विद्यार्थियों के अध्ययन और परीक्षा की तैयारी के लिए ‘शहरी कूड़ा-करकट से कम्पोस्ट (Town Compost) तैयार करने की विधि’ पर आधारित विस्तृत नोट्स नीचे दिए गए हैं:
शहरी कूड़ा-करकट से कम्पोस्ट तैयार करने की विधि (Urban Town Composting)
MP Board 12th crop Production Urban Town Composting : पौधे के अवशेष पदार्थों, घास-पात, कचरे, मनुष्य के मल-मूत्र तथा पशुओं के गोबर इत्यादि पदार्थों को सड़ाकर जो खाद बनायी जाती है, उसे कम्पोस्ट (Compost) कहते हैं। खाद तैयार करने की इस विधि को कम्पोस्ट बनाना (Composting) कहा जाता है।
जब कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए मुख्य रूप से शहरों की सड़कों तथा नालियों के कूड़ा-करकट, मिट्टी और मानव मल-मूत्र का प्रयोग किया जाता है, तो इसे शहरी कम्पोस्ट (Town or Urban Compost) कहते हैं।
1. शहरी कम्पोस्ट बनाने के मुख्य उद्देश्य और लाभ
- शहरों की स्वच्छता: शहर में रोड के किनारे रखे अथवा सड़कों और नालियों से प्राप्त कचरे का उचित उपयोग कर उन्हें स्वच्छ रखा जा सकता है।
- उपयोगी उत्पाद: व्यर्थ पदार्थों से उत्तम गुणवत्ता वाली जैविक खाद प्राप्त होती है।
- मृदा की उर्वरता: मानव मल-मूत्र और शहरी कचरे से बनी खाद में नाइट्रोजन और अन्य आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, जो मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं।
2. कम्पोस्ट बनाने के लिए आवश्यक पदार्थ (Essential Materials)
शहरी कूड़ा-करकट से कम्पोस्ट बनाने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:
- कार्बनिक पदार्थ (Organic Matter): गलियों का कूड़ा-करकट, व्यर्थ कागज, सूती कपड़े, और जैविक कचरा।
- उपयुक्त प्रारम्भक (Suitable Starter): कचरे को अच्छी तरह और शीघ्रता से सड़ाने के लिए मानव मल-मूत्र (विष्ठा), सीवेज, स्लज या मूत्र वाली मिट्टी का उपयोग प्रारम्भक के रूप में किया जाता है।
- चूने का पत्थर एवं नाइट्रोजन युक्त उर्वरक: कार्बनिक पदार्थों के सड़ने से उत्पन्न अम्ल (अम्लता) को कम करने के लिए चूने का प्रयोग किया जाता है।
- उचित नमी (Moisture): सूक्ष्म जीवों को सक्रिय बनाए रखने के लिए गड्ढों या ढेर में 50% नमी का होना आवश्यक है।
- उपयुक्त वायु संचार (Aeration): जीवाणुओं की क्रियाशीलता के लिए उपयुक्त मात्रा में वायु का होना आवश्यक है।
3. शहरी कम्पोस्ट तैयार करने की प्रमुख विधियाँ (Methods of Preparation)
दिए गए पाठ्य सामग्री के अनुसार, शहरी कूड़ा-करकट और मानव मल-मूत्र (विष्ठा) के उपयोग से कम्पोस्ट तैयार करने की सबसे उपयुक्त और वैज्ञानिक विधि ‘बंगलौर या आचार्य विधि’ है:
(अ) बंगलौर या आचार्य विधि (Bangalore or Acharya Method)
इस विधि को सी.एन. आचार्य ने बंगलौर में विकसित किया था। यह विधि विशेषकर शहरी कचरे और मानव विष्ठा (Night Soil) से खाद बनाने के लिए बहुत उपयोगी है। इसमें खाद की पलटाई नहीं की जाती है।
खाद बनाने की प्रक्रिया:
- गड्ढे का आकार: सुविधानुसार 6 x 2 x 1 मीटर से लेकर 12 x 3 x 1.20 मीटर तक आकार के गड्ढे बनाए जाते हैं।
- प्रथम परत (कचरा): सबसे पहले गड्ढे में शहरी कूड़ा-करकट, घास-फूस इत्यादि की 20-25 सेमी मोटी परत बिछाई जाती है।
- द्वितीय परत (मानव विष्ठा/मल-मूत्र): कचरे के ऊपर मानव विष्ठा (Human Excreta) की 5 सेमी मोटी परत लगाई जाती है।
- तृतीय परत (मिट्टी): विष्ठा के ऊपर 1-2 सेमी मोटी मिट्टी की परत बिछाई जाती है।
- गड्ढा भरना और लिपाई: इसी क्रम में परतें लगाते हुए गड्ढे को जमीन की सतह से 30 सेमी की ऊँचाई तक भर लिया जाता है। अंत में इसके ऊपर 2-5 सेमी मिट्टी डालकर अच्छी तरह लिपाई कर दी जाती है।
बंगलौर विधि की विशेषताएँ:
- लिपाई करने से मक्खियाँ गड्ढे पर बैठकर अण्डे नहीं देतीं।
- दुर्गन्ध कम फैलती है और अमोनिया गैस भी अंदर ही सोख ली जाती है।
- लगभग 4 से 5 माह में खाद बनकर तैयार हो जाती है।
- यह खाद साधारण गोबर की खाद की अपेक्षा अधिक पोषक तत्वों वाली होती है।
(ब) शहरी कचरे से वर्मी कम्पोस्ट (केंचुए की खाद) का निर्माण
शहरी व्यर्थ पदार्थों (City waste materials) को केंचुए की खाद (Vermicompost) में भी बदला जा सकता है। इसके लिए शहर के कार्बनिक अपशिष्ट को छाँटकर, प्रारंभिक उपचार (गोबर और नमी के साथ आंशिक विघटन) के बाद गड्ढों में केंचुओं (प्रति वर्ग मीटर 150 केंचुए) के साथ रखा जाता है। केंचुए इस कचरे को खाकर उच्च गुणवत्ता वाली वर्मी कम्पोस्ट में बदल देते हैं।
(स) मानव मल-मूत्र एवं वाहित मल विधि (Sewage / Town Compost System)
बड़े शहरों में नालियों (Sewage) और मानव विष्ठा को सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इसे उपचारित करके खाद के रूप में बदला जाता है। इसके लिए ‘विष्ठा चूर्ण तैयार करने की विधि (Powdretite system)’ और ‘वाहित मल ढंग (Sewage system)’ का प्रयोग कर इसे टाउन कम्पोस्ट (Town Compost) का रूप दिया जाता है।
FAQs Urban Town Composting
प्रश्न 1: शहरी कम्पोस्ट (Town Compost) किसे कहते हैं?
- उत्तर: शहरों की सड़कों, नालियों के कूड़े-कचरे, मिट्टी और मानव मल-मूत्र (विष्ठा) आदि को सड़ाकर जो जैविक खाद तैयार की जाती है, उसे शहरी कम्पोस्ट कहते हैं।
प्रश्न 2: कम्पोस्ट बनाने के लिए गड्ढे में कितनी नमी होनी चाहिए?
- उत्तर: खाद को सड़ाने वाले सूक्ष्म जीवों (जीवाणुओं) को सक्रिय बनाए रखने के लिए कम्पोस्ट के गड्ढों या ढेर में 50% नमी का होना आवश्यक होता है।
प्रश्न 3: कम्पोस्ट बनाने में ‘प्रारम्भक’ (Starter) का क्या कार्य है?
- उत्तर: कचरे और वानस्पतिक पदार्थों के सड़ने की क्रिया को शीघ्रता से पूरा करने के लिए प्रारम्भक का उपयोग किया जाता है। शहरी कम्पोस्ट में प्रायः मानव मल-मूत्र (विष्ठा), सीवेज या मूत्र वाली मिट्टी का उपयोग प्रारम्भक के रूप में होता है।
प्रश्न 4: शहरी कूड़ा-करकट और मानव मल-मूत्र से खाद बनाने की सबसे उपयुक्त विधि कौन सी है?
- उत्तर: इसके लिए ‘बंगलौर या आचार्य विधि’ (Bangalore Method) सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इस विधि को सी.एन. आचार्य ने विकसित किया था।
प्रश्न 5: बंगलौर विधि में खाद के गड्ढे को ऊपर से मिट्टी से क्यों लीप दिया जाता है?
- उत्तर: गड्ढे को मिट्टी से लीपने के तीन प्रमुख कारण हैं: पहला, मक्खियाँ उस पर बैठकर अण्डे नहीं देतीं। दूसरा, इससे दुर्गन्ध बाहर नहीं फैलती। तीसरा, अंदर बनने वाली अमोनिया गैस मिट्टी द्वारा सोख ली जाती है।
प्रश्न 6: बंगलौर या आचार्य विधि में खाद तैयार होने में कितना समय लगता है?
- उत्तर: इस विधि के अंतर्गत खाद की पलटाई नहीं की जाती है और इसे पूरी तरह सड़कर तैयार होने में लगभग 4 से 5 माह का समय लगता है।
प्रश्न 7: क्या बंगलौर विधि से बनी खाद गोबर की खाद से बेहतर होती है?
- उत्तर: हाँ, मानव मल-मूत्र और कचरे के उपयोग के कारण यह खाद साधारण गोबर की खाद की अपेक्षा अधिक पोषक तत्वों वाली होती है।