MP Board Class 9 Science Animal Husbandry and Fishris

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यहाँ उपलब्ध कराई गई सामग्री के आधार पर “पशुपालन और मत्स्य पालन” विषय पर विस्तृत और परीक्षा-उपयोगी नोट्स दिए गए हैं:


1. पशुपालन (Animal Husbandry)

पशुधन के प्रबंधन को पशुपालन कहते हैं, जिसके अंतर्गत पशुओं को भोजन देना, प्रजनन तथा रोगों पर नियंत्रण करना आता है

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उद्देश्य और मुख्य नस्लें:

  • उद्देश्य: पशुपालन के दो मुख्य उद्देश्य हैं – दूध देने वाले पशुओं को पालना तथा कृषि कार्य (हल चलाना, सिंचाई तथा बोझा ढोना) के लिए पशुओं को पालना ।
  • नस्लें: भारतीय पालतू पशुओं की दो मुख्य स्पीशीज़ हैं: गाय (बॉस इंडिकस) और भैंस (बॉस बुबेलिस) । दूध देने वाली मादाओं को दुधारू पशु कहते हैं ।

नस्ल सुधार और दुग्ध उत्पादन:

  • दूध उत्पादन मुख्य रूप से पशु के दुग्धस्रवण काल (बच्चे के जन्म के पश्चात् दूध उत्पादन का समय काल) पर निर्भर करता है ।
  • लंबे समय तक दुग्धस्रवण काल प्राप्त करने के लिए विदेशी नस्लों (जैसे जर्सी, ब्राउन स्विस) का चुनाव किया जाता है ।
  • देशी नस्लों (जैसे रेडसिंधी, साहीवाल) में रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत अधिक होती है ।
  • इन दोनों नस्लों का संकरण (Crossbreeding) कराकर ऐसी संतति प्राप्त की जाती है जिसमें दोनों ऐच्छिक गुण (रोग प्रतिरोधक क्षमता और लंबा दुग्धस्रवण काल) मौजूद हों ।

प्रबंधन और आहार:

  • आवास और सफाई: पशुओं के शरीर से झड़े हुए बाल तथा धूल हटाने के लिए नियमित सफाई करनी चाहिए । उनका आवास छतदार, रोशनदान युक्त और वर्षा, गर्मी तथा सर्दी से बचाने वाला होना चाहिए । फर्श ढलवा होना चाहिए ताकि वह साफ और सूखा रहे ।
  • आहार: पशुओं को संतुलित आहार की आवश्यकता होती है । पशु आहार में ‘मोटा चारा’ (रुसांश) जिसमें मुख्य रूप से रेशे होते हैं, तथा ‘सांद्र’ जिसमें रेशे कम और प्रोटीन व अन्य पोषक तत्व अधिक होते हैं, दिए जाते हैं ।

रोग नियंत्रण:

  • पशु बाह्य परजीवी (त्वचा रोग पैदा करने वाले) तथा अंतः परजीवी (आमाशय, आँत और यकृत को प्रभावित करने वाले) से ग्रसित हो सकते हैं ।
  • संक्रामक रोग बैक्टीरिया तथा वाइरस के कारण होते हैं, जिनसे बचाव के लिए पशुओं को नियमित रूप से टीका (Vaccine) लगाया जाता है ।

2. मत्स्य उत्पादन (Fish Production)

मछली हमारे भोजन में प्रोटीन का एक बहुत ही समृद्ध स्रोत है । मछली प्राप्त करने की दो मुख्य विधियाँ हैं: प्राकृतिक स्रोत (मछली पकड़ना) तथा मछली पालन या मछली संवर्धन (Culture fishery)

A. समुद्री मत्स्यकी (Marine Fisheries):

  • भारत का समुद्री मछली संसाधन क्षेत्र 7500 किलोमीटर समुद्री तट तक है ।
  • सर्वाधिक प्रचलित समुद्री मछलियाँ पॉमफ्रेट, मैकर्ल, टुना, सारडाइन, तथा बांबेडॅक हैं ।
  • खुले समुद्र में मछलियों के बड़े समूह का पता लगाने के लिए सैटेलाइट तथा प्रतिध्वनि गभीरतामापी (Echo-sounders) का उपयोग किया जाता है ।
  • समुद्री संवर्धन (मेरीकल्चर): समुद्री जल में आर्थिक महत्त्व वाली मछलियों (मुलेट, भेटकी, पर्लस्पॉट), कवचीय मछलियों (झींगा, मस्सल, ऑएस्टर) और समुद्री खर-पतवार का संवर्धन किया जाता है । ऑएस्टर का संवर्धन मोतियों को प्राप्त करने के लिए भी किया जाता है ।

B. अंतःस्थली मत्स्यकी (Inland Fisheries):

  • ताज़ा जल के स्रोत जैसे नाले, तालाब, पोखर तथा नदियाँ इसके अंतर्गत आते हैं । इसके अतिरिक्त खारे जल के संसाधन (एस्चुरी, लैगून) में भी मत्स्य भंडारण होता है ।
  • इन स्रोतों से अधिकांश मछली उत्पादन प्राकृतिक प्रग्रहण की तुलना में ‘जल संवर्धन’ (Aquaculture) द्वारा अधिक होता है । यह कभी-कभी धान की फसल के साथ भी किया जाता है ।

मिश्रित मछली संवर्धन (Composite Fish Culture):

  • अधिक उत्पादन के लिए एक ही तालाब में 5 अथवा 6 विभिन्न मछलियों की स्पीशीज़ (देशी तथा आयातित) का एक साथ संवर्धन किया जाता है ।
  • इनमें ऐसी मछलियों को चुना जाता है जिनके आहार भिन्न-भिन्न हों ताकि उनमें आहार के लिए प्रतिस्पर्धा न हो ।
  • उदाहरण: कटला मछली जल की सतह से भोजन लेती है, रोहु मछली मध्य क्षेत्र से, मृगल तथा कॉमन कार्प तली से, और ग्रास कार्प खर-पतवार खाती है । इस प्रकार तालाब के हर हिस्से के आहार का उपयोग हो जाता है और उत्पादन बढ़ता है ।
  • समस्या और समाधान: इस तंत्र की एक बड़ी समस्या अच्छी गुणवत्ता वाले डिंभों (मछली के बीज) का उपलब्ध न होना है, क्योंकि कई मछलियां केवल वर्षा ऋतु में जनन करती हैं । इसका समाधान तालाब में हार्मोन के उपयोग द्वारा इन मछलियों का संवर्धन करके किया जा रहा है ।

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