Crop Production Rhizobium Azotobacter BGA PSB : कक्षा 12 कृषि विज्ञान (Class 12 Agriculture) के छात्रों के लिए प्रमुख जैविक उर्वरकों—एजोला (Azolla), एजोटोबैक्टर (Azotobacter), राइजोबियम (Rhizobium), नील-हरित शैवाल (BGA), और पी.एस.बी. (PSB)—की प्रारंभिक जानकारी पर एक अत्यंत विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख। इस लेख में इन जीवाणु खादों की कार्यप्रणाली, फसल विशिष्टता, उपयोग की विधियां और कृषि में महत्व का गहन अध्ययन किया गया है, जो बोर्ड परीक्षाओं के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है।
Crop Production Rhizobium Azotobacter BGA PSB
1. प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय कृषि (Indian Agriculture) में फसल उत्पादन बढ़ाने और मिट्टी की उर्वरता (Soil Fertility) को बनाए रखने के लिए जैविक उर्वरकों (Biofertilizers) का उपयोग आज समय की सबसे बड़ी मांग है। जैसा कि हमने पिछले अध्याय में पढ़ा, जैविक उर्वरक जीवित सूक्ष्मजीवों (Living Microorganisms) के संवर्धन (Culture) होते हैं, जो पर्यावरण से पोषक तत्व खींचकर पौधों को उपलब्ध कराते हैं।
कक्षा 12 कृषि विज्ञान (Class 12 Agriculture) के पाठ्यक्रम में मुख्य रूप से पांच जैविक उर्वरकों का विस्तार से अध्ययन किया जाता है। ये हैं— राइजोबियम कल्चर, एजोटोबैक्टर कल्चर, नील-हरित शैवाल (BGA), एजोला, और पी.एस.बी. (PSB)। ये पांचों जीवाणु खादें भारतीय टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) और समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management – INM) के प्रमुख स्तंभ हैं। इस विस्तृत लेख में हम इन सभी प्रमुख जैविक उर्वरकों की वैज्ञानिक कार्यप्रणाली, उनकी फसल विशिष्टता, उपयोग की विधियां, और उनके महत्व का गहन और विश्लेषणात्मक अध्ययन करेंगे।
2. राइजोबियम कल्चर (Rhizobium Culture)
राइजोबियम (Rhizobium) कृषि के इतिहास में सबसे पुराना, सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्रभावी जैविक उर्वरक है। यह मुख्य रूप से दलहनी फसलों (Leguminous Crops) में नाइट्रोजन की आपूर्ति के लिए उपयोग किया जाता है।
2.1 वैज्ञानिक प्रकृति और कार्यप्रणाली (Scientific Nature and Mechanism)
राइजोबियम एक सहजीवी जीवाणु (Symbiotic Bacterium) है। ‘सहजीवन’ (Symbiosis) का अर्थ है दो जीवों का ऐसा संबंध जिसमें दोनों को एक-दूसरे से लाभ होता है।
जब राइजोबियम कल्चर से उपचारित बीज को मिट्टी में बोया जाता है, तो ये जीवाणु दलहनी पौधों की जड़ों के मूल रोमों (Root hairs) के माध्यम से जड़ों के अंदर प्रवेश करते हैं। वहां ये तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं और जड़ों पर छोटी-छोटी गुलाबी रंग की ग्रंथियां या गांठें (Root Nodules) बना लेते हैं।
इन गांठों के अंदर राइजोबियम जीवाणु वायुमंडल की मुक्त नाइट्रोजन गैस (
) को खींचकर उसे अमोनिया (
) में बदल देता है, जिसे पौधा आसानी से ग्रहण कर लेता है। बदले में, पौधा प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) द्वारा बनाया गया भोजन (Carbohydrates) और आश्रय जीवाणु को प्रदान करता है।
नोट (Important for 12th Class): इन गांठों का गुलाबी रंग ‘लेग्हीमोग्लोबिन’ (Leghemoglobin) नामक वर्णक (Pigment) के कारण होता है, जो जीवाणुओं को ऑक्सीजन से बचाता है ताकि नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation) की प्रक्रिया सुचारू रूप से चल सके।
2.2 फसल विशिष्टता (Crop Specificity / Cross Inoculation Groups)
राइजोबियम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ‘फसल विशिष्ट’ (Crop Specific) होता है। एक प्रकार का राइजोबियम सभी दलहनों में काम नहीं करता। इसके लिए अलग-अलग प्रजातियां (Strains) विकसित की गई हैं:
- राइजोबियम लेग्युमिनोसारम (Rhizobium leguminosarum): मटर (Pea), मसूर (Lentil)।
- राइजोबियम फैजियोलाई (Rhizobium phaseoli): राजमा (Kidney bean), मूंग, उर्द।
- राइजोबियम जैपोनिकम (Rhizobium japonicum): सोयाबीन (Soybean)।
- राइजोबियम मेलीलोटाई (Rhizobium meliloti): रिजका (Lucerne), मेथी।
- राइजोबियम साइसरी (Rhizobium ciceri): चना (Gram/Chickpea)।
2.3 राइजोबियम के लाभ (Benefits of Rhizobium)
- यह एक फसल ऋतु (Crop season) में 50 से 100 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर तक स्थिर (Fix) कर सकता है।
- इसके उपयोग से रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरक (जैसे यूरिया) की आवश्यकता में 20-30% की कमी आती है।
- यह फसल की पैदावार में 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि करता है।
- दलहनी फसल की कटाई के बाद भी इसके द्वारा फिक्स की गई नाइट्रोजन का कुछ हिस्सा मिट्टी में रह जाता है, जो अगली फसल (Next Crop) को फायदा पहुंचाता है (Residual effect)।
3. एजोटोबैक्टर कल्चर (Azotobacter Culture)
दलहनी फसलों के लिए राइजोबियम है, लेकिन अनाज वाली फसलों के लिए क्या? इस कमी को पूरा करता है एजोटोबैक्टर (Azotobacter)।
3.1 वैज्ञानिक प्रकृति और कार्यप्रणाली (Scientific Nature and Mechanism)
एजोटोबैक्टर एक असहजीवी या स्वतंत्र जीवी जीवाणु (Non-symbiotic or Free-living Bacterium) है। इसका अर्थ है कि यह पौधों की जड़ों में कोई गांठ (Nodule) नहीं बनाता। यह मिट्टी में स्वतंत्र रूप से रहता है, मिट्टी के कार्बनिक पदार्थों (Organic matter) को अपने भोजन के रूप में उपयोग करता है, और वायुमंडल की नाइट्रोजन को खींचकर मिट्टी में स्थिर कर देता है, जिसे पौधे अपनी जड़ों द्वारा सोख लेते हैं।
3.2 फसल विशिष्टता (Suitable Crops)
चूंकि इसे जड़ों में गांठें नहीं बनानी होतीं, इसलिए इसका उपयोग सभी प्रकार की अदलहनी फसलों (Non-leguminous crops) में किया जाता है।
- अनाज (Cereals): गेहूं (Wheat), धान (Paddy), जौ, मक्का (Maize)।
- नगदी फसलें (Cash Crops): कपास (Cotton), गन्ना (Sugarcane), सरसों, सूरजमुखी।
- सब्जियां (Vegetables): आलू, टमाटर, बैंगन, गोभी, प्याज आदि।
3.3 एजोटोबैक्टर के लाभ (Benefits of Azotobacter)
- यह प्रति हेक्टेयर 15 से 25 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी में स्थिर कर सकता है।
- हार्मोन का स्राव (Secretion of Hormones): यह न केवल नाइट्रोजन देता है, बल्कि पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक हार्मोन जैसे इंडोल एसिटिक एसिड (IAA), जिबरेलिन (Gibberellin), और विटामिन-बी (Vitamin-B) भी स्रावित करता है। इससे बीजों का अंकुरण (Seed germination) जल्दी होता है।
- यह मिट्टी में रोगजनक कवकों (Pathogenic fungi) को पनपने से रोकता है, जिससे पौधों में बीमारी कम लगती है।
4. नीली-हरी शैवाल (Blue-Green Algae – BGA / Cyanobacteria)
धान (Paddy) भारत की सबसे प्रमुख फसल है, और धान के खेत पानी से भरे होते हैं। ऐसे जलमग्न खेतों के लिए नीली-हरी शैवाल या साइनोबैक्टीरिया सबसे बेहतरीन जैविक उर्वरक है।
4.1 वैज्ञानिक प्रकृति (Scientific Nature)
नीली-हरी शैवाल (BGA) वास्तव में एक प्रकार का प्रोकैरियोटिक सूक्ष्मजीव (Prokaryotic Microorganism) है जो पानी में पनपता है। यह स्वपोषी (Autotrophic) होता है, यानी इसमें क्लोरोफिल (Chlorophyll) पाया जाता है और यह सूर्य के प्रकाश (Sunlight) की मदद से अपना भोजन स्वयं बनाता है।
इसकी मुख्य प्रजातियां जैसे नोस्टॉक (Nostoc), एनाबीना (Anabaena), ऑसिलेटोरिया (Oscillatoria) और ऑलोसिरा (Aulosira) कृषि में उपयोग की जाती हैं।
वैज्ञानिक तथ्य (Scientific Fact): BGA के तंतुओं (Filaments) में एक विशेष प्रकार की कोशिका पाई जाती है जिसे हेटरोसिस्ट (Heterocyst) कहते हैं। इसी हेटरोसिस्ट के अंदर नाइट्रोजिनेज एंजाइम (Nitrogenase enzyme) की मदद से वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण (Nitrogen fixation) होता है।
4.2 उपयोग की विधि (Method of Application)
- धान की रोपाई (Transplanting) के लगभग 7 से 10 दिन बाद, जब खेत में 2-3 इंच पानी भरा हो, तब इसका प्रयोग किया जाता है।
- 10 किलोग्राम नीली-हरी शैवाल का कल्चर (सूखे पाउडर या पपड़ी के रूप में) प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में भुरकाव (Broadcasting) कर दिया जाता है।
- इसे डालने के बाद खेत में कुछ दिनों तक पानी सूखने नहीं देना चाहिए। धीरे-धीरे शैवाल पूरे खेत में एक हरी चादर (Green mat) की तरह फैल जाती है।
4.3 नीली-हरी शैवाल के लाभ (Benefits of BGA)
- यह धान के खेत में 25-30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर तक स्थिर करता है।
- जब यह शैवाल सड़ती है, तो मिट्टी में भारी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ (Organic matter) जुड़ता है, जिससे मिट्टी भुरभुरी होती है।
- यह क्षारीय मृदाओं (Alkaline Soils) के सुधार (Reclamation) में भी मदद करती है, क्योंकि यह कार्बनिक अम्ल छोड़ती है जो मिट्टी के pH को संतुलित करते हैं।
5. एजोला (Azolla)
धान के खेतों के लिए नीली-हरी शैवाल के अलावा एक और चमत्कारिक जैविक उर्वरक है— एजोला। इसे ‘धान के खेत का हरा सोना’ (Green Gold of Paddy fields) भी कहा जाता है।
5.1 वैज्ञानिक प्रकृति (Scientific Nature)
एजोला पानी की सतह पर तैरने वाली एक बहुत ही छोटी फर्न (Free-floating Water Fern) है। एजोला अपने आप में नाइट्रोजन स्थिर नहीं करता।
सहजीवी संबंध (Symbiotic Relationship): एजोला की पत्तियों के अंदर छोटी-छोटी गुहाएं (Cavities) होती हैं। इन गुहाओं के अंदर एनाबीना एजोली (Anabaena azollae) नामक नीली-हरी शैवाल सहजीवी (Symbiont) के रूप में निवास करती है। यह शैवाल हवा से नाइट्रोजन खींचती है और फर्न को देती है, और बदले में फर्न शैवाल को आश्रय प्रदान करता है।
5.2 एजोला के उपयोग की विधियां (Methods of Using Azolla)
एजोला का उपयोग धान में दो तरीकों से किया जा सकता है:
- हरी खाद के रूप में (As Green Manure): धान की रोपाई से 15-20 दिन पहले खेत में पानी भरकर एजोला डाल दिया जाता है। एजोला इतनी तेजी से बढ़ता है कि 10-15 दिनों में पूरा खेत हरी चादर से ढक जाता है। रोपाई से ठीक पहले पानी निकालकर पाटा (Planking) लगाकर इसे मिट्टी में दबा दिया जाता है, जहाँ यह सड़कर खाद बन जाता है।
- दोहरी फसल (Dual Cropping) के रूप में: धान की रोपाई के एक सप्ताह बाद 1-2 टन ताज़ा एजोला प्रति हेक्टेयर खेत में डाल दिया जाता है। यह धान के पौधों के बीच खाली पानी की सतह पर पनपता रहता है। जब खेत का पानी सूखता है, तो यह उसी मिट्टी में सड़कर नाइट्रोजन प्रदान करता है।
5.3 एजोला के लाभ (Benefits of Azolla)
- यह धान के खेत में 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर तक जोड़ सकता है (जो BGA से भी अधिक है)।
- खरपतवार नियंत्रण (Weed Control): यह पानी की सतह को पूरी तरह ढक लेता है, जिससे सूर्य का प्रकाश नीचे नहीं पहुंचता और पानी में उगने वाले खरपतवार (Aquatic weeds) नष्ट हो जाते हैं।
- पशु चारा (Animal Feed): एजोला में भरपूर मात्रा में प्रोटीन, विटामिन और खनिज होते हैं। इसलिए इसे गाय, भैंस, मुर्गियों और मछलियों को पौष्टिक चारे (Nutritious fodder) के रूप में भी खिलाया जाता है, जिससे दूध और अंडे के उत्पादन में वृद्धि होती है।
6. पी.एस.बी. कल्चर (PSB – Phosphate Solubilizing Bacteria)
अभी तक हमने जिन चार जैविक उर्वरकों (Rhizobium, Azotobacter, BGA, Azolla) की बात की, वे सभी नाइट्रोजन (Nitrogen) प्रदान करते हैं। लेकिन पौधों को फॉस्फोरस (Phosphorus) की भी अत्यधिक आवश्यकता होती है। भारतीय मिट्टियों में फॉस्फोरस तो बहुत है, लेकिन वह अघुलनशील रूप (Insoluble form) में फिक्स है, जिसे पौधे नहीं ले पाते। इसी समस्या का हल है पी.एस.बी. (PSB)।
6.1 वैज्ञानिक प्रकृति और कार्यप्रणाली (Scientific Nature and Mechanism)
पी.एस.बी. (PSB) का पूरा नाम फॉस्फेट विलेयकारी जीवाणु (Phosphate Solubilizing Bacteria) है। इस समूह में मुख्य रूप से बैसिलस मेगाटेरियम (Bacillus megaterium) और स्यूडोमोनास स्ट्रिएटा (Pseudomonas striata) नामक जीवाणु आते हैं।
कार्यप्रणाली: जब PSB को बीज या मिट्टी में मिलाया जाता है, तो ये जीवाणु मिट्टी में कार्बनिक अम्ल (Organic Acids) स्रावित करते हैं, जैसे— साइट्रिक एसिड (Citric acid), लैक्टिक एसिड (Lactic acid), और मैलिक एसिड (Malic acid)। ये अम्ल मिट्टी में मौजूद अघुलनशील और अनुपलब्ध फॉस्फेट (जैसे रॉक फॉस्फेट या ट्राई-कैल्शियम फॉस्फेट) के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करते हैं और उसे पानी में घुलनशील रूप (Water-soluble form –
) में बदल देते हैं। घुलनशील होने के कारण पौधों की जड़ें इसे आसानी से सोख लेती हैं।
6.2 फसल विशिष्टता और उपयोग (Crop Specificity and Application)
PSB किसी विशेष फसल तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग सभी प्रकार की फसलों— अनाज, दलहन, तिलहन, सब्जियां और फलों के पेड़ों में किया जा सकता है। इसे राइजोबियम या एजोटोबैक्टर के साथ मिलाकर (Combined inoculation) देने से बहुत ही शानदार परिणाम मिलते हैं।
6.3 पी.एस.बी. के लाभ (Benefits of PSB)
- यह मिट्टी में पड़े हुए बेकार फॉस्फोरस को पौधों के लिए उपयोगी बना देता है।
- इसके उपयोग से महंगे रासायनिक उर्वरकों (जैसे DAP या SSP) की मात्रा में 20 से 25 प्रतिशत तक की बचत की जा सकती है।
- यह फसल की उपज में 10-15% की वृद्धि करता है।
- यह जड़ों के मजबूत विकास (Strong root development) में मदद करता है, जिससे पौधे सूखे का सामना आसानी से कर सकते हैं।
7. इन प्रमुख जैविक उर्वरकों का तुलनात्मक अध्ययन (Comparative Study)
बोर्ड परीक्षा के छात्रों के लिए एक संक्षिप्त और स्पष्ट तुलनात्मक तालिका (Comparative Table) उत्तर को बहुत प्रभावशाली बना देती है:
| जैविक उर्वरक (Biofertilizer) | प्रकृति (Nature) | मुख्य फसलें (Target Crops) | योगदान (Nutrient Contribution) | विशेष गुण (Special Feature) |
| राइजोबियम (Rhizobium) | सहजीवी जीवाणु (Symbiotic Bacteria) | दलहनी फसलें (चना, मटर, सोयाबीन, मूंग) | 50-100 kg N/ha | जड़ों में ग्रंथियां (Nodules) बनाता है। |
| एजोटोबैक्टर (Azotobacter) | असहजीवी (Free-living Bacteria) | अदलहनी फसलें (गेहूं, मक्का, सब्जियां) | 15-25 kg N/ha | वृद्धि हार्मोन (IAA, Gibberellin) स्रावित करता है। |
| नील-हरित शैवाल (BGA) | स्वपोषी सूक्ष्मजीव (Autotrophic) | धान (Paddy – जलमग्न खेत) | 25-30 kg N/ha | प्रकाश संश्लेषण करता है, हेटरोसिस्ट (Heterocyst) में N फिक्स करता है। |
| एजोला (Azolla) | फर्न (Fern) + सहजीवी शैवाल | धान (Paddy) | 40-60 kg N/ha | हरी खाद और पशु चारे (Animal feed) के रूप में भी उपयोग होता है। |
| पी.एस.बी. (PSB) | फॉस्फेट घोलक (Phosphate Solubilizer) | सभी प्रकार की फसलें (All Crops) | अघुलनशील P को घोलता है | कार्बनिक अम्ल (Organic acids) का स्राव करता है। |
8. जैविक उर्वरकों के प्रयोग की विधियाँ (Methods of Application)
इन जैविक उर्वरकों का सही लाभ तभी मिलता है जब इन्हें उचित विधि से खेत में पहुंचाया जाए। इनकी मुख्य 3 विधियां हैं:
8.1 बीजोपचार या बीज शोधन विधि (Seed Treatment)
यह राइजोबियम, एजोटोबैक्टर और पी.एस.बी. के लिए सबसे उत्तम विधि है।
- 1 लीटर पानी में 100-150 ग्राम गुड़ (Jaggery) उबालकर घोल बना लें। (गुड़ जीवाणुओं को बीज से चिपकाने और ऊर्जा देने का काम करता है)।
- घोल के ठंडा होने पर उसमें 200 ग्राम जैविक उर्वरक (पाउडर) मिला दें।
- इस मिश्रण को 10 किलोग्राम बीज पर छिड़क कर हाथों से हल्के से मिलाएं ताकि बीज पर काली परत (Black coating) चढ़ जाए।
- बीजों को छाया (Shade) में सुखाकर 24 घंटे के अंदर बुवाई (Sowing) कर दें।
8.2 जड़ उपचार विधि (Root Dipping / Seedling Treatment)
यह विधि उन फसलों के लिए है जिनकी नर्सरी (Nursery) से रोपाई की जाती है (जैसे— धान, टमाटर, प्याज, गोभी)।
- 5-10 लीटर पानी में 1-2 किलोग्राम एजोटोबैक्टर या PSB मिला लें।
- उखाड़े गए पौधों (Seedlings) की जड़ों को 20-30 मिनट तक इस घोल में डुबो कर रखें और तुरंत खेत में रोप दें।
8.3 मृदा उपचार विधि (Soil Application)
यह विधि BGA, एजोला, और फलदार वृक्षों (Fruit trees) के लिए उपयुक्त है।
- 2-3 किलो PSB या एजोटोबैक्टर को 50 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद (FYM) में मिलाकर छाया में 2 दिन रख दें। फिर अंतिम जुताई के समय खेत में भुरक (Broadcast) दें।
- BGA और एजोला को धान के खेत में सीधे पानी की सतह पर भुरका (Broadcast) जाता है।
9. जैविक उर्वरकों के प्रयोग में रखी जाने वाली सावधानियाँ (Precautions while using Biofertilizers)
- धूप से बचाव (Protect from Direct Sunlight): जैविक उर्वरकों के पैकेट और उपचारित बीजों को कभी भी सीधी धूप में नहीं रखना चाहिए, सूर्य की UV किरणें जीवाणुओं को मार देती हैं।
- रसायनों से दूरी (Keep away from Chemicals): जैविक उर्वरकों को रासायनिक खादों (जैसे यूरिया) और फफूंदनाशकों/कीटनाशकों (Fungicides/Insecticides) के साथ मिलाकर उपयोग नहीं करना चाहिए।
- क्रम का ध्यान (FIR Sequence): यदि बीज को रसायनों से भी उपचारित करना है, तो पहले फफूंदनाशक (Fungicide), फिर कीटनाशक (Insecticide), और अंत में राइजोबियम (Rhizobium) का प्रयोग करना चाहिए।
- एक्सपायरी डेट (Check Expiry Date): पाउडर आधारित कल्चर 6 महीने तक ही जीवित रहते हैं। खरीदने और उपयोग करने से पहले निर्माण तिथि (Manufacturing date) अवश्य चेक करें।
- फसल विशिष्टता (Crop Specificity): राइजोबियम का उपयोग करते समय ध्यान रखें कि वह उसी फसल का कल्चर हो जिसे आप बोने जा रहे हैं।
10. कृषि में इन जैविक उर्वरकों का समग्र महत्व (Overall Importance in Agriculture)
कक्षा 12 के छात्रों को यह समझना चाहिए कि ये पांचों जैविक उर्वरक भविष्य की कृषि की जीवनरेखा (Lifeline of Future Agriculture) हैं।
- आर्थिक महत्व (Economic Importance): यूरिया और DAP कारखानों में बनते हैं जो बहुत महंगे हैं। जैविक उर्वरक प्राकृतिक हैं, बहुत सस्ते मिलते हैं (मात्र 20-30 रुपये प्रति पैकेट), जिससे खेती की लागत (Cost of farming) बहुत कम हो जाती है।
- पर्यावरणीय महत्व (Environmental Importance): रासायनिक उर्वरक जमीन के पानी (Groundwater) को प्रदूषित करते हैं और मिट्टी को बंजर बनाते हैं। जैविक उर्वरक 100% इको-फ्रेंडली (Eco-friendly) हैं, इनसे कोई प्रदूषण नहीं होता।
- मृदा स्वास्थ्य (Soil Health): ये लगातार उपयोग किए जाने पर मिट्टी की भौतिक (Physical), रासायनिक (Chemical) और जैविक (Biological) दशा में सुधार करते हैं। मिट्टी में मित्र सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है।
11. निष्कर्ष (Conclusion)
एजोला, एजोटोबैक्टर, राइजोबियम, BGA और PSB जैसे जैविक उर्वरक प्रकृति द्वारा किसानों को दिए गए अमूल्य उपहार हैं। आज जब पूरी दुनिया ‘ऑर्गेनिक फार्मिंग’ (Organic Farming) और ‘सस्टेनेबल एग्रीकल्चर’ (Sustainable Agriculture) की ओर लौट रही है, तो इन जीवाणु खादों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है।
कृषि विज्ञान के छात्र के रूप में, यह आपका दायित्व है कि आप न केवल परीक्षाओं के लिए इनका वैज्ञानिक अध्ययन करें, बल्कि भविष्य में एक कृषि विशेषज्ञ (Agriculture Expert) बनकर किसानों को इन जैविक उर्वरकों को अपनाने के लिए जागरूक (Educate) भी करें।
12. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: राइजोबियम (Rhizobium) और एजोटोबैक्टर (Azotobacter) में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: राइजोबियम एक सहजीवी (Symbiotic) जीवाणु है जो केवल दलहनी फसलों की जड़ों में गांठें (Nodules) बनाकर नाइट्रोजन स्थिर करता है। जबकि एजोटोबैक्टर एक असहजीवी (Free-living) जीवाणु है जो जड़ों में गांठें नहीं बनाता और सभी अदलहनी फसलों (अनाज, सब्जियों) में उपयोग किया जाता है।
प्रश्न 2: धान के खेत में नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए कौन से दो जैविक उर्वरक सबसे अच्छे हैं?
उत्तर: धान के जलमग्न खेतों के लिए नीली-हरी शैवाल (BGA) और एजोला (Azolla) सबसे उत्तम जैविक उर्वरक हैं। ये दोनों पानी की सतह पर पनपते हैं और भारी मात्रा में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करते हैं।
प्रश्न 3: क्या एजोला (Azolla) का उपयोग गेहूं की फसल में किया जा सकता है?
उत्तर: नहीं। एजोला एक जल-फर्न (Water Fern) है जिसे पनपने और जीवित रहने के लिए खड़े पानी (Standing water) की आवश्यकता होती है। गेहूं की फसल में पानी भरकर नहीं रखा जाता, इसलिए वहां एजोला सूखकर मर जाएगा।
प्रश्न 4: बीजोपचार में FIR क्रम क्या है?
उत्तर: जब किसी बीज को रसायन और जैविक उर्वरक दोनों से उपचारित करना हो, तो FIR क्रम अपनाते हैं: F (Fungicide – फफूंदनाशक), I (Insecticide – कीटनाशक), और R (Rhizobium/Biofertilizer – जैविक उर्वरक)। जैविक उर्वरक हमेशा सबसे अंत में लगाया जाता है ताकि रसायनों का उस पर सीधा प्रभाव न पड़े।
प्रश्न 5: पी.एस.बी. (PSB) का पूरा नाम क्या है और यह क्या कार्य करता है?
उत्तर: PSB का पूरा नाम फॉस्फेट विलेयकारी जीवाणु (Phosphate Solubilizing Bacteria) है। यह मिट्टी में मौजूद अघुलनशील (Insoluble) फॉस्फोरस को कार्बनिक अम्लों की मदद से पानी में घुलनशील (Water-soluble) रूप में बदल देता है, जिससे पौधे उसे आसानी से ग्रहण कर लेते हैं।
प्रश्न 6: क्या जैविक उर्वरकों के उपयोग के बाद रासायनिक खादों की आवश्यकता नहीं होती?
उत्तर: जैविक उर्वरक रासायनिक खादों का पूर्ण विकल्प (100% Substitute) नहीं हैं। ये केवल एक पूरक (Supplement) हैं। इनके उपयोग से रासायनिक खादों (यूरिया/DAP) की 20-30% तक बचत की जा सकती है, लेकिन भारी पैदावार के लिए समन्वित उपयोग आवश्यक है।