिश) में फैलती है, इसलिए यह टीका बारिश शुरू होने से पहले यानी मई-जून (May-June) के महीने में ही सभी पशुओं को लगा दिया जाना चाहिए।
- आयु: 6 महीने से अधिक उम्र के सभी बछड़े-बछड़ियों और वयस्क पशुओं को यह टीका लगाया जाता है। इसका असर एक साल तक रहता है, इसलिए इसे प्रतिवर्ष लगाना अनिवार्य है।
7.2 मृत पशु का निपटान (Disposal of Carcass) – अत्यंत संवेदनशील
(बोर्ड परीक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण)
लंगड़ी रोग से मरे हुए पशु का निपटान बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए, अन्यथा यह बीमारी उस खेत में हमेशा के लिए जड़ जमा लेगी:
- खाल न उतारें (No Skinning): बी.क्यू. से मरे हुए पशु की खाल (Skin) भूलकर भी नहीं उतारनी चाहिए। यदि खाल उतारी गई या मांस को खुला छोड़ा गया, तो जीवाणु हवा (ऑक्सीजन) के संपर्क में आकर लाखों ‘बीजाणु’ (Spores) बना लेंगे, जो मिट्टी में मिल जाएंगे और सालों तक अन्य पशुओं को मारते रहेंगे।
- गहरा दफनाना (Deep Burial): मृत पशु को आबादी और जल स्रोतों से दूर एक 6 से 8 फुट गहरे गड्ढे में दफनाना चाहिए। शव के ऊपर भारी मात्रा में चूना (Slaked lime) या ब्लीचिंग पाउडर डालकर गड्ढे को अच्छी तरह मिट्टी से बंद कर देना चाहिए।
7.3 नियंत्रण के अन्य उपाय (Other Control Measures)
- बाड़े की सफाई: जिस स्थान पर पशु मरा हो, उस फर्श की ऊपरी मिट्टी को खुरच कर जला देना चाहिए और वहां 2-4% फॉर्मेलिन (Formalin) या कॉपर सल्फेट का छिड़काव करना चाहिए।
- चरागाह परिवर्तन: यदि किसी विशेष चरागाह में घास चरने से पशु बीमार हो रहे हैं, तो युवा पशुओं को उस चरागाह (Endemic pasture) में चरने के लिए नहीं भेजना चाहिए।
- घावों की सुरक्षा: पशु के शरीर पर यदि कोई घाव (Wound) हो, तो उसे तुरंत एंटीसेप्टिक (टिंचर आयोडीन) से साफ करना चाहिए, ताकि बीजाणु अंदर प्रवेश न कर सकें।
8. निष्कर्ष (Conclusion)
कक्षा 12 पशुपालन (Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘लंगड़ी रोग’ (Black Quarter) का अध्ययन ग्रामीण डेयरी व्यवस्था (Dairy Management) की एक प्रमुख चुनौती को समझने का माध्यम है।
यह बीमारी मुख्य रूप से युवा और स्वस्थ बछड़े-बछड़ियों (6 माह से 2 वर्ष) को अपना शिकार बनाती है, जो किसी भी डेयरी फार्म का ‘भविष्य’ होते हैं। इस रोग की तीव्रता इतनी अधिक है कि पशुपालक को इलाज का अवसर ही नहीं मिल पाता और सूजन में ‘चर-चर’ की आवाज आने के कुछ ही घंटों बाद पशु दम तोड़ देता है।
इसलिए, एक शिक्षित पशुपालक का यह कर्तव्य है कि वह बीमारी के आने का इंतजार न करे, बल्कि हर वर्ष मई-जून के महीने में मानसून के आगमन से ठीक पहले अपने सभी पशुओं को बी.क्यू. (B.Q. Vaccine) का टीका अवश्य लगवाए। साथ ही, मृत पशु को बिना खाल उतारे गहरे गड्ढे में चूने के साथ दफनाने का वैज्ञानिक ज्ञान ही इस मृदा-जनित ‘बीजाणुओं’ के चक्र (Spore cycle) को तोड़ सकता है। सही समय पर टीकाकरण और स्वच्छता ही इस ‘ज़हरबाद’ से पशुधन को बचाने का एकमात्र उपाय है।
9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: लंगड़ी रोग (Black Quarter) किस जीवाणु के कारण होता है और इस जीवाणु की क्या विशेषता है?
उत्तर: लंगड़ी रोग ‘क्लॉस्ट्रिडियम चौवोआई’ (Clostridium chauvoei) नामक जीवाणु के कारण होता है। इस जीवाणु की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ‘अवायवीय’ (Anaerobic) होता है, अर्थात यह ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में पनपता है। जब यह शरीर से बाहर हवा में आता है, तो यह स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए ‘बीजाणु’ (Spores) बना लेता है, जो मिट्टी में सालों तक जीवित रहते हैं।
प्रश्न 2: लंगड़ी रोग को ‘चुरचुरिया’ रोग क्यों कहा जाता है?
उत्तर: इस बीमारी में जीवाणु पशु की भारी मांसपेशियों (पुट्ठे/जांघ) में भयंकर गैस (Gas) पैदा कर देते हैं, जिससे वहां बड़ी सूजन आ जाती है। जब पशुपालक या डॉक्टर इस सूजन वाले स्थान को हाथ से दबाता है, तो अंदर भरी गैस के कारण ‘चर-चर’ या ‘चुर-चुर’ (Crepitating) की आवाज आती है। इसी विशिष्ट लक्षण के कारण इसे चुरचुरिया रोग कहा जाता है।
प्रश्न 3: लंगड़ी रोग मुख्य रूप से किस आयु वर्ग के पशुओं को सबसे अधिक प्रभावित करता है?
उत्तर: यह रोग मुख्य रूप से युवा, स्वस्थ और तगड़े पशुओं को अपना शिकार बनाता है, जिनकी आयु 6 महीने से लेकर 2 वर्ष के बीच होती है। 2 वर्ष से अधिक उम्र के पशुओं में प्राकृतिक रूप से इस रोग के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) विकसित हो जाती है।
प्रश्न 4: लंगड़ी रोग (BQ) के उपचार में सूजन वाले स्थान पर गहरा चीरा (Incision) क्यों लगाया जाता है?
उत्तर: लंगड़ी रोग का जीवाणु अवायवीय (Anaerobic) होता है, जो हवा (ऑक्सीजन) की कमी में ही जिंदा रहता है। सूजन वाले स्थान पर गहरा चीरा लगाने से वहां फंसी जहरीली गैस बाहर निकल जाती है और बाहर की ताजी हवा (ऑक्सीजन) अंदर चली जाती है। ऑक्सीजन के संपर्क में आते ही जीवाणुओं की वृद्धि रुक जाती है और वे मरने लगते हैं। इसके बाद घाव को लाल दवा (
) से धोया जाता है।
प्रश्न 5: लंगड़ी रोग (BQ) से मरे हुए पशु की खाल (Skin) क्यों नहीं उतारनी चाहिए?
उत्तर: यदि बी.क्यू. से मरे पशु की खाल उतारी गई, तो उसके मांस में मौजूद जीवाणु सीधे हवा (ऑक्सीजन) के संपर्क में आ जाएंगे। ऑक्सीजन मिलते ही ये जीवाणु लाखों अत्यंत कठोर ‘बीजाणु’ (Spores) बना लेंगे जो मिट्टी में गिर जाएंगे। ये बीजाणु मिट्टी में कई सालों तक जिंदा रहेंगे और वहां घास चरने वाले अन्य पशुओं को बीमार करते रहेंगे। इसलिए मृत पशु को बिना खाल उतारे 6-8 फुट गहरे गड्ढे में चूना डालकर दफनाना चाहिए।
प्रश्न 6: लंगड़ी रोग (BQ) से बचाव के लिए पशुओं का टीकाकरण (Vaccination) किस महीने में करवाना सबसे उपयुक्त है?
उत्तर: चूँकि लंगड़ी रोग के बीजाणु भारी बारिश के बाद मिट्टी की सतह पर आ जाते हैं और रोग फैलाते हैं, इसलिए इससे बचाव का टीका (B.Q. Polyvalent Vaccine) मानसून (बारिश) शुरू होने से ठीक पहले, यानी मई और जून के महीने में सभी पशुओं को अनिवार्य रूप से लगवा देना चाहिए।