MP Board Class 12 Scientific Cultivation of Paddy: एमपी बोर्ड कक्षा 12 कृषि विज्ञान (MP Board Class 12 Agriculture) के छात्रों के लिए ‘इकाई 7: फसलों की खेती – I’ (Unit 7: Cultivation of Crops – I) के अंतर्गत ‘धान की खेती’ (Paddy/Rice Cultivation) पर एक अति विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख। इस लेख में धान का वानस्पतिक परिचय, जलवायु, उन्नत किस्में, बुवाई की आधुनिक विधियां (जैसे डेपोग और श्री विधि), उर्वरक प्रबंधन, पादप संरक्षण (रोग एवं कीट) और उपज का द्विभाषी (Bilingual) रूप में गहराई से वैज्ञानिक अध्ययन किया गया है। यह बोर्ड और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शिका है।
इकाई 7: फसलों की खेती – I : धान की वैज्ञानिक खेती (Scientific Cultivation of Paddy/Rice) – संपूर्ण अध्ययन (कक्षा 12 कृषि विज्ञान)
1. प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय कृषि (Indian Agriculture) और अर्थव्यवस्था में धान (Paddy) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह भारत की सबसे प्रमुख खाद्यान्न फसल (Major Food Crop) है और देश की आधी से अधिक आबादी का मुख्य भोजन (Staple food) चावल ही है। विश्व में चीन के बाद भारत धान उत्पादन में दूसरे स्थान पर आता है, लेकिन क्षेत्रफल (Area) की दृष्टि से भारत का विश्व में प्रथम स्थान है।
धान की खेती (Cultivation of Paddy) एक अत्यधिक श्रम-साध्य (Labor-intensive) और जल-मांग (High water requiring) वाली प्रक्रिया है। मध्य प्रदेश (MP Board) और अन्य राज्य बोर्डों के कक्षा 12 कृषि विज्ञान (Class 12 Agriculture) के पाठ्यक्रम में धान की खेती का अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण है। बोर्ड परीक्षाओं में इसके वानस्पतिक विवरण, बुवाई की उन्नत विधियों (Dapog, SRI), और रोग-कीट प्रबंधन से दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions) निश्चित रूप से पूछे जाते हैं। इस लेख में हम धान की वैज्ञानिक और व्यावसायिक खेती का ए टू जेड (A to Z) विस्तृत अध्ययन करेंगे।
2. धान का वानस्पतिक परिचय (Botanical Description of Paddy)
कृषि छात्रों को किसी भी फसल का वानस्पतिक वर्गीकरण (Botanical Classification) याद होना अनिवार्य है:
- वानस्पतिक नाम (Botanical Name):ओराइजा सैटाइवा (Oryza sativa L.)
- कुल (Family): पोएसी या ग्रैमिनी (Poaceae / Gramineae) – यह घास कुल का पौधा है।
- गुणसूत्र संख्या (Chromosome Number): 2n = 24
- उत्पत्ति स्थान (Origin Place): दक्षिण-पूर्वी एशिया (South-East Asia) या इंडो-बर्मा क्षेत्र (Indo-Burma region)।
- पुष्पक्रम (Inflorescence): धान के फूल या बाली को पैनिकल (Panicle) कहा जाता है। यह एक स्व-परागित (Self-pollinated) फसल है।
- प्रोटीन (Protein): चावल में 6 से 7 प्रतिशत प्रोटीन पाई जाती है, जिसे ‘ओराइजेनिन’ (Oryzenin) कहते हैं।
- परीक्षण भार (Test Weight): 1000 दानों के वजन को परीक्षण भार कहते हैं। सामान्य धान का 25 ग्राम और बासमती धान का 21 ग्राम होता है।
3. जलवायु और तापमान (Climate and Temperature Requirements)
धान मूल रूप से एक उष्णकटिबंधीय (Tropical) जलवायु का पौधा है। इसे अपनी उचित वृद्धि और विकास के लिए गर्म और नम (Hot and Humid) जलवायु की आवश्यकता होती है।
- तापमान (Temperature):
- बीजों के अंकुरण (Germination) के लिए 20-25°C तापमान सर्वोत्तम होता है।
- वानस्पतिक वृद्धि (Vegetative growth) के लिए 25-30°C तापमान चाहिए।
- फूल आते समय और दाना पकते समय (Ripening stage) 20-25°C तापमान और साफ खुला आसमान आवश्यक है।
- वर्षा (Rainfall): धान को बहुत अधिक पानी की आवश्यकता होती है। जिन क्षेत्रों में 100 से 150 सेंटीमीटर (1000-1500 mm) वार्षिक वर्षा होती है, वे धान की खेती के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं।
4. उपयुक्त भूमि या मृदा (Suitable Soil)
धान की खेती वैसे तो कई प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन इसके लिए सबसे उत्तम मटियार या मटियार दोमट (Clay or Clay Loam) मिट्टी मानी जाती है।
- विशेषता (Feature): मटियार मिट्टी की जल धारण क्षमता (Water Holding Capacity) बहुत अधिक होती है। धान के खेत में पानी का भरा रहना आवश्यक है, और मटियार मिट्टी पानी को रिसने (Percolation) से रोकती है।
- पीएच मान (pH Value): धान हल्की अम्लीय मृदाओं (Slightly acidic soils) को आसानी से सहन कर लेता है। इसके लिए 5.5 से 6.5 pH मान वाली मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है।
5. धान की उन्नत किस्में (Improved Varieties of Paddy)
बंपर पैदावार प्राप्त करने के लिए क्षेत्र की जलवायु और पकने की अवधि (Maturity duration) के अनुसार सही किस्म (Variety) का चुनाव करना बहुत आवश्यक है। धान की किस्मों को उनके पकने के समय के आधार पर वर्गीकृत किया गया है:
- अगेती किस्में (Early Varieties – 90 से 110 दिन):
- आई.आर.-8 (IR-8 – विश्व की जादुई धान / Miracle rice of the world)
- जया (Jaya – भारत की जादुई धान / Miracle rice of India)
- रत्ना (Ratna), साकेत-4, बाला (Bala), पूसा-2-21।
- मध्यम किस्में (Medium Varieties – 115 से 135 दिन):
- पंत धान-4 (Pant Dhan-4), सरजू-52 (Sarju-52), सीता, आई.आर.-36, क्रांति।
- पछेती किस्में (Late Varieties – 140 दिन से अधिक):
- मसूरी (Mahsuri), पंकज (Pankaj), जगन्नाथ (Jagannath – यह एक उत्परिवर्तित/Mutant किस्म है)।
- सुगंधित या बासमती किस्में (Aromatic / Basmati Varieties):
- पूसा बासमती-1 (Pusa Basmati-1 – विश्व की पहली अधिक उपज देने वाली बासमती), कस्तूरी (Kasturi), तरावड़ी बासमती, बासमती-370।
- धान की प्रथम संकर किस्म (First Hybrid Variety of Rice):
- भारत में धान की पहली हाइब्रिड किस्म CORH-1 है।
6. बीज दर और बीजोपचार (Seed Rate and Seed Treatment)
6.1 बीज दर (Seed Rate):
धान में बीज की मात्रा बुवाई की विधि (Method of sowing) पर निर्भर करती है:
- छिटकवां विधि (Broadcasting): 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
- कतारों में बुवाई (Drilling): 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
- रोपाई विधि (Transplanting): 40-50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
- संकर धान (Hybrid Rice): 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
- श्री विधि (SRI Method): 5-6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (सबसे कम)।
6.2 बीजोपचार (Seed Treatment):
बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना अत्यंत आवश्यक है ताकि फसल को बीज जनित रोगों (Seed-borne diseases) से बचाया जा सके।
- नमक के पानी से उपचार (Brine Solution Treatment): 10 लीटर पानी में 1 किलोग्राम नमक घोलकर उसमें धान के बीज डालें। जो थोथे या हल्के बीज (Chaffy grains) और खरपतवार के बीज ऊपर तैरने लगें, उन्हें निकालकर फेंक दें। नीचे बैठे भारी और स्वस्थ बीजों को साफ पानी से धोकर सुखा लें।
- रासायनिक उपचार: सुखाए गए बीजों को कवकनाशी (Fungicide) जैसे थाइरम (Thiram) या कार्बेन्डाजिम (Carbendazim / Bavistin) की 2.5 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
7. धान की बुवाई और पौध (नर्सरी) तैयार करने की विधियाँ (Methods of Sowing and Nursery Preparation)
धान को मुख्य रूप से दो तरीकों से उगाया जाता है: 1. सीधे खेत में बुवाई (Direct Sowing), 2. नर्सरी तैयार करके रोपाई (Transplanting)। आधुनिक कृषि में नर्सरी तैयार करने की कई उन्नत विधियां विकसित की गई हैं, जो कक्षा 12 के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं:
7.1 गीली क्यारी विधि (Wet Nursery)
जिन क्षेत्रों में पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है, वहां यह विधि अपनाई जाती है। खेत में पानी भरकर पडलिंग (Puddling / लेह लगाना) की जाती है। इसके बाद अंकुरित बीजों (Sprouted seeds) को क्यारियों में छिड़क दिया जाता है। पौध 20-25 दिन में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।
7.2 सूखी क्यारी विधि (Dry Nursery)
यह विधि उन क्षेत्रों के लिए है जहां पानी की कमी होती है। खेत की जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा (Friable) बना लिया जाता है और सूखी क्यारियों में बीज बो दिए जाते हैं।
7.3 डेपोग विधि (Dapog Method of Nursery)
- उत्पत्ति: इस विधि का विकास ‘अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान’ (IRRI), फिलीपींस में हुआ था।
- विशेषता: यह एक ‘मृदा रहित’ (Soilless) नर्सरी विधि है। इसमें पौधों को मिट्टी की आवश्यकता नहीं होती।
- विधि: इसे पक्के फर्श, लकड़ी के तख्तों या केले के पत्तों (Banana leaves) पर पॉलीथिन बिछाकर उगाया जाता है। अंकुरित बीजों को 1.5 से 3 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से बहुत घना बिछाया जाता है और दिन में 3-4 बार पानी का छिड़काव किया जाता है। एक हेक्टेयर की रोपाई के लिए केवल 25-30 वर्ग मीटर जगह पर्याप्त होती है।
- समय: इसमें पौध बहुत जल्दी, मात्र 11 से 14 दिनों में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।
7.4 श्री विधि या सघन धान प्रणाली (SRI – System of Rice Intensification)
- उत्पत्ति: इस विधि का विकास 1983 में मेडागास्कर (Madagascar) में फादर हेनरी डी लॉलानी द्वारा किया गया था।
- विशेषता: यह पानी और बीज बचाने की सबसे उत्तम विधि है। इसे “कम पानी में अधिक धान” उगाने की तकनीक भी कहते हैं।
- प्रमुख सिद्धांत (Key Principles):
- बहुत कम बीज दर: केवल 5-6 किलो बीज प्रति हेक्टेयर लगता है।
- कच्ची पौध की रोपाई: इसमें बहुत छोटी उम्र की पौध (केवल 10-12 दिन की या 2 पत्तियों वाली अवस्था / 2-leaf stage) की रोपाई की जाती है।
- चौड़ी दूरी (Wider Spacing): पौधों को वर्गाकार विधि से काफी दूर-दूर (25 x 25 सेमी) रोपा जाता है। एक जगह पर केवल एक ही पौधा (Single seedling) लगाया जाता है।
- सिंचाई प्रबंधन: खेत में हमेशा पानी भरकर नहीं रखा जाता (No continuous flooding)। खेत को नम रखा जाता है और बाल आने (Hairline cracks) पर ही हल्की सिंचाई की जाती है।
- लाभ: इसमें कल्ले (Tillers) बहुत अधिक (50-60 तक) फूटते हैं, पानी की 40% तक बचत होती है, और उपज सामान्य विधियों से 20-30% अधिक होती है।
8. खेत की तैयारी और पडलिंग (Field Preparation and Puddling)
रोपाई वाले धान के लिए खेत की तैयारी एक विशेष तरीके से की जाती है, जिसे पडलिंग (Puddling) या लेह लगाना (मचाना) कहते हैं।
- पडलिंग क्या है? खेत में 5-10 सेमी पानी भरकर ट्रैक्टर (पडलर के साथ) या बैलों की मदद से मिट्टी को मथना (Churning) पडलिंग कहलाता है।
- पडलिंग के लाभ (Benefits of Puddling):
- मिट्टी के नीचे एक कठोर परत (Hard pan) बन जाती है, जिससे सिंचाई के पानी का नीचे की ओर रिसाव (Percolation losses) रुक जाता है और पानी बचता है।
- खरपतवार (Weeds) पूरी तरह नष्ट होकर मिट्टी में दबकर सड़ जाते हैं और खाद बन जाते हैं।
- रोपाई (Transplanting) करना बहुत आसान हो जाता है।
9. खाद एवं उर्वरक प्रबंधन (Manure and Fertilizer Management)
धान की फसल भारी मात्रा में पोषक तत्वों का शोषण करती है, इसलिए इसे संतुलित खाद की आवश्यकता होती है।
- जैविक खाद (Organic Manure): पडलिंग से 15-20 दिन पहले 10-15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM) या कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिला देनी चाहिए।
- रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilizers): उन्नत किस्मों के लिए N:P:K का अनुपात 120:60:60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होना चाहिए।
- फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा पडलिंग के समय आधार उर्वरक (Basal dose) के रूप में दें।
- शेष आधी नाइट्रोजन को दो बार में— कल्ले निकलते समय (Tillering stage) और बालियां बनते समय (Panicle initiation) टॉप ड्रेसिंग (Top dressing) के रूप में दें।
- जिंक सल्फेट (Zinc Sulphate): धान में जिंक की कमी बहुत होती है (जिससे खैरा रोग होता है)। अतः खेत की तैयारी के समय 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर अवश्य मिलाएं।
- जैविक उर्वरक (Bio-fertilizers): धान के जलमग्न खेत में नाइट्रोजन की आपूर्ति के लिए नीली-हरी शैवाल (BGA / Blue-Green Algae) और एजोला (Azolla) का उपयोग अत्यंत लाभकारी है। ये वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करते हैं।
10. सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)
धान एक जल-प्रेमी (Semi-aquatic) पौधा है। इसके पूरे जीवन काल में 900 से 2500 मिलीमीटर पानी की आवश्यकता होती है। खेत में 5 सेंटीमीटर तक पानी भरा रहना अच्छा माना जाता है, लेकिन कुछ क्रांतिक अवस्थाओं (Critical stages) पर पानी की कमी होने पर उपज में भारी गिरावट आती है।
धान में सिंचाई की क्रांतिक अवस्थाएं:
- कल्ले निकलते समय (Tillering Stage): रोपाई के 20-30 दिन बाद।
- बालियां बनते समय (Booting / Panicle Initiation Stage): जब तने के अंदर बाली बन रही हो। यह सबसे संवेदनशील (Most sensitive) अवस्था है।
- फूल आते समय (Flowering Stage):
- दाने में दूध भरते समय (Dough/Milky Stage):
11. खरपतवार नियंत्रण (Weed Management)
धान के खेत में खरपतवार भारी नुकसान पहुंचाते हैं। पडलिंग करने से काफी खरपतवार मर जाते हैं, फिर भी जो बचते हैं उनका नियंत्रण आवश्यक है।
- प्रमुख खरपतवार: सांवा या जंगली धान (Echinochloa crusgalli), मोथा (Cyperus rotundus), दूब घास, और जलकुंभी। (सांवा धान का नकलची / Mimicry weed है)।
- यांत्रिक नियंत्रण: रोपाई के 20 और 40 दिन बाद ‘कोनो वीडर’ (Cono weeder) या ‘जापानी पैडी वीडर’ चलाकर खरपतवारों को मिट्टी में दबा देना चाहिए।
- रासायनिक नियंत्रण (Chemical Control):
- बुवाई पूर्व (Pre-emergence): रोपाई के 2-3 दिन के अंदर ब्यूटाक्लोर (Butachlor / Machete) 1.5 किलो सक्रिय तत्व या पेंडीमेथालिन (Pendimethalin) का 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। (छिड़काव के समय खेत में 2-3 सेमी खड़ा पानी होना चाहिए)।
- खड़ी फसल में (Post-emergence): यदि चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार हों, तो बुवाई के 25-30 दिन बाद 2,4-D का छिड़काव करें। सावां के लिए ‘प्रोपेनिल’ (Propanil / Stam F-34) का उपयोग करें।
12. प्रमुख पादप रोग और उनका नियंत्रण (Major Diseases and Their Management)
धान की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग और उनके नियंत्रण के उपाय निम्नलिखित हैं:
12.1 खैरा रोग (Khaira Disease)
यह धान का सबसे प्रसिद्ध ‘दैहिक रोग’ (Physiological disease) है जिसकी खोज डॉ. वाई.एल. नेने ने की थी।
- कारण: यह मिट्टी में जस्ता या जिंक (Zinc – Zn) पोषक तत्व की भारी कमी के कारण होता है।
- लक्षण: निचली और पुरानी पत्तियों पर भूरे-कत्थई (Rust-brown) रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। पौधे बौने रह जाते हैं और कल्ले नहीं फूटते।
- नियंत्रण: 25 किलो जिंक सल्फेट (
) प्रति हेक्टेयर खेत की तैयारी के समय डालें। रोग लगने पर 5 किलो जिंक सल्फेट + 2.5 किलो बुझा चूना 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव (Foliar spray) करें।
12.2 धान का झुलसा या ब्लास्ट रोग (Blast Disease)
इसे ‘अमीर रोग’ (Rich man’s disease) भी कहते हैं।
- रोगजनक:पायरीकुलेरिया ओराइजी (Pyricularia oryzae) नामक कवक (Fungus)।
- लक्षण: पत्तियों पर आंख या नाव के आकार (Boat/Eye shaped) के धब्बे बनते हैं जिनका बीच का हिस्सा राख के रंग का होता है। यह तने की गांठ (Node blast) और बाली की गर्दन (Neck blast) को भी सड़ा देता है।
- नियंत्रण: यूरिया का अत्यधिक प्रयोग न करें। ट्राइसाइक्लाज़ोल (Tricyclazole 75 WP) या कार्बेन्डाजिम का 0.1% की दर से छिड़काव करें।
12.3 भूरा पत्ती धब्बा रोग (Brown Leaf Spot)
(1943 के बंगाल के अकाल का कारण)।
- रोगजनक:हेल्मिन्थोस्पोरियम ओराइजी (Helminthosporium oryzae) नामक कवक।
- लक्षण: पत्तियों पर तिल के बीज के आकार के गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं।
- नियंत्रण: बीजोपचार करें। मैन्कोजेब (Mancozeb) या प्रोपिकोनाज़ोल का छिड़काव करें।
12.4 जीवाणु झुलसा (Bacterial Leaf Blight – BLB)
- रोगजनक:जैन्थोमोनास ओराइजी (Xanthomonas oryzae) नामक जीवाणु।
- लक्षण: पत्तियों के किनारे (Margins) और ऊपरी सिरे पीले होकर सूखने लगते हैं।
- नियंत्रण: स्ट्रेप्टोसाइक्लिन (Streptocycline) 1 ग्राम + कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 30 ग्राम को 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़कें।
13. प्रमुख हानिकारक कीट और उनका नियंत्रण (Major Harmful Insects and Their Management)
13.1 पीला तना छेदक (Yellow Stem Borer)
- लक्षण (Damage): इसकी सूंडी (Caterpillar) तने के अंदर घुसकर उसे खाती है। वानस्पतिक अवस्था में मुख्य प्ररोह सूख जाता है, जिसे ‘डेड हार्ट’ (Dead Heart) कहते हैं। बालियां आने की अवस्था में बालियां सफेद होकर सूख जाती हैं, जिसे ‘सफेद बाली’ (White Head) कहते हैं।
- नियंत्रण: कार्बोफ्यूरान (Carbofuran 3G) या कारटैप हाइड्रोक्लोराइड (Cartap 4G) दानेदार कीटनाशक का 20 किलो/हेक्टेयर की दर से खेत में भुरकाव करें।
13.2 गंधी बग (Gundhi Bug)
- लक्षण (Damage): यह रस चूसने वाला कीट है। इसके शरीर से भयंकर बदबू (Foul smell) आती है। यह बालियों में ‘दूधिया अवस्था’ (Milky stage) में दानों का रस चूस लेता है, जिससे दाने खोखले (Chaffy grains) रह जाते हैं।
- नियंत्रण: बालियां निकलते समय मैलाथियान (Malathion 5% Dust) या क्विनालफॉस डस्ट का 20-25 किलो/हेक्टेयर की दर से शाम के समय भुरकाव करें।
13.3 भूरा फुदका (Brown Plant Hopper – BPH)
- लक्षण (Damage): ये छोटे-छोटे कीट पौधों के निचले हिस्से (तने) पर जमा होकर रस चूसते हैं। इससे पौधे गोल घेरे में सूखकर गिर जाते हैं, जिसे ‘हॉपर बर्न’ (Hopper burn) कहा जाता है।
- नियंत्रण: इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid 17.8 SL) या बुप्रोफेज़िन (Buprofezin) का छिड़काव करें।
14. कटाई, मड़ाई और उपज (Harvesting, Threshing, and Yield)
कटाई (Harvesting):
जब धान की बालियां सुनहरी (Golden yellow) हो जाएं और दानों में नमी (Moisture content) 20 से 22 प्रतिशत रह जाए, तब फसल की कटाई दरांती (Sickle) या कंबाइन हार्वेस्टर (Combine Harvester) से कर लेनी चाहिए।
भंडारण (Storage):
कटाई के बाद धान की मड़ाई (Threshing) करके दानों को तेज धूप में अच्छी तरह सुखाना चाहिए। गोदाम में सुरक्षित भंडारण के लिए दानों में नमी 10 से 12 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए, अन्यथा फफूंदी और कीट लग जाते हैं।
उपज (Yield):
धान की उपज किस्म और खेती के तरीके पर निर्भर करती है:
- देशी/परंपरागत किस्में: 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।
- उन्नत/बौनी किस्में (HYV): 40 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।
- बासमती किस्में: 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।
- संकर धान (Hybrid Rice): 60 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर।
15. निष्कर्ष (Conclusion)
धान (Paddy) केवल एक फसल नहीं, बल्कि भारतीय कृषि की जीवनरेखा है। आधुनिक समय में बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने और गिरते भूजल स्तर (Groundwater level) की समस्या से निपटने के लिए धान की खेती में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य हो गया है। कक्षा 12 के कृषि विज्ञान के छात्रों के लिए ‘श्री विधि’ (SRI) और ‘डेपोग विधि’ (Dapog method) जैसी जल-बचत तकनीकों का ज्ञान होना भविष्य की टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) के लिए एक मजबूत आधार है। सही किस्म का चुनाव, उचित पडलिंग, और ‘एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन’ (IPM) को अपनाकर ही हम पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए धान का अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
16. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: ‘डेपोग विधि’ (Dapog Method) क्या है और इसमें पौध कितने दिन में तैयार होती है?
उत्तर: डेपोग विधि धान की नर्सरी तैयार करने की एक ‘मृदा रहित’ (Soilless) तकनीक है, जिसका विकास फिलीपींस (IRRI) में हुआ था। इसमें पौधों को फर्श, पॉलीथिन या केले के पत्तों पर उगाया जाता है। इस विधि में पौध रोपाई के लिए बहुत जल्दी, मात्र 11 से 14 दिनों में तैयार हो जाती है।
प्रश्न 2: धान की ‘श्री विधि’ (SRI Method) का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: श्री विधि (सघन धान प्रणाली) का मुख्य उद्देश्य कम पानी, कम बीज (5-6 किलो/हेक्टेयर), और कम रसायनों के उपयोग से धान का अधिक उत्पादन प्राप्त करना है। इसमें बहुत छोटी (10-12 दिन की) और केवल एक-एक पौध (Single seedling) को 25×25 सेमी की चौड़ी दूरी पर रोपा जाता है।
प्रश्न 3: धान का ‘खैरा रोग’ किस तत्व की कमी से होता है?
उत्तर: धान का खैरा रोग (Khaira Disease) मिट्टी में जिंक (Zinc – जस्ता) पोषक तत्व की भारी कमी के कारण होता है। इस रोग के कारण पौधों की निचली पत्तियों पर भूरे-कत्थई रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इसका इलाज ‘जिंक सल्फेट’ का प्रयोग है।
प्रश्न 4: धान में ‘पडलिंग’ (Puddling / मचाना) क्यों की जाती है?
उत्तर: खेत में पानी भरकर मिट्टी को मथना पडलिंग कहलाता है। इसका मुख्य उद्देश्य मिट्टी के नीचे एक कठोर परत (Hard pan) बनाना है, जिससे सिंचाई का पानी नीचे न रिसे (Stop percolation losses)। साथ ही इससे खरपतवार नष्ट होते हैं और रोपाई करना आसान हो जाता है।
प्रश्न 5: ‘गोल्डन राइस’ (Golden Rice) क्या है?
उत्तर: गोल्डन राइस आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified – GM) धान की एक विशेष किस्म है। इस चावल को विशेष रूप से विटामिन ‘ए’ (Vitamin A / बीटा-कैरोटीन) की कमी को दूर करने के लिए विकसित किया गया है। इसका रंग हल्का पीला या सुनहरा होता है।
प्रश्न 6: ‘डेड हार्ट’ (Dead Heart) और ‘सफेद बाली’ (White Head) किस कीट के लक्षण हैं?
उत्तर: ये दोनों धान के सबसे खतरनाक कीट ‘पीले तना छेदक’ (Yellow Stem Borer) के हमले के लक्षण हैं। जब सूंडी वानस्पतिक अवस्था में तने को खाती है तो मुख्य प्ररोह सूख जाता है (डेड हार्ट)। जब यह बालियां आने पर हमला करती है तो बालियां सूख कर सफेद हो जाती हैं (सफेद बाली)।