MP Board Class 12 Biology Human Health and Diseases Complete Guide in Hindi

MP Board Class 12 Biology Human Health and Diseases : कक्षा 12 जीव विज्ञान (Class 12th Biology) के छात्रों के लिए Human Health and Diseases (मानव स्वास्थ्य तथा रोग) एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। बोर्ड परीक्षाओं (Board Exams) के साथ-साथ नीट (NEET) जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी इस अध्याय से कई प्रश्न पूछे जाते हैं।

इस ब्लॉग पोस्ट MP Board Class 12 Biology Human Health and Diseases में हम इस अध्याय के हर महत्वपूर्ण पहलू, जैविक शब्दावली (Biological terms) और अवधारणाओं (Concepts) को विस्तार से समझेंगे।

स्वास्थ्य (Health) क्या है?

लंबे समय तक स्वास्थ्य को केवल शरीर और मन की ऐसी स्थिति माना जाता था, जिसमें शरीर के तरलों (Humors) का संतुलन बना रहता हो। प्राचीन यूनानी विचारक हिप्पोक्रेटीज (Hippocrates) और भारतीय आयुर्वेद (Ayurveda) भी यही मानते थे कि ‘काले पित्त’ (Black bile) वाले लोगों का व्यक्तित्व गरम होता है और उन्हें बुखार होता है। लेकिन विलियम हार्वे (William Harvey) ने रक्त परिसंचरण (Blood circulation) की खोज और थर्मामीटर के उपयोग से इस ‘अच्छे तरल’ (Good humor) की परिकल्पना को गलत साबित कर दिया।

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वास्तव में, स्वास्थ्य का अर्थ केवल ‘रोग की अनुपस्थिति’ (Absence of disease) या शारीरिक स्वस्थता नहीं है। स्वास्थ्य (Health) को पूर्ण रूप से शारीरिक (Physical), मानसिक (Mental) और सामाजिक (Social) रूप से स्वस्थ होने की स्थिति के रूप में परिभाषित किया जाता है।

हमारा स्वास्थ्य मुख्य रूप से तीन बातों से प्रभावित होता है:

  1. आनुवंशिक विकार (Genetic disorders): वे कमियाँ जो बच्चे को जन्म से ही माता-पिता से वंशागत रूप से मिलती हैं।
  2. संक्रमण (Infections): रोगाणुओं द्वारा होने वाले रोग।
  3. जीवन शैली (Lifestyle): हमारा खान-पान, पानी, विश्राम, व्यायाम और आदतें।

मानव में सामान्य रोग (Common Diseases in Humans)

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जब शरीर के अंगों या तंत्रों के कार्य (Functions) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और लक्षण प्रकट होते हैं, तो उसे रोग (Disease) कहते हैं। रोगों को दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा जाता है:

  • संक्रामक रोग (Infectious Diseases): जो आसानी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलते हैं (जैसे- एड्स, जुकाम)।
  • असंक्रामक रोग (Non-infectious Diseases): जो एक से दूसरे में नहीं फैलते (जैसे- कैंसर, जो मृत्यु का एक प्रमुख कारण है)।

रोग पैदा करने वाले जीवों को रोगजनक (Pathogens) कहते हैं। इनमें जीवाणु (Bacteria), विषाणु (Viruses), कवक (Fungi), प्रोटोजोआ (Protozoans) और कृमि (Helminths) शामिल हैं। अधिकांश परजीवी (Parasites) रोगजनक होते हैं क्योंकि वे परपोषी (Host) को नुकसान पहुँचाते हैं।

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1. जीवाण्वीय रोग (Bacterial Diseases)

  • टाइफॉइड (Typhoid): यह साल्मोनेला टाइफी (Salmonella typhi) नामक जीवाणु से होता है। यह संदूषित (Contaminated) भोजन और पानी के माध्यम से छोटी आँत (Small intestine) में प्रवेश करता है।
    • लक्षण (Symptoms): लगातार उच्च ज्वर (39°-40°C), कमजोरी, आमाशय में दर्द, कब्ज, सिरदर्द और भूख न लगना।
    • परीक्षण (Test): विडाल परीक्षण (Widal test) द्वारा इसकी पुष्टि होती है।
    • रोचक तथ्य: ‘टाइफाइड मैरी’ (Mary Mallon) एक रसोइया थी, जिसने अपने बनाए खाने के जरिए वर्षों तक यह रोग फैलाया था।
  • न्युमोनिया (Pneumonia): यह स्ट्रेप्टोकोकस न्युमोनी (Streptococcus pneumoniae) और हीमोफिल्स इंफ्लुएँजी (Haemophilus influenzae) द्वारा होता है। यह फेफड़ों के वायुकोष्ठ (Alveoli) को संक्रमित करता है, जिससे उनमें तरल भर जाता है और साँस लेने में दिक्कत होती है।
    • लक्षण (Symptoms): ज्वर, ठिठुरन, खाँसी, सिरदर्द और गंभीर स्थिति में होंठ और नाखूनों का रंग नीला/धूसर हो जाना।

2. विषाणु रोग (Viral Diseases)

  • सामान्य जुकाम (Common Cold): यह नासाविषाणुओं (Rhinoviruses) के समूह द्वारा होता है। यह नाक और श्वसन पथ (Respiratory tract) को संक्रमित करता है, फेफड़ों को नहीं।
    • लक्षण (Symptoms): नासीय संकुलता (Nasal congestion), कंठ दाह (Sore throat), फटी आवाज, खाँसी, सिरदर्द (3-7 दिन तक रहता है)। यह संक्रमित व्यक्ति के खाँसने/छींकने से निकले बिंदुकों (Droplets) से फैलता है।
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3. प्रोटोजोआ रोग (Protozoan Diseases)

  • मलेरिया (Malaria): यह प्लैज्मोडियम (Plasmodium) नामक प्रोटोजोआ से होता है। इसकी जातियाँ P. vivax, P. malariae, और P. falciparum हैं। P. falciparum सबसे गंभीर और घातक दुर्दम (Malignant) मलेरिया फैलाता है।
    • जीवन चक्र (Life Cycle): संक्रमित मादा ऐनोफेलीज (Female Anopheles) मच्छर के काटने से यह जीवाणुज (Sporozoites) के रूप में मानव शरीर में घुसता है। परजीवी पहले यकृत (Liver) में संख्या बढ़ाते हैं, फिर लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) को फाड़ देते हैं। RBC फटने से हीमोजोइन (Hemozoin) नामक विषैला (Toxic) पदार्थ निकलता है, जो ठिठुरन और उच्च ज्वर (High fever) का कारण है। इसे अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए दो परपोषियों (मानव और मच्छर) की जरूरत होती है।
  • अमीबता (Amoebiasis): यह वृहत् आंत्र (Large intestine) के परजीवी एंटअमीबा हिस्टोलिटिका (Entamoeba histolytica) से होता है।
    • लक्षण: कब्ज, पेट दर्द, ऐंठन और मल में अत्यधिक श्लेष्मा (Mucus) और रक्त के थक्के। घरेलू मक्खियाँ (Houseflies) इसकी वाहक हैं।

4. कृमि रोग (Helminthic Diseases)

  • ऐस्केरिसता (Ascariasis): आंत्र परजीवी गोलकृमि ऐस्कारिस (Ascaris) से होता है।
    • लक्षण: आंतरिक रक्तस्राव (Internal bleeding), पेशीय पीड़ा, ज्वर, अरक्तता (Anemia) और आंत्र का अवरोध। यह संदूषित पानी, सब्जियों और फलों से फैलता है।
  • फाइलेरिया या हाथी पाँव (Filariasis / Elephantiasis): यह वुचेरेरिया (Wuchereria bancrofti और W. malayi) द्वारा होता है।
    • प्रभाव: यह निचले अंगों की लसीका वाहिकाओं (Lymphatic vessels) में धीरे-धीरे बढ़ने वाला शोथ (Inflammation) पैदा करता है, जिससे जननांग भी विकृत हो जाते हैं। यह मादा मच्छर के काटने से फैलता है।
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5. कवक रोग (Fungal Diseases)

  • दाद (Ringworm): यह माइक्रोस्पोरम (Microsporum), ट्राइकोफाइटॉन (Trichophyton) और एपिडर्मोफाइटॉन (Epidermophyton) कवकों से होता है।
    • लक्षण: त्वचा, नाखून और सिर पर सूखी, शल्की विक्षतियाँ (Scaly lesions) और तेज खुजली। ऊष्मा (Heat) और नमी (Moisture) इनके पनपने में मदद करते हैं।
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प्रतिरक्षा (Immunity)

परपोषी (Host) की रोगकारक जीवों से लड़ने की वह क्षमता जो उसे प्रतिरक्षा-तंत्र (Immune System) से मिलती है, प्रतिरक्षा (Immunity) कहलाती है। यह दो प्रकार की होती है:

1. सहज प्रतिरक्षा (Innate Immunity)

यह जन्म के समय से मौजूद अविशिष्ट रक्षा (Non-specific defense) है, जो शरीर में 4 प्रकार के रोध (Barriers) खड़ी करती है:

  • शारीरिक रोध (Physical Barriers): त्वचा (Skin) मुख्य रोध है। इसके अलावा श्वसन, जठरांत्र और जननमूत्र पथ में श्लेष्मा का आलेप (Mucus coating) रोगाणुओं को रोकता है।
  • कायिकीय रोध (Physiological Barriers): आमाशय का अम्ल (Stomach acid), मुँह की लार (Saliva) और आँखों के आँसू (Tears)।
  • कोशिकीय रोध (Cellular Barriers): रक्त में बहुरूप केंद्रक श्वेताणु (PMNL-Neutrophils), मोनोसाइट्स (Monocytes), प्राकृतिक मारक (Natural killer) लिम्फोसाइट्स और मैक्रोफेजेज (Macrophages) जो रोगाणुओं का भक्षण करते हैं।
  • साइटोकाइन रोध (Cytokine Barriers): विषाणु संक्रमित कोशिकाएँ इंटरफेरॉन (Interferons) नामक प्रोटीन स्रावित करती हैं, जो आस-पास की स्वस्थ कोशिकाओं को संक्रमण से बचाती हैं।

2. उपार्जित प्रतिरक्षा (Acquired Immunity)

यह रोगजनक विशिष्ट (Pathogen-specific) होती है और स्मृति (Memory) पर आधारित होती है। पहली बार रोगाणु के हमले पर ‘प्राथमिक अनुक्रिया’ (Primary response) होती है। उसी रोगाणु के दोबारा हमले पर स्मृति के कारण अत्यधिक तीव्र ‘द्वितीयक या पूर्ववृत्तीय अनुक्रिया’ (Secondary/Anamnestic response) होती है।

यह प्रतिरक्षा रक्त में मौजूद दो लसीकाणुओं (Lymphocytes) द्वारा होती है:

  • बी-लसीकाणु (B-lymphocytes): ये रोगाणुओं से लड़ने के लिए रक्त में प्रोटीन की सेना बनाते हैं जिन्हें प्रतिरक्षी (Antibodies) कहते हैं। प्रत्येक प्रतिरक्षी अणु में चार पेप्टाइड शृंखलाएँ होती हैं: दो लघु (Light) और दो दीर्घ (Heavy), इसलिए इसे H₂L₂ के रूप में दर्शाया जाता है। उदाहरण: IgA, IgM, IgE, IgG। इसे तरल प्रतिरक्षा अनुक्रिया (Humoral immune response) कहते हैं।
  • टी-लसीकाणु (T-lymphocytes): ये खुद प्रतिरक्षी नहीं बनाते बल्कि B-कोशिकाओं की मदद करते हैं। ये कोशिका माध्यित प्रतिरक्षा (Cell-mediated immunity – CMI) का माध्यम बनते हैं। अंग प्रतिरोपण (Organ transplantation) में जब निरोप (Graft) को अस्वीकृत किया जाता है, तो इसके लिए यही CMI उत्तरदायी होती है। इसलिए ऊतक मिलान (Tissue matching) आवश्यक है और रोगी को जीवनभर प्रतिरक्षा-निरोधक (Immunosuppressants) लेने पड़ते हैं।

सक्रिय और निष्क्रिय प्रतिरक्षा (Active and Passive Immunity)

  • सक्रिय प्रतिरक्षा (Active Immunity): जब शरीर सीधे प्रतिजनों (Antigens) का सामना करता है और खुद प्रतिरक्षी बनाता है। यह धीमी होती है। टीकाकरण (Vaccination) इसका उदाहरण है।
  • निष्क्रिय प्रतिरक्षा (Passive Immunity): जब बने-बनाए प्रतिरक्षी शरीर को सीधे दिए जाते हैं। उदाहरण: माँ के दूध के पीले तरल पीयूष (Colostrum) में IgA की प्रचुरता होती है, जो शिशु की रक्षा करता है। सगर्भता (Pregnancy) में अपरा (Placenta) द्वारा भी भ्रूण को प्रतिरक्षी मिलते हैं। साँप के काटने पर दिया जाने वाला प्रतिआविष (Antitoxin) भी निष्क्रिय प्रतिरक्षा है।

ऐलर्जी (Allergies)

पर्यावरण में मौजूद कुछ प्रतिजनों के प्रति प्रतिरक्षा तंत्र की अतिरंजित अनुक्रिया (Exaggerated response) को ऐलर्जी कहते हैं।

  • ऐलर्जन (Allergens): धूल, चिचड़ी (Mites), पराग (Pollen), प्राणी लघुशल्क (Animal dander)।
  • प्रतिरक्षी (Antibody): इसमें IgE प्रकार की प्रतिरक्षियाँ बनती हैं।
  • कारण: मास्ट कोशिकाओं (Mast cells) से हिस्टैमिन (Histamine) और सीरोटोनिन (Serotonin) रसायनों का निकलना।
  • लक्षण और उपचार: छींकना, पनीली आँखें, साँस लेने में दिक्कत। उपचार के लिए प्रतिहिस्टैमिन (Antihistamine), एड्रीनेलिन (Adrenaline) और स्टेरॉयड (Steroids) का प्रयोग होता है।

स्व-प्रतिरक्षा (Autoimmunity)

कभी-कभी आनुवंशिक या अज्ञात कारणों से शरीर अपनी ही कोशिकाओं पर हमला कर देता है, इसे स्व-प्रतिरक्षा रोग कहते हैं। उदाहरण: आमवाती संधिशोथ (Rheumatoid arthritis)।

मानव प्रतिरक्षा तंत्र के अंग (Immune System Organs)

  • प्राथमिक लसीकाभ अंग (Primary Lymphoid Organs): अस्थि मज्जा (Bone marrow) और थाइमस (Thymus)। यहाँ अपरिपक्व लसीकाणु, प्रतिजन संवेदनशील लसीकाणुओं में बदलते हैं। थाइमस यौवन आने तक सिकुड़ कर छोटा हो जाता है।
  • द्वितीयक लसीकाभ अंग (Secondary Lymphoid Organs): प्लीहा (Spleen), लसीका ग्रंथियाँ (Lymph nodes), टांसिल, पेयर पैच और अपेंडिक्स। यहाँ लसीकाणुओं की प्रतिजन से क्रिया होती है।
  • MALT (Mucosal Associated Lymphoid Tissue): यह श्वसन, पाचन और जननमूत्र पथ के स्तरों में होता है और शरीर के कुल लसीकाभ ऊतक का 50% बनाता है।

एड्स (AIDS – Acquired Immuno Deficiency Syndrome)

एड्स कोई जन्मजात रोग नहीं है; यह जीवनकाल में उपार्जित (Acquired) होता है। इसकी खोज 1981 में हुई थी।

  • रोगजनक: यह HIV (Human Immunodeficiency Virus) से होता है, जो पश्चविषाणु (Retrovirus) समूह का है (जिसमें RNA जीनोम होता है)।
  • संचरण (Transmission): संक्रमित व्यक्ति से यौन संपर्क, संदूषित रक्त आधान (Blood transfusion), संक्रमित सुइयों (Infected needles) के साझा प्रयोग से, और संक्रमित माँ से अपरा द्वारा बच्चे में। यह केवल छूने से नहीं फैलता, बल्कि शारीरिक द्रवों से फैलता है।
  • क्रियाविधि (Mechanism): वायरस शरीर के बृहतभक्षकाणु (Macrophages) में घुसता है। वहाँ ‘विलोम ट्रांसक्रिप्टेज’ (Reverse transcriptase) एंजाइम की मदद से RNA से DNA बनाता है। मैक्रोफेज ‘HIV फैक्टरी’ बन जाते हैं। इसके बाद वायरस सहायक टी-लसीकाणुओं (Helper T-cells) पर हमला करता है, जिससे उनकी संख्या बहुत कम हो जाती है। इससे प्रतिरक्षा इतनी घट जाती है कि व्यक्ति माइकोबैक्टीरियम (Mycobacterium), कवक और टॉक्सोप्लैज्मा जैसे परजीवियों का शिकार हो जाता है।
  • परीक्षण: एलीसा (ELISA – Enzyme Linked Immunosorbent Assay)।
  • उपचार/रोकथाम: एंटी-रिट्रोवायरल औषधियाँ केवल मृत्यु को टाल सकती हैं, रोक नहीं सकतीं। NACO (National AIDS Control Organisation) इसके प्रति जागरूकता फैलाता है।

कैंसर (Cancer)

कैंसर मानव मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है।

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  • संस्पर्श संदमन (Contact Inhibition): सामान्य कोशिकाओं में वृद्धि का नियंत्रण होता है, वे दूसरी कोशिकाओं के संपर्क में आने पर बढ़ना रुक जाती हैं। कैंसर कोशिकाओं में यह गुण खत्म हो जाता है, जिससे वे अनियंत्रित होकर कोशिकाओं का गुच्छा बना लेती हैं जिसे अर्बुद (Tumor) कहते हैं।
  • अर्बुद के प्रकार:
    1. सुदम अर्बुद (Benign Tumor): ये अपने मूल स्थान तक सीमित रहते हैं और कम नुकसान पहुँचाते हैं।
    2. दुर्दम अर्बुद (Malignant Tumor): ये नवद्रव्यीय (Neoplastic) कोशिकाएँ होती हैं जो तेजी से बढ़कर सामान्य ऊतकों पर हमला करती हैं। इनकी कोशिकाएँ रक्त द्वारा शरीर के अन्य भागों में पहुँचकर नए ट्यूमर बनाती हैं। इस डरावने गुण को मैटास्टेसिस (Metastasis) कहते हैं।
  • कैंसर के कारण (Carcinogens):
    • भौतिक/रासायनिक: एक्स-किरणें, गामा किरणें (आयनकारी), यूवी किरणें (अनायनकारी), तंबाकू का धुआँ।
    • जैविक: अर्बुदीय विषाणु (Oncogenic viruses) जिनमें वायरल ओंकोजीन (Viral oncogenes) होते हैं। इसके अलावा सामान्य कोशिकाओं में मौजूद ‘प्रोटो-ओंकोजीन’ (Proto-oncogenes) सक्रिय होकर कैंसरजनी रूपांतरण कर सकते हैं।
  • निदान (Detection): जीवृतिपरीक्षा (Biopsy), हिस्टोपैथोलॉजिकल अध्ययन, ल्यूकीमिया (Blood cancer) के लिए रक्त/मज्जा परीक्षण, रेडियोग्राफी (X-ray), सीटी स्कैन (CT – Computed Tomography), और एमआरआई (MRI – Magnetic Resonance Imaging)।
  • उपचार (Treatment): शल्यक्रिया (Surgery), विकिरण चिकित्सा (Radiotherapy), और रसोचिकित्सा (Chemotherapy)। प्रतिरक्षा चिकित्सा (Immunotherapy) में \alpha-इंटरफेरॉन (\alpha-interferon) दिया जाता है, जो प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय कर अर्बुद को नष्ट करने में मदद करता है।

ड्रग और ऐल्कोहल कुप्रयोग (Drug and Alcohol Abuse)

युवाओं में ड्रग्स का बढ़ता प्रचलन एक गंभीर चिंता है। प्रमुख ड्रग्स इस प्रकार हैं:

1. ओपिऑइड्स (Opioids)

ये केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) और जठरांत्र पथ (GI tract) के ग्राहियों (Receptors) से बंधते हैं।

  • हेरोइन / स्मैक (Heroin/Smack): यह रासायनिक रूप से डाइएसिटिल मॉर्फीन (Diacetylmorphine) है। यह सफेद, गंधहीन और रवेदार होता है।
  • स्रोत: पोस्त के पौधे पैपेवर सोम्नीफेरम (Papaver somniferum) के लेटेक्स से मॉर्फीन निकाला जाता है, जिसका एसीटिलीकरण करके हेरोइन बनती है।
  • प्रभाव: यह एक अवसादक (Depressant) है जो शरीर के कार्यों को धीमा करता है।

2. कैनेबिनॉइड्स (Cannabinoids)

ये मस्तिष्क के रिसेप्टर्स से क्रिया करते हैं।

  • स्रोत: कैनेबिस सैटाइवा (Cannabis sativa) (भाँग) के पुष्पक्रम से। मैरिजुआना, हशीश, चरस और गाँजा इसी से बनते हैं।
  • प्रभाव: ये मुख्य रूप से शरीर के हृद-वाहिका तंत्र (Cardio-vascular system) को प्रभावित करते हैं।

3. कोका ऐल्कैलॉइड्स / कोकेन (Cocaine)

  • स्रोत: दक्षिण अमेरिका के पौधे ऐरिथ्रोज़ाइलम कोका (Erythroxylum coca) से।
  • प्रभाव: यह ‘डोपेमीन’ (Dopamine) न्यूरोट्रांसमीटर के परिवहन में बाधा डालता है। इसे सूंघकर लिया जाता है। यह CNS को उद्दीपित करता है जिससे ऊर्जा (Euphoria) की अनुभूति होती है। ज्यादा मात्रा से विभ्रम (Hallucination) होता है। ऐट्रोफा बेलेडोना और धतूरा (Datura) में भी विभ्रम पैदा करने वाले गुण होते हैं।

धूम्रपान और तंबाकू (Smoking and Tobacco)

तंबाकू में निकोटीन (Nicotine) होता है, जो अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal gland) को उद्दीपित करके एड्रिनलीन (Adrenaline) स्रावित करता है। इससे रक्तचाप (Blood pressure) और हृदय गति बढ़ती है। धूम्रपान से फेफड़ों का कैंसर, वातस्फीति (Emphysema) और रक्त में कार्बन मोनोऑक्साइड बढ़ने से ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।

किशोरावस्था, व्यसन और निर्भरता (Adolescence, Addiction, and Dependence)

  • किशोरावस्था (12-18 वर्ष): यह उत्सुकता (Curiosity), जोखिम उठाने और प्रयोग करने का समय है, जिससे युवा ड्रग्स की ओर आकर्षित होते हैं। समकक्षी दबाव (Peer pressure) और तनाव (Stress) भी प्रमुख कारण हैं।
  • व्यसन (Addiction): ड्रग्स के लगातार उपयोग से शरीर के रिसेप्टर्स का सहनशीलता स्तर (Tolerance level) बढ़ जाता है, जिससे व्यक्ति मनोवैज्ञानिक रूप से आश्रित हो जाता है।
  • निर्भरता और विनिवर्तन संलक्षण (Withdrawal Syndrome): अचानक ड्रग्स छोड़ने पर शरीर में कंपन, मिचली, चिंता और पसीना आना जैसे लक्षण दिखते हैं, जिसे Withdrawal Syndrome कहते हैं।
  • रोकथाम (Prevention): माता-पिता को समकक्षी दबाव से बचाना चाहिए, सही शिक्षा और परामर्श देना चाहिए, संकट के संकेतों (Danger signs) को पहचानना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर मनोवैज्ञानिक व चिकित्सा सहायता (Professional medical help) लेनी चाहिए।

FAQs on MP Board Class 12 Biology Human Health and Diseases (परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न)

Q1. सक्रिय और निष्क्रिय प्रतिरक्षा में क्या अंतर है? (Active vs Passive Immunity) Ans: सक्रिय प्रतिरक्षा में शरीर खुद एंटीबॉडी बनाता है जब वह एंटीजन के संपर्क में आता है (जैसे- टीकाकरण)। निष्क्रिय प्रतिरक्षा में शरीर की रक्षा के लिए बाहर से बने-बनाए एंटीबॉडी सीधे दिए जाते हैं (जैसे- माँ के दूध (Colostrum) से मिलने वाला IgA या साँप के काटने पर दिया जाने वाला टीका)।

Q2. कैंसर कोशिकाओं में ‘संस्पर्श संदमन’ (Contact Inhibition) का क्या महत्व है?

Ans: सामान्य कोशिकाएँ दूसरी कोशिकाओं के संपर्क में आने पर अपनी वृद्धि रोक देती हैं, जिसे संस्पर्श संदमन कहते हैं। कैंसर कोशिकाओं में यह गुण नष्ट हो जाता है, जिससे वे लगातार विभाजित होकर ‘अर्बुद’ (Tumor) बना लेती हैं।

Q3. मैटास्टेसिस (Metastasis) किसे कहते हैं?

Ans: दुर्दम अर्बुद (Malignant tumors) की कोशिकाएँ रक्त के माध्यम से शरीर के दूरदराज के अंगों में पहुँच जाती हैं और वहाँ नए ट्यूमर बनाना शुरू कर देती हैं। कैंसर के इस सबसे खतरनाक गुण को मैटास्टेसिस कहते हैं।

Q4. एचआईवी (HIV) शरीर में कैसे संक्रमण फैलाता है?

Ans: HIV शरीर के मैक्रोफेजेज (Macrophages) में घुसकर ‘रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेज’ की मदद से RNA से DNA बनाता है। इसके बाद यह ‘सहायक टी-लसीकाणुओं’ (Helper T-cells) पर हमला कर उनकी संख्या बहुत कम कर देता है, जिससे व्यक्ति की प्रतिरक्षा पूरी तरह गिर जाती है।

Q5. प्लाज्मोडियम के जीवन चक्र में ‘हीमोजोइन’ (Hemozoin) का क्या रोल है?

Ans: मलेरिया परजीवी (Plasmodium) जब मानव की लाल रक्त कणिकाओं (RBCs) को संक्रमित करके उन्हें फाड़ देता है, तो ‘हीमोजोइन’ नामक एक विषैला पदार्थ निकलता है। यही पदार्थ हर तीन-चार दिन में आने वाले उच्च ज्वर (Fever) और ठिठुरन (Chills) का मुख्य कारण है।

Q6. ड्रग कुप्रयोग के अचानक बंद करने पर क्या होता है?

Ans: इसे विनिवर्तन संलक्षण (Withdrawal syndrome) कहते हैं। इसमें शरीर में चिंता, कंपन, मिचली और पसीना आने जैसे अप्रिय और अभिलक्षणिक लक्षण उत्पन्न होते हैं।