MP Board Class 12 Identification and Proper Use of Modern Veterinary Medicines उपयोगी दवाओं की पहचान और आधुनिक उपयोग

Identification and Proper Use of Modern Veterinary Medicines : एमपी बोर्ड कक्षा 12 पशुपालन (MP Board Class 12 Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘पशु चिकित्सा: उपयोगी दवाओं की पहचान और आधुनिक उपयोग’ (Identification and Use of Modern Veterinary Medicines) पर एक अत्यंत विस्तृत और वैज्ञानिक लेख।

इस लेख में आधुनिक एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक (NSAIDs), कृमिनाशक (Dewormers), और जीवन रक्षक औषधियों की पहचान, उनके उपयोग, दवा देने की विधियों (IV, IM, SC) और सावधानियों का द्विभाषी (Bilingual) रूप में गहराई से अध्ययन किया गया है। यह कृषि छात्रों के लिए सर्वश्रेष्ठ और संपूर्ण मार्गदर्शिका है।

इकाई 3: पशु चिकित्सा (Veterinary Science)

अध्याय: उपयोगी दवाओं की पहचान और आधुनिक उपयोग (Identification and Proper Use of Modern Veterinary Medicines) – संपूर्ण अध्ययन (कक्षा 12 पशुपालन)

1. प्रस्तावना (Introduction)

डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming) और पशुपालन व्यवसाय को आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए पशुओं का उत्तम स्वास्थ्य सबसे पहली शर्त है। प्राचीन काल और पारंपरिक पशुपालन में पशुओं की बीमारियों का इलाज मुख्य रूप से जड़ी-बूटियों या साधारण रसायनों (जैसे— फिटकरी, लाल दवा, कपूर) से किया जाता था। ये औषधियां प्राथमिक उपचार (First Aid) के लिए आज भी उपयोगी हैं।

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परंतु, आज के व्यावसायिक पशुपालन (Commercial Animal Husbandry) में जब उच्च उत्पादक संकर गायें (Crossbred Cows) और भैंसें पाली जा रही हैं, तो उनके शरीर में होने वाले भयानक संक्रमणों (Infections) और चयापचय रोगों (Metabolic diseases) को केवल पारंपरिक दवाओं से ठीक नहीं किया जा सकता। आज ‘आधुनिक पशु चिकित्सा विज्ञान’ (Modern Veterinary Science) ने अत्यंत प्रभावी एंटीबायोटिक्स (Antibiotics), सूजन रोधी (Anti-inflammatory) और कृमिनाशक (Anthelmintics) औषधियों का विकास कर लिया है।

मध्य प्रदेश (MP Board) के कक्षा 12 ‘पशुपालन’ के छात्रों और भविष्य के डेयरी प्रबंधकों के लिए यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि बाजार में उपलब्ध आधुनिक पशु औषधियों की पहचान कैसे की जाए, उनका सही उपयोग किन बीमारियों में होता है, और उन्हें पशु के शरीर में प्रवेश कराने की सही विधि क्या है। इस विस्तृत लेख में हम आधुनिक पशु चिकित्सा में प्रयुक्त होने वाली उपयोगी दवाओं का वैज्ञानिक (Scientific) और व्यावहारिक अध्ययन करेंगे।

2. आधुनिक पशु औषधियों का वर्गीकरण और पहचान (Classification and Identification of Modern Veterinary Medicines)

आधुनिक पशु चिकित्सा में दवाओं को उनके कार्य करने की प्रणाली (Mechanism of Action) के आधार पर निम्नलिखित प्रमुख वर्गों में बांटा गया है:

2.1 प्रतिजैविक औषधियां (Antibiotics / Antimicrobials)

जीवाणुओं (Bacteria) द्वारा होने वाले भयंकर संक्रामक रोगों (Infectious diseases) जैसे— थनैला (Mastitis), गलघोंटू (HS), और निमोनिया को ठीक करने के लिए आधुनिक चिकित्सा में ‘एंटीबायोटिक्स’ का उपयोग किया जाता है। ये जीवाणुओं की वृद्धि को रोकते हैं या उन्हें मार देते हैं।

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (Oxytetracycline – OTC):
    • पहचान एवं गुण: यह एक ‘ब्रॉड-स्पेक्ट्रम’ (Broad-spectrum) एंटीबायोटिक है (अर्थात यह कई प्रकार के ग्राम-पॉजिटिव और ग्राम-नेगेटिव दोनों जीवाणुओं को मारता है)। बाजार में यह ‘टेरामाइसिन’ (Terramycin) के नाम से मिलता है।
    • उपयोग: इसका उपयोग पशुओं में निमोनिया (Pneumonia), श्वास तंत्र के संक्रमण, खुरपका-मुंहपका (FMD) के घावों को सुखाने, और बच्चेदानी के संक्रमण (Metritis) को ठीक करने में व्यापक रूप से किया जाता है।
  • एनरोफ्लोक्सासिन (Enrofloxacin):
    • पहचान: यह फ्लोरोक्विनोलोन (Fluoroquinolone) समूह का एक अत्यधिक शक्तिशाली और तेज असर करने वाला आधुनिक एंटीबायोटिक है।
    • उपयोग: इसका उपयोग विशेष रूप से भयंकर थनैला रोग (Mastitis), मूत्र मार्ग के संक्रमण और आंतों के संक्रमण (Severe Diarrhea) में किया जाता है।
  • अमोक्सिसिलिन + सलबैक्टम (Amoxicillin + Sulbactam):
    • पहचान: यह पेनिसिलिन (Penicillin) समूह का एक उन्नत एंटीबायोटिक है।
    • उपयोग: यह पशुओं के घावों को सुखाने, सर्जरी के बाद के संक्रमण को रोकने और श्वसन रोगों में अत्यंत प्रभावी है।

2.2 पीड़ानाशक, ज्वरनाशक एवं सूजन रोधी (Analgesics, Antipyretics and NSAIDs)

पशुओं को बुखार (Fever), दर्द (Pain) और शरीर के किसी भाग में सूजन (Inflammation) होने पर इन आधुनिक दवाओं (Non-Steroidal Anti-inflammatory Drugs) का उपयोग किया जाता है।

  • मेलोक्सिकैम + पैरासिटामोल (Meloxicam + Paracetamol):
    • पहचान: बाजार में यह ‘मेलोनेक्स प्लस’ (Melonex Plus) जैसे नामों से मिलता है। यह पशुओं के लिए सबसे सुरक्षित और सबसे अधिक उपयोग होने वाला दर्द निवारक है।
    • उपयोग: पशुओं में थनैला के कारण अयन (Udder) की सूजन, जोड़ों का दर्द (Arthritis), चोट लगने, या किसी भी संक्रमण के कारण आए बुखार (Fever) को उतारने के लिए इसका इंजेक्शन (IM) दिया जाता है। यह गाभिन पशुओं (Pregnant animals) के लिए भी सुरक्षित है।
  • फ्लुनिक्सिन मेगलुमाइन (Flunixin Meglumine):
    • पहचान: यह घोड़ों और गायों के लिए एक अत्यधिक शक्तिशाली दर्द निवारक है।
    • उपयोग: इसका उपयोग पशुओं के पेट दर्द (Colic) और विषरक्तता (Endotoxemia) के गंभीर मामलों में तुरंत राहत देने के लिए किया जाता है।

2.3 आधुनिक कृमिनाशक औषधियां (Modern Anthelmintics / Dewormers)

पशुओं के पेट, आंतों और यकृत (Liver) में पाए जाने वाले आंतरिक परजीवियों (Internal parasites / Worms) को मारने वाली आधुनिक दवाएं अत्यंत प्रभावी हैं।

  • एल्बेन्डाजोल (Albendazole):
    • पहचान: यह एक ‘ब्रॉड-स्पेक्ट्रम’ कृमिनाशक है जो फीताकृमि (Tapeworm), गोलकृमि (Roundworm) और लिवर फ्लूक (Liver fluke) तीनों को एक साथ मारता है।
    • सावधानी: इसे गर्भावस्था के शुरुआती 45 दिनों (Early pregnancy) में पशु को बिल्कुल नहीं देना चाहिए, अन्यथा गर्भपात (Abortion) हो सकता है या बच्चा विकृत पैदा हो सकता है।
  • फेनबेंडाजोल (Fenbendazole):
    • पहचान: बाजार में ‘पानाक्योर’ (Panacur) नाम से मिलता है।
    • उपयोग: यह गाभिन (Pregnant) पशुओं के लिए सबसे सुरक्षित (Safe) कृमिनाशक है।
  • आइवरमेक्टिन (Ivermectin):
    • पहचान: यह एक जादुई आधुनिक औषधि है जो ‘एंडो-एक्टो पैरासाइटिसाइड’ (Endo-ectoparasiticide) है।
    • उपयोग: इसका केवल एक इंजेक्शन (Subcutaneous – त्वचा के नीचे) लगाने से पशु के पेट के कीड़े (Internal worms) भी मर जाते हैं और शरीर के बाहर चिपके हुए पिस्सू, जूं और चिंचड़ी (Ticks/Mites) भी झड़कर मर जाते हैं।

2.4 चयापचय एवं जीवन रक्षक औषधियां (Metabolic and Nutritional Drugs)

उच्च दुग्ध उत्पादक पशुओं (High yielding cows) में पोषक तत्वों की कमी से अचानक गंभीर बीमारियां हो जाती हैं।

  • कैल्शियम बोरोग्लुकोनेट (Calcium Borogluconate):
    • पहचान: यह कैल्शियम का तरल रूप है जो बड़ी बोतलों (450 ml) में आता है।
    • उपयोग: ब्याने (Calving) के तुरंत बाद जब गाय या भैंस के शरीर में कैल्शियम की भारी कमी हो जाती है, तो उसे ‘दुग्ध ज्वर’ (Milk Fever) हो जाता है और पशु जमीन पर लेट जाता है। इस दवा को शिरा (Intravenous – IV) में चढ़ाने से पशु 10 मिनट में जादुई रूप से खड़ा हो जाता है।
  • प्रोपलीन ग्लाइकोल (Propylene Glycol):
    • उपयोग: इसका उपयोग कीटोसिस (Ketosis) नामक बीमारी में किया जाता है, जब पशु के शरीर में ऊर्जा (Glucose) की भारी कमी हो जाती है। यह पशु को तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है।

2.5 एलर्जी रोधी औषधियां (Antihistamines)

  • क्लोरफेनिरामाइन मैलेट (Chlorpheniramine Maleate – CPM):
    • उपयोग: जब पशु को कोई जहरीला कीड़ा काट ले, त्वचा पर लाल चकत्ते (Allergy) हो जाएं, या किसी एंटीबायोटिक दवा का रिएक्शन (Drug reaction) हो जाए, तब इस दवा (CPM) का इंजेक्शन तुरंत लगाया जाता है।

2.6 हार्मोनल औषधियां (Hormonal Drugs)

  • ऑक्सीटोसिन (Oxytocin):
    • पहचान: यह एक प्राकृतिक हार्मोन का कृत्रिम रूप है।
    • उपयोग: पशु चिकित्सा में इसका असली उपयोग ब्याने के बाद रुकी हुई ‘जेर’ (Retained Placenta) को बाहर निकालने और गर्भाशय की सफाई के लिए किया जाता है।
    • दुरुपयोग (Misuse): कई अज्ञानी डेयरी किसान दूध उतारने (Milk letdown) के लिए रोज इसका इंजेक्शन लगाते हैं, जो पूरी तरह से गैर-कानूनी (Illegal) है। इसके लगातार प्रयोग से गाय बांझ (Infertile) हो जाती है और दूध पीने वाले मनुष्यों के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।

3. पशुओं को दवा देने की प्रमुख विधियां (Routes of Drug Administration)

आधुनिक पशु औषधियों को उनके प्रकार और बीमारी की गंभीरता के आधार पर शरीर में प्रवेश कराने के विभिन्न तरीके होते हैं। एक कृषि छात्र को इनका पूर्ण ज्ञान होना चाहिए:

3.1 मुंह द्वारा (Oral Route / Drenching)

यह दवा देने का सबसे पुराना, सरल और सुरक्षित तरीका है।

  • उपयोग: गोलियां (Bolus), पाउडर (Powder), या तरल कृमिनाशक (Liquid dewormers) इसी विधि से दिए जाते हैं।
  • उपकरण: तरल दवा पिलाने के लिए ‘ड्रेन्चिंग बॉटल’ (Drenching Bottle) या बांस की ‘नाल’ का उपयोग किया जाता है।
  • सावधानी: दवा पिलाते समय पशु की जीभ (Tongue) को कभी नहीं पकड़ना चाहिए। यदि जीभ पकड़ ली गई, तो दवा श्वास नली (Trachea) और फेफड़ों में चली जाएगी, जिससे पशु को ‘ड्रेन्चिंग निमोनिया’ (Aspiration Pneumonia) हो जाएगा और उसकी तुरंत मृत्यु हो सकती है।

3.2 अंतः पेशीय इंजेक्शन (Intramuscular Injection – IM)

  • पहचान: यह इंजेक्शन पशु की मांसपेशियों (Muscles) के अंदर गहराई में लगाया जाता है।
  • स्थान: गाय-भैंस में यह इंजेक्शन मुख्य रूप से गर्दन (Neck) के भारी हिस्से में या पुट्ठे (Gluteal muscles / Hindquarter) पर लगाया जाता है।
  • उपयोग: अधिकांश एंटीबायोटिक्स (जैसे- ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन, मेलोक्सिकैम) इसी विधि से लगाए जाते हैं। यहां दवा धीरे-धीरे रक्त में घुलती है और लंबे समय तक असर करती है।

3.3 अंतः शिरा इंजेक्शन (Intravenous Injection – IV)

  • पहचान: यह इंजेक्शन सीधे पशु की नस या शिरा (Vein) के अंदर खून में लगाया जाता है।
  • स्थान: पशुओं में यह मुख्य रूप से गर्दन की ‘जुगुलर वेन’ (Jugular Vein) में या कान की नस (Ear vein) में लगाया जाता है।
  • उपयोग: जब पशु की जान खतरे में हो और दवा का तुरंत असर (Immediate action) चाहिए, तब IV इंजेक्शन दिया जाता है। मिल्क फीवर में कैल्शियम की बोतल (Calcium Borogluconate) शिरा में ही धीरे-धीरे चढ़ाई जाती है (IV drip)।

3.4 उप-त्वचीय इंजेक्शन (Subcutaneous Injection – SC)

  • पहचान: यह इंजेक्शन केवल त्वचा (Skin) और मांसपेशियों के बीच के खाली स्थान में लगाया जाता है।
  • स्थान: गर्दन के पास त्वचा को उंगलियों से ‘टेंट’ (Tent) की तरह ऊपर उठाकर यह इंजेक्शन लगाया जाता है।
  • उपयोग: कई प्रकार के टीके (Vaccines) जैसे- खुरपका-मुंहपका (FMD) का टीका और चिंचड़ी नाशक ‘आइवरमेक्टिन’ (Ivermectin) इसी विधि से लगाए जाते हैं।

3.5 थन के अंदर (Intramammary Infusion)

  • उपयोग: जब गाय को थनैला रोग (Mastitis) हो जाता है, तो एंटीबायोटिक (जैसे- पेंडिस्ट्रिन एस.एच.) की ट्यूब को सीधे थन के छिद्र (Teat canal) से अयन (Udder) के अंदर चढ़ा दिया जाता है।

3.6 स्थानीय या बाह्य उपयोग (Topical Application)

  • उपयोग: त्वचा के रोगों, घावों (Wounds), या खुरपका रोग में मरहम (Ointments), लाल दवा का घोल, या स्प्रे (Spray – जैसे Topicure) को सीधे प्रभावित हिस्से की त्वचा के ऊपर लगाया जाता है।

4. आधुनिक औषधियों के उपयोग में बरती जाने वाली सावधानियां (Precautions in using Modern Medicines)

आधुनिक एलोपैथिक (Allopathic) औषधियां अत्यंत शक्तिशाली होती हैं। यदि इनका गलत उपयोग किया जाए, तो पशु की जान जा सकती है। अतः निम्नलिखित वैज्ञानिक सावधानियों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:

4.1 ‘निकासी अवधि’ या विड्रॉल पीरियड का ज्ञान (Knowledge of Withdrawal Period)

यह आधुनिक पशु चिकित्सा का सबसे महत्वपूर्ण नियम है। जब किसी दुधारू या मांस वाले पशु को ‘एंटीबायोटिक’ (Antibiotic) या तेज दवा दी जाती है, तो उस दवा का अंश कई दिनों तक पशु के दूध और मांस में आता रहता है।

  • नियम: यदि मनुष्यों ने इस दूध को पी लिया, तो उनके शरीर में भी दवा का जहर चला जाएगा। अतः दवा देने के बाद एक निश्चित अवधि (प्रायः 3 से 7 दिन) तक उस पशु का दूध इंसानों के पीने या बेचने योग्य नहीं होता। इस अवधि को ‘विड्रॉल पीरियड’ (Withdrawal Period) कहते हैं।

4.2 सही मात्रा (Proper Dosage)

दवा की मात्रा हमेशा पशु के शारीरिक भार (Body Weight) के आधार पर तय की जाती है। आवश्यकता से कम दवा देने पर कीटाणु नहीं मरते और वे उस दवा के प्रति ‘प्रतिरोधक क्षमता’ (Antimicrobial Resistance) विकसित कर लेते हैं। अत्यधिक दवा (Overdose) देने पर पशु के लिवर (Liver) और किडनी (Kidney) खराब हो सकते हैं।

4.3 गर्भाधान की स्थिति (Pregnancy Status)

दवा देने से पहले यह जानना बहुत जरूरी है कि पशु गाभिन (Pregnant) है या नहीं। कुछ दवाएं (जैसे— एल्बेन्डाजोल, डेक्सामेथासोन) ‘एबॉर्शन’ (Abortion/गर्भपात) करा सकती हैं। गाभिन पशुओं को हमेशा सुरक्षित दवाएं (Safe for pregnancy) ही दी जानी चाहिए।

4.4 एक्सपायरी डेट की जांच (Check Expiry Date)

उपयोग करने से पहले दवा या इंजेक्शन की ‘अंतिम तिथि’ (Expiry date) अवश्य जांच लें। एक्सपायर हो चुकी दवाओं में रासायनिक परिवर्तन हो जाते हैं जो जहर (Toxins) का काम कर सकते हैं।

4.5 पशु चिकित्सक का परामर्श (Veterinary Consultation)

यद्यपि पशुपालक को प्राथमिक उपचार का ज्ञान होना चाहिए, लेकिन किसी भी प्रकार का ‘एंटीबायोटिक’ (Antibiotic) या ‘अंतः शिरा’ (IV) इंजेक्शन हमेशा एक योग्य पशु चिकित्सक (Veterinary Doctor) की सलाह और देखरेख में ही लगाया जाना चाहिए।

5. निष्कर्ष (Conclusion)

कक्षा 12 पशुपालन (Animal Husbandry) के छात्रों के लिए ‘उपयोगी दवाओं की पहचान और उपयोग’ का यह अध्याय एक सफल डेयरी प्रबंधन (Dairy Management) की व्यावहारिक कुंजी है।

पारंपरिक पशु चिकित्सा (जड़ी-बूटियों) का अपना महत्व है, लेकिन आज की उन्नत डेयरी फार्मिंग में जब किसी पशु को ‘मिल्क फीवर’ (Milk Fever) या ‘थनैला’ (Mastitis) होता है, तो उसकी जान केवल ‘कैल्शियम बोरोग्लुकोनेट’ और आधुनिक ‘एंटीबायोटिक्स’ (जैसे एनरोफ्लोक्सासिन) ही बचा सकते हैं।

एक शिक्षित पशुपालक को यह भेद पता होना चाहिए कि बुखार में ‘मेलोक्सिकैम’ (NSAID) देना है, और पेट के कीड़े मारने के लिए ‘आइवरमेक्टिन’ या ‘एल्बेन्डाजोल’ का उपयोग करना है। दवाओं की सही पहचान, इंजेक्शन देने की सटीक विधि (IM, IV, SC), और ‘विड्रॉल पीरियड’ (Withdrawal period) का कड़ाई से पालन करके ही हम अपने पशुओं को स्वस्थ रख सकते हैं और समाज को विषमुक्त (Residue-free) दूध और मांस उपलब्ध करा सकते हैं।

6. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्रश्न 1: ‘ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक’ (Broad-spectrum Antibiotic) किसे कहते हैं? एक आधुनिक उदाहरण दीजिए।

उत्तर: वे एंटीबायोटिक औषधियां जो ग्राम-पॉजिटिव (Gram-positive) और ग्राम-नेगेटिव (Gram-negative) दोनों प्रकार के खतरनाक जीवाणुओं को एक साथ नष्ट करने की क्षमता रखती हैं, ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक कहलाती हैं। इनका उपयोग तब किया जाता है जब बीमारी के सटीक कारण का पता न हो। उदाहरण: ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (Oxytetracycline) और एनरोफ्लोक्सासिन (Enrofloxacin)।

प्रश्न 2: पशु चिकित्सा में ‘विड्रॉल पीरियड’ (Withdrawal Period) या निकासी अवधि का क्या अर्थ है?

उत्तर: जब किसी दुधारू या मांस वाले पशु को एंटीबायोटिक या कोई मजबूत रासायनिक दवा दी जाती है, तो दवा का अंश (Residue) उसके दूध और मांस में आ जाता है। दवा देने के बाद के वे निश्चित दिन (जैसे 3 से 7 दिन) जिनमें पशु का दूध या मांस मनुष्यों के खाने योग्य नहीं होता (प्रतिबंधित होता है), उसे ‘विड्रॉल पीरियड’ कहते हैं। यह मानव स्वास्थ्य की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 3: आइवरमेक्टिन (Ivermectin) दवा किस काम आती है और इसे कैसे लगाया जाता है?

उत्तर: आइवरमेक्टिन एक अत्यंत शक्तिशाली आधुनिक ‘एंडो-एक्टो पैरासाइटिसाइड’ है। यह पशु के शरीर के अंदर मौजूद पेट के कीड़ों (Internal worms) और त्वचा के बाहर चिपके हुए पिस्सू, जूं और चिंचड़ी (External parasites / Ticks) दोनों को एक साथ मारता है। इसका इंजेक्शन हमेशा ‘उप-त्वचीय’ (Subcutaneous / SC – त्वचा के नीचे) लगाया जाता है।

प्रश्न 4: गाभिन (Pregnant) पशुओं के पेट के कीड़े मारने के लिए कौन सी दवा सुरक्षित मानी जाती है?

उत्तर: गाभिन पशुओं के लिए ‘फेनबेंडाजोल’ (Fenbendazole / Panacur) सबसे सुरक्षित कृमिनाशक (Dewormer) माना जाता है। गाभिन पशुओं को गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में ‘एल्बेन्डाजोल’ (Albendazole) भूलकर भी नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे गर्भपात (Abortion) हो सकता है।

प्रश्न 5: यदि किसी पशु को ‘ड्रेन्चिंग बॉटल’ (Drenching bottle) से दवा पिलाते समय उसकी जीभ पकड़ ली जाए, तो क्या खतरा होता है?

उत्तर: दवा पिलाते समय पशु की जीभ (Tongue) को कभी नहीं पकड़ना चाहिए। जीभ पकड़ने से पशु दवा को निगल नहीं पाता है और दवा सीधे उसकी श्वास नली (Windpipe) से होते हुए फेफड़ों (Lungs) में चली जाती है। इससे पशु को तुरंत ‘ड्रेन्चिंग निमोनिया’ (Aspiration Pneumonia) हो जाता है और पशु की मृत्यु हो सकती है।

प्रश्न 6: ‘मिल्क फीवर’ (दुग्ध ज्वर) रोग में कौन सी जीवन रक्षक दवा का उपयोग किया जाता है?

उत्तर: मिल्क फीवर एक चयापचय रोग (Metabolic disease) है जो ब्याने के तुरंत बाद शरीर में कैल्शियम की भारी कमी से होता है। इसमें जीवन रक्षक के रूप में ‘कैल्शियम बोरोग्लुकोनेट’ (Calcium Borogluconate) की बोतल सीधे पशु की जुगुलर नस (Intravenous – IV) में धीरे-धीरे चढ़ाई जाती है, जिससे पशु तुरंत ठीक होकर खड़ा हो जाता है।