इकाई 6: अपठित बोध प्रश्न बैंक MP Board Class 10 Hindi Question Bank Unseen Passage Unit 5

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अपठित गद्यांश 1

गद्यांश: मानव का अकारण ही मानव के प्रति अनुदार हो उठना न केवल मानवता के लिए लज्जाजनक है, अनुभूति भी। वस्तुतः यथार्थ मनुष्य वही है जो मानवता का आदर करना जानता है, कर सकता है केवल इसलिए कि कोई मनुष्य बुद्धिहीन अथवा दरिद्र। वह घृणा का तो दूर उपेक्षा का भी पात्र नहीं होना चाहिए। मानव तो इसलिए सम्मान के योग्य है कि वह मानव है, भगवान का सर्वश्रेष्ठ रचना है।

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प्रश्न-(i) उपयुक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए।

उत्तर: मानव का सम्मान / सच्ची मानवता / मानव और मानवता का आदर।

(ii) यथार्थ मनुष्य किसे कहते हैं ?

उत्तर: यथार्थ मनुष्य वही है जो मानवता का आदर करना जानता है और किसी भी मनुष्य को बुद्धिहीन या दरिद्र होने के कारण घृणा या उपेक्षा का पात्र नहीं समझता।

(iii) उपयुक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।

उत्तर: यह गद्यांश इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य का अकारण ही दूसरे मनुष्य के प्रति कठोर या अनुदार होना मानवता के लिए शर्मनाक है। सच्चा मनुष्य वही है जो हर मानव का सम्मान करता है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति केवल बुद्धिहीन या गरीब होने के कारण घृणा या उपेक्षा का पात्र नहीं होना चाहिए। मानव सम्मान के योग्य इसलिए है क्योंकि वह स्वयं भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना है।


अपठित गद्यांश 2

गद्यांश: आप हमेशा अच्छी जिंदगी जीते जा रहे हैं। आप हमेशा बढ़िया बढ़िया कपड़े जूते व मोबाइल जैसे दिखावों पर बहुत खर्च करते हैं। आप अपने शरीर पर कितना खर्च करते हैं ? इसका मूल्यांकन जरूरी है। यह शरीर अनमोल है। अगर शरीर स्वस्थ नहीं होगा तो आप ये सारे सामान किस पर टाँगेंगे? अतः स्वयं का स्वस्थ रहना सबसे जरूरी है एवं स्वस्थ रहने में हमारे खान-पान का सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।

प्रश्न-(i) उपयुक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

उत्तर: स्वस्थ शरीर का महत्व / स्वास्थ्य ही धन है / दिखावा नहीं, स्वास्थ्य जरूरी।

(ii) अनमोल क्या है? उत्तर: हमारा शरीर अनमोल है।

(iii) शुद्ध असली शब्दों के विलोम शब्द लिखिए।

उत्तर:शुद्ध → अशुद्ध, असली → नकली

अपठित गद्यांश 3

गद्यांश: आदर्श व्यक्ति कर्मशीलता में ही अपने जीवन की सफलता समझता है जीवन का प्रत्येक क्षण वह चार्य में लगाता है। विश्राम और विनोद के लिए उसके पास निश्चित समय रहता है। शेष समय जन सेवा में व्यतीत होता है। हाथ पर हाथ रख कर बैठने को वह मृत्यु के समान समझता है। काम करने की उसमें लगन होती है, उत्साह होता है। विपत्तियों में भी वह अपने चरित्र का परिचय देता है। धैर्य की कुदाली से वह बड़े बड़े संकट पर्वतों को ढहा देता है उसकी कार्यकुशलता देखकर लोग दातों तले उँगली दबाते हैं। संतोष उसका धन है। वह परिस्थितियों का दास नहीं है। परिस्थितियाँ उसकी दासी हैं।

प्रश्न- (i) उपयुक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

उत्तर: आदर्श व्यक्ति की विशेषताएँ / कर्मयोगी का जीवन / आदर्श मानव।

(ii) उपयुक्त गद्यांश में वर्णित व्यक्ति के गुणों का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर: इस गद्यांश में वर्णित आदर्श व्यक्ति कर्मठ, परिश्रमी और उत्साही होता है। वह अपने जीवन की सफलता को केवल काम करने में देखता है और अपने हर पल का सदुपयोग करता है। वह आराम और मनोरंजन के लिए भी समय निकालता है, लेकिन उसका अधिकतर समय जनसेवा में व्यतीत होता है। वह आलस्य को मृत्यु के समान समझता है और उसमें काम करने की गहरी लगन होती है। विपत्ति आने पर भी वह धैर्य नहीं खोता, बल्कि अपने मजबूत चरित्र का परिचय देता है और साहस के साथ बड़ी से बड़ी बाधाओं को पार कर जाता है। उसकी कार्यकुशलता इतनी अद्भुत होती है कि लोग उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं। संतोष उसका सबसे बड़ा धन होता है और वह परिस्थितियों से प्रभावित होने के बजाय उन्हें अपने वश में रखता है।

(iii) उपयुक्त गद्यांश का सारांश लिखिए। उत्तर: यह गद्यांश एक आदर्श व्यक्ति के गुणों का वर्णन करता है। एक आदर्श व्यक्ति कर्मठ, उत्साही और जनसेवक होता है, जो आलस्य से दूर रहता है। वह जीवन में आने वाली हर विपत्ति का सामना धैर्य और साहस से करता है, और अपनी कार्यकुशलता से असंभव को संभव कर दिखाता है। संतोष को अपना सबसे बड़ा धन मानने वाला यह व्यक्ति परिस्थितियों का गुलाम नहीं होता, बल्कि उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार ढालता है।

अपठित गद्यांश 4

गद्यांश: देश प्रेम में आत्म विस्तार का भाव निहित है। जिस भाव के अंतर्गत व्यक्ति परिवार और समाज की परिधि से भी आगे अपने देश के प्रति अपना लगाव अनुभव करने लगता है, उस भाव को देश प्रेम के अंतर्गत परिगणित किया जाता है। देश प्रेम में देश की रक्षा और देश के विकास को महत्व दिए जाने के साथ देश के प्रति पूज्य भाव का संचार भी सन्निहित होता है। जब तक व्यक्ति देश को अपना आराध्य नहीं बनाता, तब तक देश के प्रति समर्पण का भाव भी उसमें जाग्रत नहीं होता।

प्रश्न-(i) उपयुक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

उत्तर: देश प्रेम / सच्चा देश प्रेम / देश भक्ति का महत्व।

(ii) देश के प्रति समर्पण का भाव कब जाग्रत होता है?

उत्तर: देश के प्रति समर्पण का भाव तब जाग्रत होता है जब व्यक्ति देश को अपना आराध्य (पूजनीय) बनाने लगता है।

(iii) उपयुक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।

उत्तर: यह गद्यांश देश प्रेम के वास्तविक अर्थ को समझाता है, जिसमें व्यक्ति अपने परिवार और समाज से बढ़कर अपने देश के प्रति लगाव महसूस करता है। देश प्रेम में न केवल देश की रक्षा और विकास का महत्व है, बल्कि देश के प्रति पूज्य भाव का संचार भी शामिल है। यह स्पष्ट किया गया है कि जब तक कोई व्यक्ति अपने देश को आराध्य के रूप में नहीं देखता, तब तक उसमें देश के प्रति सच्चा समर्पण जागृत नहीं होता।

अपठित गद्यांश 5

गद्यांश: राष्ट्रीय भावना में शौर्यभाव का अपना विशिष्ट स्थान है। राष्ट्र गौरव का बखान और उसकी रक्षा का प्रबल भाव जिस कविता में व्यक्त होता है, उस वीर भाव को शौर्य के अन्तर्गत गिना जाता है। शौर्य का भाव आत्मगौरव से परिपूर्ण होता है। हिन्दी कविता के सुदीर्घ इतिहास में इस भाव की प्रतिष्ठा प्राय: सभी युगों में होती रही है। आदिकाल से आधुनिक युग तक किसी न किसी रूप में शौर्य और देशप्रेम का भाव जाग्रत रहा है।

प्रश्न-(i) उपयुक्त गद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए।

उत्तर: राष्ट्रीय भावना में शौर्य का महत्व / शौर्य और राष्ट्र गौरव / शौर्यभाव की प्रतिष्ठा।

(ii) शौर्य भाव क्या है?

उत्तर: शौर्य भाव वह वीर भाव है जिसमें राष्ट्र के गौरव का वर्णन और उसकी रक्षा का प्रबल भाव निहित होता है। यह भाव आत्मगौरव से परिपूर्ण होता है।

(iii) उपयुक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।

उत्तर: यह गद्यांश राष्ट्रीय भावना में शौर्यभाव के महत्व को रेखांकित करता है। शौर्य का अर्थ है राष्ट्र के गौरव और उसकी रक्षा का प्रबल भाव, जो आत्मगौरव से युक्त होता है। हिंदी कविता के पूरे इतिहास में, आदिकाल से आधुनिक युग तक, शौर्य और देशप्रेम का भाव हमेशा किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है, जो इसकी निरंतर प्रतिष्ठा को दर्शाता है।


अपठित गद्यांश 6

गद्यांश: हमारी जीवन शैली में कंप्यूटर और इंटरनेट का दखल इस कदर बढ़ता जा रहा है कि संभव है कि आने वाले समय में इंसान कंप्यूटर और कंप्यूटर इंसान बन जाएगा। कंप्यूटर विशेषज्ञ और लेखक कवि रे कुर्जवील’ ने भविष्यवाणी की है कि सन 2029 तक कंप्यूटर और इंसान में तमीज कर पाना मुश्किल हो जाएगा और सदी के अंत तक तो वे सर्वथा एक रूप हो जाएंगे।

प्रश्न-(i) उपयुक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए।

उत्तर: कंप्यूटर का बढ़ता दखल / मानव और कंप्यूटर का भविष्य / तकनीकी का प्रभाव।

(ii) इंसान के कंप्यूटर बन जाने से समाज को क्या खतरे हैं?

उत्तर: (यह प्रश्न गद्यांश में सीधे तौर पर नहीं बताया गया है, लेकिन गद्यांश के भाव के अनुसार अनुमानित उत्तर दिया जा सकता है।) इंसान के कंप्यूटर बन जाने से समाज को मानवीय संवेदनाओं, नैतिकता और व्यक्तिगत पहचान के लुप्त होने का खतरा है। समाज में भावनात्मक जुड़ाव और रचनात्मकता की कमी आ सकती है, जिससे मानव जीवन का मूल स्वरूप प्रभावित हो सकता है।

(iii) उपयुक्त गद्यांश का सारांश लिखिए।

उत्तर: यह गद्यांश कंप्यूटर और इंटरनेट के हमारे जीवन में बढ़ते हस्तक्षेप को दर्शाता है। यह भविष्यवाणी की गई है कि भविष्य में इंसान और कंप्यूटर के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाएगा, और सदी के अंत तक वे लगभग एक समान हो जाएंगे। यह तकनीकी प्रगति के संभावित परिणामों पर चिंतन करने के लिए प्रेरित करता है।

अपठित गद्यांश 7

गद्यांश: लोक साहित्य में लोकोक्तियों का विशेष स्थान है ये गीत व्यक्ति विशेष के न होकर समूह के होते हैं। इनका रचयिता अज्ञात होता है और ये प्रायः मौखिक रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी या एक स्थान से दूसरे स्थान में स्थानान्तरित होते रहते हैं। लोकोक्तित, लोकजीवन का दर्पण होते हैं। जिनमें लोक संस्कृति के समस्त पक्षों का वर्णन होता है। लोकोक्तित धर्म, सामाजिक रीति-रिवाज, दर्शन, ज्योतिष, वैद्याक, सदाचार, उपदेश, लोक व्यवहार, मनोरंजन तथा जीवन के समस्त पक्षों का संचित कोष होते हैं।

प्रश्न-(i) उपयुक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए।

उत्तर: लोक साहित्य में लोकोक्तियों का महत्व / लोकोक्तियाँ: लोकजीवन का दर्पण।

(ii) लोकोक्तियों की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:

  1. अज्ञात रचयिता और सामूहिक संपत्ति: लोकोक्तियाँ किसी एक व्यक्ति द्वारा रची नहीं जातीं, बल्कि इनका रचयिता अज्ञात होता है और ये समूह की संपत्ति होती हैं।
  2. मौखिक हस्तांतरण और लोकजीवन का दर्पण: ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप से स्थानांतरित होती रहती हैं और लोकजीवन के समस्त पक्षों, जैसे धर्म, रीति-रिवाज, सदाचार, व्यवहार आदि का सटीक चित्रण करती हैं।

अपठित काव्यांश

काव्यांश: माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन, किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन, थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी, कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण, ज्ञान अर्पित प्राण अर्पित, रक्त का कण-कण समर्पित, चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ।।

प्रश्न-(i) उपयुक्त काव्यांश का शीर्षक लिखिए।

उत्तर: भारत माँ को समर्पण / मातृभूमि के प्रति समर्पण / देश प्रेम।

(ii) कवि भारत माँ को क्या अर्पित करना चाहता है?

उत्तर: कवि भारत माँ को अपना ज्ञान, अपने प्राण (जीवन) और अपने रक्त का कण-कण अर्पित करना चाहता है। वह कहता है कि जब भी वह अपना सिर थाल में सजाकर लाए, तो माँ उसे स्वीकार कर ले, और वह अपनी धरती माँ को कुछ और भी देना चाहता है।

(iii) देश की धरती का हम पर क्या ऋण हैं?

उत्तर: देश की धरती का हम पर यह ऋण है कि इसने हमें जीवन, पोषण, आश्रय, पहचान और अस्तित्व दिया है। यह हमें अन्न, जल, वायु और सभी आवश्यक संसाधन प्रदान करती है जिससे हमारा जीवन संभव हो पाता है। कवि के अनुसार, यह ऋण इतना बड़ा है कि एक साधारण व्यक्ति (अकिंचन) उसे चुका नहीं सकता।

अपठित काव्यांश 1

काव्यांश: गगन-गगन तेरा यश फहरा, पवन-पवन तेरा बल गहरा, क्षिति-जल-नभ पर डाल हिंडोले, चरण-चरण संचरण सुनह्रा, ओ ऋषियों के वेश, प्यारे भारत देश।

प्रश्न-i उपयुक्त काव्यांश का शीर्षक लिखिए।

उत्तर: मेरे प्यारे भारत देश / भारत का गौरव / भारत भूमि का यश।

ii आप अपने देश को प्यार क्यों करते हैं? उत्तर: (यह प्रश्न व्यक्तिगत उत्तर की अपेक्षा रखता है, यहाँ एक सामान्य उत्तर दिया गया है।) मैं अपने देश को इसलिए प्यार करता हूँ क्योंकि यह मेरी जन्मभूमि है, जिसने मुझे सब कुछ दिया है। इसकी संस्कृति, इसकी विविधता, इसके इतिहास और यहाँ के लोगों का प्यार मेरे जीवन का आधार है। यह मुझे पहचान और गौरव प्रदान करता है।

iii उक्त काव्यांश का भावार्थ लिखिए। उत्तर: इस काव्यांश में कवि अपने प्यारे भारत देश का गौरव गान करता है। कवि कहता है कि भारत का यश आकाश में चारों ओर फैला हुआ है और इसकी शक्ति हवा में गहराई तक समाई हुई है। पृथ्वी, जल और आकाश हर जगह इसका प्रभाव है, और इसके हर कदम में एक सुनहरी चाल है। कवि भारत को ऋषियों का देश कहकर संबोधित करता है, जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महानता को दर्शाता है। कुल मिलाकर, यह काव्यांश भारत के यश, शक्ति, व्यापकता और आध्यात्मिक परंपरा का गुणगान करता है।


अपठित काव्यांश 2

काव्यांश: जी पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको, पर पीछे-पीछे अकल जगी मुझको, जी लोगों ने तो बेच दिए ईमान, जी आप न हो सुनकर ज्यादा हैरान, मैं सोच-समझकर आखिर, अपने गीत बेचता हूँ, जी हाँ हुजूर मैं गीत बेचता हूँ।’

प्रश्न-i उपयुक्त काव्यांश का शीर्षक लिखिए।

उत्तर: गीत बेचने वाला / कलाकार की विवशता / ईमान से बड़ा पेट।

ii कवि को गीत बेचने में शर्म क्यों नहीं आती? उत्तर: कवि को गीत बेचने में अब शर्म नहीं आती क्योंकि उसे बाद में यह अकल आ गई कि जब लोग अपना ‘ईमान’ (सत्यनिष्ठा, मूल्य) तक बेच देते हैं, तो उसे केवल अपने गीत बेचने में क्यों शर्म आनी चाहिए। वह यह तर्क देता है कि उसने सोच-समझकर यह काम अपनाया है, क्योंकि यह उसकी जीविका का साधन है।

iii उपयुक्त गद्यांश का सारांश लिखिए। उत्तर: यह काव्यांश एक ऐसे कलाकार की व्यथा और विवशता को दर्शाता है जो पहले तो अपने गीत (कला) बेचने में शर्म महसूस करता था, लेकिन बाद में उसे यह समझ आ जाती है कि जब समाज में लोग अपने नैतिक मूल्यों और ईमानदारी (ईमान) तक का सौदा कर रहे हैं, तो उसे अपनी कला बेचने में शर्म नहीं करनी चाहिए। कवि सोच-समझकर इस कार्य को स्वीकार करता है और कहता है कि हाँ, वह अपने गीत बेचता है, क्योंकि यह उसके जीवन-यापन का तरीका है। यह कला के व्यवसायीकरण और कलाकार की मजबूरियों पर एक टिप्पणी है।

अपठित काव्यांश

काव्यांश: बहिन आज फूली समाती न मन में, तड़ित आज फूली समाती न घन में, घटा है न झूली समाती गगन में, लता आज फूली समाती न वन में

प्रश्न –

i उपयुक्त पंक्तियाँ किस ऋतु की ओर संकेत करती हैं? उत्तर: ये पंक्तियाँ वर्षा ऋतु की ओर संकेत करती हैं। (तड़ित-बिजली, घन-बादल, घटा-घने बादल वर्षा ऋतु से संबंधित हैं।)

ii बहन के खुश होने का क्या कारण है? उत्तर: इन पंक्तियों में बहन के खुश होने का सीधा कारण नहीं बताया गया है, बल्कि उसकी खुशी को बिजली, बादलों और लताओं की खुशी के साथ जोड़ा गया है। संभवतः, वर्षा ऋतु के आगमन से, या किसी शुभ अवसर से, बहन अत्यधिक प्रसन्न है।

iii उपयुक्त गद्यांश का भावार्थ लिखिए। उत्तर: इस काव्यांश में कवि वर्षा ऋतु के आगमन पर चारों ओर फैली खुशी और उल्लास का वर्णन करता है। कवि कहता है कि आज बहन के मन में खुशी समा नहीं रही है, वह बहुत प्रसन्न है। उसी प्रकार, बिजली बादलों में समा नहीं पा रही है (बार-बार चमक रही है), घने बादल आकाश में समा नहीं पा रहे हैं (छा गए हैं), और लताएँ भी वन में फूली नहीं समा रही हैं (अत्यधिक हरी-भरी और प्रसन्न हैं)। यह भावार्थ प्रकृति और मानव मन में वर्षा ऋतु के आगमन से होने वाली असीम प्रसन्नता और आनंद को दर्शाता है।

अपठित काव्यांश

काव्यांश: राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे, क्षण भर टटोला, और फिर, जैसे बतियाते सुवर में, वह हँसते हुए बोला, बाबू सच कहूँ – मेरी निगाह में, न कोई छोटा है, न कोई बड़ा है, मेरे लिए हर आदमी एक जोड़ी जूता है! जो मेरे सामने, मरम्मत के लिए खड़ा है।

प्रश्न –

i मोची हर आदमी को किस रूप में देखता है? उत्तर: मोची हर आदमी को एक ग्राहक के रूप में देखता है, जिसके पास मरम्मत के लिए एक जोड़ी जूता है।

ii हर आदमी की मरम्मत से मोची का क्या अभिप्राय है? उत्तर: हर आदमी की मरम्मत से मोची का अभिप्राय है कि वह सभी लोगों के जूते मरम्मत करता है, चाहे वे छोटे हों या बड़े, अमीर हों या गरीब। उसके लिए सभी ग्राहक समान हैं।

iii उपयुक्त गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए। उत्तर: इस काव्यांश में मोची अपने कार्य के प्रति अपनी निष्ठा और समानता के भाव को व्यक्त करता है। मोची की राँपी (जूते बनाने का औजार) से उठी आँखें क्षण भर के लिए कवि को देखती हैं, फिर वह सहजता से मुस्कुराते हुए कहता है कि उसकी नज़र में कोई भी व्यक्ति छोटा या बड़ा नहीं होता। उसके लिए हर इंसान केवल एक ग्राहक है जिसके जूते उसे ठीक करने हैं। इस काव्यांश का आशय यह है कि व्यक्ति को अपने कार्य के प्रति समर्पित होना चाहिए और उसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए। मोची के इस कथन में एक गहरा सामाजिक समता का भाव छिपा है, जहाँ हर व्यक्ति उसके लिए सिर्फ उसका काम है।

अपठित काव्यांश

काव्यांश: वीरों का कैसा हो बसंत ? आ रही हिमालय से पुकार है उदधि गरजता बार-बार प्राची, पश्चिम, भू, नभ उपार, सब पूछ रहे हैं दिग-दिगंत, वीरों का कैसा हो बसंत ?

प्रश्न –

(i) उपयुक्त काव्यांश का शीर्षक लिखिए। उत्तर: वीरों का बसंत / शौर्य का आह्वान / देश का बसंत।

(ii) वीरों का बसंत कैसा होना चाहिए? उत्तर: इस काव्यांश में सीधे तौर पर नहीं बताया गया है कि वीरों का बसंत कैसा होना चाहिए, बल्कि यह प्रश्न बार-बार उठाया गया है। इसका भाव यह है कि वीरों का बसंत युद्ध, पराक्रम और शौर्य से भरा होना चाहिए, न कि केवल फूलों और प्रेम से। यह राष्ट्र प्रेम और बलिदान का प्रतीक होना चाहिए।

(iii) उपयुक्त काव्यांश का भावार्थ लिखिए। उत्तर: इस काव्यांश में कवि यह प्रश्न उठाता है कि वीर पुरुषों का बसंत कैसा होना चाहिए। यह प्रश्न केवल कवि का नहीं, बल्कि पूरे देश का है। हिमालय से स्वतंत्रता और शौर्य की पुकार आ रही है, समुद्र बार-बार गरजकर कुछ कह रहा है, और पूरब, पश्चिम, धरती, आकाश तथा सभी दिशाएँ यह पूछ रही हैं कि वीरों का बसंत कैसा हो। इसका भाव यह है कि वीरों का बसंत साधारण नहीं हो सकता, बल्कि वह पराक्रम, बलिदान और देशप्रेम से ओत-प्रोत होना चाहिए। यह काव्यांश देश में वीरता और शौर्य की भावना को जगाने का आह्वान करता है।

अपठित काव्यांश

काव्यांश: मैंने छुटपन से छिपकर पैसे बोए थे सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, रूपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेगी, और फूल-फलकर, मैं मोटा सेठ बनूँगा ॥ पर बंजर धरती में एक न अंकुर फूटा मिट्टी ने न एक भी पैसा उगला। सपने जाने कहाँ मिटे सब धूल हो गए। मैं हताश हो, बांट जोत रहा दिनों तक बाल कल्पना के अपलक पाँवड़े बिछाकर मैं अयोध्य था। मैंने गलत बीज बोए थे, ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था।

प्रश्न –

i काव्यांश का उचित शीर्षक लिखिए। उत्तर: पैसों का मोह / बचपन का सपना / गलत बीज।

ii कवि ने पैसों के पेड़ से क्या कल्पना की है? उत्तर: कवि ने पैसों के पेड़ से यह कल्पना की है कि उससे रुपये-पैसे की मधुर और खनकती फसलें उगेंगी, जिनसे वह बहुत अमीर (मोटा सेठ) बन जाएगा।

iii उपयुक्त काव्यांश का भावार्थ लिखिए। उत्तर: इस काव्यांश में कवि अपने बचपन की एक भ्रामक कल्पना और उसके टूटने का वर्णन करता है। बचपन में कवि ने छिपकर पैसे बोए थे, यह सोचकर कि उनसे पैसों के पेड़ उगेंगे और वह अमीर बन जाएगा। उसे उम्मीद थी कि उन पेड़ों से रुपयों की खनकती हुई फसलें मिलेंगी, जिससे वह बड़ा सेठ बन जाएगा। लेकिन उसकी यह आशा व्यर्थ निकली। जिस धरती पर उसने पैसे बोए थे, वह बंजर निकली और उस मिट्टी ने एक भी पैसा वापस नहीं दिया। उसके सारे सपने टूट गए और धूल में मिल गए। वह निराशा में दिनों तक इंतजार करता रहा, अपनी बचपन की कल्पनाओं पर अटल रहा, लेकिन सब व्यर्थ था। अंत में कवि को यह अहसास होता है कि उसने ‘गलत बीज’ बोए थे, उसने पैसे के लिए ‘ममता’ (लगाव) को रोपा था और ‘तृष्णा’ (लालच) को सींचा था, जो कभी फलीभूत नहीं हो सकता था। यह काव्यांश लालच की व्यर्थता और बचपन की नासमझ कल्पनाओं पर प्रकाश डालता है।

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