मध्यप्रदेश में फसल चक्र की पद्धतियाँ और फसल चक्र तीव्रता Crop Rotation in MP and Rotation Intensity

मध्यप्रदेश में फसल चक्र की पद्धतियाँ और फसल चक्र तीव्रता 🌾🔄

Crop Rotation in MP and Rotation Intensity: मध्यप्रदेश जिसे ‘सोया प्रदेश’ और ‘दलहन प्रदेश’ के नाम से भी जाना जाता है, भारत के कृषि मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर फसलों के प्रभावी प्रबंधन और भूमि के सतत उपयोग पर निर्भर करती है जिसमें फसल चक्र (Crop Rotation) एक केंद्रीय भूमिका निभाता है। फसल चक्र केवल एक पारंपरिक प्रथा नहीं है, बल्कि यह मिट्टी के स्वास्थ्य, कीट और रोग प्रबंधन और अंततः कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।

मध्यप्रदेश में फसल चक्र की प्रमुख पद्धतियाँ 🗺️

मध्यप्रदेश में कृषि विविध जलवायु क्षेत्रों और मिट्टी के प्रकारों में फैली हुई है, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न फसल चक्र प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं:

  1. सोयाबीन-गेहूं चक्र (Soybean-Wheat Rotation):
    • यह मध्यप्रदेश के मालवा और निमाड़ क्षेत्रों सहित व्यापक रूप से अपनाई जाने वाली सबसे प्रमुख फसल चक्र है।
    • सोयाबीन खरीफ (मानसून) में उगाई जाती है, जो मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करके उर्वरता में सुधार करती है।
    • इसके बाद गेहूं रबी (सर्दी) में बोया जाता है, जो मिट्टी में बचे हुए पोषक तत्वों का उपयोग करता है।
    • महत्व: यह चक्र मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करता है और किसानों को दो प्रमुख नकदी फसलों से आय प्राप्त करने का अवसर देता है। हालाँकि, कुछ क्षेत्रों में लगातार सोयाबीन-गेहूं चक्र से पोषक तत्वों की कमी और विशिष्ट कीटों/रोगों का प्रकोप बढ़ने की चुनौतियां सामने आई हैं, जिससे इसके स्थायित्व पर सवाल उठने लगे हैं।
  2. धान-गेहूं चक्र (Rice-Wheat Rotation):
    • यह पूर्वी और उत्तर-पूर्वी मध्यप्रदेश के उन क्षेत्रों में प्रचलित है जहाँ धान की खेती प्रमुख है विशेष रूप से सिंचित क्षेत्रों में।
    • धान खरीफ में और गेहूं रबी में उगाया जाता है।
    • चुनौतियाँ: इस चक्र में पानी का अधिक उपयोग, मिट्टी के पोषक तत्वों का अत्यधिक निष्कर्षण और धान-गेहूं के विशिष्ट कीटों और रोगों का विकास प्रमुख चुनौतियाँ हैं। स्थिरता बनाए रखने के लिए अक्सर हरी खाद या दलहनी फसलों को शामिल करने की सलाह दी जाती है।
  3. मक्का-गेहूं/सरसों चक्र (Maize-Wheat/Mustard Rotation):
    • मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों, विशेषकर जहाँ पानी की उपलब्धता सीमित है या मिट्टी हल्की है, वहाँ मक्का खरीफ में उगाया जाता है।
    • मक्का के बाद रबी में गेहूं या सरसों की बुवाई की जाती है।
    • लाभ: सरसों कीट चक्र को तोड़ने और मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ जोड़ने में मदद कर सकती है।
  4. दलहनी-अनाज चक्र (Legume-Cereal Rotation):
    • मध्यप्रदेश में दालों (चना, अरहर, मसूर, मूंग, उड़द) का बड़ा उत्पादक होने के कारण, दलहनी फसलों को अनाज (जैसे गेहूं, ज्वार, बाजरा) के साथ चक्र में शामिल करना एक आम और फायदेमंद प्रथा है।
    • लाभ: दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन जोड़कर रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करती हैं और मिट्टी की संरचना में सुधार करती हैं। यह विशेष रूप से उन वर्षा-आधारित क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है जहाँ रासायनिक इनपुट सीमित होते हैं।
    • उदाहरण: अरहर (खरीफ) के बाद गेहूं या चना (रबी)।
  5. कपास-गेहूं/दलहन चक्र (Cotton-Wheat/Pulses Rotation):
    • पश्चिमी मध्यप्रदेश के कपास उत्पादक क्षेत्रों में, कपास (खरीफ) के बाद गेहूं या दलहनी फसलें (रबी) उगाई जाती हैं।
    • महत्व: कपास एक पोषक तत्व-गहन फसल है, इसलिए उसके बाद दलहनी फसलें उगाने से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है।
  6. विविध सब्जियों और चारा फसलों का समावेशन:
    • छोटे किसानों और सिंचित क्षेत्रों में, आर्थिक लाभ और मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए सब्जियों (जैसे आलू, प्याज, लहसुन, टमाटर) और चारा फसलों (जैसे बरसीम, जई) को फसल चक्र में शामिल किया जाता है।

रोटेशन तीव्रता (Rotation Intensity) 📈

परिभाषा: रोटेशन तीव्रता (जिसे फसल गहनता या सस्यन गहनता भी कहा जाता है) एक विशिष्ट कृषि वर्ष में एक ही भूमि पर उगाई गई फसलों की संख्या को दर्शाता है। यह भूमि के उपयोग की दक्षता और उत्पादकता का एक संकेतक है।

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गणना सूत्र:

शुद्ध बोया गया क्षेत्र (Net Sown Area): वह कुल भूमि क्षेत्र जिस पर एक कृषि वर्ष में कम से कम एक बार फसल उगाई जाती है।

  • सकल फसल क्षेत्र (Gross Cropped Area): एक कृषि वर्ष में विभिन्न फसलों के अंतर्गत बोया गया कुल क्षेत्र। यदि एक ही भूमि पर एक वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं, तो उसे उतनी ही बार गिना जाता है।

उदाहरण: यदि किसी किसान के पास 1 हेक्टेयर भूमि है:

  • यदि वह केवल खरीफ में एक फसल उगाता है, तो सकल फसल क्षेत्र 1 हेक्टेयर होगा और रोटेशन तीव्रता होगी:
  • 1/1​×100=100%
  • यदि वह खरीफ में एक और रबी में एक फसल उगाता है, तो सकल फसल क्षेत्र 2 हेक्टेयर होगा और रोटेशन तीव्रता होगी:
  • 2/1​×100=200% (यह दोहरी फसल प्रणाली है)
  • यदि वह खरीफ, रबी और जायद तीनों में फसल उगाता है, तो सकल फसल क्षेत्र 3 हेक्टेयर होगा और रोटेशन तीव्रता होगी: 3/1​×100=300% (यह तिहरी फसल प्रणाली है)

मध्यप्रदेश में रोटेशन तीव्रता का परिदृश्य 📊

  • मध्यप्रदेश में औसत फसल गहनता (Cropping Intensity) लगभग 172% है (नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यह 2018-19 के आसपास है)। यह दर्शाता है कि औसतन, एक ही कृषि भूमि पर एक वर्ष में लगभग 1.72 फसलें उगाई जाती हैं।
  • यह दर राष्ट्रीय औसत (जो लगभग 140-150% के आसपास है) से अधिक है, जो मध्यप्रदेश में कृषि भूमि के अपेक्षाकृत कुशल उपयोग को दर्शाता है।
  • वृद्धि के कारक:
    • सिंचाई का विस्तार: नहरों, कुओं और नलकूपों के माध्यम से सिंचाई सुविधाओं के विस्तार ने किसानों को रबी और जायद में भी फसलें उगाने में सक्षम बनाया है, जिससे फसल गहनता बढ़ी है। मध्यप्रदेश में लगभग 75.86% शुद्ध बोया गया क्षेत्र सिंचित है (2018-19 के अनुसार), जो उच्च फसल गहनता का एक प्रमुख कारण है।
    • कम अवधि वाली किस्मों का विकास: ऐसी फसलों की किस्मों का विकास जो कम समय में पक जाती हैं, किसानों को एक ही वर्ष में अधिक फसलें लेने की अनुमति देता है।
    • सरकारी योजनाएँ और प्रोत्साहन: विभिन्न सरकारी योजनाएँ, जैसे कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और परम्परागत कृषि विकास योजना, किसानों को बेहतर फसल चक्र अपनाने और गहनता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।
  • चुनौतियाँ: उच्च रोटेशन तीव्रता के बावजूद, कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक जल दोहन, मिट्टी की उर्वरता का तेजी से ह्रास और कीट/रोगों का बढ़ता दबाव जैसी चुनौतियाँ सामने आई हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए संतुलित फसल चक्र और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है।

मध्यप्रदेश में कृषि की सफलता के लिए फसल चक्र की सही पद्धतियों को अपनाना और रोटेशन तीव्रता का विवेकपूर्ण प्रबंधन करना आवश्यक है। यह न केवल किसानों की आय में वृद्धि करेगा, बल्कि राज्य की कृषि भूमि के दीर्घकालिक स्थायित्व को भी सुनिश्चित करेगा।

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