Class 12 Classification of Plant Diseases : एमपी बोर्ड कक्षा 12 कृषि विज्ञान (MP Board Class 12 Agriculture) के छात्रों के लिए ‘पादप रोगों का वर्गीकरण’ (Classification of Plant Diseases) पर एक अति विस्तृत और ज्ञानवर्धक लेख। इस लेख में रोगों को रोगजनकों (Causal Agents), प्रसार या फैलाव (Occurrence), संक्रमण के माध्यम (Mode of Infection) और लक्षणों (Symptoms) के आधार पर गहराई से वर्गीकृत किया गया है। यह बोर्ड परीक्षाओं और कृषि प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक सर्वश्रेष्ठ और संपूर्ण मार्गदर्शिका है।
पादप रोगों का वर्गीकरण : कारण, प्रसार और लक्षणों के आधार पर संपूर्ण अध्ययन (Classification of Plant Diseases) – कक्षा 12 कृषि विज्ञान
1. प्रस्तावना (Introduction)
भारतीय कृषि (Indian Agriculture) में फसल उत्पादन (Crop Production) को सबसे बड़ा खतरा कीटों और खरपतवारों के साथ-साथ ‘पादप रोगों’ (Plant Diseases) से होता है। मनुष्य और जानवरों की तरह ही पौधों को भी अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए एक स्वस्थ शरीर की आवश्यकता होती है। जब पौधे की सामान्य जैविक और शारीरिक क्रियाओं (Physiological processes) में कोई निरंतर व्यवधान (Continuous irritation) उत्पन्न होता है, जिसके कारण पौधा अस्वस्थ हो जाता है, तो उसे ‘पादप रोग’ कहा जाता है।
पादप रोग विज्ञान (Plant Pathology) कृषि विज्ञान की वह शाखा है जिसमें हम पौधों की बीमारियों, उनके कारणों और उनके नियंत्रण का अध्ययन करते हैं। प्रकृति में हजारों प्रकार के पादप रोग पाए जाते हैं। इन सभी रोगों का अध्ययन करना तब तक संभव नहीं है, जब तक कि उन्हें किसी वैज्ञानिक आधार पर विभिन्न वर्गों में न बांटा जाए।
कक्षा 12 कृषि विज्ञान (Class 12 Agriculture) के छात्रों के लिए पादप रोगों का वर्गीकरण (Classification of Plant Diseases) समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी वर्गीकरण के आधार पर बीमारियों को पहचानने और उनका ‘एकीकृत रोग प्रबंधन’ (Integrated Disease Management – IDM) करने की रणनीति तय की जाती है। इस विस्तृत लेख में हम पादप रोगों का विभिन्न वैज्ञानिक आधारों पर वर्गीकरण करेंगे।
2. पादप रोगों के वर्गीकरण के मुख्य आधार (Main Bases of Classification of Plant Diseases)
कृषि वैज्ञानिकों ने पादप रोगों को समझने की सुविधा के लिए उन्हें मुख्य रूप से 5 आधारों पर वर्गीकृत किया है:
- रोग उत्पन्न करने वाले कारकों (रोगजनकों) के आधार पर (Based on Causal Agents)
- रोग के प्रसार या फैलाव के आधार पर (Based on Occurrence or Spread)
- संक्रमण के माध्यम (स्रोत) के आधार पर (Based on Mode of Infection / Source of Inoculum)
- रोग के प्रमुख लक्षणों के आधार पर (Based on Symptoms)
- पौधे के प्रभावित भाग के आधार पर (Based on Affected Plant Part)
आइए इन सभी वर्गीकरणों का विस्तार से अध्ययन करें।
3. रोगजनकों या कारकों के आधार पर वर्गीकरण (Classification Based on Causal Agents)
यह पादप रोगों का सबसे मुख्य और सबसे महत्वपूर्ण वर्गीकरण है। रोग पैदा करने वाला कारक जीवित (Living) है या अजीवित (Non-living), इस आधार पर रोगों को दो मुख्य भागों में बांटा गया है:
(A) संक्रामक रोग या परजीवी रोग (Infectious or Parasitic Diseases)
ये वे रोग हैं जो जीवित सूक्ष्मजीवों (Living Microorganisms) द्वारा उत्पन्न होते हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये एक बीमार पौधे से दूसरे स्वस्थ पौधे में आसानी से फैल (Spread/Infect) जाते हैं। इन सूक्ष्मजीवों को रोगजनक (Pathogens) कहा जाता है। इन्हें आगे निम्नलिखित उप-वर्गों में बांटा गया है:
- कवक जनित रोग (Fungal Diseases):पादप रोग विज्ञान में लगभग 80% बीमारियां कवक (Fungi / फफूंदी) के कारण होती हैं। कवक अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते, इसलिए वे पौधों पर परजीवी (Parasite) के रूप में रहते हैं।
- प्रमुख उदाहरण: गेहूँ का रतुआ या गेरुई (Wheat Rust), आलू का पछेती झुलसा (Late blight of potato), गन्ने का लाल सड़न रोग (Red rot of sugarcane), और चने का उकठा (Wilt of gram)।
- जीवाणु जनित रोग (Bacterial Diseases):ये रोग बैक्टीरिया (Bacteria) द्वारा फैलते हैं। जीवाणु बहुत ही सूक्ष्म एककोशिकीय जीव होते हैं जो घावों (Wounds) या प्राकृतिक छिद्रों (Stomata/Lenticels) के माध्यम से पौधे में प्रवेश करते हैं।
- प्रमुख उदाहरण: नींबू का कैंकर रोग (Citrus Canker), धान का जीवाणु झुलसा (Bacterial leaf blight of rice), और आलू का विल्ट रोग (Brown rot of potato)।
- विषाणु जनित रोग (Viral Diseases):विषाणु (Virus) अत्यंत सूक्ष्म कण होते हैं जिन्हें केवल इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी (Electron microscope) से देखा जा सकता है। ये रोग मुख्य रूप से रस चूसने वाले कीटों (सफेद मक्खी, माहू) द्वारा एक पौधे से दूसरे पौधे तक फैलाए जाते हैं।
- प्रमुख उदाहरण: भिंडी का पीत शिरा मोज़ेक रोग (Yellow Vein Mosaic of Okra – YVMV), पपीते का पत्ती मरोड़ रोग (Papaya leaf curl), और तंबाकू का मोज़ेक रोग (TMV)।
- सूत्रकृमि या निमेटोड रोग (Nematode Diseases):सूत्रकृमि धागे जैसी संरचना वाले सूक्ष्म जीव होते हैं जो मिट्टी में रहते हैं और पौधे की जड़ों (Roots) को नुकसान पहुंचाते हैं।
- प्रमुख उदाहरण: टमाटर और बैंगन का जड़-गांठ रोग (Root-knot disease), गेहूँ का सेहू रोग (Ear cockle of wheat)।
- माइकोप्लाज्मा जनित रोग (Mycoplasma/Phytoplasma Diseases):ये जीवाणु और विषाणु के बीच की कड़ी होते हैं। इनमें कोशिका भित्ति (Cell wall) नहीं पाई जाती है।
- प्रमुख उदाहरण: बैंगन का छोटी पत्ती रोग (Little leaf of Brinjal), तिल का फाइलोडी रोग (Phyllody of Sesame)।
(B) असंक्रामक रोग या अपजीवी रोग (Non-infectious or Non-parasitic Diseases)
ये रोग किसी जीवित जीव (Pathogen) द्वारा नहीं फैलते हैं, बल्कि पर्यावरण की प्रतिकूल दशाओं (Adverse environmental conditions) या मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी (Nutrient deficiency) के कारण होते हैं। इन रोगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये एक पौधे से दूसरे पौधे में छूत की तरह नहीं फैलते हैं (Non-contagious)।
- पोषक तत्वों की कमी (Nutritional Deficiency):
- उदाहरण: मिट्टी में जिंक (Zinc) की कमी से धान का ‘खैरा रोग’ (Khaira Disease), बोरॉन (Boron) की कमी से फूलगोभी का ब्राउनिंग (Browning), मॉलिब्डेनम की कमी से व्हिपटेल रोग (Whiptail)।
- प्रतिकूल मौसम (Adverse Weather):अत्यधिक पाला (Frost) पड़ने से आलू या टमाटर के पौधों का झुलस जाना, या उच्च तापमान के कारण सनस्कैल्ड (Sunscald)।
- ऑक्सीजन की कमी (Lack of Oxygen):
- उदाहरण: भंडारण के दौरान गोदामों में ऑक्सीजन की कमी के कारण आलू का ‘ब्लैक हार्ट’ रोग (Black heart of potato)।
- प्रदूषण (Pollution):ईंट के भट्ठों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड (
) गैस के कारण आम के फलों का काला सिरा रोग (Black tip of mango)।
4. प्रसार या फैलाव के आधार पर वर्गीकरण (Classification Based on Occurrence or Spread)
यह वर्गीकरण प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive Exams) और बोर्ड परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण है। रोग किस क्षेत्र में और कितनी तीव्रता से फैलता है, इस आधार पर इसे 4 भागों में बांटा गया है:
1. स्थानिक या एंडेमिक रोग (Endemic Diseases)
“वे रोग जो किसी एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र (Specific geographic area) या जिले में साल-दर-साल (लगातार) पाए जाते हैं, स्थानिक या एंडेमिक रोग कहलाते हैं।”
इनका प्रकोप प्रायः सामान्य से लेकर मध्यम तक होता है। रोगजनक उस विशेष स्थान की मिट्टी या वातावरण में हमेशा मौजूद रहता है।
- उदाहरण: दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) में आलू का वार्ट रोग (Wart disease of potato), और भारत के कुछ विशेष क्षेत्रों में प्याज का स्मट रोग।
2. महामारी या एपिफाइटोटिक रोग (Epidemic or Epiphytotic Diseases)
“वे रोग जो बहुत बड़े क्षेत्र (Large area) में अचानक और बहुत तेजी से फैलते हैं और फसल का भारी विनाश (Massive destruction) करते हैं, महामारी या एपिफाइटोटिक रोग कहलाते हैं।”
ये रोग हर साल नहीं आते, बल्कि जब भी मौसम (हवा, नमी, तापमान) रोगजनक के अनुकूल होता है, तब ये भयंकर रूप ले लेते हैं।
- उदाहरण: गेहूँ का रतुआ (Wheat rust), आलू का पछेती झुलसा (Late blight of potato)। 1845 में आलू के इसी पछेती झुलसा रोग ने आयरलैंड में भयंकर अकाल (Irish Famine) पैदा किया था। 1943 का बंगाल का अकाल धान के भूरा पत्ती धब्बा रोग (Brown leaf spot) के कारण आया था।
3. विरल या प्रकीर्ण रोग (Sporadic Diseases)
“वे रोग जो बहुत ही अनियमित अंतराल (Irregular intervals) पर और छुटपुट (यहाँ-वहाँ बिखरे हुए स्थानों पर) रूप से प्रकट होते हैं, विरल या प्रकीर्ण रोग (Sporadic diseases) कहलाते हैं।”
ये रोग एक क्षेत्र में कभी आ जाते हैं और फिर कई सालों तक दिखाई नहीं देते। इनसे होने वाला नुकसान आमतौर पर कम होता है।
- उदाहरण: कपास का कोणीय पत्ती धब्बा (Angular leaf spot of cotton), और खीरे/ककड़ी का म्लानि (Wilt) रोग।
4. सर्वव्यापी या पेंडेमिक रोग (Pandemic Diseases)
“वे रोग जो केवल एक देश में नहीं, बल्कि महाद्वीपों (Continents) को पार करते हुए पूरी दुनिया (Worldwide) में फैल जाते हैं, सर्वव्यापी या पेंडेमिक रोग कहलाते हैं।”
- उदाहरण: अतीत में गेहूँ का काला रतुआ (Black stem rust of wheat) लगभग पूरी दुनिया के गेहूँ उत्पादक देशों में फैल गया था।
5. संक्रमण के माध्यम (स्रोत) के आधार पर वर्गीकरण (Classification Based on Mode of Infection / Source of Inoculum)
बीमारी पैदा करने वाला रोगजनक (Pathogen) कहाँ छिपकर अपना जीवन बचाता है और अगली फसल में कैसे पहुँचता है, इस आधार पर रोगों को 4 भागों में बांटा गया है:
1. बीज जनित रोग (Seed-borne Diseases)
जब बीमारी का कवक या जीवाणु बीज के अंदर (Internally) या बीज के बाहरी आवरण (Externally) पर मौजूद होता है, तो उसे बीज जनित रोग कहते हैं। जब किसान इन दूषित बीजों (Infected seeds) को बोता है, तो नया पौधा भी बीमार पैदा होता है।
- बाह्य बीज जनित (Externally seed-borne): कवक बीज के बाहर चिपका रहता है। उदाहरण: गेहूँ का पहाड़ी कण्डवा (Bunt of wheat)।
- अंतः बीज जनित (Internally seed-borne): कवक बीज के भ्रूण (Embryo) के अंदर तक प्रवेश कर जाता है। उदाहरण: गेहूँ का अनावृत कण्डवा (Loose smut of wheat)।
- नियंत्रण: बीजोपचार (Seed treatment – थाइरम या कार्बेन्डाजिम से) और सौर ऊर्जा उपचार (Solar heat treatment)।
2. मृदा जनित रोग (Soil-borne Diseases)
जब रोगजनक (विशेषकर कवक और निमेटोड) खेत की मिट्टी (Soil) में सालों तक जीवित रहते हैं और जड़ों के माध्यम से पौधे पर हमला करते हैं, तो उसे मृदा जनित रोग कहते हैं।
- उदाहरण: चने का उकठा या विल्ट रोग (Wilt of gram – Fusarium कवक द्वारा), जड़ गलन (Root rot), और डैम्पिंग ऑफ (Damping off of seedlings – नर्सरी का रोग)।
- नियंत्रण: फसल चक्र (Crop rotation), ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई, और ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) नामक मित्र फफूंद का मिट्टी में प्रयोग।
3. वायु जनित रोग (Air-borne Diseases)
वे रोग जिनके बीजाणु (Spores) या रोगजनक हवा (Wind) के माध्यम से उड़कर एक खेत से दूसरे खेत या मीलों दूर तक फैल जाते हैं, वायु जनित रोग कहलाते हैं। इनका फैलाव सबसे तेज होता है।
- उदाहरण: गेहूँ का रतुआ (Wheat Rusts), बाजरे का अर्गट (Ergot), और पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery mildew)।
- नियंत्रण: हवा से उड़कर आने वाले इन रोगों के लिए पर्णीय छिड़काव (Foliar spray) जैसे— मैन्कोजेब या प्रोपिकोनाज़ोल का उपयोग किया जाता है।
4. जल जनित रोग (Water-borne Diseases)
वे रोग जिनके रोगजनक सिंचाई के पानी (Irrigation water) या बारिश के पानी (Rain splashes) के बहने के साथ एक जगह से दूसरी जगह फैलते हैं।
- उदाहरण: धान का जीवाणु झुलसा (Bacterial blight of rice)।
6. रोग के प्रमुख लक्षणों के आधार पर वर्गीकरण (Classification Based on Symptoms)
किसान खेत में बीमारी को देखकर कैसे पहचानता है? पत्तियों और तनों पर जो बाहरी निशान (Visual expressions) दिखाई देते हैं, उन्हें लक्षण (Symptoms) कहते हैं। लक्षणों के आधार पर प्रमुख रोग इस प्रकार हैं:
1. रतुआ या गेरुई (Rusts)
पत्तियों और तनों पर छोटे-छोटे, उभरे हुए फफोले (Pustules) बन जाते हैं, जिनके फटने पर लाल, भूरे, पीले या काले रंग का चूर्ण (Powder) निकलता है। यह बिल्कुल लोहे पर लगे जंग (Rust) जैसा दिखता है।
- उदाहरण: गेहूँ का काला, भूरा और पीला रतुआ (Wheat rusts)।
2. कण्डवा या स्मट (Smuts)
पौधे के पुष्पक्रम (Inflorescence/बालियों) या दानों की जगह काले रंग का फफूंदी का चूर्ण (Black sooty mass) भर जाता है। दाने पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं और केवल काला पाउडर बचता है।
- उदाहरण: गेहूँ का अनावृत कण्डवा (Loose smut), ज्वार और बाजरे का स्मट।
3. उकठा या म्लानि (Wilts)
यह मिट्टी जनित रोग है। इसमें कवक पौधे के तने के अंदर की संवहन नलिकाओं (जाइलम/Xylem) को जाम कर देता है। पानी ऊपर न चढ़ पाने के कारण हरा-भरा पौधा अचानक मुरझाकर (Drooping) सूख जाता है।
- उदाहरण: चने का उकठा (Wilt of gram), अरहर का उकठा।
4. झुलसा या ब्लाइट (Blights)
इस रोग में पत्तियां, टहनियां और फूल ऐसे दिखाई देते हैं जैसे उन्हें आग से झुलसा (Burnt) दिया गया हो। पौधे के ऊतक बहुत तेजी से मरते (Necrosis) हैं।
- उदाहरण: आलू का अगेती और पछेती झुलसा (Early and Late blight of potato), धान का ब्लास्ट रोग।
5. फफूंदी या मिल्ड्यू (Mildews)
इसमें पत्तियों की सतह पर फफूंदी की एक स्पष्ट परत दिखाई देती है।
- चूर्णी फफूंदी (Powdery Mildew): पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद टेलकम पाउडर (White powdery growth) जैसा फैल जाता है। (जैसे- मटर की चूर्णी फफूंदी)।
- मृदुरोमिल फफूंदी (Downy Mildew): पत्तियों की निचली सतह पर रुई जैसी (Cottony) सफेद या भूरी फफूंदी दिखाई देती है। (जैसे- सरसों और बाजरे का डाउनी मिल्ड्यू)।
6. धब्बा रोग (Spots and Lesions)
पत्तियों पर गोल, अंडाकार या अनियमित आकार के मरे हुए ऊतकों (Dead tissues) के धब्बे बन जाते हैं, जो भूरे या काले रंग के होते हैं।
- उदाहरण: टिक्का रोग (Tikka disease of groundnut), धान का भूरा पत्ती धब्बा।
7. कैंकर (Canker)
पौधे के काष्ठीय (Woody) भागों, तनों, टहनियों और फलों पर उभरे हुए, कॉर्क जैसे खुरदरे (Corky/rough) घाव बन जाते हैं।
- उदाहरण: नींबू का कैंकर (Citrus canker – जीवाणु जनित)।
7. पादप रोगों के वर्गीकरण का महत्व (Importance of Classification of Plant Diseases)
कृषि विज्ञान के छात्रों और वैज्ञानिकों के लिए रोगों का यह वर्गीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि:
- सही निदान (Accurate Diagnosis): वर्गीकरण के आधार पर किसान लक्षणों (Symptoms) को देखकर तुरंत पहचान सकता है कि यह कण्डवा है, रतुआ है या झुलसा है।
- सटीक रसायन का चुनाव (Choice of Chemicals): यदि रोग कवक (Fungus) जनित है तो ‘कवकनाशी’ (Fungicide) का छिड़काव होगा। यदि जीवाणु (Bacteria) जनित है तो ‘एंटीबायोटिक’ (Antibiotics जैसे स्ट्रेप्टोमाइसिन) का उपयोग होगा। बिना वर्गीकरण के सही दवा का चुनाव असंभव है।
- रोग प्रबंधन रणनीति (Disease Management Strategy):
- यदि रोग ‘मृदा जनित’ (Soil-borne) है, तो किसान फसल चक्र (Crop rotation) अपनाएगा।
- यदि रोग ‘बीज जनित’ (Seed-borne) है, तो वह बीजोपचार (Seed treatment) करेगा।
- यदि रोग ‘वायु जनित’ (Air-borne) है, तो वह पर्णीय छिड़काव (Foliar spray) करेगा।
- संगरोध नियम (Quarantine Laws): महामारी (Epidemic) और सर्वव्यापी (Pandemic) रोगों की पहचान करके सरकार बाहर से आने वाले बीजों पर सख्त पादप संगरोध (Plant Quarantine) नियम लागू करती है।
8. निष्कर्ष (Conclusion)
आधुनिक कृषि (Modern Agriculture) में पादप रोग (Plant Diseases) किसानों के मुनाफे (Profitability) और देश की खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए एक मूक परंतु विनाशकारी खतरा हैं।
कक्षा 12 के कृषि विज्ञान के छात्रों के लिए ‘पादप रोगों का वर्गीकरण’ (Classification of Plant Diseases) केवल रटने का विषय नहीं है, बल्कि यह फसल की सुरक्षा का एक विज्ञान है। रोगों को उनके फैलने के तरीके (हवा, पानी, मिट्टी, बीज) और उनके रोगजनकों (कवक, जीवाणु, विषाणु) के आधार पर समझकर ही हम “एकीकृत रोग प्रबंधन” (Integrated Disease Management – IDM) को सफलतापूर्वक लागू कर सकते हैं। एक जागरूक किसान और एक शिक्षित कृषि छात्र ही सही समय पर सही उपाय अपनाकर फसल को नष्ट होने से बचा सकता है।
9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: संक्रामक (Infectious) और असंक्रामक (Non-infectious) रोगों में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर: संक्रामक रोग जीवित सूक्ष्मजीवों (जैसे कवक, जीवाणु, विषाणु) द्वारा उत्पन्न होते हैं और एक बीमार पौधे से दूसरे स्वस्थ पौधे में आसानी से फैल जाते हैं (जैसे गेहूँ का रतुआ)। इसके विपरीत, असंक्रामक रोग निर्जीव कारकों (जैसे पोषक तत्वों की कमी, प्रतिकूल मौसम) द्वारा होते हैं और ये छूत की तरह एक पौधे से दूसरे पौधे में नहीं फैलते (जैसे धान का खैरा रोग)।
प्रश्न 2: स्थानिक (Endemic) और महामारी (Epidemic) रोग में क्या अंतर है?
उत्तर: स्थानिक रोग (Endemic) किसी एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र (जैसे दार्जिलिंग में आलू का वार्ट रोग) में साल-दर-साल लगातार पाए जाते हैं, लेकिन इनका प्रभाव सीमित होता है। जबकि महामारी (Epidemic) अचानक बहुत बड़े क्षेत्र में फैलती है और फसल का भारी विनाश करती है (जैसे 1845 में आलू का पछेती झुलसा)।
प्रश्न 3: चने का उकठा (Wilt of gram) रोग किस प्रकार का रोग है और इसका प्रबंधन कैसे होता है?
उत्तर: चने का उकठा एक ‘मृदा जनित’ (Soil-borne) रोग है, जो Fusarium नामक कवक द्वारा फैलता है। इसके प्रबंधन के लिए फसल चक्र (Crop rotation) अपनाना चाहिए और बुवाई से पहले बीजों और मिट्टी को ‘ट्राइकोडर्मा’ (Trichoderma) नामक मित्र फफूंदी से उपचारित करना चाहिए।
प्रश्न 4: धान का ‘खैरा रोग’ किस तत्व की कमी से होता है?
उत्तर: धान का खैरा रोग एक असंक्रामक रोग है जो मिट्टी में ‘जिंक’ (Zinc – जस्ता) पोषक तत्व की कमी के कारण होता है। इसके नियंत्रण के लिए खेत में 25 किलोग्राम ‘जिंक सल्फेट’ (
) प्रति हेक्टेयर डालना चाहिए।
प्रश्न 5: अंतः बीज जनित (Internally seed-borne) रोग का एक उदाहरण दें और उसके उपचार की विधि बताएं।
उत्तर: गेहूँ का अनावृत कण्डवा (Loose smut of wheat) एक अंतः बीज जनित रोग है। इसमें कवक बीज के भ्रूण (Embryo) के अंदर तक प्रवेश कर जाता है। इसके उपचार के लिए ‘सौर ऊर्जा उपचार’ (Solar energy treatment) या सर्वांगी कवकनाशी (जैसे कार्बेन्डाजिम) से बीजोपचार किया जाता है।
प्रश्न 6: आलू का पछेती झुलसा (Late blight of potato) किस रोगजनक द्वारा होता है?
उत्तर: आलू का पछेती झुलसा फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टान्स (Phytophthora infestans) नामक कवक (Fungus) के कारण होता है। यह एक अत्यंत विनाशकारी महामारी (Epidemic) रोग है।