बहुफसली खेती (Multiple Cropping) और अंतर्वर्ती खेती (Intercropping) 🌾🤝
Multiple Cropping and Intercropping : फसल उत्पादन में बहुफसली खेती (Multiple Cropping) और अंतर्वर्ती खेती (Intercropping) दो महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं, जिन्हें अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग किया जाता है लेकिन इनमें कुछ बारीक अंतर हैं। आइए इन्हें महत्व, सिद्धांतों, आवश्यकताओं, गुणों (लाभों) और दोषों (हानियों) के साथ विस्तार से समझते हैं .
बहुफसली खेती (Multiple Cropping) 🔄🌿
अर्थ: बहुफसली खेती एक व्यापक शब्द है जो एक ही भूमि पर एक कृषि वर्ष के भीतर दो या दो से अधिक फसलें उगाने की प्रथा को संदर्भित करता है। इसमें विभिन्न समय पर या एक साथ फसलें उगाना शामिल हो सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य भूमि के प्रति इकाई क्षेत्र से अधिकतम उपज प्राप्त करना है।
बहुफसली खेती के प्रकार:
- अनुक्रमिक फसल (Sequential Cropping): इस विधि में, एक फसल की कटाई के बाद तुरंत दूसरी फसल की बुवाई की जाती है।
- उदाहरण:
- धान (खरीफ) की कटाई के बाद गेहूं (रबी) और फिर मूंग (जायद) की बुवाई।
- मक्का (खरीफ) के बाद आलू (रबी) और फिर प्याज (जायद)।
- उदाहरण:
- समवर्ती फसल (Concurrent Cropping) / अंतर्वर्ती खेती (Intercropping): इस विधि में, एक ही समय में एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलें उगाई जाती हैं। यह नीचे विस्तार से समझाया गया है।
बहुफसली खेती के गुण (Advantages of Multiple Cropping):
- बढ़ी हुई कुल उपज: एक ही भूमि से पूरे वर्ष में अधिक फसल प्राप्त होती है, जिससे समग्र उत्पादकता बढ़ती है।
- आय में वृद्धि और स्थिरता: विभिन्न फसलों से आय के कई स्रोत बनते हैं, जिससे बाजार या मौसम की अनिश्चितता से होने वाले नुकसान का जोखिम कम होता है।
- संसाधनों का कुशल उपयोग: भूमि, पानी, प्रकाश और पोषक तत्वों जैसे संसाधनों का वर्ष भर अधिकतम उपयोग होता है।
- मृदा स्वास्थ्य में सुधार: लगातार फसलें उगने से मिट्टी का कटाव कम होता है और कुछ फसलें (जैसे दलहनी) मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं।
- रोजगार सृजन: साल भर कृषि गतिविधियों के कारण श्रमिकों के लिए अधिक रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
बहुफसली खेती के दोष (Disadvantages of Multiple Cropping):
- गहन प्रबंधन: एक साथ कई फसलों या अनुक्रमिक फसलों का प्रबंधन अधिक जटिल हो सकता है, जिसमें उचित योजना, बुवाई का समय और कटाई का समन्वय शामिल है।
- संसाधनों पर दबाव: यदि उचित योजना न हो, तो लगातार फसलें उगाने से मिट्टी के पोषक तत्व तेजी से समाप्त हो सकते हैं और सिंचाई के पानी की आवश्यकता बढ़ सकती है।
- बढ़ी हुई लागत: अधिक फसलों के लिए अधिक बीज, उर्वरक और कभी-कभी श्रम की आवश्यकता हो सकती है।
- कीट और रोग का जोखिम: यदि फसल चक्र का ठीक से पालन नहीं किया जाता है, तो विशिष्ट कीटों और रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है जो कई फसलों को प्रभावित करते हैं।
- मशीनीकरण में कठिनाई: अनुक्रमिक फसल में कटाई के तुरंत बाद अगली बुवाई करनी होती है, जिससे मशीनीकरण में तेजी की आवश्यकता होती है।
अंतर्वर्ती खेती (Intercropping) 🌾🤝
अर्थ: अंतर्वर्ती खेती, बहुफसली खेती का एक विशिष्ट प्रकार है। इसमें एक ही खेत में, एक ही समय में, दो या दो से अधिक फसलें एक साथ उगाई जाती हैं, लेकिन एक निश्चित पंक्ति पैटर्न (specific row pattern) में। इस पैटर्न का उद्देश्य फसलों के बीच प्रतिस्पर्धा को कम करना और उनके पूरक संबंधों का लाभ उठाना है।
उदाहरण:
- मक्का की दो पंक्तियों के बाद मूंग या उड़द की दो पंक्तियाँ।
- गेहूं की नौ पंक्तियों के बाद सरसों की एक पंक्ति।
- कपास की पंक्तियों के बीच सोयाबीन या मूंगफली।
अंतर्वर्ती खेती का महत्व (Importance of Intercropping):
- भूमि का अधिकतम उपयोग और उच्च उत्पादकता:
- महत्व: अंतर्वर्ती खेती एकल फसल की तुलना में प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक उत्पादन करती है (उच्च भूमि समकक्ष अनुपात – LER प्राप्त होता है)। विभिन्न फसलों की जड़ प्रणालियाँ और पोषण संबंधी आवश्यकताएँ अलग-अलग होती हैं, जिससे वे मिट्टी के विभिन्न स्तरों से पोषक तत्वों और पानी का कुशलतापूर्वक उपयोग कर पाती हैं।
- LER डेटा: कई अध्ययनों से पता चला है कि अंतर्वर्ती फसल में LER 1 से अधिक होता है। उदाहरण के लिए, यदि गेहूं और सरसों को एक साथ उगाया जाता है और LER 1.25 आता है, तो इसका मतलब है कि अंतर्वर्ती फसल में 25% अधिक उत्पादन मिला।
- जोखिम का फैलाव और आय में स्थिरता:
- महत्व: यदि किसी प्राकृतिक आपदा (जैसे सूखा, बीमारी) या बाजार की कीमतों में गिरावट के कारण एक फसल खराब हो जाती है, तो दूसरी फसल से किसान को कुछ आय प्राप्त हो जाती है। यह किसानों की खाद्य सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करता है।
- मिट्टी की उर्वरता में सुधार:
- महत्व: फलीदार फसलों (जैसे मूंग, उड़द, अरहर) को अनाज या अन्य फसलों के साथ उगाने से मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है। यह रासायनिक नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता को कम करता है और मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ को बढ़ाता है।
- कीटों और रोगों का बेहतर नियंत्रण:
- महत्व: विभिन्न फसलों की उपस्थिति कीटों और रोगजनकों को भ्रमित कर सकती है या उनके प्रसार को धीमा कर सकती है। कुछ फसलें कीटों के लिए प्रतिकारक (repellent) के रूप में कार्य करती हैं, जबकि अन्य मित्र कीटों को आकर्षित करती हैं।
- उदाहरण: मक्का के साथ कुछ दलहनी फसलें उगाने से फॉल आर्मीवर्म जैसे कीटों का प्रकोप कम हो सकता है। गेंदा को सब्जियों के साथ उगाने से सूत्रकृमि (nematodes) नियंत्रित हो सकते हैं।
- खरपतवारों का प्रभावी दमन:
- महत्व: जब कई फसलें एक साथ उगाई जाती हैं, तो वे मिट्टी की सतह को अधिक कुशलता से ढक लेती हैं, जिससे खरपतवारों को उगने और पनपने के लिए कम जगह मिलती है। यह खरपतवार नियंत्रण की लागत और आवश्यकता को कम करता है।
- संसाधनों का कुशल उपयोग:
- महत्व: विभिन्न फसलों की ऊँचाई, जड़ गहराई और पोषक तत्व अवशोषण पैटर्न में अंतर होता है। यह पानी, पोषक तत्वों और प्रकाश जैसे संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग सुनिश्चित करता है।
- उदाहरण: एक लंबी बढ़ने वाली फसल (जैसे ज्वार) के साथ एक छोटी फसल (जैसे मूंग) उगाई जा सकती है, जिससे सूर्य के प्रकाश का बेहतर उपयोग होता है।
- मिट्टी का कटाव कम करना:
- महत्व: खेत को लगातार फसलों से ढका रखने से बारिश और हवा से होने वाला मिट्टी का कटाव कम होता है। विभिन्न फसलों की जड़ें मिट्टी को बांधे रखती हैं।
अंतर्वर्ती खेती के सिद्धांत (Principles of Intercropping):
- विभिन्न विकास अवधियों वाली फसलें: ऐसी फसलें चुनें जिनकी परिपक्वता अवधि अलग-अलग हो। एक छोटी अवधि की फसल को तब काटा जा सकता है जब लंबी अवधि की फसल अभी भी बढ़ रही हो।
- उदाहरण: मक्का के साथ मूंग या उड़द।
- विभिन्न जड़ प्रणालियों वाली फसलें: ऐसी फसलें चुनें जिनकी जड़ें मिट्टी में अलग-अलग गहराई तक जाती हों, ताकि वे विभिन्न परतों से पोषक तत्वों और पानी का कुशल अवशोषण कर सकें।
- उदाहरण: गहरी जड़ वाली अरहर के साथ उथली जड़ वाली ज्वार।
- विभिन्न पोषक तत्वों की आवश्यकता वाली फसलें: एक पोषक तत्व-गहन फसल (जैसे अनाज) के साथ एक पोषक तत्व-जोड़ने वाली फसल (जैसे दालें) उगाएं।
- उदाहरण: गेहूं के साथ चना।
- प्रतिस्पर्धा से बचें: ऐसी फसलें न चुनें जो पानी, पोषक तत्वों, प्रकाश या स्थान के लिए एक-दूसरे के साथ अत्यधिक प्रतिस्पर्धा करती हों। फसलों को एक-दूसरे के पूरक होना चाहिए।
- उदाहरण: ऐसी फसलें जो अत्यधिक छाया करती हों, उन्हें छोटी या प्रकाश-प्रेमी फसलों के साथ नहीं उगाना चाहिए।
- कीट/रोग प्रतिरोधक क्षमता और प्रतिकारक गुण: ऐसी फसलों को शामिल करें जो एक-दूसरे के कीटों या रोगों के प्रति प्रतिरोधी हों या कुछ हानिकारक कीटों को दूर भगाती हों।
- उदाहरण: गेंदा को सब्जियों के साथ उगाना।
- उचित पंक्ति अनुपात और रिक्ति: फसलों को इस तरह से बोना चाहिए जिससे वे एक-दूसरे के विकास में बाधा न डालें बल्कि एक-दूसरे का समर्थन करें। पंक्ति अनुपात और रिक्ति का निर्धारण महत्वपूर्ण है।
- उदाहरण: 1:1, 2:1 या 2:2 के पंक्ति अनुपात में फसलों की बुवाई।
अंतर्वर्ती खेती की आवश्यकता (Necessity of Intercropping):
- खाद्य सुरक्षा और बढ़ती जनसंख्या: सीमित कृषि योग्य भूमि पर बढ़ती आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रति इकाई क्षेत्र से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना आवश्यक है।
- जलवायु परिवर्तन का सामना: मौसम की अनिश्चितता बढ़ने के कारण, अंतर्वर्ती खेती जोखिम को कम करके किसानों को इन चुनौतियों का सामना करने में मदद करती है।
- टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ: रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करके और मिट्टी के स्वास्थ्य को बढ़ावा देकर, अंतर्वर्ती खेती दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता में योगदान करती है।
- छोटे और सीमांत किसानों के लिए आजीविका सुरक्षा: भारत में अधिकांश किसान छोटे और सीमांत जोत वाले हैं (86% से अधिक किसान 2 हेक्टेयर से कम भूमि वाले हैं), जिनके लिए अंतर्वर्ती खेती जैसी पद्धतियाँ अपनी छोटी भूमि से अधिकतम लाभ उठाने में बहुत उपयोगी हैं।
- इनपुट लागत में कमी: मिट्टी की उर्वरता में सुधार (दलहनी फसलों द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण से) और प्राकृतिक कीट/खरपतवार नियंत्रण से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की खरीद पर होने वाला खर्च कम हो जाता है।
अंतर्वर्ती खेती के गुण (Advantages of Intercropping):
- प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक उपज: LER 1 से अधिक होने के कारण एकल फसल की तुलना में कुल उत्पादन बढ़ जाता है।
- जोखिम कम होना: किसी एक फसल के खराब होने की स्थिति में दूसरी फसल से आय सुनिश्चित होती है।
- मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि: विशेष रूप से दलहनी फसलों को शामिल करने से मिट्टी में नाइट्रोजन जुड़ता है।
- खरपतवार, कीट और रोग नियंत्रण: विभिन्न फसलों की उपस्थिति से कीटों और रोगों का प्रसार कम होता है और खरपतवारों का दमन होता है।
- संसाधन दक्षता: पानी, पोषक तत्वों और प्रकाश का बेहतर उपयोग होता है।
- आय के स्रोत में विविधता: किसान को एक से अधिक फसल उत्पाद प्राप्त होते हैं।
- मिट्टी का कटाव कम होना: मिट्टी की सतह अधिक समय तक ढकी रहती है।
अंतर्वर्ती खेती के दोष (Disadvantages of Intercropping):
- जटिल प्रबंधन: विभिन्न फसलों की अलग-अलग आवश्यकताएं होने के कारण बुवाई, उर्वरक अनुप्रयोग, सिंचाई और कटाई का प्रबंधन अधिक जटिल हो सकता है।
- मशीनीकरण में कठिनाई: पंक्ति पैटर्न के बावजूद, कटाई और अन्य कृषि कार्यों के लिए बड़ी मशीनों का उपयोग कठिन हो सकता है, जिससे अधिक मानवीय श्रम की आवश्यकता हो सकती है।
- प्रतिस्पर्धा का जोखिम: यदि फसलों का चयन या पंक्ति अनुपात गलत हो, तो फसलें एक-दूसरे के साथ पानी, पोषक तत्वों या प्रकाश के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं, जिससे किसी एक या दोनों की उपज कम हो सकती है।
- विशेषज्ञता की आवश्यकता: किसानों को फसलों के संयोजन, उनकी आवश्यकताओं और प्रबंधन के बारे में बेहतर ज्ञान की आवश्यकता होती है।
- रासायनिक अनुप्रयोग में जटिलता: यदि अलग-अलग फसलों के लिए अलग-अलग उर्वरकों या कीटनाशकों की आवश्यकता होती है, तो उनका सटीक अनुप्रयोग मुश्किल हो सकता है।
संक्षेप में बहुफसली खेती एक व्यापक अवधारणा है जिसमें एक वर्ष में एक ही भूमि पर कई फसलें उगाना शामिल है, चाहे वे अनुक्रमिक रूप से (एक के बाद एक) या समवर्ती रूप से (एक साथ) उगाई गई हों। अंतर्वर्ती खेती बहुफसली खेती का एक विशिष्ट प्रकार है जहाँ फसलों को एक साथ, एक निश्चित पैटर्न में उगाया जाता है ताकि उनके बीच पूरक संबंध स्थापित हो सकें और संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो सके। दोनों ही पद्धतियाँ टिकाऊ कृषि और किसानों की आजीविका सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं, बशर्ते उनका उचित प्रबंधन किया जाए।