Soil Composition and Soil Formation🌍🌱
1. मृदा का संघटन (Soil Composition) 🧪💧💨🌿
Soil Composition and Soil Formation : मृदा एक जटिल और गतिशील मिश्रण है जिसमें मुख्य रूप से चार प्रमुख घटक होते हैं। इन घटकों का अनुपात मृदा के प्रकार, स्थान और प्रबंधन के आधार पर भिन्न हो सकता है, लेकिन एक स्वस्थ मृदा का आयतन के आधार पर लगभग निम्नलिखित संघटन होता है:
घटक | औसत प्रतिशत (आयतन द्वारा) |
खनिज पदार्थ | 45% |
कार्बनिक पदार्थ | 5% |
जल | 25% |
वायु | 25% |
आइए इन घटकों को विस्तार से समझते हैं:
- खनिज पदार्थ (Mineral Matter) – लगभग 45%: यह मृदा का सबसे बड़ा घटक है, जो चट्टानों के भौतिक, रासायनिक और जैविक अपक्षय (weathering) से प्राप्त छोटे-छोटे कणों से बना होता है। इनमें रेत (sand) (0.05 मिमी से 2.0 मिमी), गाद (silt) (0.002 मिमी से 0.05 मिमी) और चिकनी मिट्टी (clay) (0.002 मिमी से कम) के कण शामिल होते हैं। ये मृदा को ठोस ढाँचा प्रदान करते हैं और पौधों के लिए आवश्यक पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्वों के भंडार के रूप में कार्य करते हैं।
- कार्बनिक पदार्थ (Organic Matter) – लगभग 5%: यह मृदा में उपस्थित पौधों और जानवरों के मृत अवशेषों के अपघटन से बनता है, जिसमें ह्यूमस (humus), आंशिक रूप से अपघटित पदार्थ और जीवित सूक्ष्मजीव शामिल होते हैं। यह मृदा की उर्वरता बढ़ाता है (पोषक तत्वों का स्रोत), मृदा की जल-धारण क्षमता में सुधार करता है, मृदा की संरचना को बेहतर बनाता है और सूक्ष्मजीवों के लिए ऊर्जा स्रोत प्रदान करता है।
- मृदा जल (Soil Water) – लगभग 25%: यह मृदा के ठोस कणों के बीच के रंध्रों (pores) में भरा होता है। यह पौधों द्वारा पोषक तत्वों के अवशोषण के लिए एक आवश्यक विलायक का कार्य करता है और सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है।
- मृदा वायु (Soil Air) – लगभग 25%: यह भी मृदा के रंध्रों में भरा होता है, जब रंध्र पानी से भरे नहीं होते। यह पौधों की जड़ों और मृदा में रहने वाले जीवों को ऑक्सीजन (O2) प्रदान करता है, जो श्वसन के लिए आवश्यक है।
2. मृदा निर्माण (Soil Formation) ⏳
मृदा निर्माण, जिसे पेडोजेनेसिस (Pedogenesis) भी कहा जाता है, वह जटिल और धीमी प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से चट्टानी पदार्थ और कार्बनिक पदार्थ एक साथ मिलकर मृदा का निर्माण करते हैं। यह प्रक्रिया लाखों वर्षों से चल रही है।
मृदा निर्माण की प्रक्रिया:
- अपक्षय (Weathering): चट्टानों का भौतिक (तापमान परिवर्तन), रासायनिक (जल, ऑक्सीजन की क्रिया) और जैविक (पौधों की जड़ें, सूक्ष्मजीव) कारकों द्वारा छोटे टुकड़ों में टूटना।
- कार्बनिक पदार्थों का संचय: मृत पौधों और जानवरों के अवशेषों का सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन होकर ह्यूमस का निर्माण।
- संस्तर का विकास (Horizon Development): समय के साथ मृदा में विभिन्न परतें (मृदा संस्तर) विकसित होती हैं, जैसे O, A, B, C और R संस्तर, जो उनके गुणों में भिन्न होते हैं।
- स्थानांतरण और रूपांतरण: जल के माध्यम से पोषक तत्वों और खनिजों का एक संस्तर से दूसरे में जाना (निक्षालन) और खनिजों व कार्बनिक पदार्थों का रासायनिक परिवर्तन।
मृदा निर्माण को प्रभावित करने वाले कारक (CLORPT):
- जलवायु (Climate): तापमान और वर्षा अपक्षय की दर और प्रकार को सीधे प्रभावित करते हैं।
- जीव (Organisms): वनस्पति, जीव-जंतु और सूक्ष्मजीव मृदा निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- स्थलाकृति (Relief/Topography): ढलान, ऊंचाई और जल निकासी मृदा के विकास को प्रभावित करते हैं।
- मूल सामग्री (Parent Material): वह चट्टान जिससे मृदा बनी है, मृदा की बनावट, खनिज संरचना और प्रारंभिक पोषक तत्व सामग्री को निर्धारित करती है।
- समय (Time): मृदा निर्माण एक बहुत धीमी प्रक्रिया है; एक इंच शीर्ष मृदा बनने में सैकड़ों से हजारों वर्ष लग सकते हैं।
3. मध्यप्रदेश की मृदाएँ (Soils of Madhya Pradesh) 🏞️
मध्यप्रदेश अपनी विविध भौगोलिक विशेषताओं के कारण विभिन्न प्रकार की मृदाओं से समृद्ध है। ये मृदाएँ राज्य की कृषि उत्पादकता और पैटर्न को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती हैं। मध्यप्रदेश की प्रमुख मृदाएँ इस प्रकार हैं:
- काली मृदा (Black Soil / Regur Soil):
- वितरण: राज्य के सबसे बड़े क्षेत्र में, विशेषकर मालवा पठार, निमाड़, सतपुड़ा क्षेत्र और नर्मदा घाटी में पाई जाती है।
- विशेषताएँ: इसका निर्माण दक्कन ट्रैप की बेसाल्ट चट्टानों के अपक्षय से हुआ है। टिटेनिफेरस मैग्नेटाइट के कारण काला रंग होता है। इसमें उच्च चिकनी मिट्टी (clay) सामग्री (40-60%) होती है, जिससे यह अत्यधिक जल-धारण क्षमता वाली होती है और सूखने पर इसमें गहरी दरारें पड़ जाती हैं (स्वतः जुताई वाली मृदा)। लौह, मैग्नीशियम, एल्यूमीनियम और चूना से भरपूर, लेकिन नाइट्रोजन, फास्फोरस और कार्बनिक पदार्थों में कमी होती है।
- फसलें: कपास, सोयाबीन, गेहूं, मूंगफली।
- लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil):
- वितरण: राज्य के पूर्वी भागों में, जैसे बघेलखंड क्षेत्र, मंडला, बालाघाट, सीधी, शहडोल जिलों में पाई जाती है।
- विशेषताएँ: ग्रेनाइट और नीस चट्टानों के अपक्षय से निर्मित। लौह ऑक्साइड के कारण लाल रंग और जल योजन के कारण पीला रंग होता है। कम उपजाऊ होती है और नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा कार्बनिक पदार्थों में कमी होती है। इसमें निक्षालन अधिक होता है।
- फसलें: ज्वार, बाजरा, चावल और कुछ दालें।
- जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil):
- वितरण: मुख्य रूप से राज्य के उत्तरी भागों में, जैसे भिंड, मुरैना, ग्वालियर और चंबल बेसिन में पाई जाती है।
- विशेषताएँ: नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के निक्षेपण से बनती है, इसलिए अत्यधिक उपजाऊ होती है। पोटाश और चूना से भरपूर, लेकिन नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस की कमी होती है।
- फसलें: गेहूं, चना, सरसों, ज्वार, तिलहन।
- लेटेराइट मृदा (Laterite Soil):
- वितरण: राज्य के बहुत छोटे हिस्से में, जैसे छिंदवाड़ा, बालाघाट और बैतूल के कुछ ऊंचे और पठारी क्षेत्रों में पाई जाती है।
- विशेषताएँ: भारी वर्षा और उच्च तापमान वाले क्षेत्रों में तीव्र निक्षालन (leaching) के कारण बनती है, जहाँ लौह तथा एल्यूमीनियम के ऑक्साइड शेष रहते हैं। यह अनुत्पादक और कम उपजाऊ होती है।
- फसलें: आमतौर पर बागवानी फसलें (जैसे चाय), मोटे अनाज।
- मिश्रित मृदा (Mixed Soil):
- वितरण: राज्य के विभिन्न हिस्सों में, जहाँ एक मृदा दूसरे में मिलती है, जैसे बुंदेलखंड क्षेत्र के कुछ भागों में।
- विशेषताएँ: यह लाल, पीली और काली मृदा के मिश्रण से बनती है, और इसकी विशेषताएँ घटक मृदाओं के अनुपात पर निर्भर करती हैं।
- फसलें: मृदा के विशिष्ट गुणों के आधार पर विविध फसलें।