बहुफसली खेती की आवश्यकता और महत्व Needs and Importance of Multiple Cropping

बहुफसली खेती (Multiple Cropping): अर्थ, आवश्यकता, महत्व और प्रकार 🌾🔄

Needs and Importance of Multiple Cropping : बहुफसली खेती एक कृषि पद्धति है जिसमें किसान एक ही भूमि पर एक कृषि वर्ष के भीतर दो या दो से अधिक फसलें उगाते हैं। यह एकल फसल (Monoculture) के विपरीत है, जहाँ पूरे वर्ष में केवल एक ही फसल उगाई जाती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए बहुफसली खेती का महत्व अत्यधिक है क्योंकि यह खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद करती है।

बहुफसली खेती के प्रकार (Types of Multiple Cropping)

बहुफसली खेती को मुख्य रूप से दो व्यापक श्रेणियों में बांटा जा सकता है, जिनके तहत विभिन्न उप-प्रकार आते हैं:

1. अनुक्रमिक बहुफसली खेती (Sequential Multiple Cropping)

इस प्रकार में, एक फसल की कटाई के बाद ही दूसरी फसल की बुवाई की जाती है। खेत थोड़े समय के लिए ही खाली रहता है।

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  • क. एकल अनुक्रमिक फसल (Mono-sequential Cropping):
    • इसमें एक कृषि वर्ष में केवल दो फसलें एक के बाद एक उगाई जाती हैं।
    • उदाहरण: धान (खरीफ) की कटाई के बाद गेहूं (रबी) की बुवाई।
  • ख. तिहरी फसल (Triple Cropping):
    • एक ही वर्ष में तीन फसलें एक के बाद एक उगाई जाती हैं।
    • उदाहरण: धान (खरीफ) की कटाई के बाद गेहूं (रबी) और फिर मूंग (जायद) की बुवाई।
  • ग. चतुष्फसलीय फसल (Quadruple Cropping):
    • एक ही वर्ष में चार फसलें एक के बाद एक उगाई जाती हैं। यह बहुत गहन प्रणाली है और इसके लिए अनुकूल जलवायु और सिंचाई सुविधाओं की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण: धानमक्काआलूमूंग

2. समवर्ती बहुफसली खेती (Concurrent Multiple Cropping)

इस प्रकार में, दो या दो से अधिक फसलें एक ही खेत में, एक ही समय में, कुछ अवधि के लिए साथ-साथ उगाई जाती हैं।

  • क. अंतर्वर्ती खेती (Intercropping):
    • अर्थ: एक ही खेत में, एक ही समय में, दो या दो से अधिक फसलें एक साथ उगाई जाती हैं, लेकिन एक निश्चित पंक्ति पैटर्न में। इस पैटर्न का उद्देश्य फसलों के बीच प्रतिस्पर्धा को कम करना और उनके पूरक संबंधों का लाभ उठाना है।
    • उदाहरण:
      • मक्का की दो पंक्तियों के बाद मूंग या उड़द की दो पंक्तियाँ।
      • गेहूं की नौ पंक्तियों के बाद सरसों की एक पंक्ति।
      • कपास की पंक्तियों के बीच सोयाबीन या मूंगफली
  • ख. मिश्रित फसल (Mixed Cropping):
    • अर्थ: यह अंतर्वर्ती खेती का एक सरल रूप है जहाँ दो या दो से अधिक फसलों के बीजों को एक साथ मिलाकर बेतरतीब ढंग से बोया जाता है, बिना किसी विशिष्ट पंक्ति पैटर्न के।
    • उदाहरण: ज्वार और अरहर को एक साथ मिलाकर बोना।
  • ग. रिले फसल (Relay Cropping):
    • अर्थ: इसमें पहली फसल की कटाई से ठीक पहले या कटाई के दौरान दूसरी फसल की बुवाई की जाती है। यह प्रणाली पहली फसल के पूरी तरह से पकने और कटने का इंतजार नहीं करती। यह समय का अधिकतम उपयोग करती है।
    • उदाहरण: धान की फसल अभी खेत में खड़ी है और पकने के करीब है, उसी समय उसके बीच में मसूर या लाही (सरसों की एक किस्म) की बुवाई कर देना। मकई में मटर बोना, जबकि मकई अभी भी खेत में खड़ी है।
  • घ. ओवरलैपिंग फसल (Overlapping Cropping):
    • अर्थ: यह रिले क्रॉपिंग के समान है, जहाँ एक फसल के जीवन चक्र का अंत दूसरी फसल के जीवन चक्र की शुरुआत के साथ ओवरलैप होता है। यह अक्सर तब किया जाता है जब पहली फसल अपनी अधिकतम वृद्धि की अवस्था पार कर चुकी होती है और दूसरी फसल को स्थापित होने के लिए पर्याप्त स्थान और संसाधन मिल जाते हैं। इसमें पहली फसल की कटाई और दूसरी फसल की बुवाई के बीच न्यूनतम या कोई खाली समय नहीं होता।
    • उदाहरण: आलू की फसल की कटाई से पहले ही उसके बीच में मिर्च या मूली की बुवाई कर देना। जब आलू के कंद पूरी तरह विकसित हो जाते हैं और पत्तियां मरने लगती हैं, तो अगली फसल के बीज बो दिए जाते हैं।

बहुफसली खेती की आवश्यकता (Necessity of Multiple Cropping)

आज के कृषि और सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में बहुफसली खेती की आवश्यकता कई कारणों से बढ़ गई है:

  1. बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्य सुरक्षा:
    • आवश्यकता: भारत की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, और इस विशाल आबादी के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है। कृषि योग्य भूमि सीमित है और उसका विस्तार संभव नहीं है। ऐसे में, प्रति इकाई क्षेत्र से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना अनिवार्य हो जाता है। बहुफसली खेती कम भूमि से अधिक खाद्य उत्पादन सुनिश्चित करती है।
  2. छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका सुरक्षा:
    • आवश्यकता: भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत जोत वाले हैं (कुल किसानों का 86% से अधिक 2 हेक्टेयर से कम भूमि वाले हैं)। उनके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए पर्याप्त भूमि नहीं होती। बहुफसली खेती उन्हें अपनी सीमित भूमि से अधिकतम उपज और आय प्राप्त करने में सक्षम बनाती है।
    • लाभ: आय के कई स्रोत होने से किसी एक फसल की विफलता से होने वाले नुकसान का जोखिम कम होता है।
  3. जलवायु परिवर्तन का सामना और जोखिम न्यूनीकरण:
    • आवश्यकता: जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितता (जैसे सूखा, अत्यधिक वर्षा, कीटों का अप्रत्याशित प्रकोप) बढ़ गई है। यदि किसान केवल एक फसल उगाता है, तो उसके खराब होने पर उसे भारी नुकसान हो सकता है। बहुफसली खेती में, यदि एक फसल जलवायु संबंधी समस्या के कारण विफल हो जाती है, तो दूसरी फसल से कुछ उपज प्राप्त होने की संभावना बनी रहती है, जिससे जोखिम कम होता है।
  4. संसाधनों का कुशल उपयोग:
    • आवश्यकता: कृषि में पानी, पोषक तत्व और सूर्य का प्रकाश जैसे प्राकृतिक संसाधनों का कुशल उपयोग महत्वपूर्ण है। बहुफसली खेती विभिन्न फसलों की जड़ों की गहराई, पोषक तत्वों की आवश्यकता और प्रकाश के उपयोग के पैटर्न में अंतर का लाभ उठाकर इन संसाधनों का बेहतर उपयोग करती है।
  5. इनपुट लागत में कमी और मृदा स्वास्थ्य में सुधार:
    • आवश्यकता: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता पर्यावरण और किसानों की जेब दोनों पर भारी पड़ती है। बहुफसली खेती मिट्टी की उर्वरता को प्राकृतिक रूप से बढ़ा सकती है और कीटों/रोगों को नियंत्रित कर सकती है।

बहुफसली खेती का महत्व (Importance of Multiple Cropping)

बहुफसली खेती के महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  1. बढ़ी हुई भूमि उत्पादकता (Increased Land Productivity):
    • महत्व: यह प्रति इकाई क्षेत्र में अधिकतम उपज सुनिश्चित करती है। चूंकि भूमि सीमित है, इसलिए इसी भूमि से अधिक उत्पादन प्राप्त करना खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
    • उदाहरण: एक हेक्टेयर भूमि पर वर्ष भर में तीन फसलें (धान-गेहूं-मूंग) उगाकर, एकल फसल की तुलना में तीन गुना तक अधिक अनाज/दलहन प्राप्त किया जा सकता है।
  2. जोखिम प्रबंधन (Risk Management):
    • महत्व: यह कृषि जोखिमों को कम करने का एक प्रभावी तरीका है। यदि मौसम की प्रतिकूलता या कीट/रोग के कारण एक फसल विफल हो जाती है, तो किसान पूरी तरह से बर्बादी से बच जाता है क्योंकि उसके पास दूसरी फसल से आय का स्रोत होता है।
  3. मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार (Improved Soil Health):
    • महत्व: विभिन्न फसलें मिट्टी पर अलग-अलग प्रभाव डालती हैं। बहुफसली खेती, खासकर जब इसमें दलहनी फसलों और हरी खाद वाली फसलें शामिल हों, मिट्टी की उर्वरता और संरचना को बनाए रखने में मदद करती है।
    • लाभ: दलहनी फसलें (जैसे चना, मसूर, अरहर) वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में स्थिर करती हैं, जिससे अगली फसल के लिए प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन उपलब्ध होता है। यह रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करता है।
  4. कीट और खरपतवार नियंत्रण (Pest and Weed Control):
    • महत्व: विभिन्न फसलों की उपस्थिति कीटों और रोगों के प्रसार को बाधित करती है, क्योंकि कई कीट और रोग विशिष्ट फसलों के लिए ही होते हैं। साथ ही, खेत को लगातार फसलों से ढका रखने से खरपतवारों को उगने और पनपने के लिए कम जगह मिलती है।
    • उदाहरण: सरसों को गेहूं के साथ या टमाटर के साथ गेंदा लगाने से कुछ कीटों को दूर रखने में मदद मिल सकती है।
  5. संसाधनों का अधिकतम उपयोग (Optimal Resource Utilization):
    • महत्व: बहुफसली खेती पानी, पोषक तत्व और सूर्य के प्रकाश जैसे संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग करती है। अलग-अलग जड़ गहराई वाली फसलें मिट्टी की विभिन्न परतों से पोषक तत्व खींचती हैं।
    • लाभ: यह सिंचाई के पानी की बर्बादी को कम करता है और पोषक तत्वों के लीचिंग को रोकता है।
  6. आर्थिक लाभ और ग्रामीण रोजगार (Economic Benefits and Rural Employment):
    • महत्व: बढ़ी हुई उपज और आय के विविध स्रोतों से किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। साल भर खेत में काम होने से ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय श्रमिकों के लिए अधिक रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
    • डेटा: उच्च फसल गहनता (Cropping Intensity) वाले क्षेत्रों में कृषि श्रमिकों के लिए अधिक काम उपलब्ध होता है।
  7. पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability):
    • महत्व: रासायनिक इनपुट पर कम निर्भरता, मिट्टी के कटाव में कमी और जैव विविधता को बढ़ावा देकर, बहुफसली खेती दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता में योगदान करती है।

कुल मिलाकर बहुफसली खेती केवल एक कृषि अभ्यास नहीं है बल्कि यह भारत जैसे देश के लिए खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण समृद्धि और पर्यावरणीय स्थिरता प्राप्त करने का एक आवश्यक स्तंभ है। यह किसानों को बदलते पर्यावरणीय और आर्थिक परिदृश्यों के अनुकूल ढलने में मदद करते हुए भूमि संसाधनों का अधिकतम और टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित करती है।

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