Cultivation of Major Kharif and Rabi Fodder Crops : एमपी बोर्ड कक्षा 12 कृषि विज्ञान (MP Board Class 12 Agriculture) के छात्रों के लिए ‘खरीफ और रबी के प्रमुख चारे’ (Major Kharif and Rabi Fodder Crops) पर एक अत्यंत विस्तृत और विश्लेषणात्मक Cultivation of Major Kharif and Rabi Fodder Crops लेख।
इस लेख में ज्वार चरी (Sorghum), मक्का चरी (Maize), लोबिया (Cowpea), बरसीम (Berseem) और रिजका (Lucerne) की संक्षिप्त खेती, वानस्पतिक परिचय, उन्नत किस्में, बीज दर, और उपज का द्विभाषी (Bilingual) रूप में गहराई से वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है। यह बोर्ड और कृषि प्रतियोगी परीक्षाओं (PAT, ICAR) के लिए सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शिका है।
खरीफ और रबी के प्रमुख चारे: ज्वार चरी, मक्का चरी, लोबिया, बरसीम, रिजका की संक्षिप्त खेती (Cultivation of Major Kharif and Rabi Fodder Crops) – संपूर्ण अध्ययन (कक्षा 12 कृषि विज्ञान)
1. प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Indian Rural Economy) और डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming) की सफलता मुख्य रूप से पशुओं के आहार और उनके स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। दुधारू पशुओं (Milch animals) से अधिकतम और सस्ता दूध प्राप्त करने के लिए उन्हें पूरे वर्ष हरा चारा (Green Fodder) खिलाना अत्यंत आवश्यक है। हरा चारा पशुओं को न केवल पेट भरने (Bulkiness) का अहसास कराता है, बल्कि यह विटामिन ए (कैरोटीन), कैल्शियम और सुपाच्य प्रोटीन का सबसे सस्ता और उत्तम स्रोत है।
भारत में जलवायु (Climate) के आधार पर चारे की फसलों को मुख्य रूप से दो ऋतुओं में बांटा गया है:
- खरीफ के चारे (Kharif Fodders): जिन्हें मानसून के आगमन (जून-जुलाई) पर बोया जाता है। (जैसे— ज्वार, मक्का, लोबिया)।
- रबी के चारे (Rabi Fodders): जिन्हें सर्दियों की शुरुआत (अक्टूबर-नवंबर) में बोया जाता है। (जैसे— बरसीम, रिजका)।
मध्य प्रदेश बोर्ड (MP Board) के कक्षा 12 कृषि विज्ञान (Class 12 Agriculture) के पाठ्यक्रम में ‘फसलों की खेती’ के अंतर्गत इन चारा फसलों का सस्य वैज्ञानिक अध्ययन (Agronomic study) अत्यंत महत्वपूर्ण है। बोर्ड परीक्षाओं में इन फसलों की बीज दर (Seed rate), उन्नत किस्में (Improved varieties), और उपज (Yield) से संबंधित प्रश्न हर वर्ष पूछे जाते हैं। इस विस्तृत लेख में हम इन सभी प्रमुख चारे वाली फसलों का वैज्ञानिक और व्यावहारिक अध्ययन करेंगे।
2. खरीफ ऋतु के प्रमुख चारे (Major Kharif Fodder Crops)
खरीफ ऋतु में बोई जाने वाली चारा फसलों को गर्म और नम जलवायु (Hot and humid climate) की आवश्यकता होती है। इनकी वृद्धि बहुत तेजी से होती है। आइए प्रमुख खरीफ चारों का अध्ययन करें:
2.1 ज्वार चरी की खेती (Cultivation of Fodder Sorghum / Jowar Chari)
ज्वार खरीफ के मौसम का सबसे प्रमुख और लोकप्रिय हरा चारा है। यह सूखा सहन करने वाली (Drought-tolerant) फसल है, इसलिए इसे कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी आसानी से उगाया जा सकता है।
- वानस्पतिक नाम (Botanical Name):सोरघम बाइकलर (Sorghum bicolor)
- कुल (Family): पोएसी या ग्रैमिनी (Poaceae / Gramineae)
1. जलवायु और भूमि (Climate and Soil):
ज्वार गर्म जलवायु (Warm climate) का पौधा है। इसके बीजों के अंकुरण के लिए 25-30°C तापमान सबसे उपयुक्त होता है। यह जलभराव (Waterlogging) को सहन नहीं कर सकता। इसके लिए जल निकास वाली दोमट या भारी दोमट मिट्टी (Loam to Heavy Loam Soil) सर्वोत्तम होती है, जिसका pH मान 6.0 से 7.5 के बीच हो।
2. उन्नत किस्में (Improved Varieties):
- एकल कटाई वाली (Single cut): पूसा चरी-1, एम.पी. चरी (M.P. Chari), राज चरी-1, पी.सी.-6 (P.C.-6)।
- बहु-कटाई वाली (Multi-cut): मीठी सूडान (Sweet Sudan), एस.एस.जी.-59-3 (SSG-59-3)।
3. बीज दर एवं बीजोपचार (Seed Rate and Seed Treatment):
चारे के लिए ज्वार को सघन (घना) बोया जाता है, ताकि तना पतला और मुलायम (Thin and soft stem) रहे।
- बीज दर: 40 से 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
- बीजोपचार: बुवाई से पहले बीजों को एग्रोसन जी.एन. या थाइरम (Thiram) 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
4. बुवाई का समय (Time of Sowing):
खरीफ चारे के लिए इसकी बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से मध्य जुलाई तक की जाती है। जायद (गर्मियों) में इसे मार्च-अप्रैल में बोया जाता है।
5. एच.सी.एन. विषाक्तता (HCN / Prussic Acid Toxicity):(परीक्षा के लिए अति महत्वपूर्ण)
ज्वार के छोटे पौधों (छोटी अवस्था में) की जड़ों में धुरिन (Dhurrin) नामक एक ग्लूकोसाइड बनता है, जो पत्तियों में आकर हाइड्रोसाइनिक एसिड (HCN / Prussic acid) नामक भयंकर जहर में बदल जाता है। यदि पशु इस छोटी ज्वार को खा लें, तो उनकी मृत्यु हो सकती है।
- बचाव: ज्वार को कभी भी बुवाई के 45 दिनों से पहले या 50 सेंटीमीटर से कम ऊंचाई पर पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए। फूल आने पर यह जहर अपने आप खत्म हो जाता है।
6. कटाई और उपज (Harvesting and Yield):
ज्वार की कटाई फूल आने की अवस्था (50% Flowering stage) पर, यानी बुवाई के 60-70 दिन बाद करनी चाहिए। इस समय चारे में पोषक तत्व सर्वाधिक होते हैं।
- उपज: एकल कटाई वाली किस्मों से 400 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, और बहु-कटाई वाली किस्मों से 700 से 800 क्विंटल हरा चारा प्राप्त होता है।
2.2 मक्का चरी की खेती (Cultivation of Forage Maize)
मक्का दुधारू पशुओं के लिए एक अत्यंत पौष्टिक (Nutritious) और स्वादिष्ट हरा चारा है। मक्के के हरे चारे से दुनिया का सबसे बेहतरीन ‘साइलेज’ (Silage) बनाया जाता है।
- वानस्पतिक नाम (Botanical Name):जिया मेज (Zea mays)
- कुल (Family): पोएसी (Poaceae)
1. जलवायु और भूमि (Climate and Soil):
मक्का एक उष्णकटिबंधीय (Tropical) पौधा है। इसे भी गर्म और नम जलवायु चाहिए। मक्का खेत में जलभराव (Water stagnation) बिल्कुल सहन नहीं कर सकता, इसलिए इसके लिए उत्तम जल निकास (Well-drained) वाली बलुई दोमट या दोमट मिट्टी (Sandy Loam to Loam) सबसे अच्छी होती है।
2. उन्नत किस्में (Improved Varieties):
चारे के लिए मक्के की वे किस्में बोई जाती हैं जिनकी ऊंचाई अधिक हो और पत्तियां चौड़ी हों।
- अफ्रीकन टॉल (African Tall) – यह चारे की सबसे प्रसिद्ध किस्म है।
- जे-1006 (J-1006), प्रताप मक्का चरी-6, विजय।
3. बीज दर एवं बुवाई (Seed Rate and Sowing):
- बीज दर: चारे के लिए मक्के की बीज दर 40 से 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखी जाती है, जबकि दाने के लिए यह 20-25 किलो होती है।
- बुवाई का समय: मानसून शुरू होते ही जून के अंतिम सप्ताह से मध्य जुलाई तक। इसे कतारों में (Row to Row distance 30 cm) बोया जाता है।
4. खाद एवं उर्वरक (Manures and Fertilizers):
मक्का जमीन से बहुत अधिक पोषक तत्व खींचता है (Exhaustive crop)। बुवाई के समय 10-15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM) और N:P:K 100:50:40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देना चाहिए।
5. कटाई और उपज (Harvesting and Yield):
मक्के के चारे की कटाई दूधिया अवस्था (Milky stage / Silking stage) से लेकर दाना सख्त होने (Dough stage) के बीच करनी चाहिए। यह अवस्था बुवाई के 65-75 दिन बाद आती है।
- उपज: एक हेक्टेयर से लगभग 300 से 400 क्विंटल पौष्टिक हरा चारा प्राप्त होता है।
2.3 लोबिया की खेती (Cultivation of Cowpea / Lobia)
लोबिया खरीफ ऋतु का सबसे प्रमुख दलहनी चारा (Leguminous Fodder) है। दलहनी होने के कारण यह प्रोटीन (Protein) और कैल्शियम का उत्तम स्रोत है। इसे अक्सर ज्वार या मक्के के साथ मिलाकर (Mixed cropping) बोया जाता है, जिससे चारे की गुणवत्ता (Quality) बहुत बढ़ जाती है।
- वानस्पतिक नाम (Botanical Name):विग्ना अन्गुईकुलाटा (Vigna unguiculata)
- कुल (Family): फैबेसी / लेग्युमिनोसी (Fabaceae / Leguminosae)
1. जलवायु और भूमि (Climate and Soil):
लोबिया गर्म और आर्द्र (Hot and humid) जलवायु की फसल है। यह पाला (Frost) बिल्कुल सहन नहीं कर सकती। इसके लिए दोमट (Loam) मिट्टी सबसे अच्छी होती है।
2. उन्नत किस्में (Improved Varieties):
- रशियन जायंट (Russian Giant), यू.पी.सी.-5286 (UPC-5286), शिरसा-10, बुंदेल लोबिया-1।
3. बीज दर एवं बीजोपचार (Seed Rate and Seed Treatment):
- बीज दर: अकेले बोने पर 35 से 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर। यदि ज्वार या मक्के के साथ मिलाकर बोना हो, तो 15-20 किलो बीज पर्याप्त है।
- बीजोपचार: चूँकि यह दलहनी फसल है, इसलिए बुवाई से पहले बीजों को राइजोबियम कल्चर (Rhizobium culture) से अवश्य उपचारित करना चाहिए ताकि जड़ों में नाइट्रोजन स्थिर करने वाली ग्रंथियां (Nodules) जल्दी बन सकें।
4. बुवाई का समय (Time of Sowing):
खरीफ में जून-जुलाई और जायद में मार्च-अप्रैल में बुवाई की जाती है।
5. कटाई और उपज (Harvesting and Yield):
चारे के लिए लोबिया की कटाई तब करनी चाहिए जब पौधे में 50% फूल (Flowering stage) आ जाएं। यह समय बुवाई के 55-65 दिन बाद आता है।
- उपज: एक हेक्टेयर से 250 से 300 क्विंटल उच्च गुणवत्ता वाला हरा चारा प्राप्त होता है।
3. रबी ऋतु के प्रमुख चारे (Major Rabi Fodder Crops)
रबी ऋतु की चारा फसलों को ठंडी जलवायु (Cool and temperate climate) की आवश्यकता होती है। इस ऋतु के चारे मुख्य रूप से दलहनी (Leguminous) होते हैं, जो पशुओं के लिए अत्यधिक पौष्टिक होते हैं।
3.1 बरसीम की खेती (Cultivation of Berseem / Egyptian Clover)
बरसीम को ‘चारों का राजा’ (King of Fodders) कहा जाता है। यह सर्दियों के मौसम का सबसे लोकप्रिय, मुलायम (Succulent), रसीला और अत्यधिक पौष्टिक दलहनी चारा है। इसके चारे में 17-20% तक सुपाच्य क्रूड प्रोटीन (Crude Protein) होता है।
- वानस्पतिक नाम (Botanical Name):ट्राइफोलियम एलेक्जेंड्रिनम (Trifolium alexandrinum)
- कुल (Family): फैबेसी / लेग्युमिनोसी (Fabaceae)
- उत्पत्ति स्थान: मिस्र (Egypt – इसीलिए इसे इजिप्शियन क्लोवर कहते हैं)।
1. जलवायु और भूमि (Climate and Soil):
बरसीम को ठंडी और शुष्क जलवायु चाहिए। इसके बीज 20-25°C तापमान पर अच्छे से अंकुरित होते हैं। यह फसल क्षारीयता (Alkalinity) को कुछ हद तक सहन कर सकती है। इसके लिए मटियार दोमट (Clay Loam) मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है जिसमें पानी रोकने की क्षमता अधिक हो।
2. उन्नत किस्में (Improved Varieties):
बरसीम की किस्मों को दो भागों में बांटा जाता है:
- द्विगुणित (Diploid): मेस्कावी (Mescavi – भारत की सबसे प्रसिद्ध किस्म), वरदान (Vardan), बी.एल.-1।
- चतुर्गुणित (Tetraploid): पूसा जायंट (Pusa Giant) – इसके पत्ते बहुत बड़े होते हैं और उपज अधिक होती है।
3. बीज दर एवं बीजोपचार (Seed Rate and Seed Treatment):
- बीज दर:25 से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
- कासनी के बीज अलग करना: बरसीम के बीज में कासनी (Chicory – Cichorium intybus) नामक खरपतवार के बीज मिले होते हैं। बुवाई से पहले बीजों को 5% नमक के घोल (Salt solution) में डालें; कासनी के बीज तैरने लगेंगे, उन्हें निकाल कर फेंक दें।
- बीजोपचार: बीजों को राइजोबियम ट्राइफोलाई (Rhizobium trifolii) कल्चर से उपचारित करके बोना नितांत अनिवार्य है।
4. बुवाई की विधि और समय (Sowing Method and Time):
- समय: अक्टूबर का प्रथम पखवाड़ा (First fortnight of October) बुवाई के लिए सर्वोत्तम है।
- विधि: बरसीम की बुवाई खेत में 4-5 सेंटीमीटर खड़ा पानी (Standing water) भरकर, उसमें बीजों को छिटककर (Broadcasting) की जाती है।
5. कटाई और उपज (Harvesting and Yield):
बरसीम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे बहु-कटाई (Multi-cuts) प्राप्त होती हैं।
- पहली कटाई बुवाई के 50-55 दिन बाद की जाती है। इसके बाद हर 25-30 दिन के अंतराल पर कटाई (कुल 5 से 6 कटाइयां) मिलती हैं।
- उपज: एक हेक्टेयर से 800 से 1000 क्विंटल अत्यंत पौष्टिक हरा चारा प्राप्त होता है।
3.2 रिजका या लूसर्न की खेती (Cultivation of Lucerne / Alfalfa)
रिजका को ‘चारों की रानी’ (Queen of Fodders) कहा जाता है। यह एक बहुवर्षीय दलहनी चारा (Perennial Leguminous Fodder) है, अर्थात इसे एक बार बोने पर 3 से 4 साल तक लगातार हरा चारा मिलता रहता है। यह घोड़ों (Horses) और अधिक दूध देने वाली गायों के लिए उत्तम आहार है।
- वानस्पतिक नाम (Botanical Name):मेडिकागो सैटाइवा (Medicago sativa)
- कुल (Family): फैबेसी / लेग्युमिनोसी (Fabaceae)
1. जलवायु और भूमि (Climate and Soil):
रिजका ठंडी जलवायु का पौधा है, लेकिन इसकी जड़ें बहुत गहरी (Deep rooted) जाती हैं, इसलिए यह सूखा (Drought) भी अच्छी तरह सहन कर सकता है। इसके लिए जल निकास वाली दोमट मिट्टी (Loam Soil) सबसे अच्छी है। यह अम्लीय मिट्टी (Acidic soils) में बिल्कुल नहीं उगता।
2. उन्नत किस्में (Improved Varieties):
- आनंद-2 (Anand-2), सिरसा-9 (Sirsa-9), एन.डी.आर.आई. सलेक्शन-1 (NDRI Selection-1), चेतक।
3. बीज दर एवं अमरबेल का उपचार (Seed Rate and Weed Treatment):
- बीज दर:15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर। (चूंकि इसके बीज छोटे होते हैं, इसलिए बीज दर कम लगती है)।
- अमरबेल का उपचार: रिजका का सबसे भयंकर खरपतवार अमरबेल (Dodder – Cuscuta) है, जो पूर्ण तना परजीवी (Total stem parasite) है। इसके बीज रिजका में मिले होते हैं। बुवाई से पहले बीजों को 20% नमक के पानी में डालकर अमरबेल के बीजों को अलग कर देना चाहिए।
- बीजोपचार: बीजों को राइजोबियम मेलीलोटाई (Rhizobium meliloti) कल्चर से उपचारित करें।
4. बुवाई का समय (Time of Sowing):
मध्य अक्टूबर से मध्य नवंबर तक। इसे कतारों (Lines) में 30 सेमी की दूरी पर बोना चाहिए।
5. कटाई और उपज (Harvesting and Yield):
- पहली कटाई बुवाई के 55-60 दिन बाद करें। उसके बाद हर 30-35 दिन पर कटाई करें। एक साल में 7-8 कटाइयां मिल जाती हैं।
- उपज: एक वर्ष में 600 से 800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा प्राप्त होता है।
4. खरीफ और रबी चारे की फसलों में मुख्य अंतर (Difference Between Kharif and Rabi Fodder Crops)
| क्र.सं. | विशेषता (Feature) | खरीफ के चारे (Kharif Fodder) | रबी के चारे (Rabi Fodder) |
| 1. | बुवाई का समय (Sowing Time) | इनकी बुवाई जून-जुलाई (मानसून आने पर) में की जाती है। | इनकी बुवाई अक्टूबर-नवंबर (सर्दी शुरू होने पर) में की जाती है। |
| 2. | जलवायु की आवश्यकता (Climate) | इन्हें गर्म और नम (Hot and humid) जलवायु चाहिए। | इन्हें ठंडी और शुष्क (Cool and dry) जलवायु चाहिए। |
| 3. | पोषक तत्व (Nutritional Value) | ये अधिकतर घास कुल (Gramineae) के होते हैं, अतः इनमें कार्बोहाइड्रेट अधिक और प्रोटीन कम होता है (लोबिया को छोड़कर)। | ये अधिकतर दलहनी (Leguminous) होते हैं, अतः इनमें सुपाच्य प्रोटीन और कैल्शियम बहुत अधिक होता है। |
| 4. | प्रमुख उदाहरण (Examples) | ज्वार चरी, मक्का चरी, बाजरा, लोबिया, ग्वार। | बरसीम, रिजका, जई (Oats)। |
| 5. | कटाई (Harvesting Pattern) | ये प्रायः एक या दो कटाई (Single/Double cut) वाले होते हैं। | ये बहु-कटाई (Multi-cut) वाले होते हैं (बरसीम, रिजका में 5-7 कटाइयां मिलती हैं)। |
5. हरा चारा उत्पादन का महत्व (Importance of Green Fodder Production)
डेयरी फार्मिंग (Dairy Farming) को घाटे से उबारने के लिए हरे चारे का उत्पादन संजीवनी के समान है:
- उत्पादन लागत में कमी (Reduces Feed Cost): दाना (Concentrate) बहुत महंगा होता है। यदि पशु को पेट भर उत्तम गुणवत्ता का हरा चारा (जैसे बरसीम/लोबिया) खिलाया जाए, तो महंगे दाने की आवश्यकता बहुत कम हो जाती है।
- विटामिन A का स्रोत: हरे चारे में ‘कैरोटीन’ (Carotene) भरपूर होता है, जो पशु के शरीर में विटामिन ए में बदल जाता है। इससे पशुओं की आंखें स्वस्थ रहती हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है।
- दुग्ध उत्पादन में वृद्धि: हरे चारे (विशेषकर दलहनी) में दूध बनाने के लिए आवश्यक सभी अमीनो अम्ल और खनिज (Ca, P) प्रचुर मात्रा में होते हैं, जिससे दूध का उत्पादन और दूध में फैट की मात्रा बढ़ती है।
- सुपाच्य और स्वादिष्ट (Palatable & Digestible): हरा चारा रसीला (Succulent) और मुलायम होता है। यह पेट को कब्ज (Constipation) से बचाता है और पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं।
6. निष्कर्ष (Conclusion)
कक्षा 12 कृषि विज्ञान के छात्रों के लिए ‘खरीफ और रबी के प्रमुख चारों’ का अध्ययन केवल सैद्धांतिक (Theoretical) नहीं, बल्कि एक सफल डेयरी व्यवसाय (Profitable Dairy Farming) की नींव है।
एक उन्नत किसान वही है जो अपने पशुओं के लिए पूरे साल भर हरे चारे की उपलब्धता (Year-round green fodder availability) सुनिश्चित करे। खरीफ में ‘मक्का और ज्वार’ तथा रबी में ‘बरसीम और रिजका’ का फसल चक्र (Crop rotation) अपनाकर न केवल पशुओं को भरपूर पोषण दिया जा सकता है, बल्कि दलहनी फसलों के कारण खेत की मिट्टी की उर्वरता (Soil fertility) भी बढ़ती है। “हरा चारा ही सफेद दूध की गारंटी है।” सही बीज दर, उचित बीजोपचार और समय पर कटाई अपनाकर भारत का किसान पशुपालन में नई ऊंचाइयां छू सकता है।
7. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: किस चारे की फसल को ‘चारों का राजा’ (King of Fodders) और किसे ‘चारों की रानी’ (Queen of Fodders) कहा जाता है?
उत्तर: सर्दियों के सबसे प्रमुख दलहनी चारे ‘बरसीम’ (Berseem) को चारों का राजा कहा जाता है, और ‘रिजका’ (लूसर्न / Lucerne) को चारों की रानी कहा जाता है। ये दोनों ही अत्यंत पौष्टिक और प्रोटीन से भरपूर होते हैं।
प्रश्न 2: ज्वार (Sorghum) के छोटे पौधों को पशुओं को क्यों नहीं खिलाना चाहिए?
उत्तर: ज्वार की प्रारंभिक अवस्था (बुवाई के 40-45 दिन तक) में इसकी पत्तियों में धुरिन (Dhurrin) नामक तत्व होता है, जो हाइड्रोसाइनिक एसिड (HCN / Prussic acid) नामक भयंकर जहर बनाता है। इसे खाने से पशु की अचानक मृत्यु हो सकती है। फूल आने पर यह जहर समाप्त हो जाता है।
प्रश्न 3: बरसीम की बुवाई से पहले बीजों को नमक के पानी (Salt solution) में क्यों डाला जाता है?
उत्तर: बरसीम के बीज में कासनी (Chicory) नामक एक खतरनाक खरपतवार के बीज मिले होते हैं। जब बरसीम के बीजों को 5% नमक के घोल में डाला जाता है, तो हल्के होने के कारण कासनी के बीज पानी के ऊपर तैरने लगते हैं, जिन्हें आसानी से छानकर अलग कर दिया जाता है।
प्रश्न 4: दुनिया का सबसे बेहतरीन ‘साइलेज’ (Silage) किस चारे से बनाया जाता है?
उत्तर: दुनिया का सबसे उत्तम और पौष्टिक साइलेज ‘मक्का’ (Maize / Corn) के हरे चारे से बनाया जाता है। मक्के के तने में कार्बोहाइड्रेट (शर्करा) की भरपूर मात्रा होती है, जो साइलेज में अच्छे किण्वन (Fermentation) और लैक्टिक एसिड (Lactic acid) बनाने में मदद करती है।
प्रश्न 5: रिज़का (Lucerne) के खेत में कौन सा परजीवी खरपतवार भयंकर नुकसान पहुंचाता है?
उत्तर: रिजका के खेत में ‘अमरबेल’ (Dodder – Cuscuta) नामक पूर्ण तना परजीवी (Total stem parasite) खरपतवार सबसे भयंकर नुकसान पहुंचाता है। यह रिजका के तने पर पीले धागों की तरह लिपट जाता है और उसका सारा पोषण चूस लेता है।
प्रश्न 6: दलहनी चारा फसलों (बरसीम, लोबिया) का बीजोपचार किस कल्चर से करना अनिवार्य है?
उत्तर: दलहनी चारे की फसलों को हमेशा ‘राइजोबियम कल्चर’ (Rhizobium culture) से उपचारित करके बोना चाहिए। राइजोबियम जीवाणु पौधों की जड़ों में ग्रंथियां (Nodules) बनाकर वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करता है, जिससे रासायनिक यूरिया डालने की आवश्यकता नहीं पड़ती।