आवेशों के निकाय के कारण विभव Potential due to a System of Charges

आवेशों के निकाय के कारण विभव (Potential due to a System of Charges)

1. बहुल आवेशों के कारण विभव (अध्यारोपण का सिद्धांत)

यदि हमारे पास कई बिंदु आवेशों (q_1, q_2, \dots, q_n) का एक निकाय है, तो किसी बिंदु P पर कुल वैद्युत विभव, प्रत्येक आवेश के कारण उस बिंदु पर उत्पन्न अलग-अलग विभवों के बीजगणितीय योग के बराबर होता है। इसे अध्यारोपण का सिद्धांत (Superposition Principle) कहते हैं।

  • माना बिंदु P पर आवेश q_1 के कारण विभव V_1 है, तो:

        \[V_1 = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} \frac{q_1}{r_{1P}}\]

    (जहाँ r_{1P} बिंदु P तथा आवेश q_1 के बीच की दूरी है)
  • इसी प्रकार, अन्य आवेशों q_2, q_3 \dots के कारण विभव क्रमशः V_2, V_3 \dots होंगे।
  • कुल विभव (V):

        \[V = V_1 + V_2 + \dots + V_n\]

        \[V = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} \left( \frac{q_1}{r_{1P}} + \frac{q_2}{r_{2P}} + \dots + \frac{q_n}{r_{nP}} \right)\]


2. संतत आवेश वितरण के कारण विभव (Continuous Charge Distribution)

यदि आवेश अलग-अलग बिंदुओं पर न होकर किसी वस्तु पर एकसमान रूप से फैला हो (जैसे आयतन आवेश घनत्व \rho), तो हम विभव ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाते हैं:

  1. संपूर्ण आयतन को छोटे-छोटे आयतन अवयवों (\Delta v) में विभाजित करते हैं।
  2. प्रत्येक अवयव पर आवेश की मात्रा \rho\Delta v होती है।
  3. प्रत्येक छोटे अवयव के कारण विभव निकालकर, संपूर्ण निकाय के लिए उसका समाकलन (Integration) कर दिया जाता है।

3. एकसमान आवेशित गोलीय खोल (Spherical Shell) के कारण विभव

मान लीजिए कि हमारे पास R त्रिज्या का एक गोलीय खोल (Spherical shell) है, जिस पर कुल आवेश q एकसमान रूप से वितरित है।

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स्थिति (i): खोल के बाहर स्थित बिंदु पर (r \ge R)

खोल के बाहर स्थित किसी भी बिंदु के लिए, वैद्युत विभव इस प्रकार व्यवहार करता है मानो खोल का संपूर्ण आवेश उसके केंद्र पर केंद्रित हो।

    \[V = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} \frac{q}{r} \quad (r \ge R)\]

स्थिति (ii): खोल के भीतर स्थित बिंदु पर (r < R)

  • गोलीय खोल के भीतर वैद्युत क्षेत्र शून्य (E = 0) होता है।
  • चूंकि अंदर कोई वैद्युत क्षेत्र नहीं है, इसलिए किसी आवेश को अंदर गति कराने में कोई कार्य नहीं करना पड़ता है।
  • इसका अर्थ है कि खोल के भीतर विभव नियत (Constant) रहता है और यह ठीक उतना ही होता है जितना कि खोल के पृष्ठ (Surface) पर होता है।

        \[V = \frac{1}{4\pi\epsilon_0} \frac{q}{R}\]

\


उदाहरण 2.2: दो आवेशों के निकाय के कारण शून्य विभव

प्रश्न: 3 \times 10^{-8} C तथा -2 \times 10^{-8} C के दो आवेश एक-दूसरे से 15 cm दूरी पर रखे हैं। इन दोनों आवेशों को मिलाने वाली रेखा के किस बिंदु पर वैद्युत विभव शून्य है? (अनंत पर वैद्युत विभव शून्य मानिए)

हल (Solution):

मान लीजिए कि धनावेश (3 \times 10^{-8} C) मूल बिंदु O पर रखा है और ऋणावेश (-2 \times 10^{-8} C) बिंदु A पर रखा है। दोनों के बीच की दूरी 15 cm है।

हम उस बिंदु P की तलाश कर रहे हैं जहाँ कुल विभव शून्य (V = 0) हो। इसके लिए दो स्थितियाँ हो सकती हैं:

स्थिति 1: जब बिंदु P दोनों आवेशों के बीच (O और A के मध्य) स्थित हो

  • मान लीजिए बिंदु P की धनावेश (O) से दूरी x cm है।
  • चूँकि बिंदु P पर कुल विभव शून्य है, अतः दोनों आवेशों के कारण विभव का योग शून्य होगा:

        \[\frac{1}{4\pi\epsilon_0} \left[ \frac{3 \times 10^{-8}}{x \times 10^{-2}} - \frac{2 \times 10^{-8}}{(15 - x) \times 10^{-2}} \right] = 0\]

  • इसे सरल करने पर:

        \[\frac{3}{x} - \frac{2}{15 - x} = 0\]

        \[\frac{3}{x} = \frac{2}{15 - x}\]

  • तिर्यक गुणा (Cross multiply) करने पर:

        \[3(15 - x) = 2x\]

        \[45 - 3x = 2x\]

        \[5x = 45 \implies x = 9\]

    cm

स्थिति 2: जब बिंदु P विस्तारित रेखा OA पर स्थित हो (आवेशों के बाहर)

  • इस स्थिति में, धनावेश से बिंदु P की दूरी x (जहाँ x > 15) है।
  • सूत्र के अनुसार:

        \[\frac{3}{x} - \frac{2}{x - 15} = 0\]

        \[\frac{3}{x} = \frac{2}{x - 15}\]

  • तिर्यक गुणा करने पर:

        \[3(x - 15) = 2x\]

        \[3x - 45 = 2x \implies x = 45\]

    cm

निष्कर्ष: धनावेश से 9 cm तथा 45 cm की दूरी पर (ऋणावेश की ओर) वैद्युत विभव शून्य होगा।


उदाहरण 2.3: वैद्युत क्षेत्र रेखाएँ और विभव/स्थितिज ऊर्जा

अवधारणा: इमेजेज़ में दो अलग-अलग चित्र दिए गए हैं— एक धनावेश (+) के कारण बाहर की ओर निकलती क्षेत्र रेखाएँ और एक ऋणावेश (-) के कारण अंदर की ओर आती क्षेत्र रेखाएँ।

प्रश्नों के हल और स्पष्टीकरण:

(a) विभवांतर (V_P - V_Q) और (V_B - V_A) के चिह्न क्या होंगे?

  • धनावेश के लिए: विभव दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है (V \propto \frac{1}{r})। बिंदु P, बिंदु Q की तुलना में आवेश के अधिक पास है, इसलिए V_P > V_Q होगा। अतः (V_P - V_Q) का चिह्न धनात्मक (+) होगा।
  • ऋणावेश के लिए: विभव ऋणात्मक होता है और दूरी बढ़ने पर यह कम ऋणात्मक (यानी अधिक) होता जाता है। चूँकि बिंदु B, बिंदु A से अधिक दूर है, इसलिए V_B > V_A होगा। अतः (V_B - V_A) का चिह्न भी धनात्मक (+) होगा।

(b) Q और P; A और B के बीच एक छोटे ऋणावेश की स्थितिज ऊर्जा के अंतर का चिह्न:

  • Q से P: एक छोटा ऋणावेश, धनावेश की ओर आकर्षित होता है। प्रवृत्तिक रूप से आवेश उच्च स्थितिज ऊर्जा से निम्न की ओर गति करते हैं। इसलिए दूर वाले बिंदु (Q) पर ऊर्जा अधिक और पास (P) पर कम होगी। अतः Q और P के बीच ऊर्जा का अंतर धनात्मक (+) है।
  • A से B: यहाँ ऋणावेश को ऋणावेश के पास रखा गया है (प्रतिकर्षण)। पास वाले बिंदु (A) पर स्थितिज ऊर्जा अधिक होगी और दूर (B) जाने पर घटेगी। इसलिए (स्थितिज ऊर्जा)_A > (स्थितिज ऊर्जा)_B, और यह अंतर भी धनात्मक (+) है।

(c) Q से P तक एक छोटे धनावेश को ले जाने में क्षेत्र द्वारा किए गए कार्य का चिह्न:

  • एक धनावेश को दूसरे धनावेश के पास (Q से P की ओर) ले जाने पर वैद्युत क्षेत्र इसे दूर धकेलने (प्रतिकर्षण) का प्रयास करेगा। चूँकि हम बल के विपरीत दिशा में जा रहे हैं, इसलिए वैद्युत क्षेत्र द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक (-) होगा।

(d) B से A तक एक छोटे ऋणावेश को ले जाने के लिए बाह्य साधन (External Agency) द्वारा किए गए कार्य का चिह्न:

  • एक ऋणावेश को दूसरे ऋणावेश के पास (B से A की ओर) ले जाने पर प्रतिकर्षण बल लगेगा। इस प्रतिकर्षण के विरुद्ध उसे पास ले जाने के लिए बाह्य साधन को बल लगाना पड़ेगा। चूँकि विस्थापन और बाह्य बल एक ही दिशा में हैं, इसलिए यह कार्य धनात्मक (+) होगा।

(e) B से A तक जाने में क्या छोटे ऋणावेश की गतिज ऊर्जा बढ़ेगी या घटेगी?

  • B से A की ओर जाने पर ऋणावेश पर प्रतिकर्षी (Repulsive) बल लगता है, जो उसकी गति का विरोध करता है। गति का विरोध होने के कारण उसका वेग कम हो जाएगा, और परिणामस्वरूप उसकी गतिज ऊर्जा घट जाएगी

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