“कृषि में सुधार” (Improvements in Agriculture) विषय पर एक विस्तृत और परीक्षा-उपयोगी नोट्स तैयार किए गए हैं। इसे छात्रों के लिए बहुत ही सरल और व्यवस्थित रूप में लिखा गया है:
कृषि में सुधार (Improvements in Agriculture): परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण नोट्स
बढ़ती हुई जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए केवल खेती की ज़मीन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कृषि उत्पादन की क्षमता को बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। कृषि में सुधार और उत्पादन बढ़ाने के लिए अपनाई जाने वाली विभिन्न आधुनिक विधियों और वैज्ञानिक प्रणालियों को निम्नलिखित मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है:
1. कृषि की आधुनिक विधियाँ (Modern Farming Methods)
- बहुविध फसल प्रणाली (Multiple Cropping): एक वर्ष में एक ही भूमि पर एक से ज़्यादा फसलें (जैसे खरीफ़, रबी और ज़ायद) उगाने की प्रणाली को बहुविध फसल प्रणाली कहते हैं। इससे सीमित ज़मीन पर भी उत्पादन बढ़ता है।
- हरित क्रांति (Green Revolution): 1960 के दशक के अंत में आई हरित क्रांति ने भारतीय कृषि में बड़ा बदलाव किया। इसके तहत अधिक उपज वाले बीजों (HYV – High Yielding Varieties), रासायनिक उर्वरकों (Fertilizers) और कीटनाशकों का प्रयोग शुरू हुआ, जिससे गेहूँ और चावल के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई।
2. फसल की किस्मों में सुधार (Crop Variety Improvement)
फसल का अच्छा उत्पादन बहुत हद तक बीजों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
- संकरण (Hybridization): विभिन्न आनुवंशिक गुणों वाले पौधों के बीच क्रॉस (Cross) करवाकर नई और उन्नत किस्में तैयार की जाती हैं।
- सुधार के मुख्य लक्ष्य: * प्रति एकड़ उच्च उत्पादन प्राप्त करना।
- उत्पाद की गुणवत्ता (जैसे दालों में प्रोटीन, तिलहन में तेल) बढ़ाना।
- जैविक (बीमारी, कीट) और अजैविक (सूखा, पाला, गर्मी) कारकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना।
- फसल के पकने का समय (परिपक्वन काल) कम करना।
3. फसल उत्पादन प्रबंधन (Crop Production Management)
इसके अंतर्गत किसानों द्वारा फसल उगाने के लिए अपनाई जाने वाली विभिन्न तकनीकें आती हैं:
A. पोषक प्रबंधन (Nutrient Management):
पौधों को वृद्धि के लिए 16 आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है (हवा, पानी और मिट्टी से)।
- मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए खाद (Manure) (जैसे कंपोस्ट, हरी खाद) का उपयोग किया जाता है, जो पर्यावरण के अनुकूल है।
- उत्पादन को तेज़ी से बढ़ाने के लिए व्यावसायिक रूप से तैयार रासायनिक उर्वरकों (Fertilizers) का भी प्रयोग किया जाता है।
B. सिंचाई व्यवस्था (Irrigation):
कृषि को केवल मानसून पर निर्भर न रखकर सिंचाई के आधुनिक साधनों का विकास किया गया है। इनमें कुएँ, नलकूप (Tube-wells), नहरें और नदी जल उठाव प्रणाली शामिल हैं। वर्षा जल संग्रहण (Rainwater Harvesting) से भी भूजल स्तर को सुधारा जाता है।
C. फसल पैटर्न (Cropping Patterns):
- मिश्रित फसल (Mixed Cropping): एक ही खेत में दो या अधिक फसलों को एक साथ उगाना (जैसे- गेहूँ + चना), ताकि किसी एक फसल के खराब होने पर भी नुकसान कम हो।
- अंतराफसलीकरण (Intercropping): दो या अधिक फसलों को एक निश्चित पैटर्न या कतारों में उगाना।
- फसल चक्र (Crop Rotation): खेत में पूर्व-नियोजित क्रम के अनुसार बदल-बदल कर फसलें उगाना, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है।
4. फसल सुरक्षा प्रबंधन (Crop Protection Management)
खेतों में खड़ी फसल को कई कारकों से नुकसान हो सकता है, जिनसे बचाव करना कृषि सुधार का अहम हिस्सा है:
- खरपतवार नियंत्रण (Weed Control): गाजर घास, गोखरू जैसे अनावश्यक पौधे मुख्य फसल का पोषण छीन लेते हैं। इन्हें निराई करके या शाकनाशी (Herbicides) रसायनों के छिड़काव से हटाया जाता है।
- कीट और रोग नियंत्रण: बैक्टीरिया, कवक और वायरस से फसलों को बचाने के लिए पीड़कनाशी (Pesticides) और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है।
- सुरक्षित भंडारण (Safe Storage): अनाज की कटाई के बाद उसे चूहों, कीटों (जैविक कारक) और नमी (अजैविक कारक) से बचाना ज़रूरी है। इसके लिए अनाज को धूप में सुखाना और गोदामों में रासायनिक धुएँ (Fumigation) का उपयोग किया जाता है।
(नोट: परीक्षा की दृष्टि से छात्रों को इन सभी बिंदुओं का क्रमबद्ध अध्ययन करना चाहिए। ये सभी प्रणालियाँ न केवल उत्पादन बढ़ाती हैं, बल्कि हमारी खाद्य सुरक्षा को भी सुनिश्चित करती हैं।)