जैविक खेती: अर्थ, महत्व और उपयोगिता Organic Farming Meaning Importance and Utility

जैविक खेती: अर्थ, महत्व, उपयोगिता, चुनौतियाँ और सरकारी प्रयास 🌿🌍

Organic Farming Meaning Importance and Utility : जैविक खेती (Organic Farming) कृषि की एक ऐसी विधि है जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हुए खेती करने पर जोर देती है। यह आधुनिक रासायनिक कृषि पद्धतियों के प्रतिकूल प्रभावों को दूर करने और एक स्थायी तथा स्वस्थ कृषि प्रणाली बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि यह खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और पर्यावरणीय स्थिरता को सीधे प्रभावित करती है।

1. जैविक खेती का अर्थ (Meaning of Organic Farming)

जैविक खेती कृषि की वह प्रणाली है जो संश्लेषित उर्वरकों, रासायनिक कीटनाशकों, खरपतवारनाशकों और आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) के उपयोग को प्रतिबंधित करती है या पूरी तरह से त्याग देती है। इसके बजाय, यह मिट्टी की उर्वरता और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए प्राकृतिक विधियों पर निर्भर करती है।

जैविक खेती के मुख्य सिद्धांत और घटक:

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  • मृदा स्वास्थ्य पर ध्यान: यह मिट्टी को एक जीवित प्रणाली के रूप में देखती है। रासायनिक इनपुट के बजाय, यह जैविक खाद (जैसे गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट), हरी खाद, और फसल चक्र के माध्यम से मिट्टी के स्वास्थ्य और सूक्ष्मजीव गतिविधि को बढ़ाती है।
  • जैव विविधता का संरक्षण: यह खेत में और उसके आसपास पौधों और जीवों की विविधता को बढ़ावा देती है, जिससे प्राकृतिक कीट नियंत्रक और परागणकर्ता आकर्षित होते हैं।
  • प्राकृतिक कीट और रोग नियंत्रण: रासायनिक कीटनाशकों के बजाय, यह जैविक कीट नियंत्रण विधियों (जैसे मित्र कीटों का उपयोग), फसल चक्र, प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग और एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) पर निर्भर करती है।
  • टिकाऊपन: इसका उद्देश्य एक ऐसी कृषि प्रणाली बनाना है जो पर्यावरण के अनुकूल हो, संसाधनों का संरक्षण करे और लंबी अवधि के लिए उत्पादक बनी रहे।
  • पशु कल्याण: यदि पशुधन शामिल है, तो उनके प्राकृतिक व्यवहार, स्वास्थ्य और कल्याण का विशेष ध्यान रखा जाता है।

सरल शब्दों में, जैविक खेती “प्रकृति के साथ काम करती है, उसके खिलाफ नहीं”।

2. जैविक खेती का महत्व (Importance of Organic Farming)

जैविक खेती का महत्व बहुआयामी है, जो पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिरता तीनों को प्रभावित करता है:

  • पर्यावरणीय लाभ:
    • मिट्टी का स्वास्थ्य: रासायनिक उर्वरकों के बिना, जैविक खाद मिट्टी की संरचना, जल-धारण क्षमता और सूक्ष्मजीव गतिविधि को बढ़ाती है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और कटाव कम होता है।
    • जल और वायु प्रदूषण में कमी: रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के उपयोग से जल स्रोतों (नदी, झील, भूजल) का प्रदूषण होता है और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। जैविक खेती इन प्रदूषकों को कम करती है।
    • जैव विविधता का संरक्षण: यह खेत और उसके आसपास कीटों, पक्षियों, मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और अन्य जीवों के लिए एक स्वस्थ वातावरण बनाती है, जिससे जैव विविधता को बढ़ावा मिलता है।
  • मानव स्वास्थ्य लाभ:
    • स्वस्थ और पौष्टिक भोजन: जैविक रूप से उगाए गए उत्पादों में हानिकारक रासायनिक अवशेष नहीं होते हैं, जिससे वे उपभोग के लिए सुरक्षित होते हैं। कई अध्ययनों से पता चला है कि जैविक उत्पादों में पारंपरिक उत्पादों की तुलना में पोषक तत्व (जैसे एंटीऑक्सिडेंट) अधिक हो सकते हैं।
    • रोगों का जोखिम कम: किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को रसायनों के संपर्क में आने से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों से बचाया जाता है।
  • आर्थिक और सामाजिक लाभ:
    • लागत में कमी: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की खरीद पर होने वाला खर्च कम हो जाता है, जिससे किसानों की उत्पादन लागत घटती है
    • आय में वृद्धि: जैविक उत्पादों की बाजार में मांग बढ़ रही है और अक्सर वे पारंपरिक उत्पादों की तुलना में अधिक मूल्य पर बिकते हैं, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होती है।
    • स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: जैविक खेती अक्सर छोटे और मध्यम किसानों द्वारा की जाती है, जो स्थानीय खाद्य प्रणालियों को मजबूत करती है।
    • दीर्घकालिक स्थिरता: यह कृषि प्रणाली को लंबी अवधि के लिए टिकाऊ बनाती है, जिससे भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण होता है।

डेटा: भारत जैविक किसानों की कुल संख्या के मामले में विश्व में नंबर वन पर है, और जैविक खेती के तहत प्रमाणित क्षेत्र के मामले में चौथे स्थान पर है। 2024-25 वित्त वर्ष के दौरान, भारत में जैविक खेती के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल 7.3 मिलियन हेक्टेयर था, और लगभग 3.6 मिलियन मीट्रिक टन प्रमाणित जैविक उत्पादों का उत्पादन किया गया। सिक्किम भारत का पहला पूर्ण जैविक राज्य है। (स्रोत: APEDA, IFOAM सांख्यिकी 2022, डाउन टू अर्थ)।

3. जैविक खेती की उपयोगिता (Utility of Organic Farming)

जैविक खेती की उपयोगिता इसके व्यापक लाभों से स्पष्ट होती है, जो व्यक्तिगत से लेकर वैश्विक स्तर तक प्रभाव डालते हैं:

  • उत्पाद की गुणवत्ता और सुरक्षा: यह सुनिश्चित करती है कि उत्पाद रसायन-मुक्त और सुरक्षित हों। उपभोक्ता अब अपने स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक हैं और रासायनिक मुक्त भोजन को प्राथमिकता दे रहे हैं। जैविक उत्पादों को अक्सर उनके बेहतर स्वाद और पोषण मूल्य के लिए सराहा जाता है।
  • पर्यावरण संरक्षण में योगदान: यह जल, मृदा और वायु प्रदूषण को कम करके पर्यावरण को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह जैव विविधता को बनाए रखने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी सहायक है।
  • संसाधन दक्षता: जैविक खेती पानी और ऊर्जा जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अधिक कुशलता से उपयोग करने में मदद करती है। मिट्टी की जल-धारण क्षमता में सुधार होने से सिंचाई की आवश्यकता कम होती है।
  • किसानों का सशक्तिकरण: किसानों को महंगी रासायनिक इनपुट पर निर्भरता से मुक्त करती है, जिससे वे अधिक आत्मनिर्भर और लागत प्रभावी बनते हैं। यह उन्हें बाजार में अपने उत्पादों के लिए बेहतर मूल्य प्राप्त करने में भी मदद करती है।
  • सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति: जैविक खेती कई संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में योगदान करती है, जैसे भूख समाप्त करना (SDG 2), अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण (SDG 3), स्वच्छ जल और स्वच्छता (SDG 6), जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन (SDG 12), और जलवायु कार्रवाई (SDG 13)
  • बाजार की बढ़ती मांग को पूरा करना: वैश्विक स्तर पर जैविक उत्पादों की मांग में लगातार वृद्धि हो रही है। भारत जैसे देश के लिए, यह एक बड़ा निर्यात अवसर प्रस्तुत करती है, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है। भारत से जैविक निर्यात में अलसी के बीज, तिल, सोयाबीन, चाय, औषधीय पौधे, चावल और दालें शामिल हैं।

4. जैविक खेती की चुनौतियाँ (Challenges of Organic Farming)

जैविक खेती को व्यापक रूप से अपनाने और सफल बनाने में कई चुनौतियाँ हैं:

  1. प्रारंभिक वर्षों में कम उपज (Lower Yields in Initial Years):
    • जब किसान रासायनिक खेती से जैविक खेती में संक्रमण करते हैं, तो पहले 2-3 वर्षों में अक्सर उत्पादन में गिरावट आती है। मिट्टी को अपनी प्राकृतिक उर्वरता पुनः प्राप्त करने में समय लगता है। यह किसानों को जैविक खेती अपनाने से हतोत्साहित करता है, खासकर उन छोटे किसानों को जिनकी आजीविका पूरी तरह से उत्पादन पर निर्भर करती है।
    • डेटा: कुछ अध्ययनों से पता चला है कि पहले वर्ष में उपज में 30-50% तक की गिरावट आ सकती है, जबकि तीसरे वर्ष तक यह गिरावट 10-15% तक कम हो जाती है।
  2. जैविक आदानों की सीमित उपलब्धता और उच्च लागत (Limited Availability and High Cost of Organic Inputs):
    • रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के विकल्प के रूप में पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद (गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट), जैव-उर्वरक, और जैव-कीटनाशकों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है।
    • इन जैविक आदानों का उत्पादन या खरीद अक्सर महंगी होती है और इन्हें बनाने में समय और श्रम लगता है।
  3. तकनीकी ज्ञान और प्रशिक्षण का अभाव (Lack of Technical Knowledge and Training):
    • जैविक खेती के लिए विशिष्ट ज्ञान और कौशल की आवश्यकता होती है जो पारंपरिक खेती से भिन्न होते हैं।
    • कई किसानों के पास मिट्टी के स्वास्थ्य प्रबंधन, प्राकृतिक कीट नियंत्रण, फसल चक्र और जैविक खाद तैयार करने की सही तकनीकों का अभाव है। उचित प्रशिक्षण और विस्तार सेवाओं की कमी है।
  4. प्रमाणीकरण प्रक्रिया की जटिलता और लागत (Complexity and Cost of Certification Process):
    • जैविक उत्पादों को “जैविक” के रूप में बेचने के लिए प्रमाणीकरण (Organic Certification) अनिवार्य है। यह प्रक्रिया जटिल, समय लेने वाली और महंगी होती है।
    • छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह प्रक्रिया विशेष रूप से कठिन होती है, जिससे वे अपने उत्पादों का प्रीमियम मूल्य प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। भागीदारी गारंटी प्रणाली (PGS-India) जैसे वैकल्पिक तरीके मौजूद हैं, लेकिन उनकी स्वीकार्यता अभी भी एक मुद्दा है।
  5. विपणन और मूल्य श्रृंखला की समस्याएँ (Marketing and Value Chain Issues):
    • जैविक उत्पादों के लिए अलग से संगठित बाजार और वितरण नेटवर्क का अभाव है।
    • किसानों को अक्सर अपने उत्पादों के लिए उचित मूल्य नहीं मिल पाता क्योंकि बिचौलियों की भूमिका अधिक होती है।
    • शीत भंडारण, प्रसंस्करण इकाइयों और परिवहन जैसी बुनियादी ढांचागत कमियाँ भी जैविक उत्पादों के विपणन को बाधित करती हैं।
  6. खरपतवार और कीट प्रबंधन (Weed and Pest Management):
    • रासायनिक खरपतवारनाशकों और कीटनाशकों के बिना, खरपतवार और कीटों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है और इसमें अधिक श्रम की आवश्यकता होती है।
  7. संक्रमण अवधि का प्रबंधन (Management of Transition Period):
    • रासायनिक से जैविक में परिवर्तन की संक्रमण अवधि के दौरान किसानों को तकनीकी और वित्तीय दोनों तरह की सहायता की आवश्यकता होती है, क्योंकि इस दौरान उन्हें कम उपज और प्रमाणन संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

5. भारत में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकारी प्रयास (Government Efforts to Promote Organic Farming in India)

भारत सरकार ने जैविक खेती के महत्व को पहचानते हुए इसे बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं और पहल शुरू की हैं:

  1. परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY):
    • शुरुआत: 2015 में शुरू की गई।
    • उद्देश्य: यह क्लस्टर-आधारित जैविक खेती को बढ़ावा देती है। इसमें किसानों के समूहों को 20 हेक्टेयर या उससे अधिक के समूहों में जैविक खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
    • सहायता: पीकेवीवाई के तहत, किसानों को 3 साल की अवधि के लिए ₹31,500 प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसमें जैविक आदानों की खरीद, प्रमाणीकरण लागत, और क्षमता निर्माण शामिल है। ₹15,000 प्रति हेक्टेयर किसानों को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के रूप में दिए जाते हैं।
    • डेटा: 2023-24 तक, PKVY के तहत लगभग 8.16 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जैविक खेती के अंतर्गत लाया गया है, जिसमें 16.19 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं। (स्रोत: PIB)
  2. पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट (MOVCDNER):
    • शुरुआत: 2015 में विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत के राज्यों (असम, त्रिपुरा, मेघालय, आदि) के लिए शुरू की गई।
    • उद्देश्य: यह संपूर्ण मूल्य श्रृंखला दृष्टिकोण पर केंद्रित है, जिसमें उत्पादन से लेकर कटाई के बाद के प्रबंधन, प्रसंस्करण, प्रमाणन और विपणन तक का समर्थन शामिल है।
    • सहायता: MOVCDNER के तहत, किसानों को 3 साल की अवधि के लिए ₹46,500 प्रति हेक्टेयर की सहायता प्रदान की जाती है, जिसमें से ₹32,500 प्रति हेक्टेयर प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के रूप में दिए जाते हैं।
    • डेटा: इस योजना के तहत लगभग 4.64 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है।
  3. जैविक उत्पादन के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPOP):
    • शुरुआत: 2001 में वाणिज्य मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया।
    • उद्देश्य: यह भारत में जैविक उत्पादों के लिए प्रमाणीकरण मानकों को निर्धारित करता है और उनके निर्यात को बढ़ावा देता है। यह योजना APEDA (कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) द्वारा कार्यान्वित की जाती है।
    • उपयोगिता: यह योजना जैविक उत्पादों के लिए एक विश्वसनीय प्रमाणन प्रणाली प्रदान करती है, जिससे भारतीय जैविक उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में मान्यता मिलती है।
  4. भागीदारी गारंटी प्रणाली (PGS-India):
    • उद्देश्य: यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक कम लागत वाली और सरल जैविक प्रमाणीकरण प्रणाली है। इसमें किसानों के समूह एक-दूसरे के खेतों का निरीक्षण और सत्यापन करते हैं।
    • उपयोगिता: यह छोटे किसानों को जैविक प्रमाणीकरण की जटिल और महंगी प्रक्रिया से मुक्त करती है, जिससे वे अपने उत्पादों को ‘जैविक’ के रूप में बेच सकें।
  5. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के प्रयास:
    • ICAR के तहत अखिल भारतीय नेटवर्क कार्यक्रम ऑन ऑर्गेनिक फार्मिंग (A-INPOF) जैविक खेती पर अनुसंधान कर रहा है।
    • इसने 16 राज्यों में 20 सहयोगी केंद्रों के साथ 76 फसल प्रणालियों के लिए जैविक विधियों का पैकेज विकसित किया है। यह किसानों को व्यावहारिक समाधान प्रदान करता है।
  6. जैविक खेती को बढ़ावा देने वाली अन्य योजनाएँ:
    • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY): विभिन्न राज्यों में जैविक खेती के बुनियादी ढांचे और पहलों को सहायता प्रदान करती है।
    • मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन योजना (SHM): जैविक खाद के उत्पादन और उपयोग को बढ़ावा देती है।
    • राष्ट्रीय बागवानी मिशन (NHM): जैविक बागवानी को बढ़ावा देता है।
  7. जैविक आदानों के लिए सहायता:
    • सरकार जैविक आदानों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए वाणिज्यिक उत्पादन इकाइयों की स्थापना के लिए सब्सिडी प्रदान कर रही है (जैसे वर्मीकम्पोस्ट इकाइयाँ)।

इन सरकारी प्रयासों का उद्देश्य किसानों को जैविक खेती की ओर आकर्षित करना, चुनौतियों का समाधान करना और भारत को वैश्विक जैविक बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी बनाना है। सिक्किम का 100% जैविक राज्य बनना इन प्रयासों की सफलता का एक बड़ा उदाहरण है।

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