MP Board Class 12 Biology Chapter 6 Evolution -विकास Detailed & Easy Exam Notes

MP Board Class 12 Biology Chapter 6 Evolution : MP Board Class 12 Biology Chapter 6 Evolution के सबसे विस्तृत, आसान और परीक्षा-उपयोगी नोट्स। इस ब्लॉग पोस्ट में जीवन की उत्पत्ति, डार्विन का सिद्धांत, विकास के प्रमाण, हार्डी-वेनवर्ग सिद्धांत और मानव विकास को सरल हिंदी में विस्तार से समझें। बोर्ड परीक्षा में शत-प्रतिशत अंक प्राप्त करने के लिए इसे जरूर पढ़ें।

MP Board Class 12 Biology Chapter 6: विकास (Evolution) – Detailed & Easy Exam Notes

प्रिय विद्यार्थियों, एमपी बोर्ड कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के लिए जीव विज्ञान (Biology) का अध्याय 6, ‘विकास’ (Evolution) अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अध्याय न केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाने में मदद करता है, बल्कि यह भी समझाता है कि पृथ्वी पर जीवन कैसे शुरू हुआ और आज हम जो विशाल जैव विविधता देखते हैं, वह कैसे विकसित हुई।

इस विस्तृत आर्टिकल में, हमने एनसीईआरटी (NCERT) पाठ्यक्रम पर आधारित इस पूरे अध्याय को बहुत ही आसान भाषा में समझाया है। जटिल वैज्ञानिक सिद्धांतों को छोटे-छोटे बिंदुओं में बाँटा गया है ताकि आप इन्हें आसानी से याद कर सकें।

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6.1 जीवन की उत्पत्ति (Origin of Life)

जब हम साफ और अंधेरी रात में आसमान में तारों को देखते हैं, तो वास्तव में हम भूतकाल (बीते हुए समय) को देख रहे होते हैं। तारों और हमारे बीच की दूरी इतनी अधिक है कि इसे प्रकाश वर्षों (Light Years) में मापा जाता है। आज जो प्रकाश हमारी आँखों तक पहुँच रहा है, उसकी यात्रा लाखों वर्ष पहले शुरू हुई थी। इसी विशाल ब्रह्मांड की पृष्ठभूमि में पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति एक अनूठी और चमत्कारिक घटना है।

ब्रह्मांड और पृथ्वी का निर्माण

  • ब्रह्मांड की आयु और आकार: ब्रह्मांड अत्यधिक विशाल और प्राचीन है। इसकी आयु लगभग 20,000 करोड़ (200 बिलियन) वर्ष मानी जाती है। ब्रह्मांड में अनगिनत आकाश गंगाओं (Galaxies) का समूह है, जिनमें सितारों, गैसों के बादल और धूल के कण समाहित हैं। इस विशाल ब्रह्मांड के आकार की तुलना में हमारी पृथ्वी केवल एक छोटी सी बिंदु या कणिका मात्र है।
  • बिग बैंग सिद्धांत (Big Bang Theory): ब्रह्मांड की उत्पत्ति को समझाने के लिए ‘बिग बैंग’ नामक महाविस्फोट का सिद्धांत सबसे प्रामाणिक माना जाता है। यह एक अकल्पनीय भौतिक महाविस्फोट था, जिसके कारण ब्रह्मांड का तेजी से विस्तार हुआ और तापमान में कमी आई।
  • गैसों का निर्माण: तापमान कम होने पर कुछ समय बाद हाइड्रोजन और हीलियम गैसें बनीं। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ये गैसें संघनित हुईं और वर्तमान आकाश गंगाओं का निर्माण हुआ।
  • पृथ्वी की उत्पत्ति: हमारी आकाशगंगा, जिसे ‘मिल्की वे’ (Milky Way) कहा जाता है, के सौर-मंडल में पृथ्वी की रचना लगभग 4.5 बिलियन वर्ष (450 करोड़ वर्ष) पूर्व हुई थी।

प्रारंभिक पृथ्वी का वातावरण

  • प्रारंभिक अवस्था में पृथ्वी पर कोई वायुमंडल नहीं था।
  • पृथ्वी का धरातल गलित (पिघले हुए) पदार्थों से ढका था, जिनसे जल वाष्प, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और अमोनिया जैसी गैसें निकलकर बाहर आईं।
  • जल और ओजोन का निर्माण: सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (अल्ट्रावॉयलेट) किरणों ने पानी को तोड़कर H₂ (हाइड्रोजन) तथा O₂ (ऑक्सीजन) में विखंडित कर दिया। हल्की गैस होने के कारण H₂ मुक्त हो गई। ऑक्सीजन ने अमोनिया और मीथेन के साथ रासायनिक क्रिया करके पानी, कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और अन्य गैसों का निर्माण किया। इसके बाद पृथ्वी के चारों ओर सुरक्षात्मक ओजोन परत का गठन हुआ।
  • महासागरों का निर्माण: जब पृथ्वी का तापमान कम हुआ और यह ठंडी हुई, तो जल-वाष्प भारी बारिश के रूप में धरती पर गिरी। इस बारिश ने पृथ्वी के गहरे स्थानों को भर दिया, जिससे विशाल महासागरों का निर्माण हुआ।
  • पृथ्वी की उत्पत्ति के लगभग 50 करोड़ (500 मिलियन) वर्ष बाद, अर्थात् आज से लगभग 400 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर जीवन प्रकट हुआ।

जीवन की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धांत

जीवन पृथ्वी पर कैसे आया, इसे लेकर वैज्ञानिकों और विचारकों ने कई सिद्धांत दिए हैं:

  1. पैन-स्पर्मिया या सर्वबीजाणु सिद्धांत (Panspermia Theory): पूर्व ग्रीक विचारकों और कुछ खगोल वैज्ञानिकों का मानना था कि जीवन अंतरिक्ष से आया है। उनके अनुसार, जीवन की ‘स्पोर’ नामक इकाई विभिन्न ग्रहों (जिनमें पृथ्वी भी एक थी) में स्थानांतरित हुई।
  2. स्वतः जनन सिद्धांत (Spontaneous Generation): काफी समय तक यह माना जाता रहा कि जीवन सड़ती-गलती और क्षयमान सामग्री, जैसे भूसे और कीचड़ आदि से अपने आप प्रकट हुआ।
  • लुई पाश्चर का प्रयोग: महान वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने अपने सावधानीपूर्वक किए गए प्रयोगों से ‘स्वतः जनन सिद्धांत’ को हमेशा के लिए खारिज कर दिया। उन्होंने फ्लास्क का उपयोग करके यह सिद्ध किया कि जीवन पहले से विद्यमान जीवन से ही निकल कर आता है। उन्होंने दिखाया कि जीवाणुरहित किए गए बंद फ्लास्क में ‘मृत यीस्ट’ से नए जीव पैदा नहीं होते, जबकि खुले फ्लास्क में मृत यीस्ट रखने पर हवा के संपर्क से कुछ समय बाद नए जीव आ जाते हैं।
  1. रासायनिक विकास का सिद्धांत (ओपेरिन-हाल्डेन सिद्धांत):
  • रूस के आपेरिन और इंग्लैंड के हालडेन ने यह प्रस्ताव रखा कि जीवन का पहला स्वरूप पूर्व-विद्यमान जीवन-रहित कार्बनिक अणुओं (जैसे- आरएनए, प्रोटीन इत्यादि) से आया होगा।
  • यह जीवन रासायनिक विकास के बाद बना, जिसमें अकार्बनिक संघटकों से विविध कार्बनिक अणुओं का निर्माण हुआ।
  • उस समय पृथ्वी का तापमान बहुत उच्च था, ज्वालामुखीय तूफान आते थे, और वायुमंडल में ऑक्सीजन नहीं थी बल्कि मिथेन और अमोनिया की कमी वाली (Reducing) अवस्था थी।

एस.एल. मिलर का प्रयोग (S.L. Miller’s Experiment) – VVIP for Exams

रासायनिक विकास के सिद्धांत को सिद्ध करने के लिए 1953 में अमेरिकी वैज्ञानिक एस.एल. मिलर ने अपनी प्रयोगशाला में प्रारंभिक पृथ्वी जैसी स्थितियाँ पैदा कीं।

  • उन्होंने एक बंद फ्लास्क में मिथेन, हाइड्रोजन और अमोनिया गैसों का मिश्रण लिया।
  • इसमें जल वाष्प मिलाकर 800°C ताप पर एक विद्युत-डिस्चार्ज (स्पार्क) किया।
  • परिणाम: उन्होंने देखा कि इस प्रयोग के परिणामस्वरूप अमीनो एसिड का निर्माण होता है।
  • अन्य वैज्ञानिकों ने भी ऐसे प्रयोग किए और शर्कराओं, नाइट्रोजन क्षारकों, वर्णकों तथा वसा आदि का निर्माण होते हुए देखा। उल्का पिंडों के विश्लेषण से भी ऐसे ही तत्व मिले, जिससे रासायनिक विकास के सिद्धांत को मान्यता मिली।
MP Board Class 12 Biology Chapter 6 Evolution

प्रथम कोशिकीय जीवन

  • जीवन का प्रथम अकोशिकीय रूप लगभग 3 अरब (3 बिलियन) वर्ष पूर्व पैदा हुआ होगा। ये विशाल अणु (जैसे आरएनए, प्रोटीन, पौलीसैक्केराइड) रहे होंगे, जो अपने अणुओं का जनन कर सकते थे।
  • सर्वप्रथम कोशिकीय प्रकार का जीवन लगभग 200 करोड़ वर्ष पूर्व जलीय वातावरण में प्रकट हुआ होगा। आज विज्ञान में अजीवात् जनन (अजीवों से जीवन की उत्पत्ति) के सिद्धांत को ही बहुमत प्राप्त है।

6.2 जीवन-स्वरूप का विकास – एक सिद्धांत (Evolution of Life Forms)

पृथ्वी पर आज पाए जाने वाले विभिन्न जीव-जंतु और वनस्पतियाँ कैसे बने, इसके लिए अलग-अलग अवधारणाएँ दी गई हैं।

धार्मिक साहित्य और विशिष्ट सृष्टि का सिद्धांत (Theory of Special Creation)

परंपरागत धार्मिक विचारों के अनुसार तीन बातें मानी जाती थीं:

  1. संसार में आज जितने भी जीव और प्रजातियाँ मौजूद हैं, वे सब ऐसे ही सर्जित (बनाई) गई थीं।
  2. उत्पत्ति के समय से ही यही जैव विविधता थी और भविष्य में भी यह ऐसी ही रहेगी।
  3. पृथ्वी केवल 4000 वर्ष पुरानी है।

चार्ल्स डार्विन का प्राकृतिक वरण का सिद्धांत (Darwin’s Theory of Natural Selection)

19वीं सदी में इन धार्मिक विचारों में भारी बदलाव आया। चार्ल्स डार्विन ने ‘एच एम एस बीगल’ (HMS Beagle) नामक विश्व-समुद्री जहाज पर यात्रा की और जीवों का गहराई से अवलोकन किया।

  • डार्विन के निष्कर्ष: डार्विन ने पाया कि आज के सजीव आपस में तो समानता रखते ही हैं, बल्कि वे उन जीव रूपों से भी समानता रखते हैं जो करोड़ों वर्ष पूर्व जीवित थे।
  • धरती के इतिहास में पुराने जीव नष्ट होते गए और नए जीव पैदा होते गए। जीवों का यह विकास बहुत धीमा रहा है।
  • उपयुक्तता (Fitness): जिस जीव में जलवायु, भोजन और भौतिक कारकों का सामना करने की विशिष्टताएँ थीं, वे जीवित रहे। डार्विन के अनुसार ‘उपयुक्तता’ का अर्थ केवल ‘जनन संबंधी उपयुक्तता’ है।
  • प्राकृतिक वरण (Natural Selection): जो जीव वातावरण के अनुकूल होते हैं, वे अधिक संतानें पैदा करते हैं। प्रकृति अंततः उन्हीं का वरण (चुनाव) करती है। इसे डार्विन ने प्राकृतिक चुनाव का नाम दिया।

अल्फ्रेड वॉलेस का योगदान: डार्विन के समय में ही एक अन्य प्रकृति विज्ञानी अल्फ्रेड वॉलेस ने मलयआर्कपेलैगो (Malay Archipelago) में काम करते हुए ठीक डार्विन जैसे ही निष्कर्ष निकाले थे। इन दोनों के अध्ययनों ने साबित कर दिया कि पृथ्वी हजारों वर्ष नहीं, बल्कि करोड़ों-अरबों वर्ष पुरानी है।

6.3 विकास के प्रमाण क्या हैं? (Evidences for Evolution)

विकास कोई कल्पना नहीं है, बल्कि इसके कई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं:

1. पुराजीवी या जीवाश्म प्रमाण (Paleontological Evidences)

  • चट्टानों के अंदर जीवन के कठोर अंगों के अवशेष जीवाश्म कहलाते हैं।
  • भूपर्पटी (Earth crust) की चट्टानें अवसाद या तलछट से बनती हैं। अलग-अलग आयु की चट्टानों की परतों में अलग-अलग प्रकार के जीव रूप पाए गए हैं।
  • कुछ जीवाश्म आधुनिक जीवों से मिलते-जुलते हैं, जबकि कुछ विलुप्त जीवों (जैसे डायनासोर) का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • जीवाश्मों की आयु की गणना रेडियोऐक्टिव तिथि निर्धारण तकनीक से की जाती है। इन अध्ययनों से सिद्ध होता है कि जीवों के रूप विभिन्न कालों में प्रकट हुए और पृथ्वी पर जीवन के रूप बदलते रहे हैं।

2. भ्रूणात्मक प्रमाण (Embryological Evidences)

  • अर्नेस्ट हेकल ने सभी कशेरुकी जीवों के भ्रूणों के प्रेक्षण के आधार पर बताया कि सभी कशेरुकी जंतुओं (मनुष्य सहित) के भ्रूण में सिर के ठीक पीछे अवशेषी गलफड़ों की श्रृंखला विकसित होती है, जो केवल मछलियों में वयस्क अवस्था में बचती है।
  • हालांकि, बाद में कार्ल-अर्नेस्ट बेयर ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, क्योंकि भ्रूण कभी भी अन्य जंतुओं की वयस्क अवस्थाओं से नहीं गुजरता।

3. शारीरिकी और आकारिकी प्रमाण (Anatomical and Morphological Evidences)

आज के जीवों और पुराने जीवों के बीच शारीरिक संरचनाओं की तुलना करने पर दो प्रकार की समानताएँ देखने को मिलती हैं:

  • समजात अंग (Homologous Organs) और अपसारी विकास (Divergent Evolution):
  • वे अंग जिनकी उत्पत्ति और मूल शारीरिक संरचना समान होती है, परंतु भिन्न-भिन्न कार्यों को संपन्न करने के कारण उनका रूप अलग हो जाता है, समजात अंग कहलाते हैं।
  • उदाहरण: ह्वेल (तैरने के लिए), चमगादड़ (उड़ने के लिए), चीता (दौड़ने के लिए) और मानव (पकड़ने के लिए) के अग्रपाद (Forelimbs) की अस्थियाँ। इन सभी में प्रगंडिका (ह्यूमरस), प्रकोष्ठिका (रेडिअस), अंतः प्रकोष्ठिका (अलना), मणिबंधिका (कार्पेल्स), करभिका (मेटाकार्पेल्स) और अंगुलास्थि (फैलेंजेस) नामक हड्डियां एक ही क्रम में होती हैं।
  • पौधों में समजातता: बोगनबिलिया के काँटे और क्युकुरबिटा के प्रतान (टेंड्रिल्स)।
  • यह घटना समजातता कहलाती है और यह साझे पूर्वज (Common Ancestry) से अपसारी विकास (Divergent Evolution) को दर्शाती है।
  • तुल्यरूप या समरूप अंग (Analogous Organs) और अभिसारी विकास (Convergent Evolution):
  • वे अंग जो समान कार्य संपन्न करते हैं, लेकिन उनकी मूल शारीरिक रचना और पूर्वज परंपरा समान नहीं होती, तुल्यरूप अंग कहलाते हैं।
  • उदाहरण: पक्षी और तितलियों के पंख (दोनों उड़ने का काम करते हैं लेकिन बनावट बिल्कुल अलग है)।
  • अन्य उदाहरण: ऑक्टोपस और स्तनधारियों की आँखें, या पेंग्विन और डॉल्फिन मछलियों के फ्लिपर्स।
  • यह समान आवासीय आवश्यकताओं के कारण जीवों के समान रूप से अनुकूलित होने को दर्शाता है, जिसे अभिसारी विकास कहते हैं।

4. जैव रासायनिक प्रमाण (Biochemical Evidences)

विभिन्न जीवों में प्रोटीन और जीनों की कार्यदक्षता और संरचनात्मक समानताएँ भी यह संकेत देती हैं कि सभी जीवों की पूर्वज परंपरा एक ही रही है (साझे पूर्वज)।

5. कृत्रिम चयन (Artificial Selection)

मनुष्य ने अपनी जरूरत (कृषि, सुरक्षा, खेल) के लिए बहुत सारे जंगली जानवरों को पालतू बनाया और सघन प्रजनन द्वारा नई नस्लें तैयार कीं (जैसे कुत्ते की विभिन्न नस्लें)। डार्विन ने तर्क दिया कि यदि मनुष्य सौ साल के भीतर नई नस्ल पैदा कर सकता है, तो प्रकृति लाखों वर्षों के प्राकृतिक वरण से नई प्रजातियां क्यों नहीं बना सकती?।

6. प्राकृतिक वरण का प्रत्यक्ष प्रमाण: औद्योगिक मैलेनिज्म (Industrial Melanism)

इंग्लैंड में शलभों (Moths) का उदाहरण प्राकृतिक वरण का सबसे बेहतरीन और प्रत्यक्ष प्रमाण है।

  • औद्योगिकीकरण से पूर्व (1850 ई. से पहले): प्रदूषण नहीं था, पेड़ों पर श्वेत (सफेद) लाइकेन उगते थे। सफेद पृष्ठभूमि के कारण श्वेत पंखी शलभ शिकारियों की नजर से बच जाते थे, जबकि गहरे रंग वाले शलभ आसानी से पकड़े जाते थे। अतः श्वेत शलभों की संख्या अधिक थी।
  • औद्योगिकीकरण के पश्चात् (1920): उद्योगों के धुएँ और कालिख़ के कारण लाइकेन नष्ट हो गए और पेड़ों के तने काले पड़ गए।
  • परिणाम: अब श्वेत शलभ आसानी से शिकारियों को दिखने लगे और मारे गए, जबकि काले शलभ पेड़ों के रंग में छिपकर बच गए। फलस्वरूप, गहरे रंग के शलभों की संख्या बढ़ गई और अनुपात उलट हो गया।
  • ग्रामीण इलाकों में जहाँ औद्योगिकीकरण नहीं हुआ, वहाँ श्वेत शलभ ही बचे रहे। यह स्पष्ट करता है कि मिश्र जीव संख्या में जो वातावरण के अनुसार अनुकूलित हो जाता है, वह बच जाता है। (याद रहे, किसी भी जीव का पूर्ण विनाश नहीं होता)।

7. मानवोद्भवी क्रियाओं द्वारा विकास (Anthropogenic Evolution)

इंसानों द्वारा रसायनों के उपयोग से भी सूक्ष्म स्तर पर विकास देखने को मिलता है।

  • शाकनाशकों एवं कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से बहुत कम समय में ही प्रतिरोधक (Resistant) किस्मों का चयन हो गया।
  • प्रतिजैविकों (Antibiotics) के इस्तेमाल के कारण सूक्ष्मजीवों (बैक्टीरिया) में कुछ ही महीनों या वर्षों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई।
  • यह बताता है कि विकास कोई पूर्व-निश्चित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के संयोग और जीवों में संयोग जन्य उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) पर आधारित प्रसंभाव्य प्रक्रम है।

6.4 अनुकूली विकिरण क्या है? (Adaptive Radiation)

विकास की एक बहुत ही रोचक प्रक्रिया ‘अनुकूली विकिरण’ है।

  • डार्विन अपनी समुद्री यात्रा के दौरान गैलापैगों द्वीप (Galapagos Islands) गए थे। वहाँ उन्होंने एक छोटी काली चिड़िया को देखा, जिसे बाद में ‘डार्विन फिंच’ (Darwin’s Finches) कहा गया।
  • उन्होंने देखा कि एक ही द्वीप पर इस चिड़िया की कई किस्में (प्रजातियां) मौजूद थीं।
  • ये सभी पक्षी मूल रूप से बीजभक्षी (बीज खाने वाले) थे। लेकिन अलग-अलग आवासों में अनुकूलन के कारण, इनकी चोंच की बनावट में बदलाव आ गया और वे कीट भक्षी तथा शाकाहारी फिंच में बदल गईं।
  • परिभाषा: एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम जो एक बिंदु (समान पूर्वज) से शुरू होकर अन्य भू-भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होता है, उसे अनुकूली विकिरण (Adaptive Radiation) कहा जाता है। डार्विन की फिंच इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

अन्य उदाहरण:

  • ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल (शिशुधानी प्राणी): अधिकांश ऑस्ट्रेलियाई मार्सुपियल (जैसे कंगारू, कोआला, तस्मानियाई भेड़िया) एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं, लेकिन वे सभी एक ही पूर्वज से विकसित होकर पूरे ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप में अनुकूलित हुए हैं।

अभिसारी विकास (Convergent Evolution) से संबंध:
जब एक से अधिक अनुकूली विकिरण एक अलग-थलग भौगोलिक क्षेत्र में भिन्न आवासों का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रकट होते हैं, तो इसे अभिसारी विकास कहा जाता है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया के अपरास्तनी जंतु (Placental mammals) और वहाँ के मार्सुपियल (Marsupials) बाहरी रूप से एक समान दिखते हैं, जैसे अपरास्तनी भेड़िया और तस्मानियाई वूल्फ।

6.5 जैव विकास (Biological Evolution)

विकास वास्तव में तभी शुरू हुआ होगा, जब प्रथम कोशिकीय जीवन ने अपनी चयापचयी (Metabolic) क्षमताओं के कारण भिन्नता उत्पन्न की होगी।

  • विकास के डार्विन सिद्धांत का मूल तत्व ‘प्राकृतिक चुनाव’ है।
  • नए जीवों के प्रकट होने की दर उनके जीवन चक्र (Life span) पर निर्भर करती है। जैसे रोगाणु (बैक्टीरिया) एक घंटे में करोड़ों की संख्या में विभाजित हो सकते हैं, इसलिए उनमें नई प्रजाति कुछ ही दिनों में बन सकती है। इसके विपरीत, मछली या मुर्गी का जीवन चक्र लंबा होता है, इसलिए उनमें बदलाव आने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।
  • प्रकृति हमेशा उस जीव को चुनती है जिसकी ‘उपयुक्तता’ बेहतर होती है। यह उपयुक्तता वंशानुगत (Genetic) होनी चाहिए, ताकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ सके।

डार्विनीवाद की दो मुख्य संकल्पनाएँ

डार्विन के विकासवाद की दो प्रमुख संकल्पनाएँ हैं:

  1. शाखनी अवरोहण (Branching Descent): जीव एक ही पूर्वज से शाखाओं की तरह विकसित होकर नई प्रजातियों में बँटते हैं।
  2. प्राकृतिक वरण (Natural Selection): प्रकृति अनुकूलित जीवों का चुनाव करती है।

लामार्क का सिद्धांत (Lamarck’s Theory)

डार्विन से पहले फ्रांसीसी वैज्ञानिक लामार्क ने ‘अंगों के उपयोग एवं अनुपयोग’ का सिद्धांत दिया था। उन्होंने जिराफ का उदाहरण दिया कि ऊँचे पेड़ों की पत्तियां खाने के प्रयास में उनकी गर्दन लंबी हो गई और यह लक्षण उनकी संतानों में चला गया। हालांकि, आज विज्ञान इस अटकलबाजी पर विश्वास नहीं करता।

थॉमस मॉल्थस का प्रभाव

डार्विन पर थॉमस मॉल्थस के ‘समष्टि (Population)’ पर किए गए कार्यों का बहुत प्रभाव पड़ा।

  • प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं और मौसम के अलावा जीवों की संख्या स्थिर रहती है।
  • जीवों में विविधताएँ वंशागत होती हैं।
  • चूँकि संसाधन सीमित हैं, इसलिए जीवों में अस्तित्व के लिए प्रतियोगिता होती है।
  • डार्विन का निष्कर्ष था कि जिन जीवों में वंशागत विविधताएँ उन्हें पर्यावरण से बेहतर अनुकूलन कराती हैं, वे संसाधन का बेहतर उपयोग करते हैं, अधिकाधिक संतति पैदा करते हैं और अंततः नई प्रजाति का रूप ले लेते हैं।

6.6 विकास की क्रिया विधि (Mechanism of Evolution)

डार्विन ने विकास और प्राकृतिक वरण के बारे में बताया, लेकिन वे यह नहीं बता पाए कि यह ‘विविधता’ उत्पन्न कैसे होती है। इसके बारे में उन्होंने चुप्पी साध ली थी।

  • ह्यूगो डीवेरीज़ (Hugo de Vries) का उत्परिवर्तन सिद्धांत: 20वीं सदी के प्रथम दशक में, डीवेरीज़ ने ‘इवनिंग प्राइमरोज’ (Evening Primrose) पौधे पर काम किया और म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) का सिद्धांत दिया।
  • उत्परिवर्तन क्या है? जीव संख्या में सहसा (अचानक) आने वाले बड़े-बड़े परिवर्तनों को उत्परिवर्तन कहते हैं।
  • डार्विन और डीवेरीज़ में अंतर:
  • डार्विन मानते थे कि विविधताएँ छोटी-छोटी और दिशावान होती हैं, और विकास क्रमबद्ध (धीरे-धीरे) होता है।
  • डीवेरीज़ का मानना था कि उत्परिवर्तन यादृच्छिक (Random) और दिशाहीन होते हैं, और यही प्रजातियों की उत्पत्ति का असली कारण हैं।
  • डीवेरीज़ ने विशाल उत्परिवर्तन के इस बड़े कदम को साल्टेशन (Saltation) कहा।

6.7 हार्डी-वेनवर्ग सिद्धांत (Hardy-Weinberg Principle) – Very Important

हार्डी-वेनवर्ग सिद्धांत समष्टि आनुवंशिकी (Population Genetics) का एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

  • यह सिद्धांत कहता है कि किसी जीव संख्या (Population) में अलील (युग्मविकल्पी) आवृत्तियाँ स्थिर होती हैं और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर एक जैसी रहती हैं।
  • कुल जीन कोश (Gene pool) हमेशा अपरिवर्तनीय रहता है। इसे आनुवंशिक संतुलन (Genetic Equilibrium) कहते हैं।
  • सभी अलील आवृत्तियों का योग हमेशा 1 होता है।

गणितीय अभिव्यक्ति:
यदि द्विगुणित जीव में अलील ‘A’ की आवृत्ति p है और अलील ‘a’ की आवृत्ति q है, तो:
AA की आवृत्ति = p^2
aa की आवृत्ति = q^2
Aa की आवृत्ति = 2pq
हार्डी-वेनवर्ग समीकरण:

    \[p^2 + 2pq + q^2 = 1\]

यह (p + q)^2 की द्विपदी अभिव्यक्ति है।

जब मापी गई आवृत्ति इस अपेक्षित मान से भिन्न होती है, तो यह भिन्नता इस बात का संकेत देती है कि विकासीय परिवर्तन हो रहा है (विकास हो रहा है)।

हार्डी-वेनवर्ग साम्यता को प्रभावित करने वाले 5 घटक:

परीक्षा में यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। हार्डी-वेनवर्ग संतुलन को ये पांच कारक प्रभावित करते हैं:

  1. जीन पलायन या जीन प्रवाह (Gene flow): जब जीव एक स्थान से दूसरे स्थान जाते हैं, तो नई समष्टि में जीन जुड़ जाते हैं और पुरानी से घट जाते हैं। बार-बार ऐसा होने पर यह जीन प्रवाह कहलाता है।
  2. आनुवंशिक विचलन (Genetic drift): यदि जीन आवृत्तियों में परिवर्तन संयोगवश (Chance) होता है, तो उसे जेनेटिक ड्रिफ्ट कहते हैं। यह छोटे जीव समूहों में होता है। कभी-कभी यह इतना भिन्न हो जाता है कि नई प्रजाति बन जाती है। इस प्रभाव को संस्थापक प्रभाव (Founder Effect) कहते हैं।
  3. उत्परिवर्तन (Mutation): अचानक होने वाले परिवर्तन।
  4. आनुवंशिक पुनर्योग (Genetic Recombination): युग्मकों के निर्माण के समय जीनों का नया मेल।
  5. प्राकृतिक वरण (Natural selection): अधिक उपयुक्त जीवों का चयन। प्राकृतिक वरण तीन तरह के परिवर्तन ला सकता है: स्थायित्व (Stabilization), दिशात्मक परिवर्तन (Directional change), या विदारण (Disruption – जिसमें वितरण वक्र के दोनों सिरों पर उभार आता है)।

चित्र 6.8 – प्राकृतिक वरण के तीन प्रकार (स्थायित्व, दिशात्मक, विदारण) के वितरण वक्र का ग्राफिकल चित्र यहाँ लगाएँ।]

6.8 विकास का संक्षिप्त विवरण (A Brief Account of Evolution)

पृथ्वी पर जीवन के विकास का एक संक्षिप्त कालक्रम (Timeline) इस प्रकार है:

  • 2000 मिलियन वर्ष पूर्व: जीवन का प्रथम कोशिकीय रूप प्रकट हुआ। कुछ कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण जैसी ऑक्सीजन (O₂) मुक्त करने की क्षमता विकसित हुई।
  • 500 मिलियन वर्ष पूर्व: एककोशिकीय जीवों से बहुकोशिकीय अकशेरुकी जीव (Invertebrates) बने।
  • 350 मिलियन वर्ष पूर्व: जबड़े रहित मछलियाँ अस्तित्व में आईं। उस समय मजबूत पंखों वाली मछलियाँ धरती पर आ जा सकती थीं।
  • 320 मिलियन वर्ष पूर्व: समुद्री खरपतवार और कुछ पादप अस्तित्व में आए। धरती पर पशुओं के आने से पहले पादप (पौधे) फैल चुके थे।
  • सीलाकेंथि (Coelacanth) मछली: 1938 में दक्षिण अफ्रीका में यह मछली पकड़ी गई जिसे विलुप्त मान लिया गया था। इन्हें लोबेफिन कहा गया, जो जल और थल दोनों जगह रह सकते थे। ये आधुनिक उभयचरों (मेंढक, सैलामैंडर) के पूर्वज थे।
  • सरीसृप (Reptiles) और डायनासोर: उभयचरों से सरीसृप बने जो धूप में न सूखने वाले मोटे कवच के अंडे देते थे। अगले 200 मिलियन वर्ष तक विभिन्न आकार के सरीसृपों ने पृथ्वी पर राज किया। इनमें सबसे खूंखार ट्राइरैनोसोरस रेक्स (T-Rex) डायनासौर था, जो लगभग 20 फुट ऊँचा और विशाल कटार जैसे दाँतों वाला था।
  • लगभग 65 मिलियन वर्ष पूर्व डायनासोर अचानक समाप्त हो गए। कारण जलवायु परिवर्तन हो सकता है या वे पक्षियों में विकसित हो गए।
  • स्तनधारी (Mammals) का युग: डायनासोर के बाद स्तनधारियों ने स्थल पर कब्जा कर लिया। पहले स्तनधारी ‘श्रू (मंजोरू)’ जैसे थे। स्तनधारी जरायुज (बच्चों को जन्म देने वाले) होते हैं और खतरों के प्रति अधिक सतर्क और बुद्धिमान होते हैं। महाद्वीपीय विस्थापन के कारण ऑस्ट्रेलिया अलग हो गया, जिससे वहाँ मार्सुपियल (जैसे कंगारू) जीवित बचे रहे।

[Image Placeholder: चित्र 6.9 और 6.10 – भू-भौगोलिक मापदंड पर पौधों और जंतुओं के विकास के रेखा चित्र यहाँ प्रदर्शित करें।]

6.9 मानव का उद्भव और विकास (Origin and Evolution of Man)

मानव का विकास विकासवादी इतिहास की सर्वाधिक सफल और रोचक कहानी है, क्योंकि मानव के पास भाषा, कौशल और आत्मबोध (Self-consciousness) है। इसके प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं:

  1. ड्रायोपिथिकस (Dryopithecus) तथा रामापिथिकस (Ramapithecus):
  • समय: लगभग 15 मिलियन वर्ष पूर्व।
  • ये नरवानर थे। इनके शरीर बालों से भरपूर थे और ये गोरिल्ला तथा चिंपैंजी की तरह चलते थे।
  • अंतर: रामापिथिकस अधिक मनुष्यों जैसे थे, जबकि ड्रायोपिथिकस वनमानुष (Ape) जैसे थे।
  1. ऑस्ट्रालोपिथेसिन (Australopithecines) – आदिमानव:
  • समय: लगभग 2 मिलियन वर्ष पूर्व।
  • स्थान: पूर्वी अफ्रीका के घास स्थलों में।
  • विशेषता: वे पत्थर के हथियारों से शिकार करते थे, लेकिन भोजन में मुख्य रूप से फल ही खाते थे।
  1. होमो हैबिलिस (Homo habilis):
  • इसे ‘पहला मानव जैसा प्राणी’ माना गया।
  • मस्तिष्क क्षमता (Brain capacity): 650-800 सीसी (CC) के बीच थी।
  • विशेषता: वे संभवतः माँस नहीं खाते थे।
  1. होमो इरैक्टस (Homo erectus):
  • समय: लगभग 1.5 मिलियन वर्ष पूर्व। (इसके जीवाश्म 1991 में जावा में मिले)।
  • मस्तिष्क क्षमता: यह बड़ा था, लगभग 900 सीसी (CC) का था।
  • विशेषता: होमो इरैक्टस संभवतः माँस खाता था।
  1. नियंडरटाल मानव (Neanderthal Man):
  • समय और स्थान: 100,000 से 40,000 वर्ष पूर्व, पूर्वी एवं मध्य एशियाई देशों में।
  • मस्तिष्क क्षमता: 1400 सीसी आकार का मस्तिष्क।
  • विशेषता: वे अपने शरीर की रक्षा के लिए जानवरों की खालों का इस्तेमाल करते थे और अपने मृतकों को जमीन में गाड़ते थे (दफनाते थे)।
  1. होमो सैंपियंस (Homo sapiens) – आधुनिक मानव:
  • उत्पत्ति: यह अफ्रीका में विकसित हुआ और धीरे-धीरे विभिन्न महाद्वीपों में फैल गया।
  • हिमयुग के दौरान (75,000 से 10,000 वर्ष पूर्व) यह आधुनिक युगीन मानव पैदा हुआ।
  • संस्कृति और कृषि: मानव ने प्रागैतिहासिक गुफा-चित्रों की रचना लगभग 18,000 वर्ष पूर्व की। कृषि कार्य और बस्तियाँ बसाना लगभग 10,000 वर्ष पूर्व आरंभ हुआ, जिसके बाद मानव सभ्यता का तीव्र विकास हुआ।

[Image Placeholder: चित्र 6.11 आधुनिक वयस्क मानव, शिशु चिंपैंजी और वयस्क चिंपैंजी की खोपड़ियों की तुलना का चित्र यहाँ शामिल करें।]

सारांश (Conclusion)

पृथ्वी पर जीवन के उद्भव का आधार ब्रह्मांड और पृथ्वी की उत्पत्ति है। अधिकांश वैज्ञानिक रासायनिक विकास के सिद्धांत को मानते हैं, जहाँ जीवन के प्रथम कोशिकीय रूपों के उदय के पूर्व द्वि-अणु पैदा हुए थे। इसके बाद की जैव विविधता और विकास का मुख्य आधार डार्विन का प्राकृतिक वरण का सिद्धांत है। जीवाश्म, समजात-समरूप अंग, और आनुवंशिक साम्यता विकास के ठोस प्रमाण देते हैं। विकास की इस पूरी यात्रा में आधुनिक मानव का विकास सबसे रोचक है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय एवं लघु उत्तरीय प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: डार्विन के चयन सिद्धांत के परिप्रेक्ष्य में जीवाणुओं में देखी गई प्रतिजैविक प्रतिरोध का स्पष्टीकरण करें।

उत्तर: जब हम जीवाणुओं पर प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) दवाओं का प्रयोग करते हैं, तो अधिकांश जीवाणु मर जाते हैं। परंतु प्राकृतिक रूप से मौजूद भिन्नताओं के कारण, कुछ जीवाणुओं में दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता होती है (उत्परिवर्तन के कारण)। डार्विन के प्राकृतिक वरण सिद्धांत के अनुसार, बदलते वातावरण (एंटीबायोटिक की उपस्थिति) में ये प्रतिरोधक जीवाणु अधिक ‘उपयुक्त’ साबित होते हैं। वे बच जाते हैं, जनन करते हैं और अपनी प्रतिरोधक क्षमता अगली पीढ़ी को सौंप देते हैं। कुछ ही समय में पूरी कॉलोनी प्रतिरोधक बन जाती है।

प्रश्न 2: ‘प्रजाति’ की स्पष्ट परिभाषा क्या है?

उत्तर: प्रजाति (Species) जीवों का वह समूह है जिसके सदस्य शारीरिक और आनुवंशिक रूप से एक-दूसरे के समान होते हैं, और जो प्राकृतिक परिस्थितियों में स्वतंत्र रूप से आपस में प्रजनन (Interbreeding) करके जननक्षम (Fertile) संतान उत्पन्न कर सकते हैं।

प्रश्न 3: मानव-विकास के विभिन्न घटकों (मस्तिष्क साइज, कंकाल-संरचना) का उल्लेख करें।

उत्तर: मानव विकास में क्रमिक परिवर्तन हुए हैं:

  • होमो हैबिलिस: मस्तिष्क क्षमता 650-800 सीसी, माँस नहीं खाते थे।
  • होमो इरैक्टस: मस्तिष्क क्षमता 900 सीसी, सीधे चलते थे, माँस खाते थे।
  • नियंडरटाल मानव: मस्तिष्क क्षमता 1400 सीसी, शरीर की रक्षा के लिए खाल का प्रयोग, मृतकों को दफनाते थे।
  • होमो सैंपियंस (आधुनिक मानव): पूर्ण विकसित मस्तिष्क, भाषा का विकास, सीधे खड़े होने की उत्तम कंकाल-संरचना और कृषि कौशल।

प्रश्न 4: अनुकूलनी विकिरण (Adaptive Radiation) को एक उदाहरण सहित वर्णन करें।

उत्तर: एक विशेष भू-भौगोलिक क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के विकास का प्रक्रम जो एक बिंदु से शुरू होकर अन्य भौगोलिक क्षेत्रों तक प्रसारित होता है, अनुकूली विकिरण कहलाता है।
उदाहरण: डार्विन की फिंच। गैलापैगों द्वीप पर एक मूल बीजभक्षी चिड़िया से विकास होकर अनेक नई प्रजातियां बनीं, जिनकी चोंच अलग-अलग आहार (कीट भक्षी, शाकाहारी) के अनुसार बदल गई थीं।

प्रश्न 5: क्या हम मानव विकास को अनुकूलनी विकिरण कह सकते हैं?

उत्तर: नहीं, मानव विकास को पूर्ण रूप से अनुकूली विकिरण नहीं कहा जा सकता। अनुकूली विकिरण में एक ही पूर्वज से एक ही समय पर कई अलग-अलग प्रजातियां अलग-अलग दिशाओं (आवासों) में विकसित होती हैं (जैसे फिंच)। जबकि मानव का विकास मुख्य रूप से एक क्रमिक, अनुक्रमिक (Sequential) विकास है जहाँ एक प्रजाति ने समय के साथ दूसरी अधिक उन्नत प्रजाति का रूप लिया (जैसे होमो इरैक्टस से होमो सैंपियंस)।


(यह आर्टिकल पूरी तरह से एनसीईआरटी (NCERT) और एमपी बोर्ड के पाठ्यक्रम पर आधारित है। परीक्षा से पूर्व इन बिंदुओं का बार-बार अभ्यास करें। शुभकामनाएँ!)

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