इकाई 3: क्षितिज भाग-2 (गद्य खंड) प्रश्न बैंक MP Board Class 10 Hindi Question Bank Unit 3

MP Board Class 10 Hindi Question Bank Unit 3 :

MP Board Class 10 Hindi Question Bank Unit 3

वस्तुनिष्ठ प्रश्न (01 अंक)
सही विकल्प चुनकर लिखिए –

  1. “नेताजी का चश्मा” पाठ की विधा है –
    (अ) एकांकी
    (ब) निबन्ध
    (स) व्यंग्य
    (द) कहानी
    उत्तर: (द) कहानी
  2. ‘स्वयं प्रकाश’ जी का जन्म हुआ था –
    (अ) मध्यप्रदेश में
    (ब) राजस्थान में
    (स) गुजरात में
    (द) उत्तरप्रदेश में
    उत्तर: (अ) मध्यप्रदेश में
  3. स्वयं प्रकाश जी ने पत्रिका का संपादन किया –
    (अ) सरस्वती का
    (ब) वसुधा का
    (स) कादम्बिनी का
    (द) जनवाणी का
    उत्तर: (ब) वसुधा का
  4. ‘कैप्टन’ नाम था –
    (अ) पान वाले का
    (ब) सैनिक का
    (स) हालदार साहब का
    (द) चश्मे वाले का
    उत्तर: (द) चश्मे वाले का
  5. ‘नेताजी का चश्मा’ कहानी का मूलभाव है –
    (अ) शिक्षा का विकास
    (ब) समाज सुधार
    (स) प्रेम सम्बन्ध
    (द) देश भक्ति की भावना
    उत्तर: (द) देश भक्ति की भावना
  1. कस्बे के चौराहे पर प्रतिमा लगी थी –
    (अ) महात्मा गांधी की
    (ब) भीमराव अम्बेडकर की
    (स) सरदार पटेल की
    (द) सुभाषचंद्र बोस की
    उत्तर: (द) सुभाषचंद्र बोस की
  2. नेता जी की मूर्ति लगवाई गई थी –
    (अ) वन विभाग द्वारा
    (ब) नगरपालिका द्वारा
    (स) नगर निगम द्वारा
    (द) शिक्षा विभाग द्वारा
    उत्तर: (ब) नगरपालिका द्वारा
  3. ‘कलम का जादूगर’ कहा जाता है –
    (अ) स्वयं प्रकाश जी को
    (ब) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी को
    (स) मन्नू भंडारी को
    (द) रामवृक्ष बेनीपुरी जी को
    उत्तर: (द) रामवृक्ष बेनीपुरी जी को
  4. ‘बालगोबिन भगत’ पाठ की विधा है –
    (अ) जीवनी
    (ब) आत्मकथा
    (स) रेखाचित्र
    (द) संस्मरण
    उत्तर: (स) रेखाचित्र

बालगोबिन भगत थे –
(अ) साधु
(ब) गृहस्थ
(स) साहब
(द) पुजारी
उत्तर: (ब) गृहस्थ

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  1. बालगोबिन भगत जी पद गाते थे –
    (अ) कबीर के
    (ब) सूरदास के
    (स) मीरा के
    (द) तुलसीदास के
    उत्तर: (अ) कबीर के
  2. बालगोबिन भगत पाठ प्रहार करता है –
    (अ) कुरीतियों पर
    (ब) दहेज लोभियों पर
    (स) शिक्षा पर
    (द) राजनीति पर
    उत्तर: (अ) कुरीतियों पर
  3. बालगोबिन भगत गाते समय बजाते थे –
    (अ) ढोलक
    (ब) तबला
    (स) मंजीरा
    (द) खंजड़ी
    उत्तर: (द) खंजड़ी
  4. सच्चे साधु की पहचान होती है –
    (अ) पहनावे से
    (ब) भाषा से
    (स) ईश्वर भक्ति से
    (द) उसके विचारों से
    उत्तर: (द) उसके विचारों से
  1. ‘झूठा सच’ उपन्यास के लेखक है –
    (अ) यशपाल
    (ब) मन्नू भंडारी
    (स) रामवृक्ष बेनीपुरी
    (द) स्वयं प्रकाश
    उत्तर: (अ) यशपाल
  2. ‘लखनवी अंदाज़’ पाठ की विधा है –
    (अ) कहानी
    (ब) निबन्ध
    (स) व्यंग्य
    (द) रेखाचित्र
    उत्तर: (स) व्यंग्य
  3. नवाबों के शौक के लिए प्रसिद्ध है –
    (अ) दिल्ली
    (ब) लखनऊ
    (स) हैदराबाद
    (द) भोपाल
    उत्तर: (ब) लखनऊ
  1. मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में जन्म हुआ था –
    (अ) स्वयं प्रकाश का
    (ब) सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का
    (स) यशपाल का
    (द) मन्नू भंडारी का
    उत्तर: (अ) स्वयं प्रकाश का
  2. ‘आपका बंटी’ उपन्यास लिखा है –
    (अ) मन्नू भंडारी ने
    (ब) रामवृक्ष बेनीपुरी ने
    (स) यतीन्द्र मिश्र ने
    (द) महावीर प्रसाद द्विवेदी ने
    उत्तर: (अ) मन्नू भंडारी ने
  3. ‘आत्मकथा’ विधा में लिखा गया पाठ है –
    (अ) नौबतखाने में इबादत
    (ब) लखनवी अंदाज़
    (स) बालगोबिन भगत
    (द) एक कहानी यह भी
    उत्तर: (द) एक कहानी यह भी
  4. मन्नू भंडारी के किस व्यवहार से तंग आकर प्रिंसिपल ने उनके पिता को बुलाया?
    (अ) अशिष्ट
    (ब) विनम्र
    (स) दुष्ट
    (द) आंदोलनकारी
    उत्तर: (द) आंदोलनकारी
  5. जैनेंद्र का कौन सा उपन्यास मन्नू भंडारी को पसंद था?
    (अ) सुनीता
    (ब) परख
    (स) त्याग-पत्र
    (द) भाभी
    उत्तर: (स) त्याग-पत्र
  6. उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के लिए प्रसिद्ध थे –
    (अ) सितार वादन के लिए
    (ब) शहनाई वादन के लिए
    (स) तबला वादन के लिए
    (द) बांसुरी वादन के लिए
    उत्तर: (ब) शहनाई वादन के लिए
  1. बिस्मिल्ला खाँ का दूसरा नाम था –
    (अ) अमीरुद्दीन
    (ब) अलीबख्श
    (स) मिथुन
    (द) हुसैन खाँ
    उत्तर: (अ) अमीरुद्दीन
  2. भदंत आनंद कौसल्यायन विशेष प्रभावित थे –
    (अ) नेहरू जी से
    (ब) गांधी जी से
    (स) अम्बेडकर जी से
    (द) सरदार पटेल से
    उत्तर: (ब) गांधी जी से
  3. गद्य की विधा नहीं है –
    (अ) महाकाव्य
    (ब) कहानी
    (स) नाटक
    (द) एकांकी
    उत्तर: (अ) महाकाव्य (महाकाव्य काव्य की विधा है, गद्य की नहीं)
  4. उपन्यास सम्राट हैं –
    (अ) जयशंकर प्रसाद
    (ब) प्रेमचन्द
    (स) यशपाल
    (द) मन्नू भंडारी
    उत्तर: (ब) प्रेमचन्द
  5. ‘यदि गद्य कवियों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है’ यह कथन है –
    (अ) मन्नू भंडारी का
    (ब) प्रेमचन्द का
    (स) नंद दुलारे बाजपेयी का
    (द) आचार्य रामचंद्र शुक्ल का
    उत्तर: (द) आचार्य रामचंद्र शुक्ल का

रिक्त स्थान में सही शब्द चुनकर लिखिए –

  1. लय, ताल, छन्द से आदि से मुक्त रचना………………………………….. कहलाती है। (पद्य / गद्य)
    उत्तर: गद्य
  2. एक अंक वाली रचना………………………………….. कहलाती है। (एकांकी / कहानी)
    उत्तर: एकांकी
  3. …………………… में लेखक अपने ही जीवन-वृत्त को प्रस्तुत करता है (जीवनी/आत्मकथा)
    उत्तर: आत्मकथा
  4. प्रेमचन्द- …………………… हैं। (कवि / कथाकार)
    उत्तर: कथाकार
  5. जीवनी…………………………………..की लिखी जाती है। (स्वयं / महापुरुष)
    उत्तर: महापुरुष
  6. प्रतिमा बनाने वाले का नाम…………………………………..था। (श्यामलाल / मोतीलाल)
    उत्तर: मोतीलाल
  7. प्रतिमा पर सरकंडे का चश्मा………………………………….. ने लगाया था। (दुकानदार ने /बच्चों ने)
    उत्तर: बच्चों ने
  1. प्रतिमा का चश्मा …………………… बदल देता था। (पानवाला / कैप्टन)
    उत्तर: कैप्टन
  2. नेताजी की मूर्ति …………………… कपड़ों में थी। (खादी / फौजी)
    उत्तर: फौजी
  3. ‘दिल्ली चलो’ का नारा …………………… ने दिया था। (नेताजी / कैप्टन)
    उत्तर: नेताजी
  4. आषाढ़ की रिमझिम है। समूचा गाँव …………………… में उतर पड़ा। (नदियों/खेतों)
    उत्तर: खेतों
  5. बालगोबिन भगत की मौत उन्हीं के …………………… हुई। (अनुरूप / विपरीत)
    उत्तर: अनुरूप
  6. बालगोबिन भगत पाठ …………………… विधा का है। (रेखाचित्र / संस्मरण)
    उत्तर: रेखाचित्र
  7. बालगोबिन भगत की सब चीज …………………… की थी। (स्वयं/साहब)
    उत्तर: साहब
  8. कबीर के पद उनके कंठ से निकलकर …………………… हो उठते। (निर्जीव/सजीव)
    उत्तर: सजीव
  9. तेरी गठरी में लागा …………………… मुसाफिर जाग जरा। (जोर / चोर)
    उत्तर: चोर
  10. नवाब साहब ने खीरे की …………………… फाँकों को बाहर फेंक दिया। (सब/दो)
    उत्तर: सब
  11. नवाब साहब ने संगति के लिए …………………… नहीं दिखाया। (सम्मान/उत्साह)
    उत्तर: उत्साह
  12. हम …………………… से नवाब साहब की ओर देख रहे थे। (कनखियों/खिड़कियों)
    उत्तर: कनखियों
  13. मन्नू भंडारी का जन्म मध्यप्रदेश के …………………… गाँव में हुआ। (रामपुरा / भानपुरा)
    उत्तर: भानपुरा
  14. मन्नू भंडारी की बड़ी बहन का नाम …………………… था। (सुशीला/विनीता)
    उत्तर: सुशीला
  15. शीला अग्रवाल …………………… की प्राध्यापिका थीं। (हिन्दी/संस्कृत)
    उत्तर: हिन्दी
  16. पिताजी के चेहरे का संतोष धीरे-धीरे …………………… में बदलता जा रहा था। (गुस्से/गर्व)
    उत्तर: गर्व
  17. बिस्मिल्ला खाँ का जन्म बिहार के …………………… गाँव में हुआ था। (नौनांग राजगीर/डुमराव)
    उत्तर: डुमराव
  18. पंचगंगा घाट …………………… में स्थित है। (काशी/प्रयाग)
    उत्तर: काशी
  19. बिस्मिल्ला खाँ …………………… मंदिर में प्रतिदिन शहनाई बजाते थे। (विश्वनाथ/बालाजी)
    उत्तर: बालाजी

रिक्त स्थान में सही शब्द चुनकर लिखिए –

  1. काशी शास्त्रों में…………………………………..के नाम से प्रतिष्ठित है। (आनंदकानन/वाराणसी)
    उत्तर: आनंदकानन
  2. गुरुत्वाकर्षण का आविष्कार…………………………………..ने किया था। (राबर्ट हुक/न्यूटन)
    उत्तर: न्यूटन
  3. अपनी योग्यता प्रवृत्ति या प्रेरणा से अविष्कार करने वाला………………………………….. मानव होता है। (सभ्य/संस्कृत)
    उत्तर: संस्कृत
  4. मानव संस्कृति एक…………………………………..वस्तु है। (विभाज्य /अविभाज्य)
    उत्तर: अविभाज्य

सही जोड़ी बनाकर लिखिए –

i.

1. कैप्टन चश्मे वाला(iii) प्रतिमा पर चश्मा
2. बालगोबिन भगत(iv) कबीर पंथ
3. मोतीलाल(v) ड्राइंग मास्टर
4. बालम खीरा(vi) लखनऊ
5. मन्नू भंडारी(i) महाभोज
6. आनंद कानन(ii) काशी

ii.

1. लखनवी अंदाज़(iii) यशपाल
2. एक कहानी यह भी(iv) मन्नू भंडारी
3. नौबतखाने में इबादत(v) यतीन्द्र मिश्र
4. संस्कृति(vi) भदंत आनंद कौसल्यायन
5. बालगोबिन भगत(ii) रामवृक्ष बेनीपुरी
6. नेताजी का चश्मा(i) स्वयं प्रकाश

iii.

1. सूरज कब निकलेगा(iv) स्वयं प्रकाश
2. माटी की मूरतें(v) रामवृक्ष बेनीपुरी
3. दादा कामरेड(i) यशपाल
4. एक प्लेट सैलाब(vi) मन्नू भंडारी
5. यदा-कदा(iii) भदंत आनंद कौसल्यायन
6. रेल का टिकट(ii) यतीन्द्र मिश्र

एक वाक्य में उत्तर लिखिए –

  1. रिपोर्ताज किस भाषा का शब्द है?
    उत्तर: फ्रांसीसी भाषा का।
  2. हिन्दी गद्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा कौन-सी है?
    उत्तर: कहानी।
  3. आधुनिक हिन्दी गद्य का विकास किस युग से प्रारम्भ हुआ?
    उत्तर: भारतेन्दु युग से।
  4. जीवनी किसकी लिखी जाती है?
    उत्तर: महापुरुषों की।
  5. उपन्यास सम्राट किन्हें कहा जाता है?
    उत्तर: मुंशी प्रेमचन्द को।
  6. एकांकी में कितने अंक होते हैं?
    उत्तर: एक।
  7. प्रतिमा पर सरकंडे का चश्मा किसने लगाया था?
    उत्तर: बच्चों ने।
  8. कम्पनी के काम के सिलसिले में कस्बे से कौन गुजरता था?
    उत्तर: हालदार साहब।
  9. नेताजी की मूर्ति किससे बनी थी?
    उत्तर: संगमरमर से।
  10. ‘दिल्ली चलो’ नारा किसने दिया था?
    उत्तर: सुभाष चंद्र बोस ने।
  11. बालगोबिन भगत सिर पर क्या पहनते थे?
    उत्तर: कबीरपंथी टोपी।
  12. ‘कलम का जादूगर’ किसे कहा जाता है?
    उत्तर: रामवृक्ष बेनीपुरी को।
  13. बालगोबिन भगत कबीर को क्या मानते थे?
    उत्तर: साहब (गुरु)।
  14. भादों के महीने में कैसा मौसम होता है?
    उत्तर: उमस भरा और हल्की बारिश वाला (या अंधेरी रातों वाला)।
  15. कबीर के गीतों को कौन गाता था?
    उत्तर: बालगोबिन भगत।
  16. बालगोबिन भगत की प्रभातियाँ किस माह से शुरू होती थी?
    उत्तर: कार्तिक माह से।
  17. भारत विभाजन की त्रासदी का मार्मिक दस्तावेज़ कौन सा उपन्यास है?
    उत्तर: ‘झूठा सच’ (यशपाल)।
  18. नेशनल कॉलेज में यशपाल जी का किससे परिचय हुआ था?
    उत्तर: भगत सिंह से।
  19. खीरे किसके पास थे?
    उत्तर: नवाब साहब के पास।
  20. लखनऊ का कौन-सा खीरा प्रसिद्ध है?
    उत्तर: बालम खीरा।
  21. नवाब साहब ने खीरे की फाँकों का क्या किया?
    उत्तर: सूँघकर खिड़की से बाहर फेंक दिया।
  22. मन्नू भंडारी का विवाह किससे हुआ?
    उत्तर: राजेन्द्र यादव से।
  23. मन्नू भंडारी के पिता रसोई को क्या कहते थे?
    उत्तर: भटियारखाना।
  24. अजमेर आने से पहले मन्नू भंडारी के पिताजी कहाँ रहते थे?
    उत्तर: मंदसौर में।
  25. शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी?
    उत्तर: आग और सुई-धागे का आविष्कार।
  26. शास्त्रों में काशी किस नाम से प्रतिष्ठित है?
    उत्तर: आनंदकानन।
  27. बिस्मिल्ला खाँ को किस सर्वश्रेष्ठ सम्मान से सम्मानित किया गया?
    उत्तर: भारत रत्न से।
  28. काशी किसकी पाठशाला है?
    उत्तर: संस्कृति की।
  29. बिस्मिल्ला खाँ की माँ का नाम क्या था?
    उत्तर: मिठ्ठन बाई।
  30. हरनामदास किसके बचपन का नाम था?
    उत्तर: भदंत आनंद कौसल्यायन के।
  31. संस्कृति पाठ किस विधा का है?
    उत्तर: निबंध।
  32. सभ्यता किसका परिणाम है?
    उत्तर: संस्कृति का।
  33. आग के आविष्कार के पीछे क्या प्रेरणा रही होगी?
    उत्तर: पेट की आग (भूख) बुझाने की इच्छा।
  34. मानव संस्कृति किस प्रकार की वस्तु है?
    उत्तर: अविभाज्य वस्तु है।

सत्य / असत्य लिखिए-

  1. नाटक गद्य की विधा नहीं है।
    उत्तर: असत्य (नाटक गद्य की एक प्रमुख विधा है।)
  2. उपन्यास में कई कथाओं का समावेश होता है।
    उत्तर: असत्य (उपन्यास में मुख्यतः एक ही मुख्य कथा होती है, हालाँकि उसमें कई उप-कथाएँ या प्रसंग शामिल हो सकते हैं।)
  3. नाटक में एक अंक होता है।
    उत्तर: असत्य (नाटक में एक से अधिक अंक होते हैं, जबकि एकांकी में एक अंक होता है।)
  4. यदि गद्य कवियों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है।
    उत्तर: सत्य
  5. एक अंक वाली रचना कहानी कहलाती है।
    उत्तर: असत्य (एक अंक वाली रचना ‘एकांकी’ कहलाती है।)
  6. कैप्टन चश्मे वाला आजाद हिन्द फौज का सिपाही था।
    उत्तर: असत्य (वह सिपाही नहीं था, बल्कि एक साधारण देशभक्त व्यक्ति था जो नेताजी के प्रति श्रद्धा रखता था।)
  7. नेताजी की मूर्ति संगमरमर की थी।
    उत्तर: सत्य
  8. नेताजी की मूर्ति दो फुट ऊँची थी।
    उत्तर: असत्य (पाठ में मूर्ति की ऊँचाई दो फुट बताई गई है।)
    (नोट: पाठ में नेताजी की मूर्ति की ऊँचाई 2 फुट बताई गई है। अतः यह कथन ‘सत्य’ होना चाहिए। यदि आपके संदर्भ में यह गलत है, तो कृपया पाठ्यपुस्तक से पुनः जांच करें। सामान्यतः यह 2 फुट ही मानी जाती है।)
  9. मूर्ति नगरपालिका ने लगवाई थी।
    उत्तर: सत्य
  10. मूर्तिकार मोतीलाल अध्यापक थे।
    उत्तर: सत्य (वह ड्राइंग मास्टर थे।)
  11. बालगोबिन भगत कबीर को साहब मानते थे।
    उत्तर: सत्य
  12. भादों की अधरतियों में भगत गीत नहीं गाते थे।
    उत्तर: असत्य (वे भादों की अधरतियों में भी गीत गाते थे, उनकी प्रभातियाँ कार्तिक मास से शुरू होती थीं।)
  13. बालगोबिन भगत हर वर्ष गंगा नहाने जाते थे।
    उत्तर: सत्य
  14. बालगोबिन भगत के दो बेटे थे।
    उत्तर: असत्य (बालगोबिन भगत का केवल एक बेटा था।)
  15. बालगोबिन भगत साधु थे।
    उत्तर: असत्य (वे गृहस्थ थे, लेकिन उनका आचरण साधुओं जैसा था।)
  16. नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह दिखाया।
    उत्तर: असत्य (उन्होंने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया।)
  17. नवाब साहब खीरे खाकर सो गए।
    उत्तर: असत्य (उन्होंने खीरे सूँघकर खिड़की से बाहर फेंक दिए।)
  18. नवाब साहब के पास चार खीरे थे।
    उत्तर: असत्य (उनके पास केवल दो खीरे थे।)
  19. लखनऊ का बालमखीरा प्रसिद्ध है।
    उत्तर: सत्य
  20. लखनऊ को नवाबों का शहर कहा जाता है।
    उत्तर: सत्य
  21. मन्नू भंडारी 6 भाई-बहिनों में सबसे बड़ी हैं।
    उत्तर: असत्य (वह सबसे छोटी थीं।)
  22. शीला अग्रवाल संस्कृत की प्राध्यापिका थीं।
    उत्तर: असत्य (वह हिन्दी की प्राध्यापिका थीं।)
  1. मन्नू भंडारी की अपने पिता से वैचारिक टकराहट थी।
    उत्तर: सत्य
  2. मन्नू भंडारी मूलतः एक कहानीकार हैं।
    उत्तर: सत्य
  3. अमीरुद्दीन और बिस्मिल्ला खाँ एक ही व्यक्ति के नाम हैं।
    उत्तर: सत्य
  4. शहनाई स्वर-वाद्य यंत्र है।
    उत्तर: सत्य
  5. काशी संस्कृति की पाठशाला है।
    उत्तर: सत्य
  6. काशी में मरण भी मंगल माना गया है।
    उत्तर: सत्य
  7. बिस्मिल्ला खाँ की श्रद्धा काशी विश्वनाथ जी के प्रति अपार थी।
    उत्तर: सत्य
  8. सभ्यता संस्कृति का परिणाम है।
    उत्तर: सत्य
  9. मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है।
    उत्तर: सत्य
  10. एक संस्कृत व्यक्ति किसी नई चीज की खोज करता है।
    उत्तर: सत्य
  11. सभ्यता और संस्कृति एक ही वस्तु है।
    उत्तर: असत्य (सभ्यता और संस्कृति भिन्न अवधारणाएं हैं, संस्कृति मानव निर्मित गुणों का समूह है, जबकि सभ्यता उन गुणों का प्रयोग।)

लघु उत्तरीय प्रश्न (02 अंक)

1. आत्मकथा और जीवनी में दो अंतर लिखिए। उत्तर:

  1. लेखक: आत्मकथा स्वयं लेखक अपने जीवन के बारे में लिखता है, जबकि जीवनी कोई अन्य व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन के बारे में लिखता है।
  2. सत्यता/आत्मनिष्ठता: आत्मकथा में लेखक के अपने अनुभव और आत्मनिष्ठता (subjectivity) अधिक होती है, जबकि जीवनी में तथ्यों और वस्तुनिष्ठता (objectivity) पर अधिक जोर दिया जाता है।

2. कहानी और उपन्यास में दो अंतर लिखिए। उत्तर:

  1. विस्तार: कहानी का आकार छोटा होता है और इसमें किसी एक घटना या एक मुख्य भाव पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, जबकि उपन्यास का आकार बड़ा होता है और इसमें जीवन के अनेक पहलुओं और घटनाओं का विस्तृत चित्रण होता है।
  2. पात्र और कथानक: कहानी में पात्रों की संख्या सीमित होती है और कथानक सरल होता है, जबकि उपन्यास में पात्रों की संख्या अधिक होती है और कथानक विस्तृत तथा जटिल हो सकता है।

3. नाटक और एकांकी में दो अंतर लिखिए। उत्तर:

  1. अंक: नाटक में एक से अधिक अंक होते हैं, जबकि एकांकी में केवल एक अंक होता है।
  2. विस्तार और पात्र: नाटक का कथानक विस्तृत होता है और इसमें पात्रों की संख्या अधिक होती है, जबकि एकांकी का कथानक संक्षिप्त होता है और पात्रों की संख्या सीमित होती है।

4. रेखाचित्र और संस्मरण में दो अंतर लिखिए। उत्तर:

  1. विषय-वस्तु: रेखाचित्र में किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना का चित्रात्मक वर्णन किया जाता है, जैसे किसी व्यक्ति का शब्द-चित्र खींचना; जबकि संस्मरण में लेखक अपने स्मृति के आधार पर किसी व्यक्ति, घटना या स्थान का भावनात्मक वर्णन करता है।
  2. कल्पना/भाव: रेखाचित्र में चित्रकला के तत्वों का प्रभाव होता है, जबकि संस्मरण में लेखक की निजी भावनाओं और यादों का महत्व अधिक होता है।

5. गद्य किसे कहते हैं? उत्तर: गद्य भाषा का वह रूप है जो लय, ताल और छंद के बंधनों से मुक्त होता है। यह सामान्य बोलचाल की भाषा के अधिक निकट होता है और विचारों को सीधे-सीधे व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होता है। कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक आदि गद्य की प्रमुख विधाएँ हैं।

6. हिन्दी साहित्य में गद्य के विकास का काल विभाजन लिखिए। उत्तर: हिन्दी साहित्य में गद्य के विकास को मुख्य रूप से निम्न कालों में विभाजित किया जा सकता है:

  1. भारतेन्दु युग (सन् 1850-1900 ई.): आधुनिक गद्य का प्रारंभिक काल।
  2. द्विवेदी युग (सन् 1900-1918 ई.): गद्य का परिमार्जन और व्याकरणिक शुद्धता पर जोर।
  3. शुक्ल युग (सन् 1918-1936 ई.): गद्य का विकास और कहानियों, उपन्यासों का स्वर्ण युग।
  4. शुक्लोत्तर युग (सन् 1936 ई. के बाद): गद्य की विविध विधाओं का विकास।

7. निबंध किसे कहते हैं? उत्तर: निबंध गद्य साहित्य की वह विधा है जिसमें लेखक किसी विषय पर अपने विचारों और भावों को व्यवस्थित, सुसंगठित और कलात्मक ढंग से व्यक्त करता है। इसमें विषय की कोई सीमा नहीं होती और लेखक की व्यक्तिगत शैली का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।

8. हिन्दी साहित्य के दो निबंधकारों के नाम और उनकी रचनाएँ लिखिए। उत्तर:

  1. आचार्य रामचंद्र शुक्ल: ‘चिंतामणि’ (भाग 1, 2)
  2. हजारी प्रसाद द्विवेदी: ‘अशोक के फूल’, ‘कुटज’

9. हिन्दी में उपन्यास सम्राट किसे कहते हैं? उनके दो उपन्यासों के नाम लिखिए। उत्तर: हिन्दी में मुंशी प्रेमचन्द को उपन्यास सम्राट कहा जाता है। उनके दो उपन्यास:

  1. गोदान
  2. गबन

10. हिन्दी गद्य की प्रमुख विधाओं एवं गौण विधाओं के नाम लिखिए। उत्तर:

  • प्रमुख विधाएँ: कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, एकांकी, आलोचना।
  • गौण विधाएँ: रेखाचित्र, संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा, यात्रा वृत्तांत, रिपोर्ताज, डायरी, व्यंग्य।

11. हिन्दी के प्रमुख दो रेखाचित्र लेखकों एवं उनकी एक-एक रचना के नाम लिखिए। उत्तर:

  1. रामवृक्ष बेनीपुरी: ‘माटी की मूरतें’
  2. महादेवी वर्मा: ‘अतीत के चलचित्र’ / ‘स्मृति की रेखाएँ’

12. रिपोर्ताज किसे कहते हैं? उत्तर: रिपोर्ताज गद्य साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी घटना या तथ्य को कलात्मक और भावनात्मक शैली में प्रस्तुत किया जाता है, जैसे एक पत्रकार रिपोर्ट लिखता है, लेकिन उसमें साहित्यिकता और लेखक की निजी अनुभूति का पुट होता है। यह अक्सर किसी आँखों देखी घटना का सजीव और प्रभावपूर्ण वर्णन होता है।

13. रामवृक्ष बेनीपुरी की भाषा-शैली एवं दो रचनाओं के नाम लिखिए। उत्तर:

  • भाषा-शैली: इनकी भाषा-शैली अत्यंत ओजस्वी, प्रवाहमयी और चित्रात्मक है। इन्होंने खड़ी बोली के साथ-साथ लोक भाषाओं के शब्दों का भी प्रयोग किया है। इनकी शैली में सजीवता और उत्साह का संचार होता है। ये शब्दों के जादूगर कहे जाते हैं।
  • दो रचनाएँ:
    1. माटी की मूरतें (रेखाचित्र)
    2. गेहूँ और गुलाब (निबंध)

14. यशपाल की भाषा-शैली एवं दो रचनाओं के नाम लिखिए। उत्तर:

  • भाषा-शैली: यशपाल की भाषा-शैली यथार्थवादी, व्यंग्यात्मक और सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करने वाली है। इनकी भाषा सरल, सीधी और विषय के अनुरूप होती है, जिसमें उर्दू के शब्दों का भी सहज प्रयोग मिलता है।
  • दो रचनाएँ:
    1. झूठा सच (उपन्यास)
    2. परदा (कहानी संग्रह)

15. स्वयं प्रकाश की भाषा-शैली एवं दो रचनाओं के नाम लिखिए। उत्तर:

  • भाषा-शैली: स्वयं प्रकाश की भाषा-शैली बोलचाल की खड़ी बोली पर आधारित, सरल, सहज और आम पाठक को समझ आने वाली है। इनकी कहानियों में व्यंग्य और मानवीय संवेदनाओं का गहरा पुट होता है।
  • दो रचनाएँ:
    1. सूरज कब निकलेगा (कहानी संग्रह)
    2. आएँगे अच्छे दिन भी (कहानी संग्रह)

16. मन्नू भंडारी की भाषा-शैली एवं दो रचनाओं के नाम लिखिए। उत्तर:

  • भाषा-शैली: मन्नू भंडारी की भाषा-शैली सरल, सहज, व्यवहारिक और प्रवाहपूर्ण है। इनकी रचनाओं में नारी मन के द्वंद्व, सामाजिक रूढ़ियों पर व्यंग्य और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की प्रधानता होती है। संवादों का प्रयोग अत्यंत स्वाभाविक होता है।
  • दो रचनाएँ:
    1. आपका बंटी (उपन्यास)
    2. एक प्लेट सैलाब (कहानी संग्रह)

17. स्वयं प्रकाश, यतीन्द्र मिश्र एवं भदंत आनंद कौसल्यायन की दो-दो रचनाओं के नाम लिखिए। उत्तर:

  1. स्वयं प्रकाश:
    • सूरज कब निकलेगा
    • आएँगे अच्छे दिन भी
  2. यतीन्द्र मिश्र:
    • यदा-कदा
    • ड्योढ़ी पर आलाप
  3. भदंत आनंद कौसल्यायन:
    • संस्कृति
    • कहाँ क्या देखा

18. सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे? उत्तर: चश्मेवाला कोई सेनानी नहीं था, लेकिन वह नेताजी सुभाषचंद्र बोस के प्रति अगाध श्रद्धा रखता था। वह नेताजी की मूर्ति पर चश्मा लगाने का काम करता था क्योंकि वह बिना चश्मे की मूर्ति को अधूरा मानता था। उसकी इसी देशभक्ति, कर्तव्यपरायणता और नेताजी के प्रति सम्मान की भावना के कारण लोग उसे ‘कैप्टन’ कहते थे।

19. कैप्टन बार-बार मूर्ति पर चश्मा क्यों लगा देता था? उत्तर: कैप्टन बार-बार मूर्ति पर चश्मा लगा देता था क्योंकि नेताजी की मूर्ति पर असली चश्मा नहीं था। कैप्टन एक देशभक्त व्यक्ति था और वह नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति को अधूरा और कष्टप्रद महसूस करता था। उसे लगता था कि नेताजी को चश्मे के बिना नहीं होना चाहिए, इसलिए वह अपनी ओर से एक चश्मा लगा देता था।

20. मूर्ति पर लगा सरकंडे का चश्मा क्या उम्मीद जगाता है? उत्तर: मूर्ति पर लगा सरकंडे का चश्मा यह उम्मीद जगाता है कि बच्चों में भी देशभक्ति की भावना जीवित है। भले ही वे छोटे हैं और महंगे चश्मे नहीं लगा सकते, लेकिन उनकी सहज देशभक्ति और नेताजी के प्रति सम्मान की भावना अटूट है। यह बताता है कि आने वाली पीढ़ी में भी देशभक्ति का जज्बा कायम रहेगा और यह भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

21. पानवाले का एक रेखाचित्र प्रस्तुत कीजिए। उत्तर: पानवाला एक मोटा, खुशमिजाज और काला व्यक्ति था। उसकी तोंद निकली हुई थी। वह हमेशा अपने मुँह में पान भरे रखता था, जिसके कारण उसके दाँत लाल-काले हो गए थे। वह पान खाने और बेचने का शौकीन था। उसकी आदत थी कि जब भी वह किसी बात पर हंसता, तो उसकी तोंद हिलने लगती थी। वह व्यंग्यात्मक बातें करने में माहिर था, लेकिन उसके मन में देशभक्तों के प्रति सम्मान था, जैसा कि कैप्टन चश्मेवाले के प्रति उसके व्यवहार से पता चलता है।

22. भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेला क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी? उत्तर: भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी क्योंकि वह जानती थी कि भगत जी के बुढ़ापे में उनकी सेवा करने वाला कोई और नहीं था। भगत जी के बेटे की मृत्यु के बाद, वह अकेली ही उनकी देखभाल करने वाली थी। वह नहीं चाहती थी कि भगत जी को भोजन-पानी या अन्य किसी भी चीज़ के लिए किसी और पर निर्भर रहना पड़े या कष्ट उठाना पड़े। उसका उद्देश्य भगत जी की सेवा और उनके जीवन को सुचारू रखना था।


23. बालगोबिन भगत के व्यक्तित्व और उनकी वेशभूषा का अपने शब्दों में चित्र प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर: व्यक्तित्व: बालगोबिन भगत एक गृहस्थ साधु थे। वे कबीर के आदर्शों का पालन करते थे और सच्चे अर्थों में मानवीयता के प्रतीक थे। वे स्पष्टवादी, सत्यवादी और आत्मविश्वासी थे। वे किसी से न तो झगड़ा करते थे और न ही किसी की चीज छूते थे। उनकी नैतिकता और कबीर के प्रति गहरी आस्था उनके जीवन का आधार थी। वे आडंबरों से दूर रहते हुए भी सच्चे साधु की पहचान थे। वेशभूषा: उनकी वेशभूषा सामान्य थी। वे कमर में एक लंगोटी और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी पहनते थे। सर्दियों में वे एक काली कमली (कंबल) ओढ़ लेते थे। उनके माथे पर रामानंदी चंदन और गले में तुलसी की जड़ों की माला रहती थी। उनकी सादगी भरी वेशभूषा उनके साधु स्वभाव को दर्शाती थी।


24. भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ किस तरह व्यक्त कीं? लिखिए।

उत्तर: भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर दुख व्यक्त करने के बजाय, उसे परमात्मा से मिलने का अवसर माना और अपनी भावनाओं को असाधारण रूप से व्यक्त किया। उन्होंने बेटे के शव को फूल, तुलसीदल से सजाया और उस पर कुछ दीपक जला दिए। वे स्वयं कबीर के भक्ति पद गाते रहे, जिसमें आत्मा-परमात्मा के मिलन का भाव था। उन्होंने अपनी पुत्रवधू से भी रोने के बजाय उत्सव मनाने को कहा क्योंकि उनके अनुसार, एक विरहिणी आत्मा अपने प्रेमी (परमात्मा) से मिली थी। यह उनके गहन वैराग्य और मृत्यु को जीवन का एक स्वाभाविक अंग मानने की भावना को दर्शाता है।


25. मोह और प्रेम में अंतर होता है। बालगोबिन भगत के जीवन की किस घटना के आधार पर इस कथन का सच सिद्ध करेंगे?

उत्तर: हाँ, मोह और प्रेम में अंतर होता है। बालगोबिन भगत के जीवन की उनके बेटे की मृत्यु की घटना से यह सिद्ध होता है। स्पष्टीकरण:

  • मोह: मोह का अर्थ होता है किसी व्यक्ति या वस्तु से अत्यधिक लगाव, जिससे उसके दूर होने पर अत्यधिक दुख और कष्ट होता है। यदि भगत जी को अपने बेटे से केवल मोह होता, तो उसकी मृत्यु पर वे विलाप करते, रोते और दुखी होते।
  • प्रेम: सच्चा प्रेम निःस्वार्थ होता है और व्यक्ति के कल्याण की भावना रखता है। बालगोबिन भगत को अपने बेटे से प्रेम था, लेकिन वह मोह नहीं था। बेटे की मृत्यु पर उन्होंने उसे आत्मा का परमात्मा से मिलन मानकर उत्सव मनाया। उन्होंने अपनी पुत्रवधू को भी पुनर्विवाह के लिए भेज दिया, ताकि वह अपना नया जीवन शुरू कर सके, जबकि वे उसे अपने साथ रख सकते थे। यह दर्शाता है कि उनका प्रेम निस्वार्थ था और वे बेटे तथा पुत्रवधू के कल्याण को अपने व्यक्तिगत मोह से ऊपर रखते थे।

26. लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं? उत्तर: लेखक को नवाब साहब के इन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए उत्सुक नहीं हैं:

  1. दृष्टि फेर लेना: नवाब साहब ने लेखक के डिब्बे में आते ही अपनी नजरें फेर लीं और खिड़की से बाहर देखने लगे।
  2. बैठने का तरीका: वे ट्रेन में बैठे-बैठे ही अपनी पुरानी आरामदायक मुद्रा में वापस आ गए, जिससे लगा कि वे किसी बाहरी व्यक्ति की उपस्थिति से परेशान नहीं होना चाहते।
  3. बातचीत न करना: उन्होंने लेखक के साथ कोई बातचीत शुरू नहीं की, जिससे स्पष्ट हुआ कि वे अकेले रहना पसंद कर रहे थे।
  4. प्रतिक्रिया का अभाव: जब लेखक ने उनकी ओर देखा, तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, जिससे यह भाव स्पष्ट हो गया।

27. नवाब साहब ने खीरा सूँघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?

उत्तर: नवाब साहब ने खीरा सूँघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया क्योंकि:

  1. नवाबी शान: वे अपनी नवाबी और रईसी का प्रदर्शन करना चाहते थे। वे दिखाना चाहते थे कि वे इतने नवाब हैं कि खीरा जैसी साधारण चीज़ को केवल उसकी खुशबू लेकर ही संतुष्ट हो सकते हैं, उसे खाने की जरूरत नहीं है।
  2. अपनी नजाकत: वे अपनी नजाकत और परिष्कृत जीवनशैली को बनाए रखना चाहते थे। उन्हें लगा होगा कि लेखक के सामने खीरा खाना उनकी ‘नवाबी’ के खिलाफ होगा, खासकर जब उन्होंने उसे खाने के लिए आमंत्रित नहीं किया था।
  3. सामान्य लोगों से अलगाव: वे स्वयं को सामान्य लोगों से अलग दिखाना चाहते थे, जो खीरा जैसी साधारण चीज़ को खाकर पेट भरते हैं। वे लेखक को यह महसूस कराना चाहते थे कि उनकी आदतें आम लोगों से भिन्न हैं।

28. ‘लखनवी अंदाज़’ कहानी को आप और क्या नाम दे सकते हैं? लिखिए।

उत्तर: ‘लखनवी अंदाज़’ कहानी को कुछ अन्य नाम दिए जा सकते हैं:

  1. दिखावे की संस्कृति: क्योंकि कहानी नवाब साहब के दिखावे और आडंबरपूर्ण जीवनशैली को दर्शाती है।
  2. नवाबी शान का खोखलापन: यह दिखाता है कि नवाब साहब की शान-शौकत अंदर से कितनी खोखली हो चुकी थी।
  3. खीरे का व्यंग्य: कहानी में खीरा एक प्रतीक बन जाता है जो सामाजिक दिखावे और व्यर्थता पर व्यंग्य करता है।
  4. अजीब दास्तान: नवाब साहब का व्यवहार इतना अजीब था कि यह शीर्षक भी उपयुक्त लगता है।

29. इस आत्मकथा में लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भटियारखाना’ कहकर क्यों संबोधित किया है? उत्तर: लेखिका के पिता ने रसोई को ‘भटियारखाना’ कहकर संबोधित किया क्योंकि उनका मानना था कि रसोईघर केवल खाने-पीने और चूल्हे-चौके का स्थान है, जहाँ महिलाएं अपनी रचनात्मकता और प्रतिभा को सिर्फ खाना बनाने में खपा देती हैं। वे चाहते थे कि उनकी बेटियाँ रसोई से बाहर निकलकर देश और समाज के लिए कुछ बड़ा करें। उन्हें लगता था कि रसोई में रहकर महिलाओं की क्षमताएं कुंठित हो जाती हैं, जैसे भटियारखाने में ईंधन जलकर राख हो जाता है।

30. वह कौन सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर? उत्तर: वह घटना थी जब लेखिका के कॉलेज की प्रिंसिपल ने उनके पिता को बुलाकर शिकायत की और उन्हें कॉलेज से निकालने की धमकी दी। इसके बाद, लेखिका के पिता कॉलेज गए, लेकिन जब वह लौटे तो उन्होंने लेखिका की प्रशंसा की और कहा कि कॉलेज वालों को उनकी देशभक्ति और आंदोलनकारी स्वभाव पर गर्व है। यह बात लेखिका के लिए अविश्वसनीय थी क्योंकि उनके पिता हमेशा उनके आंदोलनों के खिलाफ रहते थे और उनकी प्रगतिशीलता को पसंद नहीं करते थे।

31. मन्नू भंडारी के पिता का स्वभाव शक्की क्यों हो गया था? उत्तर: मन्नू भंडारी के पिता का स्वभाव शक्की हो गया था क्योंकि उन्हें जीवन में लगातार अपनों से धोखा मिला था। उनके आर्थिक नुकसान हुए थे और उन्हें लगा था कि उनके अपने ही लोगों ने उनका फायदा उठाया है। इस वजह से वे बहुत संवेदनशील और क्रोधी हो गए थे और हर किसी पर शक करने लगे थे, यहाँ तक कि अपनी बेटी पर भी।

32. सन् 1947 में मन्नू भंडारी को कौन सी सर्वाधिक महत्वपूर्ण खुशी प्राप्त हुई? उत्तर: सन् 1947 में मन्नू भंडारी को सर्वाधिक महत्वपूर्ण खुशी भारत की स्वतंत्रता प्राप्त होने की मिली। यह उनके और पूरे देश के लिए एक ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण क्षण था।

33. शहनाई की दुनिया में डुमराँव को क्यों याद किया जाता है? उत्तर: शहनाई की दुनिया में डुमराँव को इसलिए याद किया जाता है क्योंकि यह बिस्मिल्ला खाँ का जन्म स्थान है। इसके साथ ही, शहनाई बजाने के लिए जिस रीड (नरकट/सरकंडा) का प्रयोग होता है, वह सोन नदी के किनारे पाई जाती है, जो डुमराँव के पास ही है। इस रीड के बिना शहनाई की मंगल ध्वनि संभव नहीं है।

34. बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक क्यों कहा गया है? उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ को शहनाई की मंगल ध्वनि का नायक इसलिए कहा गया है क्योंकि उन्होंने शहनाई को विवाह, उत्सव जैसे मंगल अवसरों पर बजने वाले वाद्य यंत्र से निकालकर उसे शास्त्रीय संगीत की ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उन्होंने अपनी साधना और भक्ति से शहनाई को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई, जिससे यह वाद्य यंत्र और इसकी ध्वनि सभी के लिए ‘मंगल’ (शुभ) का प्रतीक बन गई।

35. सुबिर बाड़ों से क्या अभिप्राय है? उत्तर: ‘सुबिर बाड़ों’ से अभिप्राय है सुषिर वाद्यों से। सुषिर वाद्य वे वाद्य यंत्र होते हैं जिन्हें फूँककर बजाया जाता है, जैसे शहनाई, बाँसुरी, शंख आदि।

36. शहनाई को ‘सुषिर-वाद्यों’ में ‘शाह’ की उपाधि क्यों दी गई है? उत्तर: शहनाई को ‘सुषिर-वाद्यों’ में ‘शाह’ (राजा) की उपाधि इसलिए दी गई है क्योंकि इसकी ध्वनि अन्य सभी फूँककर बजाए जाने वाले वाद्यों में सबसे अधिक मधुर, प्रभावशाली और पवित्र मानी जाती है। इसे भारतीय संस्कृति में विशेषकर मांगलिक अवसरों पर अत्यंत शुभ माना जाता है और यह अपनी मोहक ध्वनि के कारण सभी सुषिर वाद्यों में श्रेष्ठ है।

37. ‘फटा सुर न बख्शें! लुंगिया का क्या है आज फटी है तो कल सी जाएगी’ कथन का आशय स्पष्ट कीजिए। उत्तर: इस कथन का आशय यह है कि कलाकार के लिए उसकी कला की शुद्धता और उत्कृष्टता सबसे महत्वपूर्ण है, भौतिक सुख-सुविधाएँ या दिखावा नहीं। बिस्मिल्ला खाँ कहते थे कि उन्हें भले ही फटी हुई लुंगी में रहना पड़े, लेकिन उनका सुर नहीं फटना चाहिए, यानी उनकी शहनाई से निकलने वाली ध्वनि में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। उनका मानना था कि वस्त्र तो आज फटे हैं, कल सिल जाएंगे, लेकिन एक बार सुर फट गया (कला बिगड़ गई) तो उसे वापस पाना मुश्किल है। यह उनकी कला के प्रति अगाध निष्ठा और सादगी को दर्शाता है।

38. काशी में हो रहे कौन से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे? उत्तर: काशी में हो रहे कुछ परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे, जैसे:

  1. संगीत और परंपराओं का क्षरण: उन्हें लगता था कि काशी में संगीत और पुरानी परंपराओं का धीरे-धीरे लोप हो रहा है।
  2. भाईचारे में कमी: पहले की तरह हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे में कमी आ रही थी।
  3. खानपान की संस्कृति में बदलाव: पुराने लखनवी और बनारसी खानपान की जगह पश्चिमी फास्ट फूड का चलन बढ़ रहा था, जो उन्हें पसंद नहीं था।
  4. पुराने मोहल्लों का टूटना: काशी के पुराने और ऐतिहासिक मोहल्ले टूटकर नए भवनों में बदल रहे थे, जिससे पुरानी संस्कृति का माहौल नष्ट हो रहा था।

39. बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे। पाठ में आए प्रसंगों के आधार पर स्पष्ट कीजिए। उत्तर: बिस्मिल्ला खाँ वास्तव में मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे, यह पाठ में कई प्रसंगों से स्पष्ट होता है:

  1. मज़हब से ऊपर कला: वे एक सच्चे मुसलमान होने के बावजूद प्रतिदिन बालाजी मंदिर और विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे। वे गंगा किनारे बैठकर रियाज़ करते थे।
  2. मुहर्रम और काशी विश्वनाथ: मुहर्रम पर वे मातम मनाते थे और उसमें भाग लेते थे, वहीं दूसरी ओर काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे।
  3. गंगा और खुदा: वे गंगा नदी को पवित्र मानते थे और गंगा तथा खुदा दोनों को एक ही मानते थे।
  4. पारंपरिक पोशाक: वे हमेशा अपनी पारंपरिक लुंगी और शहनाई के साथ ही देखे जाते थे, जो बनारस की गंगा-जमुनी संस्कृति का हिस्सा था। ये सभी बातें दिखाती हैं कि वे धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर भारतीय कला और संस्कृति की समग्रता को जीते थे।

40. उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की काशी विश्वनाथ जी के प्रति अपार श्रद्धा थी, स्पष्ट कीजिए। उत्तर: उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की काशी विश्वनाथ जी के प्रति अपार श्रद्धा थी। वे रोज़ाना बालाजी मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे। वे काशी छोड़कर कहीं और नहीं जाना चाहते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि काशी विश्वनाथ और गंगा मैया का आशीर्वाद उनके साथ है। वे काशी को ‘आनंद कानन’ कहते थे और विश्वनाथ मंदिर से उनकी गहरी आत्मिक जुड़ाव था। उनकी शहनाई की हर धुन विश्वनाथ जी को समर्पित होती थी।

41. शहनाई बजाने के लिए किसका प्रयोग होता है? वह कैसा होता है? उत्तर: शहनाई बजाने के लिए रीड (नरकट/सरकंडा) का प्रयोग होता है। यह एक प्रकार की घास होती है जो सोन नदी के किनारे पाई जाती है। यह खोखली और पतली होती है, जिसे शहनाई के मुँह में लगाकर फूँका जाता है, जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है। इसकी गुणवत्ता शहनाई की ध्वनि पर सीधा प्रभाव डालती है।

42. लेखक की दृष्टि में सभ्यता और संस्कृति की सही समझ अब तक क्यों नहीं बन पाई है? उत्तर: लेखक की दृष्टि में सभ्यता और संस्कृति की सही समझ अब तक नहीं बन पाई है क्योंकि लोग प्रायः इन दोनों शब्दों को एक ही मान लेते हैं या उनके बीच के सूक्ष्म अंतर को समझ नहीं पाते। वे बाहरी चमक-दमक या भौतिक उन्नति को ही सभ्यता मान लेते हैं और आंतरिक मानवीय मूल्यों, प्रेरणाओं और त्याग को संस्कृति से अलग कर देते हैं। लेखक का मानना है कि सभ्यता वह है जो हमें प्राप्त है (जैसे आग का ज्ञान), जबकि संस्कृति वह मूल प्रेरणा है जिसने हमें उसे प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया (जैसे पेट की आग बुझाने की इच्छा)।

43. वास्तविक अर्थ में संस्कृत व्यक्ति किसे कहा जा सकता है? उत्तर: वास्तविक अर्थ में संस्कृत व्यक्ति उसे कहा जा सकता है जो अपनी योग्यता, प्रवृत्ति या प्रेरणा से किसी नई चीज़ की खोज करता है या किसी नए विचार को जन्म देता है, जो मानव कल्याण के लिए उपयोगी हो। ऐसा व्यक्ति वह नहीं होता जो केवल दूसरों द्वारा खोजी गई चीज़ों का उपभोग करता है, बल्कि वह होता है जो अपनी बुद्धि और चिंतन से कुछ नया सृजित करता है, जैसे आग का आविष्कार करने वाला व्यक्ति।

44. संस्कृत मानव और सभ्य मानव में क्या अंतर होता है? लिखिए। उत्तर: संस्कृत मानव: वह व्यक्ति है जिसने अपनी बुद्धि और प्रेरणा से किसी नई चीज़ या विचार का आविष्कार किया हो। यह वह मूल आविष्कारक या प्रेरक होता है जो मानव कल्याण के लिए कुछ नया खोजता है (जैसे जिसने आग का आविष्कार किया या सुई-धागे की खोज की)। संस्कृत मानव त्याग और निस्वार्थ भावना से प्रेरित होता है। सभ्य मानव: वह व्यक्ति है जो संस्कृत मानव द्वारा किए गए आविष्कारों या विचारों का उपभोग करता है और उनका उपयोग अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए करता है। सभ्यता उन सभी उपकरणों और तरीकों का समूह है जिनका उपयोग मानव अपने जीवन को आसान बनाने के लिए करता है। सभ्य मानव संस्कृत मानव द्वारा बनाई गई चीज़ों का उपभोक्ता होता है।

गद्यांश की ससंदर्भ, प्रसंग सहित व्याख्या लिखिए- (03 अंक)

(1) बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-जिंदगी सब कुछ होम देने वालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढ़ती है। दुःखी हो गए।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘नेताजी का चश्मा’ से लिया गया है। इसके लेखक स्वयं प्रकाश जी हैं।
  • प्रसंग: यह प्रद्यांश उस समय का है जब हालदार साहब कैप्टन चश्मे वाले की मृत्यु के बारे में सुनते हैं और समाज की संवेदनहीनता तथा स्वार्थपरता पर दुखी होते हैं।
  • व्याख्या: हालदार साहब बार-बार यह सोचकर चिंतित और दुखी हो जाते हैं कि उस कौम (जाति या समाज) का भविष्य क्या होगा, जो अपने देश के लिए अपना घर, परिवार, युवावस्था, जीवन, सब कुछ न्योछावर करने वाले देशभक्तों (जैसे कैप्टन चश्मे वाला) का सम्मान नहीं करती, बल्कि उनका मज़ाक उड़ाती है। ऐसे लोग देश के लिए बलिदान देने वालों पर हंसते हैं और स्वयं केवल अपने स्वार्थ के लिए (पैसे या लाभ के लिए) बिकने के अवसर ढूंढते रहते हैं। हालदार साहब को यह देखकर बहुत दुख होता है कि समाज में देशभक्ति का सम्मान कम हो रहा है और लोग स्वार्थी होते जा रहे हैं।

(2) वह गृहस्थ थे, लेकिन उनकी सब चीज ‘साहब’ की थी। जो कुछ खेत में पैदा होता, सिर पर लादकर पहले उसे साहब के दरबार में ले जाते जो उनके घर से चार कोस दूर था – एक कबीरपंथी मठ से मतलब! वह दरबार में भेंट रूप रख दिया जाकर प्रसाद रूप में जो उन्हें मिलता, उसे घर लाते और उसी से गुजरा चलाते।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘बालगोबिन भगत’ से लिया गया है। इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी जी हैं।
  • प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने बालगोबिन भगत के गृहस्थ जीवन में भी उनकी साधुता और कबीर के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा का वर्णन किया है।
  • व्याख्या: लेखक बालगोबिन भगत के जीवन-दर्शन को समझाते हुए कहते हैं कि यद्यपि बालगोबिन भगत एक गृहस्थ व्यक्ति थे, उनका अपना घर-परिवार, खेत सब कुछ था, लेकिन वे किसी भी चीज को अपना नहीं मानते थे। उनका मानना था कि उनकी हर वस्तु उनके ‘साहब’ (कबीर) की है। वे अपने खेतों में जो कुछ भी पैदा करते थे, उसे सबसे पहले सिर पर लादकर उस कबीरपंथी मठ में ले जाते थे जो उनके घर से लगभग चार मील दूर था। वहाँ वे उसे भेंट के रूप में अर्पित कर देते थे। मठ से उन्हें प्रसाद के रूप में जो भी थोड़ा-बहुत अनाज या वस्तु मिलती थी, उसी को वे घर लाते थे और उसी से अपना तथा अपने परिवार का गुजारा करते थे। यह उनकी निःस्वार्थ भावना, कबीर के प्रति अगाध श्रद्धा और सांसारिक मोह से मुक्ति को दर्शाता है।

(3) भादों की वह अंधेरी अधरतिया। अभी थोड़ी ही देर पहले मूसलाधार वर्षा खत्म हुई है। बादलों की गरज, बिजली की तड़प में आपने कुछ नहीं सुना होगा, किन्तु अब झिल्ली की झंकार या दादुरों की टर्र-टर्र बालगोबिन भगत के संगीत को अपने कोलाहल में डुबो नहीं सकती।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘बालगोबिन भगत’ से लिया गया है। इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी जी हैं।
  • प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने बालगोबिन भगत के संगीत साधना की विशेषता का वर्णन किया है, विशेषकर भादों (भाद्रपद) महीने की अंधेरी रात में।
  • व्याख्या: लेखक भादों महीने की आधी रात का वर्णन करते हैं, जब घनघोर बारिश अभी-अभी रुकी है। ऐसे समय में आसमान में बादल गरज रहे होते हैं और बिजली चमक रही होती है। इन तेज आवाजों के बीच शायद ही कोई कुछ और सुन पाए, लेकिन बालगोबिन भगत के संगीत की शक्ति इतनी अद्भुत है कि झींगुरों की तेज़ आवाज़ (झिल्ली की झंकार) या मेंढकों की टर्र-टर्र (दादुरों की टर्र-टर्र) भी उनके संगीत को अपने शोर में छिपा नहीं सकती। भगत का संगीत इन सभी प्राकृतिक कोलाहल पर हावी होकर स्पष्ट रूप से सुनाई देता है, जो उनकी अटूट भक्ति, संगीत के प्रति एकाग्रता और प्रकृति की बाधाओं को पार करने की उनकी क्षमता को दर्शाता है।

(4) यह पितु गाथा मैं इसलिए नहीं कह रही कि मुझे उनका गौरव-गान करना है, बल्कि मैं तो यह देखना चाहती हूँ कि उनके व्यक्तित्व की कौन सी खूबी और खामियों मेरे व्यक्तित्व के ताने-बाने में गुंथी हुई हैं या कि अनजाने-अनचाहे ही उनके व्यवहार ने मेरे भीतर किन ग्रंथियों को जन्म दे दिया।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘एक कहानी यह भी’ से लिया गया है। इसकी लेखिका मन्नू भंडारी हैं।
  • प्रसंग: लेखिका यहाँ अपने पिता के व्यक्तित्व का विश्लेषण कर रही हैं और बता रही हैं कि वे अपनी आत्मकथा में अपने पिता का वर्णन किस उद्देश्य से कर रही हैं।
  • व्याख्या: मन्नू भंडारी स्पष्ट करती हैं कि वे अपने पिता के बारे में केवल उनकी प्रशंसा करने के लिए नहीं लिख रही हैं। उनका मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि उनके पिता के व्यक्तित्व की कौन सी अच्छी बातें (खूबियां) और कौन सी बुरी बातें (खामियां) उनके (लेखिका के) स्वयं के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन गई हैं। वे यह भी जानना चाहती हैं कि उनके पिता के व्यवहार ने, भले ही अनजाने में या अनचाहे तरीके से, उनके भीतर कौन सी मानसिक गांठें (ग्रंथियां) या उलझनें पैदा कर दी हैं। यह लेखिका की आत्मविश्लेषण की प्रवृत्ति और अपने अतीत तथा अपने व्यक्तित्व पर पिता के प्रभाव को समझने की गहरी इच्छा को दर्शाता है।

(5) केवल बाहरी भिन्नता के आधार पर अपनी परम्परा और पीढ़ियों को नकारने वालों को सचमुच इस बात का बिल्कुल एहसास नहीं होता कि उनका आश्रय अतीत किस कदर उनके भीतर जड़ जमाए बैठा रहता है। समय का प्रवाह भले ही हमें दूसरी दिशाओं में बहाकर ले जाए स्थितियों का दबाव भले ही हमारा रूप बदल दे, हमें पूरी तरह से उससे मुक्त तो नहीं ही कर सकता।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘संस्कृति’ से लिया गया है। इसके लेखक भदंत आनंद कौसल्यायन हैं।
  • प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक उन लोगों पर टिप्पणी कर रहे हैं जो आधुनिकता के नाम पर अपनी पुरानी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को भूल जाते हैं या नकार देते हैं।
  • व्याख्या: लेखक कहते हैं कि जो लोग केवल ऊपरी तौर पर दिखने वाले बदलावों के आधार पर अपनी प्राचीन परंपराओं और पीढ़ियों की सीख को अस्वीकार करते हैं, उन्हें यह सचमुच महसूस ही नहीं होता कि उनका अतीत (उनकी परंपराएं और संस्कृति) कितनी गहराई से उनके भीतर समाया हुआ है। भले ही समय का बहाव हमें नई दिशाओं में ले जाए, और परिस्थितियों का दबाव हमारे जीवन-शैली को बदल दे, फिर भी हम अपनी मूल संस्कृति और अतीत से पूरी तरह से अलग नहीं हो सकते। हमारा अतीत, हमारी जड़ें, हमारे भीतर हमेशा विद्यमान रहती हैं और हमारा मार्गदर्शन करती हैं। यह गद्यांश सांस्कृतिक विरासत के महत्व और उसके स्थायी प्रभाव पर बल देता है।

(6) काशी आज भी संगीत के स्वर पर जगती और उसी की थापों पर सोती है। काशी में मरण भी मंगल माना जाता है। काशी आनंदकानन है। सबसे बड़ी बात यह है कि काशी के पास उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ जैसा लय और सुर की तमीज सिखाने वाला नायाब हीरा रहा है जो हमेशा दो कौमों को एक होने व आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रेरणा देता रहा है।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘नौबतखाने में इबादत’ से लिया गया है। इसके लेखक यतीन्द्र मिश्र जी हैं।
  • प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने काशी शहर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता का वर्णन किया है, और विशेष रूप से बिस्मिल्ला खाँ के काशी के प्रति योगदान को बताया है।
  • व्याख्या: लेखक कहते हैं कि काशी (बनारस) एक ऐसा शहर है जो पूरी तरह से संगीत और कला में डूबा हुआ है। यहाँ के लोग सुबह संगीत की धुन पर जागते हैं और रात को उसी की ताल पर सोते हैं, जिसका अर्थ है कि संगीत यहाँ के जीवन का अभिन्न अंग है। काशी की एक और विशेषता यह है कि यहाँ मृत्यु को भी शुभ (मंगल) माना जाता है, क्योंकि यह मोक्ष का स्थान है। इसलिए काशी को ‘आनंदकानन’ (आनंद का जंगल) भी कहते हैं। इन सबसे बढ़कर, काशी को यह गौरव प्राप्त है कि उसके पास उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ जैसा अद्वितीय कलाकार रहा, जिन्होंने न केवल शहनाई के माध्यम से लय और सुर का ज्ञान सिखाया, बल्कि अपने जीवन और कला से हमेशा हिंदू और मुस्लिम (दो कौमों) को एक साथ रहने और भाईचारे का संदेश दिया। वे काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति के सच्चे प्रतीक थे।

(7) एक संस्कृत व्यक्ति किसी नई चीज की खोज करता है, किन्तु उसकी संतान को वह अपने पूर्वज से अनायास ही प्राप्त हो जाती है। जिस व्यक्ति की बुद्धि ने अथवा उसके विवेक ने किसी भी नए तथ्य का दर्शन किया, वह व्यक्ति ही वास्तविक संस्कृत व्यक्ति है और उसकी संतान जिसने अपने पूर्वज से वह वस्तु अनायास ही प्राप्त कर ली है, वह अपने पूर्वज की भाँति सभ्य भले ही बन जाए, संस्कृत नहीं कहला सकता।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘संस्कृति’ से लिया गया है। इसके लेखक भदंत आनंद कौसल्यायन हैं।
  • प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने ‘संस्कृत व्यक्ति’ और ‘सभ्य व्यक्ति’ के बीच के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट किया है।
  • व्याख्या: लेखक समझाते हैं कि ‘संस्कृत व्यक्ति’ वह होता है जो अपनी मौलिक बुद्धि, योग्यता और प्रेरणा से किसी नई चीज़ या विचार का आविष्कार करता है। उदाहरण के लिए, जिसने पहली बार आग जलाई या सुई-धागे की खोज की। लेखक के अनुसार, यही व्यक्ति वास्तविक अर्थों में ‘संस्कृत’ होता है। इसके विपरीत, उसी आविष्कारक की संतान या बाद की पीढ़ी, जिसे वह नई चीज़ (जैसे आग या सुई-धागा) अपने पूर्वज से बिना किसी विशेष प्रयास के आसानी से मिल जाती है, वह व्यक्ति ‘सभ्य’ तो हो सकता है क्योंकि वह उस आविष्कार का उपभोग कर रहा है और अपने जीवन को बेहतर बना रहा है, लेकिन वह अपने पूर्वज की तरह ‘संस्कृत’ नहीं कहला सकता। ‘संस्कृत’ होने के लिए मूल रूप से कुछ नया सृजित करना आवश्यक है, केवल उपभोग करना नहीं।

(8) मूर्ति संगमरमर की थी। टोपी की नोक से कोट के दूसरे बटन तक कोई दो फुट ऊँची। जिसे कहते हैं बस्ट। और सुंदर थी। नेता जी सुंदर लग रहे थे। कुछ-कुछ फुट मासूम और कमसिन। फौजी वर्दी में। मूर्ति को देखते ही ‘दिल्ली चलो ‘ और ‘तुम मुझे खून दो …’ वगैरह याद आने लगते थे। इस दृष्टि से यह सफल और सराहनीय प्रयास था।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘नेताजी का चश्मा’ से लिया गया है। इसके लेखक स्वयं प्रकाश जी हैं।
  • प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मूर्ति का विस्तृत वर्णन किया है जो कस्बे के चौराहे पर लगाई गई थी।
  • व्याख्या: लेखक बताते हैं कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मूर्ति संगमरमर (मार्बल) की बनी हुई थी। यह मूर्ति टोपी की नोक से लेकर कोट के दूसरे बटन तक, लगभग दो फुट ऊँची थी, जिसे ‘बस्ट’ (सिर और धड़ का ऊपरी हिस्सा) कहा जाता है। मूर्ति बहुत सुंदर बनाई गई थी, और उसमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस अत्यंत आकर्षक लग रहे थे। मूर्ति कुछ हद तक मासूम (कमसिन) और युवा (फुट) दिखाई देती थी। नेताजी फौजी वर्दी में थे, जिससे उनकी वीरता और देश के प्रति समर्पण का भाव स्पष्ट हो रहा था। इस मूर्ति को देखते ही लोगों को नेताजी के प्रसिद्ध नारे जैसे ‘दिल्ली चलो’ और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’ याद आने लगते थे। लेखक के अनुसार, नेताजी की याद दिलाने और देशभक्ति का भाव जगाने की दृष्टि से यह मूर्ति बनाने का प्रयास पूरी तरह से सफल और सराहनीय था।

(9) जीप कस्बा छोड़कर आगे बढ़ गई तब भी हालदार साहब इस मूर्ति के बारे में ही सोचते रहे और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कुल मिलाकर कस्बे के नागरिकों का यह प्रयास सराहनीय ही कहा जाना चाहिए। महत्त्व मूर्ति के रंग-रूप या कद का नहीं, उस भावना का है वरना तो देश-भक्ति भी आजकल मजाक की चीज होती जा रही है।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘नेताजी का चश्मा’ से लिया गया है। इसके लेखक स्वयं प्रकाश जी हैं।
  • प्रसंग: हालदार साहब जब कस्बे से वापस जा रहे होते हैं, तब वे कैप्टन चश्मे वाले द्वारा नेताजी की मूर्ति पर चश्मा लगाए जाने की घटना और कैप्टन की देशभक्ति पर विचार करते हैं।
  • व्याख्या: हालदार साहब जब कस्बे को छोड़कर अपनी जीप में आगे बढ़ जाते हैं, तब भी वे नेताजी की मूर्ति और विशेषकर उस पर लगने वाले चश्मे के बारे में सोचते रहते हैं। अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कस्बे के नागरिकों और विशेषकर कैप्टन चश्मे वाले का यह प्रयास, भले ही छोटा हो, वास्तव में बहुत सराहनीय है। हालदार साहब का मानना है कि मूर्ति का रंग, रूप या उसकी ऊँचाई महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उस मूर्ति के प्रति जो देशभक्ति की भावना दर्शाई जा रही है, वह सबसे ज्यादा मायने रखती है। वे चिंता व्यक्त करते हैं कि आजकल समाज में देशभक्ति को भी मजाक का विषय बनाया जा रहा है, ऐसे में यह छोटा सा प्रयास भी बहुत बड़ा है जो लोगों में देशभक्ति की भावना को जीवित रखता है।

(10) खेतीबारी करते, परिवार रखते भी, बालगोबिन भगत साधु थे- साधु की सब परिभाषाओं में खरे उतरने वाले। कबीर को ‘साहब ‘ मानते थे, उन्हीं के गीतों को गाते, उन्हीं के आदेशों पर चलते। कभी झूठ नहीं बोलते, खरा व्यवहार रखते। किसी से भी दो टूक बात करने में संकोच नहीं करते, न किसी से खामख्वाह झगड़ा मोल लेते। किसी की चीज नहीं छूते, न बिना पूछे व्यवहार में लाते।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘बालगोबिन भगत’ से लिया गया है। इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी जी हैं।
  • प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने बालगोबिन भगत के गृहस्थ जीवन में भी उनकी साधुता और उनके सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन किया है।
  • व्याख्या: लेखक बालगोबिन भगत के अद्वितीय व्यक्तित्व का चित्रण करते हुए कहते हैं कि वे खेती का काम करते थे और उनका अपना परिवार भी था, फिर भी वे सच्चे साधु थे। वे साधुता की हर कसौटी पर खरे उतरते थे। वे संत कबीर को अपना ‘साहब’ (गुरु) मानते थे और जीवन भर उन्हीं के लिखे गीतों को गाते थे, उन्हीं के बताए हुए नियमों और आदर्शों का पालन करते थे। वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और उनका व्यवहार हमेशा स्पष्ट और खरा होता था। किसी से भी सीधे और स्पष्ट बात कहने में वे बिल्कुल भी संकोच नहीं करते थे, और न ही बेवजह किसी से झगड़ा करते थे। उनकी एक और बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी भी दूसरे व्यक्ति की वस्तु को बिना पूछे न तो छूते थे और न ही अपने उपयोग में लाते थे। यह उनकी ईमानदारी, निष्ठा और आत्म-नियंत्रण को दर्शाता है, जो उन्हें एक सच्चे साधु के रूप में स्थापित करता है।

(11) बालगोबिन भगत का संगीत साधना का चरम उत्कर्ष उस दिन देखा गया दिन उनका बेटा मरा। इकलौता बेटा था वह। कुछ सुस्त और बोदा-सा था, किन्तु कारण बालगोबिन भगत उसे और भी मानते। उनकी समझ में ऐसे आदमियों पर दा नजर रखनी चाहिए या प्यार करना चाहिए क्योंकि ये निगरानी और मोहब्बत का हकदार होते हैं।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘बालगोबिन भगत’ से लिया गया है। इसके लेखक रामवृक्ष बेनीपुरी जी हैं।
  • प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने बालगोबिन भगत की संगीत साधना और उनके अद्भुत वैराग्य को उनके इकलौते बेटे की मृत्यु के संदर्भ में व्यक्त किया है।
  • व्याख्या: लेखक कहते हैं कि बालगोबिन भगत की संगीत साधना का सबसे ऊंचा और अद्भुत रूप उस दिन देखने को मिला, जिस दिन उनके इकलौते बेटे की मृत्यु हुई थी। वह बेटा स्वभाव से कुछ सुस्त और शारीरिक रूप से कमजोर (बोदा-सा) था, लेकिन इसी कारण से बालगोबिन भगत उसे अन्य बच्चों से भी अधिक मानते थे। उनकी यह धारणा थी कि जो लोग थोड़े कमजोर या मंदबुद्धि होते हैं, उन पर अधिक ध्यान रखना चाहिए और उन्हें ज्यादा प्यार देना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग ही विशेष देखभाल और स्नेह के हकदार होते हैं। यह उनके पुत्र के प्रति गहरे प्रेम को दर्शाता है, जो मोह से बढ़कर था, और उनकी मृत्यु को स्वीकार करने की अलौकिक क्षमता को भी उजागर करता है।

(12) ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत। नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिल्कुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफायत के विचार से सेकेण्ड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर का कोई सफेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफर करता देखे।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘लखनवी अंदाज़’ से लिया गया है। इसके लेखक यशपाल जी हैं।
  • प्रसंग: लेखक ट्रेन के डिब्बे में नवाब साहब को देखकर उनके व्यवहार का विश्लेषण कर रहे हैं और उनके अकेले यात्रा करने के कारणों का अनुमान लगा रहे हैं।
  • व्याख्या: लेखक बताते हैं कि खाली बैठे होने के कारण उनकी पुरानी आदत थी कि वे कल्पनाओं में खो जाते थे। वे नवाब साहब के अजीबोगरीब व्यवहार, उनकी असुविधा और संकोच का कारण अनुमान लगाने लगते हैं। लेखक सोचते हैं कि शायद नवाब साहब ने यह सोचकर सेकंड क्लास का टिकट खरीदा होगा कि डिब्बा खाली मिलेगा और वे अकेले यात्रा कर पाएंगे। लेकिन अब उन्हें यह गवारा नहीं हो रहा है कि शहर का कोई भी संभ्रांत व्यक्ति (सफेदपोश) उन्हें मध्यम वर्ग के दर्जे (सेकंड क्लास) में यात्रा करते हुए देखे। यह नवाब साहब के दिखावे की प्रवृत्ति, उनकी झूठी शान और सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने की चिंता को दर्शाता है, जिसके कारण वे लेखक की उपस्थिति से असहज महसूस कर रहे थे।

(13) नवाब साहब ने सतृष्ण आँखों से नमक-मिर्च के संयोग से चमकती खीरे की फाँकों की ओर देखा। खिड़की के बाहर देखकर दीर्घ निःश्वास लिया। खीरे की एक फाँक उठाकर होठों तक ले गए। फाँक को सूँघा। स्वाद के आनंद में पलकें मुँद गई। मुँह में भर आए पानी का घूँट गले से उतर गया। तब नवाब साहब ने फाँक को खिड़की से बाहर छोड़ दिया। नवाब साहब खीरे की फाँकों को नाक के पास ले जाकर, वासना से रसास्वादन कर खिड़की के बाहर फेंकते गए।

  • संदर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज भाग-2’ में संकलित पाठ ‘लखनवी अंदाज़’ से लिया गया है। इसके लेखक यशपाल जी हैं।
  • प्रसंग: इस गद्यांश में लेखक ने नवाब साहब द्वारा खीरा खाने की अपनी इच्छा को दबाने और केवल दिखावा करने के लिए उसे सूंघकर फेंक देने की क्रिया का बड़ा ही मार्मिक और व्यंगात्मक वर्णन किया है।
  • व्याख्या: लेखक बताते हैं कि नवाब साहब की आँखों में खीरा खाने की तीव्र इच्छा थी (सतृष्ण आँखों से)। उन्होंने नमक और मिर्च से सजी, चमकदार खीरे की फाँकों को देखा। फिर उन्होंने खिड़की से बाहर देखकर एक लंबी साँस ली, जैसे वे अपनी इच्छा पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हों। इसके बाद उन्होंने खीरे की एक फाँक उठाई और उसे अपने होठों तक ले गए। उन्होंने फाँक को सूँघा, जिससे स्वाद के आनंद में उनकी आँखें बंद हो गईं और मुँह में आया पानी का घूँट उनके गले से नीचे उतर गया। इस सारी प्रक्रिया के बाद, उन्होंने उस फाँक को खिड़की के बाहर फेंक दिया। नवाब साहब ने इसी तरह खीरे की सभी फाँकों को अपनी नाक के पास ले जाकर, केवल उसकी सुगंध से ही स्वाद का आनंद लिया (वासना से रसास्वादन) और एक-एक करके खिड़की से बाहर फेंकते गए। यह दृश्य नवाब साहब के दिखावे, उनकी खोखली शान, और उस समाज पर एक तीखा व्यंग्य है जो केवल बाहरी आडंबरों में जीता है, भले ही इसके लिए अपनी स्वाभाविक इच्छाओं को दबाना पड़े।

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