MP Board Class 12 Weed Control: Agronomic Physical Biological and Chemical Methods खरपतवार नियंत्रण: सस्य वैज्ञानिक, भौतिक, जैविक और रासायनिक विधियाँ

Weed Control: Agronomic Physical Biological and Chemical Methods :कक्षा 12 कृषि विज्ञान (Class 12 Agriculture) के छात्रों के लिए ‘खरपतवार नियंत्रण की विधियाँ’ (Methods of Weed Control) पर एक अति विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख। इस लेख में खरपतवारों के सस्य वैज्ञानिक (Agronomic), भौतिक/यांत्रिक (Physical/Mechanical), जैविक (Biological) और रासायनिक नियंत्रण (Chemical Control) का गहन और विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। यह लेख बोर्ड परीक्षाओं और कृषि प्रतियोगी परीक्षाओं (UPCATET, ICAR, CUET) के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका (Complete Guide) है।

खरपतवार नियंत्रण: सस्य वैज्ञानिक, भौतिक, जैविक और रासायनिक विधियाँ (Weed Control: Agronomic, Physical, Biological and Chemical Methods) – संपूर्ण अध्ययन (कक्षा 12 कृषि विज्ञान)

1. प्रस्तावना (Introduction)

भारतीय कृषि (Indian Agriculture) में फसल उत्पादन (Crop Production) की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपनी फसल को विभिन्न नाशीजीवों (Pests) से कितना सुरक्षित रख पाते हैं। कृषि विज्ञान के अनुसार, बीमारियों और हानिकारक कीटों की तुलना में खरपतवारों (Weeds) से फसलों को सबसे अधिक नुकसान (लगभग 30 से 35 प्रतिशत) होता है। खरपतवार मुख्य फसल के साथ स्थान (Space), सूर्य के प्रकाश (Sunlight), जल (Water) और मिट्टी के पोषक तत्वों (Nutrients) के लिए भयंकर प्रतिस्पर्धा करते हैं।

यदि सही समय पर खरपतवारों को नियंत्रित न किया जाए, तो फसल की उपज (Yield) 50% से लेकर 100% तक गिर सकती है। इसलिए, ‘खरपतवार नियंत्रण’ (Weed Control) आधुनिक कृषि का एक अनिवार्य और महत्वपूर्ण अंग बन गया है।

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कक्षा 12 कृषि विज्ञान (Class 12 Agriculture) के पाठ्यक्रम में खरपतवार प्रबंधन (Weed Management) की चार प्रमुख विधियों का विस्तार से अध्ययन किया जाता है— सस्य वैज्ञानिक (Agronomic), भौतिक या यांत्रिक (Physical/Mechanical), जैविक (Biological) और रासायनिक (Chemical)। इस विस्तृत लेख में हम इन सभी विधियों के वैज्ञानिक सिद्धांतों, कार्यप्रणाली, लाभ, हानियां और महत्वपूर्ण उदाहरणों का गहन अध्ययन करेंगे।

2. खरपतवार नियंत्रण के मूलभूत सिद्धांत (Basic Principles of Weed Control)

विधियों पर चर्चा करने से पहले, हमें खरपतवार प्रबंधन के तीन मुख्य सिद्धांतों को समझना होगा:

  1. रोकथाम या निरोध (Prevention): किसी नए क्षेत्र (Field/Area) में खरपतवार के बीजों या उनके वानस्पतिक भागों (Vegetative parts) को प्रवेश करने से रोकना। इसके लिए शुद्ध बीजों का प्रयोग और कृषि यंत्रों की सफाई आवश्यक है।
  2. उन्मूलन या समूल नष्ट करना (Eradication): किसी क्षेत्र से खरपतवार के पौधों और उनके बीजों को पूरी तरह से (100%) जड़ से खत्म कर देना। यह विधि बहुत महंगी और कठिन होती है, इसे केवल छोटे क्षेत्रों (Nursery/Greenhouse) में ही अपनाया जा सकता है।
  3. नियंत्रण (Control): खरपतवारों की आबादी (Population) को उस स्तर तक कम कर देना जहाँ वे मुख्य फसल को आर्थिक रूप से कोई नुकसान (Economic damage) न पहुँचा सकें। बड़े खेतों में यही सिद्धांत अपनाया जाता है।

3. सस्य वैज्ञानिक या कर्षण विधियाँ (Agronomic or Cultural Methods)

सस्य वैज्ञानिक विधियों का अर्थ है फसल उगाने के सामान्य तरीकों (Farming Practices) में ऐसा बदलाव करना, जिससे फसल की वृद्धि तो अच्छी हो, लेकिन खरपतवारों को उगने और पनपने के लिए प्रतिकूल वातावरण (Unfavorable environment) मिले। यह विधि पर्यावरण के लिए सबसे सुरक्षित और सबसे सस्ती होती है।

इसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख क्रियाएं आती हैं:

3.1. फसल चक्र अपनाना (Crop Rotation)

लगातार एक ही खेत में एक ही प्रकार की फसल बोने से उस फसल से जुड़े खरपतवारों (Associated weeds) की संख्या बहुत बढ़ जाती है। यदि हम फसल चक्र बदल दें, तो खरपतवारों का जीवन चक्र (Life cycle) टूट जाता है।

उदाहरण: यदि गेहूं के खेत में ‘गेहूं का मामा’ (Phalaris minor) बहुत अधिक हो गया है, तो अगले साल गेहूं की जगह चना (Gram), सरसों (Mustard) या बरसीम बोने से इस खरपतवार को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

3.2. उकसावा या बासी बीज शैया (Stale Seedbed Technique)

यह एक बहुत ही प्रभावी सस्य विधि है। इसमें फसल की बुवाई से 15-20 दिन पहले खेत की जुताई करके हल्की सिंचाई (Irrigation) कर दी जाती है। नमी पाकर मिट्टी में मौजूद खरपतवार के सारे बीज उग (Germinate) आते हैं। जब वे छोटे-छोटे पौधे बन जाते हैं, तब एक और उथली जुताई (Shallow ploughing) करके या रसायन छिड़क कर उन्हें नष्ट कर दिया जाता है। इसके बाद मुख्य फसल की बुवाई की जाती है।

3.3. ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई (Deep Summer Ploughing)

मई-जून की चिलचिलाती धूप में खेत की मिट्टी पलटने वाले हल (Mould Board Plough – M.B. Plough) से गहरी जुताई कर दी जाती है। ऐसा करने से मोथा (Nutsedge), दूब घास, और काँस जैसे बहुवर्षीय खरपतवारों की जड़ें, प्रकंद (Rhizomes) और कंद (Tubers) जमीन के ऊपर आ जाते हैं और तेज धूप में सूखकर नष्ट हो जाते हैं।

3.4. उचित बीज दर और कतारों में बुवाई (Optimum Seed Rate and Line Sowing)

यदि बीजों की मात्रा (Seed rate) 10-15% बढ़ा दी जाए और बुवाई कतारों (Lines) में की जाए, तो फसल के पौधे जल्दी से बड़े होकर जमीन को पूरी तरह ढक (Cover) लेते हैं। इससे खरपतवारों के बीजों को सूर्य का प्रकाश (Sunlight) नहीं मिल पाता और वे पनप नहीं पाते। कतारों में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई (Interculture) करना भी आसान हो जाता है।

3.5. सह-फसली खेती या अंतःफसली खेती (Intercropping)

मुख्य फसल के बीच की खाली जगह (Inter-row space) में कोई और तेजी से बढ़ने वाली फसल बो देना इंटरक्रॉपिंग कहलाता है।

उदाहरण: मक्का (Maize) या गन्ने की कतारों के बीच मूंग (Moong) या उड़द या लोबिया (Cowpea) बो देना। ये फसलें जमीन को ढक लेती हैं (Cover crops) और खरपतवारों की वृद्धि (Weed growth) को दबा देती हैं।

3.6. मल्चिंग या पलवार (Mulching)

खेत की खाली जमीन को फसल के अवशेषों (पुआल/Straw), सूखी पत्तियों या काले प्लास्टिक की पॉलीथिन (Black Polythene) से ढक देना मल्चिंग कहलाता है। इससे खरपतवारों को प्रकाश नहीं मिलता और उनका अंकुरण रुक जाता है। यह विधि नमी संरक्षण (Moisture conservation) में भी बहुत सहायक है।

4. भौतिक या यांत्रिक विधियाँ (Physical or Mechanical Methods)

यह खरपतवार नियंत्रण की सबसे पुरानी, पारंपरिक और आम विधि है। इसमें मानव श्रम (Human labor), पशुओं की ताकत या मशीनों (Machinery) का उपयोग करके खरपतवारों को भौतिक रूप से नष्ट किया जाता है।

4.1. हाथ से उखाड़ना (Hand Pulling)

यह विधि तब अपनाई जाती है जब खरपतवारों की संख्या बहुत कम हो या वे बहुत बड़े हो गए हों। किसान खेतों में घूमकर खरपतवारों को हाथ से खींचकर जड़ सहित उखाड़ (Uproot) देते हैं। यह विधि बहुवर्षीय (Perennial) खरपतवारों के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि उनकी जड़ें अंदर रह जाती हैं।

4.2. निराई-गुड़ाई करना (Hoeing / Hand Weeding)

खुरपी (Khurpi), कुदाली या हैंड-हो (Hand-hoe) की मदद से खरपतवारों को काटकर या उखाड़कर अलग करने की क्रिया को निराई-गुड़ाई कहते हैं।

  • महत्व: यह सबसे प्रभावी विधि है। इससे न केवल खरपतवार नष्ट होते हैं, बल्कि मिट्टी में वायु संचार (Soil aeration) भी बढ़ता है।
  • समय: आमतौर पर फसलों में पहली निराई बुवाई के 20-25 दिन बाद और दूसरी 40-45 दिन बाद की जाती है।

4.3. भूपरिष्करण या जुताई (Tillage / Ploughing)

फसल बोने से पहले खेत की तैयारी (Primary Tillage) के दौरान ट्रैक्टर या बैलों की सहायता से कल्टीवेटर और हैरो (Harrow) चलाकर खरपतवारों को उखाड़ दिया जाता है और उन्हें मिट्टी में मिला दिया जाता है, जहां वे सड़कर खाद बन जाते हैं।

4.4. कटाई या छंटाई (Mowing / Sickling)

सड़कों के किनारे, बागों (Orchards), या चरागाहों में जहां जुताई नहीं की जा सकती, वहां दरांती (Sickle) या मूवर मशीन (Lawn mower) से खरपतवारों को जमीन की सतह से काट दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य खरपतवारों को फूल और बीज बनाने (Seed setting) से रोकना है।

4.5. जलप्लावन या पानी भरना (Flooding)

यह विधि उन खरपतवारों के लिए बहुत उपयोगी है जो सूखे में पनपते हैं। खेत में 15 से 20 सेंटीमीटर पानी भरकर 2-3 सप्ताह के लिए छोड़ दिया जाता है। पानी भरने से जड़ों को ऑक्सीजन (Oxygen) नहीं मिल पाती और खरपतवार घुटकर मर जाते हैं।

4.6. दहन या जलाना (Burning/Flaming)

बंजर भूमियों, रेलवे ट्रैकों के किनारे या गन्ने के खेतों (कटाई के बाद) में खरपतवारों और उनके बीजों को नष्ट करने के लिए आग लगा दी जाती है (Flamethrower का भी उपयोग किया जाता है)। इससे मिट्टी की सतह पर पड़े खरपतवार के बीज (Weed seeds) भी जलकर नष्ट हो जाते हैं।

4.7. मृदा सौरीकरण (Soil Solarization)

यह एक आधुनिक भौतिक विधि है जो विशेषकर नर्सरी (Nursery) में काम आती है। गर्मियों (मई-जून) में साफ और नमीयुक्त मिट्टी को एक पारदर्शी पॉलीथिन शीट (Transparent Polythene Sheet – 25-50 micron) से 4 से 6 सप्ताह के लिए ढक दिया जाता है। सूर्य की किरणें अंदर जाकर ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse effect) पैदा करती हैं, जिससे मिट्टी का तापमान 8-10°C तक बढ़ जाता है। इस अत्यधिक गर्मी से मिट्टी के अंदर मौजूद खरपतवार के बीज, फफूंदी और हानिकारक निमेटोड्स (Nematodes) पक कर नष्ट हो जाते हैं।

5. जैविक नियंत्रण (Biological Control)

जैविक नियंत्रण एक अत्यंत रोचक और पर्यावरण हितैषी (Eco-friendly) विधि है। “किसी एक जीवित जीव (प्राकृतिक शत्रु) द्वारा दूसरे हानिकारक जीव (खरपतवार) को नष्ट करने या उसकी वृद्धि को रोकने की प्रक्रिया को जैविक नियंत्रण (Biological Control) कहते हैं।”

इसमें मुख्य रूप से कीड़ों (Insects), फफूंदी (Fungi), जीवाणुओं (Bacteria), घोंघों (Snails) या मछलियों (Fishes) का उपयोग किया जाता है।

5.1. एक सफल जैविक कारक की विशेषताएँ (Characteristics of a successful Bio-agent)

  • वह ‘परपोषी विशिष्ट’ (Host-specific) होना चाहिए। अर्थात वह केवल उसी खरपतवार को खाए जिसे नष्ट करना है, मुख्य फसल को बिल्कुल न छुए।
  • उस क्षेत्र के वातावरण (Environment) के अनुकूल होना चाहिए।
  • खरपतवार की तुलना में उस कीट की प्रजनन दर (Reproduction rate) तेज होनी चाहिए।

5.2. जैविक नियंत्रण के प्रमुख और प्रसिद्ध उदाहरण (Most Important Examples for Exams)

कक्षा 12 की बोर्ड और यूपीकेटेट (UPCATET) परीक्षा में ये उदाहरण बार-बार पूछे जाते हैं:

  1. गाजर घास (Parthenium / Congress Grass) का नियंत्रण:इसके लिए मेक्सिको से ‘जागोग्रामा बाइकोलोरेटा’ (Zygogramma bicolorata) नामक एक पत्ती खाने वाले भृंग (Leaf-eating Beetle) को लाया गया। यह कीड़ा गाजर घास की पत्तियों को खाकर उसे पूरी तरह नष्ट कर देता है।
  2. जलकुंभी (Water Hyacinth) का नियंत्रण:नदियों और तालाबों में फैले इस जलीय खरपतवार को नष्ट करने के लिए ‘नियोचेटिना इकॉर्निया’ (Neochetina eichhorniae) नामक घुन (Weevil) का सफलतापूर्वक उपयोग किया जाता है।
  3. नागफनी या प्रिकली पियर (Prickly Pear / Opuntia) का नियंत्रण:भारत में नागफनी के नियंत्रण के लिए ‘डैक्टाइलोपियस टोमेंटोसस’ (Dactylopius tomentosus) नामक कीट (Cochineal insect) का उपयोग किया गया था, जो जैविक नियंत्रण की दुनिया की सबसे पहली और सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है।
  4. लैंटाना कैमरा (Lantana camara) का नियंत्रण:इसके लिए ‘ओफियोमायिया लैंटाना’ (Ophiomyia lantanae) और ‘टेलेनेमिया स्क्रुपोलोसा’ (Teleonemia scrupulosa) कीटों का उपयोग किया जाता है।

5.3. जैव-खरपतवारनाशी या मायकोहर्बिसाइड (Bio-herbicides / Mycoherbicides)

ये ऐसे व्यावसायिक उत्पाद (Commercial products) हैं जिनमें जीवित फफूंदी (Fungi) के बीजाणु (Spores) होते हैं। इन्हें रासायनिक दवाओं की तरह स्प्रे मशीन से खरपतवारों पर छिड़का जाता है। ये फफूंदी खरपतवारों में बीमारी पैदा करके उन्हें मार देती हैं।

  • डिवाइन (DeVine): यह दुनिया का पहला मायकोहर्बिसाइड है। इसमें Phytophthora palmivora नामक फफूंदी होती है जो सिट्रस (नींबू) के बागों में ‘स्ट्रेंगल वाइन’ (Strangle vine) को नष्ट करती है।
  • कॉलेगो (Collego): इसमें Colletotrichum gloeosporioides फफूंदी होती है जो धान के खेत में ‘जॉइंट वेच’ खरपतवार को मारती है।
  • बायपोलारिस (Bipolaris): जॉनसन घास के नियंत्रण के लिए।

6. रासायनिक नियंत्रण (Chemical Control)

खरपतवारों को नष्ट करने के लिए जहरीले रसायनों (Toxic Chemicals) का उपयोग करना ‘रासायनिक नियंत्रण’ कहलाता है। जिन रसायनों का उपयोग किया जाता है, उन्हें खरपतवारनाशी या शाकनाशी (Herbicides / Weedicides) कहते हैं।

आधुनिक बड़े कृषि फार्मों (Large commercial farms) में जहां मजदूर नहीं मिलते, वहां यही विधि सबसे ज्यादा कारगर और सस्ती पड़ती है।

6.1. खरपतवारनाशियों का वर्गीकरण (Classification of Herbicides)

(A) मारक क्षमता या चुनाव के आधार पर (Based on Selectivity):

  1. वर्णात्मक खरपतवारनाशी (Selective Herbicides): ये वे रसायन हैं जो किसी खेत में छिड़कने पर केवल अनचाहे खरपतवारों को ही मारते हैं और मुख्य फसल (Main crop) को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। (वे फसल का चुनाव करते हैं)।उदाहरण: गेहूं की फसल में 2,4-D का छिड़काव करने से केवल बथुआ मरता है, गेहूं को कुछ नहीं होता। पेंडीमेथालिन (Pendimethalin), एट्राजीन (Atrazine)।
  2. अवर्णात्मक खरपतवारनाशी (Non-selective Herbicides): ये रसायन चुनाव नहीं करते। इनके संपर्क में जो भी हरा पौधा (चाहे फसल हो या खरपतवार) आएगा, वह जलकर नष्ट हो जाएगा। इनका उपयोग खाली खेतों, बंजर जमीनों, या मेड़ों पर किया जाता है।उदाहरण: ग्लाइफोसेट (Glyphosate), पैराक्वाट (Paraquat), डाइक्वाट (Diquat)।

(B) कार्यप्रणाली के आधार पर (Based on Mode of Action):

  1. संपर्क खरपतवारनाशी (Contact Herbicides): ये रसायन पौधे के जिस हिस्से (पत्ती या तने) पर पड़ते हैं, केवल उसी हिस्से की कोशिकाओं को जलाकर मारते हैं। ये पौधे के अंदर नहीं फैलते। उदाहरण: पैराक्वाट।
  2. सर्वांगी खरपतवारनाशी (Systemic Herbicides): ये रसायन पौधे की पत्तियों या जड़ों द्वारा सोख (Absorb) लिए जाते हैं और जाइलम व फ्लोएम (Xylem & Phloem) के माध्यम से पूरे पौधे के तंत्र (System) में फैलकर उसे जड़ सहित मार देते हैं। ये बहुवर्षीय खरपतवारों के लिए बहुत उपयोगी हैं। उदाहरण: 2,4-D, ग्लाइफोसेट, सल्फोसल्फ्यूरॉन।

6.2. खरपतवारनाशियों के प्रयोग का समय (Time of Application of Herbicides)

यह विषय कक्षा 12 और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण (VVI) है:

  1. बुवाई पूर्व मिलाना (Pre-Plant Incorporation – PPI):फसल बोने से पहले इन रसायनों को खेत में छिड़क कर हल या हैरो की मदद से मिट्टी में 5-10 सेमी गहराई तक मिला दिया जाता है।
    • कारण: ये रसायन वाष्पशील (Volatile) होते हैं, धूप लगने पर हवा में उड़ सकते हैं।
    • उदाहरण: फ्लूक्लोरालिन (Fluchloralin – व्यापारिक नाम: बासालिन/Basalin)। इसका उपयोग चना, सरसों, और सोयाबीन में बुवाई से पहले किया जाता है।
  2. अंकुरण पूर्व या निर्गमन पूर्व (Pre-Emergence – PE):इन दवाओं का छिड़काव फसल की बुवाई (Sowing) के तुरंत बाद (1 से 3 दिन के अंदर), लेकिन फसल और खरपतवार के उगने (अंकुरण) से पहले किया जाता है। यह मिट्टी की सतह पर एक जहरीली परत (Film) बना देते हैं, जिससे खरपतवार के बीज उगते ही मर जाते हैं।
    • उदाहरण: पेंडीमेथालिन (Pendimethalin – Stomp), एट्राजीन (Atrazine), एलाक्लोर (Alachlor)।
  3. अंकुरण पश्चात या निर्गमन पश्चात (Post-Emergence – POE):इन रसायनों का छिड़काव खड़ी फसल में किया जाता है, जब फसल और खरपतवार दोनों उग आते हैं और लगभग 25 से 35 दिन की अवस्था में होते हैं।
    • उदाहरण: गेहूं में चौड़ी पत्ती के लिए 2,4-D और ‘गेहूं के मामा’ के लिए सल्फोसल्फ्यूरॉन (Sulfosulfuron) या क्लोडिनाफॉप (Clodinafop)।

7. एकीकृत खरपतवार प्रबंधन (Integrated Weed Management – IWM)

किसी एक ही विधि (जैसे केवल रसायनों) पर बार-बार निर्भर रहने से खरपतवार उन रसायनों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता (Resistance) विकसित कर लेते हैं (जैसे गेहूं के मामा ने आइसोप्रोट्यूरॉन के प्रति कर ली थी) और पर्यावरण प्रदूषित (Environmental pollution) होता है।

एकीकृत खरपतवार प्रबंधन (IWM) का अर्थ है खरपतवारों को आर्थिक क्षति स्तर (Economic Threshold Level – ETL) से नीचे रखने के लिए सस्य, यांत्रिक, जैविक और रासायनिक—इन सभी विधियों का एक साथ, संतुलित और न्यायसंगत तरीके (Judicious way) से उपयोग करना।

  • लाभ: इससे रसायनों पर निर्भरता कम होती है, पर्यावरण सुरक्षित रहता है, खेती की लागत घटती है, और फसल की गुणवत्ता में सुधार होता है।

8. निष्कर्ष (Conclusion)

खरपतवार कृषि के ऐसे “मौन शत्रु” (Silent Enemies) हैं, जो बीमारियों की तरह कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाते, लेकिन चुपचाप फसल का सारा पोषण चुरा लेते हैं। एक सफल किसान और कृषि छात्र के लिए खरपतवार प्रबंधन की इन चारों विधियों (Agronomic, Physical, Biological, Chemical) का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। आज के समय में जब मजदूरों की कमी है, वहां रासायनिक विधि (Herbicides) बहुत उपयोगी है, लेकिन दीर्घकालिक कृषि (Sustainable Agriculture) और पर्यावरण सुरक्षा के लिए हमें ‘एकीकृत खरपतवार प्रबंधन’ (IWM) को ही अपनाना होगा। प्रकृति के नियमों (Biological control) और कृषि तकनीकों (Cultural control) का सही संयोजन ही भविष्य की खेती का आधार है।

9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्रश्न 1: खरपतवारों का ‘सस्य वैज्ञानिक नियंत्रण’ (Cultural Control) क्या है? एक उदाहरण दें।

उत्तर: सस्य नियंत्रण का अर्थ है खेती करने के सामान्य तरीकों में ऐसा बदलाव करना जिससे मुख्य फसल तेजी से बढ़े और खरपतवारों को उगने का मौका न मिले। इस विधि में कोई रसायन या मशीन उपयोग नहीं होती।

उदाहरण: ‘फसल चक्र’ (Crop Rotation) अपनाना। लगातार गेहूं बोने से गेहूं का मामा (Phalaris minor) बढ़ता है। यदि गेहूं के स्थान पर चना या सरसों बो दी जाए, तो यह खरपतवार अपने आप नियंत्रित हो जाता है।

प्रश्न 2: ‘वर्णात्मक’ (Selective) और ‘अवर्णात्मक’ (Non-selective) खरपतवारनाशी में क्या अंतर है?

उत्तर:

  • वर्णात्मक खरपतवारनाशी: यह खेत में छिड़कने पर मुख्य फसल को नुकसान पहुंचाए बिना केवल अनचाहे खरपतवारों को चुनकर मारता है। उदाहरण: 2,4-D केवल चौड़ी पत्ती वाले पौधों को मारता है, गेहूं (संकरी पत्ती) को नहीं।
  • अवर्णात्मक खरपतवारनाशी: यह कोई भेदभाव नहीं करता। इसके संपर्क में आने वाली हर हरी वनस्पति (फसल या खरपतवार) जलकर नष्ट हो जाती है। उदाहरण: ग्लाइफोसेट (Glyphosate)।

प्रश्न 3: बासी बीज शैया (Stale Seedbed) तकनीक क्या है?

उत्तर: यह खरपतवार नष्ट करने की एक स्मार्ट भौतिक विधि है। इसमें मुख्य फसल की बुवाई से 2-3 सप्ताह पहले खेत में पानी (सिंचाई) दे दिया जाता है ताकि मिट्टी में मौजूद खरपतवार के बीज उग आएं। जब वे उग जाते हैं, तो एक जुताई करके उन्हें नष्ट कर दिया जाता है। इसके बाद मुख्य फसल बोई जाती है, जिससे फसल खरपतवार-मुक्त रहती है।

प्रश्न 4: गाजर घास (Parthenium) के जैविक नियंत्रण के लिए किस कीट का प्रयोग किया जाता है?

उत्तर: गाजर घास के जैविक नियंत्रण (Biological control) के लिए मेक्सिको से ‘जागोग्रामा बाइकोलोरेटा’ (Zygogramma bicolorata) नामक एक पत्ती खाने वाले भृंग (Beetle) को लाया गया था। यह कीड़ा गाजर घास की पत्तियों को खाकर पौधे को पूरी तरह नष्ट कर देता है।

प्रश्न 5: प्री-इमर्जेंस (Pre-emergence) खरपतवारनाशी का प्रयोग कब किया जाता है? एक उदाहरण दें।

उत्तर: प्री-इमर्जेंस खरपतवारनाशियों का प्रयोग फसल की बुवाई (Sowing) के तुरंत बाद (1 से 3 दिन के अंदर), लेकिन बीजों के उगने (अंकुरण) से ठीक पहले किया जाता है। यह मिट्टी पर एक जहरीली फिल्म बना देता है जिससे खरपतवार उगते ही मर जाते हैं।

उदाहरण:पेंडीमेथालिन (Pendimethalin)।

प्रश्न 6: ‘मृदा सौरीकरण’ (Soil Solarization) विधि कैसे काम करती है?

उत्तर: यह एक भौतिक विधि है। गर्मी के मौसम (मई-जून) में नम खेत को एक पारदर्शी पॉलीथिन शीट (Transparent Polythene Sheet) से 4 से 6 सप्ताह के लिए अच्छी तरह ढक दिया जाता है। सूर्य की किरणें अंदर जाकर ‘ग्रीनहाउस प्रभाव’ पैदा करती हैं, जिससे मिट्टी का तापमान बहुत बढ़ जाता है। इस गर्मी से खरपतवार के बीज और फफूंदियों के बीजाणु पक कर नष्ट हो जाते हैं। यह नर्सरी के लिए बहुत उपयोगी है।

प्रश्न 7: जैव-खरपतवारनाशी या मायकोहर्बिसाइड (Bio-herbicides) क्या होते हैं?

उत्तर: ये व्यावसायिक रूप से तैयार किए गए ऐसे जैविक उत्पाद (Biological products) हैं, जिनमें फफूंदी (Fungi) के जीवित बीजाणु (Spores) भरे होते हैं। इन्हें रसायनों की तरह स्प्रे मशीन से खरपतवारों पर छिड़का जाता है। ये फफूंदी खरपतवारों के शरीर में बीमारी पैदा करके उन्हें मार देती हैं। उदाहरण: डिवाइन (DeVine), कॉलेगो (Collego)।