Class 12 Biology Microbes in Human Welfare – मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव Detailed Exam Notes

Class 12 Biology Microbes in Human Welfare : एमपी बोर्ड कक्षा 12 जीव विज्ञान अध्याय 8 ‘मानव कल्याण में सूक्ष्मजीव’ (Class 12 Biology Microbes in Human Welfare) के परीक्षा-उपयोगी और विस्तृत नोट्स। घरेलू उत्पादों, औद्योगिक उत्पादों, वाहितमल उपचार, बायोगैस और जैव उर्वरकों में सूक्ष्मजीवों की भूमिका को सरल हिंदी और इंग्लिश तकनीकी शब्दों (Technical Terms) के साथ समझें। बोर्ड परीक्षा (Board Exams) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।

Class 12 Biology Microbes in Human Welfare
Class 12 Biology Microbes in Human Welfare

Class 12 Biology Microbes in Human Welfare

जीव विज्ञान (Biology) के इस अध्याय में हम सूक्ष्मजीवों (Microbes) के उन पहलुओं का अध्ययन करेंगे जो मानव समाज के लिए अत्यंत लाभदायक हैं। अक्सर हम सोचते हैं कि सूक्ष्मजीव केवल बीमारियाँ फैलाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। कई सूक्ष्मजीव (Microbes) हमारे दैनिक जीवन, उद्योगों, कृषि और पर्यावरण संरक्षण में वरदान साबित हुए हैं।

यह विस्तृत आर्टिकल विशेष रूप से कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं (Class 12th Board Exams) को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें सभी महत्वपूर्ण विषयों को हिंदी और अंग्रेजी के तकनीकी शब्दों (Technical Terms in English) के साथ समझाया गया है।

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1. सूक्ष्मजीवों का परिचय (Introduction to Microbes)

असूक्ष्म पादपों (Macroscopic plants) तथा प्राणियों के अतिरिक्त इस पृथ्वी पर जीव विज्ञानी तंत्र के प्रमुख घटक सूक्ष्मजीव (Microbes) हैं।

  • सर्वव्यापी प्रकृति (Ubiquitous Nature): सूक्ष्मजीव सर्वव्यापी होते हैं। यह मृदा (Soil), जल (Water), वायु (Air), हमारे शरीर के अंदर तथा अन्य प्रकार के प्राणियों तथा पादपों में पाए जाते हैं।
  • चरम पर्यावरण (Extreme Environments): जहाँ किसी प्रकार जीवन संभव नहीं है, वहाँ भी ये पाए जाते हैं, जैसे गीजर के भीतर गहराई तक (Thermal Vents) जहाँ ताप 100°C तक बढ़ा हुआ रहता है, मृदा में गहराई तक, बर्फ की पर्तों के कई मीटर नीचे तथा उच्च अम्लीय पर्यावरण (Highly acidic environments) में भी।
  • प्रकार (Types): सूक्ष्मजीव विविध रूपायित होते हैं – प्रोटोजोआ (Protozoa), जीवाणु (Bacteria), कवक (Fungi) तथा सूक्ष्मदर्शीय पादप एवं प्राणी। विषाणु (Viruses), विरायड (Viroids) तथा प्रायोन (Prions) भी प्रोटीनीय संक्रमित कारक हैं जिन्हें सूक्ष्मजीवों में गिना जाता है।
  • संवर्धन (Culturing): जीवाणु तथा अधिकांश कवकों के समान सूक्ष्मजीवियों को पोषक मीडिया (Nutrient Media) पर उगाया जा सकता है, ताकि वृद्धि कर यह कालोनी (Colonies) का रूप ले लें और इन्हें नग्न नेत्र (Naked eyes) से देखा जा सके। ऐसे संवर्धन (Cultures) अध्ययन के दौरान काफी लाभदायक होते हैं।

2. घरेलू उत्पादों में सूक्ष्मजीव (Microbes in Household Products)

हम प्रतिदिन सूक्ष्मजीवियों अथवा उनसे व्युत्पन्न उत्पादों का प्रयोग करते हैं। परीक्षा की दृष्टि से निम्नलिखित उत्पाद बहुत महत्वपूर्ण हैं:

2.1 दही (Curd)

  • दूध से दही का उत्पादन सूक्ष्मजीवों का सबसे सामान्य उदाहरण है।
  • सूक्ष्मजीव जैसे लैक्टोबैसिलस (Lactobacillus) तथा अन्य जिन्हें सामान्यतः लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया (Lactic Acid Bacteria – LAB) कहते हैं, दूध में वृद्धि करते हैं और उसे दही में परिवर्तित कर देते हैं।
  • वृद्धि के दौरान LAB अम्ल (Acid) उत्पन्न करता है जो दुग्ध प्रोटीन (Milk proteins) को स्कंदित (Coagulate) तथा आंशिक रूप में पचा देता है।
  • दही की थोड़ी सी मात्रा निवेश द्रव्य (Inoculum) अथवा आरंभक (Starter) के रूप में ताजे दूध में मिलाया जाता है।
  • पोषण में सुधार (Nutritional Improvement): इससे विटामिन बी 12 (Vitamin B12) की मात्रा बढ़ने से पोषण संबंधी गुणवत्ता में भी सुधार हो जाता है।
  • हमारे पेट में भी LAB रोगों को रोकने में लाभदायक भूमिका निभाते हैं।

2.2 इडली और डोसा का आटा (Dough for Dosa and Idli)

  • दाल-चावल का बना ढीला-ढाला आटा जिसका प्रयोग ‘डोसा’ तथा ‘इडली’ बनाने में किया जाता है, वह भी बैक्टीरिया द्वारा किण्वित (Fermented) होता है।
  • इस आटे की फूली उभरी शक्ल (Puffed-up appearance) CO_{2} गैस के उत्पादन के कारण होती है।

2.3 ब्रेड (Bread)

  • ढीला-ढाला आटा जिसका प्रयोग ब्रैड बनाने में किया जाता है उसमें बैकर यीस्ट (Baker’s Yeast) का प्रयोग किया जाता है।
  • बैकर यीस्ट का वैज्ञानिक नाम सैकरोमाइसीज़ सैरीवीसी (Saccharomyces cerevisiae) है।

2.4 पारंपरिक पेय (Traditional Drinks)

  • दक्षिण भारत के कुछ भागों में एक पारंपरिक पेय ‘टोडी’ (Toddy) है।
  • इसे ताड़वृक्ष (Palm tree) के तने के स्त्राव (Sap) को किण्वित (Ferment) कराकर तैयार किया जाता है।
  • इसके अलावा सूक्ष्मजीवियों का प्रयोग किण्वित मत्स्य (Fermented fish), सोयाबीन (Soybean) तथा बाँस प्ररोह (Bamboo shoots) आदि के भोजन तैयार करने में किया जाता है।

2.5 पनीर या चीज़ (Cheese)

  • पनीर (Cheese) एक प्राचीन भोज्य पदार्थ है, जिसे तैयार करने में सूक्ष्मजीवियों का प्रयोग किया जाता है।
  • स्विस चीज (Swiss Cheese): इसमें पाए जाने वाले बड़े-बड़े छिद्र प्रोपिओनिबैक्टीरियम शारमैनाई (Propionibacterium sharmanii) नामक बैक्टीरियम द्वारा बड़ी मात्रा में उत्पन्न CO_{2} के कारण होते हैं।
  • रॉक्यूफोर्ट चीज (Roquefort Cheese): यह एक विशेष प्रकार के कवक (Fungi) की वृद्धि से परिपक्व होते हैं जिससे विशेष सुगंध आने लगती है।

3. औद्योगिक उत्पादों में सूक्ष्मजीव (Microbes in Industrial Products)

उद्योगों में सूक्ष्मजीवियों का प्रयोग बहुत से उत्पादों के संश्लेषण (Synthesis) में किया जाता है। व्यावसायिक पैमाने (Commercial scale) पर सूक्ष्मजीवियों को पैदा करने के लिए बड़े बर्तन की आवश्यकता होती है जिसे फरमैंटर या किण्वक (Fermentors) कहते हैं।

3.1 किण्वित पेय (Fermented Beverages)

  • सूक्ष्मजीव विशेषकर यीस्ट (Yeast) का प्रयोग प्राचीन काल से वाइन, बियर, ह्विस्की, ब्रांडी या रम जैसे पेयों के उत्पादन में किया जाता आ रहा है।
  • इस उद्देश्य के लिए वही यीस्ट सैकेरोमाइसीज़ सैरीबिसी (Saccharomyces cerevisiae), जो सामान्यतः ब्रीवर्स यीस्ट (Brewer’s Yeast) के नाम से भी प्रसिद्ध है, का प्रयोग माल्टीकृत धान्यों (Malted cereals) तथा फलों के रसों में ऐथानॉल (Ethanol) उत्पन्न करने में किया जाता है।
  • आसवन (Distillation) का प्रभाव: वाइन (Wine) तथा बियर (Beer) का उत्पादन बिना आसवन (Without distillation) के होता है। जबकि ह्विस्की (Whisky), ब्रांडी (Brandy) तथा रम (Rum) किण्वित रस के आसवन (By distillation) द्वारा तैयार किए जाते हैं।

3.2 प्रतिजैविक (Antibiotics)

  • 20वीं शताब्दी की अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण खोज प्रतिजैविकों (Antibiotics) का उत्पादन है।
  • ‘ऐंटी’ (Anti) एक ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ ‘खिलाफ’ (Against) तथा ‘बॉयो’ (Bio) का अर्थ ‘जीवन’ (Life) है।
  • प्रतिजैविक एक प्रकार के रसायनिक पदार्थ (Chemical substances) हैं, जिनका निर्माण कुछ सूक्ष्मजीवियों द्वारा होता है, जो रोग उत्पन्न करने वाले अन्य सूक्ष्मजीवियों की वृद्धि को मंद (Retard) अथवा उन्हें मार (Kill) सकते हैं।
  • पैनीसीलिन (Penicillin) की खोज: पैनीसीलिन सबसे पहला ऐंटीबॉयोटिक था। इसकी खोज एलैग्जैंडर फ्लैमिंग (Alexander Fleming) ने एक हादसे (Chance discovery) के रूप में की थी जब वह स्टैफिलोकोकस (Staphylococci) बैक्टीरिया पर कार्य कर रहे थे। उन्होंने देखा कि बिना धुली प्लेट पर मोल्ड (Mold) उत्पन्न हो गए हैं जिस कारण बैक्टीरिया वृद्धि न कर सका। यह मोल्ड पैनीसीलियम नोटेटम (Penicillium notatum) था।
  • बाद में अरनैस्ट चैन (Ernest Chain) तथा हावर्ड फ्लौरे (Howard Florey) ने इसकी एक शक्तिशाली ऐंटीबॉयोटिक के रूप में पुष्टि की।
  • दूसरे विश्व युद्ध (World War II) में घायल अमरीकन सिपाहियों के उपचार में इसका व्यापक प्रयोग हुआ, जिसके लिए फ्लैमिंग, चैन तथा फ्लौरे को 1945 में नोबल पुरस्कार (Nobel Prize) मिला।
  • ऐंटीबॉयोटिकों ने प्लेग (Plague), काली खाँसी (Whooping cough), डिप्थीरिया/गलघोंटू (Diphtheria), और लैप्रोसी/कुष्ठरोग (Leprosy) जैसे भयानक रोगों के उपचार में बहुत मदद की है।

3.3 रसायन, एंजाइम तथा अन्य जैवसक्रिय अणु (Chemicals, Enzymes and other Bioactive Molecules)

परीक्षा के लिए यह भाग अत्यंत महत्वपूर्ण (VVIP) है। छात्रों को निम्नलिखित सूची याद रखनी चाहिए:

  • कार्बनिक अम्ल (Organic Acids):
    • सिट्रिक अम्ल (Citric acid): ऐस्परजिलस नाइगर (Aspergillus niger) – एक कवक (Fungus)।
    • एसीटिक अम्ल (Acetic acid): एसीटोबैक्टर एसिटाई (Acetobacter aceti) – एक जीवाणु (Bacterium)।
    • ब्युट्रिक अम्ल (Butyric acid): क्लोस्ट्रीडियम ब्यूटायलिकम (Clostridium butylicum) – एक जीवाणु।
    • लैक्टिक अम्ल (Lactic acid): लैक्टोबैसिलस (Lactobacillus) – एक जीवाणु।
  • ऐल्कोहल (Alcohol): ऐथानॉल (Ethanol) के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए यीस्ट (सैकेरोमाइसीज सैरीविसेएई) का प्रयोग किया जाता है।
  • एंजाइम (Enzymes):
    • लाइपेज (Lipases): इसका प्रयोग अपमार्जक संरूपण (Detergent formulations) तथा धुलाई में कपड़ों से तेल के धब्बे (Oily stains) हटाने में किया जाता है।
    • पैक्टीनेजिज (Pectinases) तथा प्रोटीऐजिज (Proteases): इनके प्रयोग के कारण बाजार से खरीदे गए बोतल वाले फलों के रस (Bottled fruit juices) अधिक स्वच्छ एवं साफ (Clarified) दिखाई पड़ते हैं।
    • स्ट्रैप्टोकाइनेज (Streptokinase): यह स्ट्रैप्टोकोकस (Streptococcus) जीवाणु द्वारा उत्पन्न होता है जो आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic engineering) द्वारा रूपांतरित किया जाता है। इसका प्रयोग उन रोगियों में रक्त वाहिकाओं (Blood vessels) से थक्का (Clot) हटाने में ‘थक्का स्फोटन’ (Clot buster) के रूप में किया जाता है, जो हृदयाघात (Myocardial infarction) से गुजरते हैं।
  • जैव सक्रिय अणु (Bioactive Molecules):
    • साइक्लोस्पोरिन-ए (Cyclosporin A): इसका प्रयोग अंग प्रतिरोपण (Organ transplant) में प्रतिरक्षा निरोधक (Immunosuppressive) कारक के रूप में किया जाता है। इसका उत्पादन ट्राइकोडर्मा पॉलोस्पोरम (Trichoderma polysporum) नामक कवक (Fungus) से किया जाता है।
    • स्टैटिन (Statins): मोनॉस्कस परप्यूरीअस (Monascus purpureus) नामक यीस्ट (Yeast) से उत्पन्न इस स्टैटिन का प्रयोग रक्त-कॉलिस्ट्रॉल (Blood cholesterol) को कम करने वाले कारक के रूप में किया जाता है। यह कॉलिस्ट्रॉल के संश्लेषण (Synthesis) के लिए उत्तरदायी एंजाइम का स्पर्धा संदमन (Competitive inhibition) करता है।

4. वाहितमल उपचार में सूक्ष्मजीव (Microbes in Sewage Treatment)

प्रतिदिन नगर एवं शहरों से व्यर्थ-जल (Waste water) की एक बहुत बड़ी मात्रा जनित होती है, जिसका प्रमुख घटक मनुष्य का मलमूत्र (Human excreta) है। इसे वाहित मल (Sewage) कहते हैं। इसमें कार्बनिक पदार्थों (Organic matter) की बड़ी मात्रा तथा रोगजनकीय (Pathogenic) सूक्ष्मजीव पाये जाते हैं। इसे सीधे प्राकृतिक जल स्रोतों (नदियों, झरनों) में नहीं छोड़ा जा सकता, इसलिए इसका उपचार वाहितमल संयंत्र (Sewage Treatment Plants – STPs) में परपोषित सूक्ष्मजीवों (Heterotrophic microbes) द्वारा किया जाता है। यह दो चरणों में होता है:

4.1 प्राथमिक उपचार (Primary Treatment)

  • मूलभूत रूप से उपचार के इस पद में वाहित मल से बड़े छोटे कणों का निस्यंदन (Filtration) तथा अवसादन (Sedimentation) द्वारा भौतिक रूप (Physically) से अलग कर दिये जाते हैं।
  • आरंभ में तैरते हुए कूड़े-करकट को अनुक्रमिक निस्यंदन (Sequential filtration) द्वारा हटाया जाता है।
  • इसके बाद शितबालुकाश्म (Grit – मृदा तथा छोटे गुटिकाएँ/pebbles) को अवसादन (Sedimentation) द्वारा निष्कासित किया जाता है।
  • सभी ठोस कण जो नीचे बैठते हैं, वे प्राथमिक आंपक (Primary sludge) बनाते हैं और ऊपर का तरल प्लावी (Supernatant) या बहिःस्राव (Effluent) कहलाता है, जिसे द्वितीयक उपचार के लिए ले जाया जाता है।

4.2 द्वितीयक उपचार या जीव विज्ञानीय उपचार (Secondary or Biological Treatment)

  • प्राथमिक बहिःस्राव (Primary effluent) को बड़े वायुवीय टैंकों (Aeration tanks) में से गुजारा जाता है जहाँ इसे लगातार यांत्रिक रूप से हिलाया (Agitated) जाता है और वायु (Air) पंप की जाती है।
  • इससे लाभदायक वायुवीय सूक्ष्मजीवियों की प्रबल वृद्धि ऊर्णक (Flocs) के रूप में होने लगती है। ऊर्णक कवकीय तंतुओं से जुड़े जीवाणुओं के जाली जैसी संरचना का झुंड (Masses of bacteria associated with fungal filaments to form mesh-like structures) है।
  • वृद्धि के दौरान यह सूक्ष्मजीव बहिःस्राव में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों के प्रमुख भागों की खपत करते हैं, जिससे जल का बी ओ डी (BOD – Biochemical Oxygen Demand) घट जाता है।
  • BOD क्या है? BOD ऑक्सीजन की उस मात्रा को संदर्भित करता है जो जीवाणु द्वारा एक लीटर पानी में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों की खपत कर उन्हें ऑक्सीकृत (Oxidize) कर दें। जब व्यर्थ-जल का बी ओ डी अधिक होगा, तब इसकी प्रदूषण क्षमता (Polluting potential) भी अधिक होगी।
  • जब BOD पर्याप्त घट जाता है, तो बहिःस्राव को निःसादन टैंक (Settling tank) में भेजते हैं जहाँ जीवाणु झुंड (Flocs) अवसाद में बदल जाते हैं जिसे सक्रियीत आपंक (Activated Sludge) कहते हैं।
  • सक्रियीत आपंक के एक छोटे भाग को पीछे वायुवीय टैंक में पंप करते हैं (निवेशद्रव्य/Inoculum की तरह), और बचे हुए मुख्य भाग को बड़े टैंक में पंप किया जाता है जिसे अवायवीय आपंक संपाचित्र (Anaerobic Sludge Digester) कहते हैं।
  • यहाँ अवायवीय जीवाणु (Anaerobic bacteria) आपंक में उपस्थित जीवाणुओं तथा कवकों का पाचन कर लेते हैं और मीथेन (Methane), हाइड्रोजन सल्फाइड (H_{2}S) तथा कार्बन डायक्साइड (CO_{2}) उत्पन्न करते हैं। ये गैसें बॉयोगैस (Biogas) का निर्माण करती हैं जो ज्वलनशील (Inflammable) होती है और ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्रयोग की जाती है।
  • उपचारित बहिःस्राव को नदियों में छोड़ दिया जाता है।

नोट: पर्यावरण तथा वन मंत्रालय ने हमारी नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए गंगा ऐक्शन प्लान (Ganga Action Plan) तथा यमुना ऐक्शन प्लान (Yamuna Action Plan) शुरू किया है।

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5. बायोगैस के उत्पादन में सूक्ष्मजीव (Microbes in Biogas Production)

बायोगैस गैसों का मिश्रण है (जिसमें मुख्यतः मीथेन शामिल है) जो सूक्ष्मजीवी सक्रियता द्वारा उत्पन्न होती हैं।

  • मीथैनोजेन (Methanogens): कुछ बैक्टीरिया जो सैल्यूलोजीय (Cellulosic) पदार्थों पर अवायुवीय (Anaerobically) रूप से उगते हैं, वे CO_{2} तथा H_{2} के साथ-साथ बड़ी मात्रा में मीथेन (Methane) उत्पन्न करते हैं। सामूहिक रूप से इन जीवाणुओं को मीथैनोजेन कहते हैं (उदाहरण: मीथैनोबैक्टीरियम / Methanobacterium)।
  • यह जीवाणु पशुओं के रूमेन (Rumen – प्रथम आमाशय) में पाए जाते हैं जहाँ ये सैल्यूलोज को तोड़ने में सहायक होते हैं और पशुओं के पोषण में भूमिका निभाते हैं। (मानव सैल्यूलोज को नहीं पचा सकते)।
  • पशुओं के मल (Dung), जिसे गोबर कहते हैं, में ये जीवाणु प्रचुर संख्या में पाए जाते हैं। इसलिए गोबर का प्रयोग बायोगैस पैदा करने में किया जाता है जिसे ‘गोबर गैस’ (Gobar Gas) भी कहते हैं।

बायोगैस संयंत्र (Biogas Plant)

  • बायोगैस संयंत्र में एक 10-15 फीट गहरा टैंक होता है जिसमें अपशिष्ट और गोबर की कर्दम (Slurry) भरी जाती है।
  • कर्दम के ऊपर एक सचल ढक्कन (Floating cover) रखा जाता है, जो गैस बनने पर ऊपर को उठता है।
  • एक निकास (Outlet) पाइप से आस-पास के घरों में बायोगैस की आपूर्ति की जाती है।
  • उपयोग की गई कर्दम को दूसरे निकास से बाहर निकाल कर उर्वरक (Fertilizer) के रूप में प्रयोग किया जाता है।
  • भारत में बॉयोगैस उत्पादन की प्रौद्योगिकी का विकास भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI – Indian Agricultural Research Institute) तथा खादी एवं ग्रामीण उद्योग आयोग (KVIC – Khadi and Village Industries Commission) के प्रयासों से हुआ।

6. जैव नियंत्रण कारक के रूप में सूक्ष्मजीव (Microbes as Biocontrol Agents)

पादप रोगों (Plant diseases) तथा पीड़कों (Pests) के नियंत्रण के लिए जैव वैज्ञानिक विधि (Biological methods) का प्रयोग ही जैव नियंत्रण (Biocontrol) है। रसायनों (कीटनाशियों और पीड़कनाशियों / Insecticides and Pesticides) का प्रयोग पर्यावरण, मृदा, जल और मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

  • जैव नियंत्रण का सिद्धांत: कृषि में यह विधि प्राकृतिक परभक्षण (Natural predation) पर निर्भर करती है। आर्गेनिक फॉर्मर (Organic farmers) मानते हैं कि जैव विविधता (Biodiversity) ही स्वास्थ्य की कुंजी है। वे कीटों (पीड़कों) का पूर्ण उन्मूलन (Eradication) नहीं करते, बल्कि उन्हें एक संतुलित स्तर पर रखते हैं क्योंकि उनके बिना लाभप्रद परभक्षी तथा परजीवी जीवित नहीं रह पायेंगे।
  • उदाहरण (Examples of Biocontrol):
    • भृंग (Beetle – Ladybird) जिन पर लाल तथा काली धारियाँ पाई जाती हैं, और व्याध पतंग (Dragonfly) क्रमशः ऐफिडों (Aphids) तथा मच्छरों (Mosquitoes) से छुटकारा दिलवाने में लाभप्रद हैं।
    • बैक्टीरिया (Bacteria): वैसीलस थूरिजिऐंसिस (Bacillus thuringiensis – Bt) का प्रयोग बटरफ्लाई केटरपिलर (Butterfly caterpillars) के नियंत्रण में किया जाता है। इसके शुष्क बीजाणु (Dried spores) पानी में मिलाकर सरसों (Brassicas) और फल वृक्षों पर छिड़के जाते हैं। लार्वा की पाचननली (Gut) में टॉक्सिन (Toxin) निकलता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering) से Bt-कॉटन (Bt-Cotton) जैसे पादप विकसित किए गए हैं।
    • कवक (Fungi): ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) प्रजाति एक मुक्त जीवित कवक (Free-living fungi) है जो मूल-पारिस्थितिक तंत्र (Root ecosystems) में पादप रोगजनकों (Plant pathogens) के खिलाफ प्रभावशील जैव नियंत्रण कारक है।
    • विषाणु (Viruses): बैक्यूलोवायरेसिस (Baculoviruses) ऐसे रोगजनक हैं जो कीटों तथा संधिपादों (Arthropods) पर हमला करते हैं। अधिकांश बैक्यूलोवायरेसिस जो जैव नियंत्रण में प्रयुक्त होते हैं, वे न्यूक्लिओपॉलीहीड्रोसिसवायरस (Nucleopolyhedrovirus) जीनस (Genus) के अंतर्गत आते हैं। ये प्रजाति-विशेष (Species-specific), संकरे स्पैक्ट्रम (Narrow-spectrum) कीटनाशी हैं, जिनका पादपों, स्तनधारियों, पक्षियों या लक्ष्यविहीन कीटों (Non-target insects) पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता। यह समाकलित पीड़क प्रबंधन (IPM – Integrated Pest Management) के लिए उत्तम हैं।

7. जैव उर्वरक के रूप में सूक्ष्मजीव (Microbes as Biofertilizers)

रसायन उर्वरकों (Chemical fertilizers) के पर्यावरण पर हानिकारक प्रभावों के कारण अब कार्बनिक खेती (Organic farming) और जैव उर्वरकों (Biofertilizers) का प्रयोग बढ़ रहा है। जैव उर्वरक वे जीव हैं जो मृदा (Soil) की पोषक गुणवत्ता (Nutrient quality) को बढ़ाते हैं। इनके मुख्य स्रोत जीवाणु (Bacteria), कवक (Fungi) तथा सायनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria) होते हैं।

  • जीवाणु (Bacteria):
    • राइजोबियम (Rhizobium): लैग्यूमिनस (Leguminous) पादपों की जड़ों की ग्रंथियों (Nodules) में सहजीवी संबंध (Symbiotic association) बनाता है और वायुमंडलीय नाइट्रोजन (Atmospheric nitrogen) का स्थिरीकरण (Fixation) करता है।
    • मुक्तावस्था जीवाणु (Free-living bacteria): ऐज़ोस्पाइरिलम (Azospirillum) तथा ऐजोबैक्टर (Azotobacter) मृदा में मुक्तावस्था में रहते हुए नाइट्रोजन स्थिर करते हैं।
  • कवक (Fungi):
    • कवक पादपों के साथ सहजीवी संबंध बनाते हैं जिसे माइकोराइजा (Mycorrhiza) कहते हैं।
    • ग्लोमस (Glomus) जीनस के सदस्य माइकोराइजा बनाते हैं, जो मृदा से फास्फोरस (Phosphorus) का अवशोषण कर पादपों को देते हैं। ऐसे पादप मूलवातोढ़ रोगजनक (Root-borne pathogens) के प्रति प्रतिरोधकता, लवणता (Salinity) और सूखे (Drought) के प्रति सहनशीलता दिखाते हैं।
  • सायनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria):
    • ये स्वपोषित (Autotrophic) सूक्ष्मजीव हैं जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर सकते हैं।
    • उदाहरण: ऐनाबीना (Anabaena), नॉसटॉक (Nostoc), ऑसिलेटोरिया (Oscillatoria)।
    • धान के खेत (Paddy fields) में सायनोबैक्टीरिया (नील हरित शैवाल – Blue Green Algae) महत्त्वपूर्ण जैव उर्वरक की भूमिका निभाते हैं, जो मृदा में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाकर उसकी उर्वरता (Fertility) बढ़ा देते हैं।

8. परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय एवं लघु उत्तरीय प्रश्न (Important FAQs for 12th Board Exams)

प्रश्न 1: प्राथमिक तथा द्वितीयक वाहितमल उपचार के बीच मुख्य अंतर क्या है? उत्तर: प्राथमिक वाहितमल उपचार एक भौतिक प्रक्रिया (Physical process) है जिसमें कूड़े-करकट और कंकड़-पत्थर को निस्यंदन (Filtration) और अवसादन (Sedimentation) द्वारा अलग किया जाता है। इसके विपरीत, द्वितीयक उपचार एक जीव विज्ञानीय प्रक्रिया (Biological process) है जिसमें वायुवीय और अवायवीय सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके कार्बनिक पदार्थों (Organic matter) को विघटित किया जाता है और जल का बी ओ डी (BOD) कम किया जाता है।

प्रश्न 2: बी ओ डी (BOD – Biochemical Oxygen Demand) से आप क्या समझते हैं? उत्तर: बी ओ डी ऑक्सीजन की उस मात्रा को संदर्भित करता है जो जीवाणुओं द्वारा एक लीटर पानी में उपस्थित कार्बनिक पदार्थों को ऑक्सीकृत (Oxidize) करने के लिए आवश्यक होती है। जल का बी ओ डी जितना अधिक होगा, उसकी प्रदूषण क्षमता (Polluting potential) उतनी ही अधिक होगी। वाहितमल उपचार संयंत्रों में सूक्ष्मजीव जल का बी ओ डी घटाने का कार्य करते हैं।

प्रश्न 3: किन्हीं दो कवक (Fungi) प्रजातियों के नाम लिखें, जिनका प्रयोग प्रतिजैविकों (Antibiotics) और अन्य जैव सक्रिय अणुओं के उत्पादन में किया जाता है।

उत्तर:

  1. पैनीसीलियम नोटेटम (Penicillium notatum): इससे पहली ऐंटीबॉयोटिक ‘पैनीसीलिन’ (Penicillin) प्राप्त की गई थी।
  2. ट्राइकोडर्मा पॉलोस्पोरम (Trichoderma polysporum): इससे ‘साइक्लोस्पोरिन-ए’ (Cyclosporin A) प्राप्त किया जाता है, जो अंग प्रतिरोपण (Organ transplant) में प्रतिरक्षा निरोधक (Immunosuppressive) के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 4: जैव उर्वरक (Biofertilizers) किस प्रकार से मृदा उर्वरता (Soil fertility) को बढ़ाते हैं? उत्तर: जैव उर्वरक मृदा की पोषक गुणवत्ता को जैविक तरीके से बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए, ‘राइजोबियम’, ‘ऐज़ोस्पाइरिलम’ और ‘ऐजोबैक्टर’ जैसे जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर पादपों को उपलब्ध कराते हैं। ‘ग्लोमस’ नामक कवक माइकोराइजा (Mycorrhiza) बनाकर मिट्टी से फास्फोरस का अवशोषण करते हैं। इसी प्रकार सायनोबैक्टीरिया (नील हरित शैवाल) धान के खेतों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर मृदा में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाते हैं, जिससे उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।

प्रश्न 5: उस सूक्ष्मजीवी का नाम बताओ जिससे साइक्लोस्पोरिन-ए तथा स्टैटिन प्राप्त किया जाता है। उत्तर: साइक्लोस्पोरिन-ए कवक ट्राइकोडर्मा पॉलोस्पोरम (Trichoderma polysporum) से प्राप्त होता है। स्टैटिन यीस्ट मोनॉस्कस परप्यूरीअस (Monascus purpureus) से प्राप्त किया जाता है जो रक्त कॉलिस्ट्रॉल (Blood cholesterol) कम करने में प्रयोग होता है।

निष्कर्ष (Conclusion): यह स्पष्ट है कि सूक्ष्मजीव केवल बीमारियाँ ही पैदा नहीं करते, बल्कि मानव समाज के कल्याण (Human Welfare) में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भोजन निर्माण से लेकर जीवन रक्षक दवाओं (Antibiotics), प्रदूषण नियंत्रण (Sewage Treatment) और टिकाऊ कृषि (Biofertilizers & Biocontrol) तक, सूक्ष्मजीव हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। परीक्षा में सफलता के लिए वैज्ञानिक नामों (जैसे Saccharomyces cerevisiae, Bacillus thuringiensis, Monascus purpureus) का लिखित अभ्यास अवश्य करें। शुभकामनाएँ!