खेती के प्रकार और प्रणालियाँ 11th Agriculture Types and systems of farming

11th Agriculture Types and systems of farming

खेती के प्रकार और प्रणालियाँ: एक विस्तृत अध्ययन 🚜

11th Agriculture Types and systems of farming : खेती जिसे कृषि भी कहते हैं वह प्राथमिक आर्थिक गतिविधि है जो हमें भोजन और अन्य आवश्यक उत्पाद प्रदान करती है। विभिन्न भौगोलिक, जलवायु संबंधी, आर्थिक और सामाजिक कारकों के आधार पर खेती के कई प्रकार और प्रणालियाँ विकसित हुई हैं। इन विभिन्न प्रणालियों को समझना किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण है ताकि वे भूमि और संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर सकें।

यहाँ खेती के मुख्य प्रकार उनकी परिभाषा, गुण, दोष और विशेषताओं का विस्तृत विवरण दिया गया है:

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1. सामान्य खेती (General Farming) 🌾🐄

परिभाषा: सामान्य खेती (जिसे विविध खेती – Diversified Farming भी कहा जा सकता है) वह प्रणाली है जहाँ किसान एक साथ कई प्रकार की फसलें उगाते हैं और/या विभिन्न प्रकार के पशुधन का पालन करते हैं। इसमें किसी एक विशिष्ट उत्पाद पर निर्भरता नहीं होती है। आय का कोई भी एक स्रोत कुल कृषि आय के 50% से अधिक नहीं होता। इसका मुख्य उद्देश्य जोखिम को कम करना और साल भर आय के विभिन्न स्रोत बनाए रखना है।

विशेषताएँ:

  • विविधता: इसमें विभिन्न अनाज (गेहूं, चावल), दालें, तिलहन, सब्जियां जैसी फसलें और पशुधन (गायें, भैंसें, मुर्गियाँ, बकरियाँ) दोनों शामिल हो सकते हैं।
  • जोखिम का फैलाव: यह बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव या किसी एक फसल या पशुधन में रोग लगने के जोखिम को कम करता है। यदि एक फसल असफल होती है, तो अन्य फसलें या पशुधन आय प्रदान करते हैं।
  • संसाधनों का इष्टतम उपयोग: खेत पर उपलब्ध विभिन्न संसाधनों (जैसे भूमि, श्रम, पूंजी) का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, फसल अवशेषों का उपयोग पशु चारे के रूप में किया जा सकता है, और पशुओं के गोबर का उपयोग जैविक खाद के रूप में।
  • पारिस्थितिक संतुलन: फसल चक्र और विभिन्न प्रकार की खेती मिट्टी के स्वास्थ्य और जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करती है, जिससे रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम हो सकती है।

गुण (Advantages):

  • जोखिम कम: किसी एक फसल के खराब होने या मूल्य घटने पर किसान को भारी नुकसान नहीं होता क्योंकि आय के कई स्रोत होते हैं।
  • नियमित आय: विभिन्न उत्पादों से अलग-अलग समय पर आय प्राप्त होती रहती है, जिससे वित्तीय प्रवाह बना रहता है।
  • संसाधनों का कुशल उपयोग: फसल अवशेषों का उपयोग पशु चारे के रूप में और पशुओं के गोबर का उपयोग खाद के रूप में किया जा सकता है, जिससे लागत कम होती है।
  • आत्मनिर्भरता: परिवार की विविध खाद्य जरूरतों को पूरा करने में मदद करती है, बाहरी बाजार पर निर्भरता कम होती है।

दोष (Disadvantages):

  • विशेषज्ञता का अभाव: किसान को किसी एक क्षेत्र में अत्यधिक विशेषज्ञता हासिल करना मुश्किल होता है, जिससे उच्चतम दक्षता प्राप्त नहीं हो पाती।
  • प्रबंधन में जटिलता: कई अलग-अलग फसलों और पशुधन का एक साथ प्रबंधन करना जटिल हो सकता है, जिसके लिए व्यापक ज्ञान की आवश्यकता होती है।
  • बाजार में कम सौदेबाजी शक्ति: विशिष्ट उत्पादों की कमी के कारण बड़े खरीदारों के साथ बातचीत करने की शक्ति कम हो सकती है, जिससे बेहतर मूल्य प्राप्त करना कठिन होता है।
  • कम उत्पादन क्षमता: किसी एक उत्पाद में अत्यधिक उच्च उत्पादन प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है क्योंकि संसाधनों को विभिन्न गतिविधियों में बांटा जाता है।

उदाहरण और डेटा (भारत में): भारत में विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के बीच, सामान्य खेती एक आम बात है क्योंकि यह उनकी आजीविका को सुरक्षित रखने में मदद करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई किसान खाद्यान्न के साथ-साथ कुछ सब्जियां उगाते हैं और कुछ दुधारू पशु या मुर्गी भी रखते हैं। हालांकि इस प्रकार की खेती का कोई विशिष्ट राष्ट्रीय डेटा नहीं है, लेकिन भारत की कृषि विविधता और छोटे भूखंडों की प्रकृति इसकी व्यापकता को दर्शाती है।

2. विशिष्ट खेती (Specialized Farming) 💰🎯

परिभाषा: विशिष्ट खेती वह प्रणाली है जहाँ किसान अपनी कुल कृषि आय का 50% से अधिक केवल एक प्रकार की फसल या एक प्रकार के पशुधन से प्राप्त करता है। इसका मुख्य ध्यान किसी एक उत्पाद पर होता है, जिसे बड़े पैमाने पर बाजार में बेचने के उद्देश्य से उगाया जाता है।

विशेषताएँ:

  • उच्च विशेषज्ञता: किसान किसी एक फसल या पशुधन के उत्पादन में अत्यधिक कुशल हो जाता है, जिससे गुणवत्ता और दक्षता में सुधार होता है।
  • बड़े पैमाने का उत्पादन: अक्सर बड़े कृषि क्षेत्रों या पशुधन इकाइयों में संचालित होती है, जिससे मशीनीकरण और मानकीकरण आसान होता है।
  • प्रौद्योगिकी का सघन उपयोग: विशिष्ट मशीनों और तकनीकों का उपयोग किया जाता है जो उस विशेष उत्पाद के लिए अनुकूलित होती हैं, जैसे कपास के लिए विशेष हार्वेस्टर या डेयरी फार्म में स्वचालित दूध निकालने वाली मशीनें
  • बाजार-उन्मुखी: इसका प्राथमिक उद्देश्य बड़े बाजारों को लक्षित करके अधिकतम लाभ कमाना होता है, अक्सर निर्यात के लिए भी।

गुण (Advantages):

  • उच्च दक्षता और उत्पादकता: एक ही उत्पाद पर ध्यान केंद्रित करने से उत्पादन प्रक्रिया अधिक कुशल और उत्पादक बनती है, जिससे प्रति हेक्टेयर या प्रति पशु उपज बढ़ती है।
  • बेहतर गुणवत्ता: विशेषज्ञता के कारण उत्पाद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है, जिससे प्रीमियम मूल्य प्राप्त करने में मदद मिलती है।
  • कम लागत (प्रति इकाई): बड़े पैमाने के उत्पादन से उत्पादन की प्रति इकाई लागत कम हो सकती है (अर्थव्यवस्था का पैमाना)।
  • बड़ी बाजार पहुंच: विशिष्ट उत्पादों के लिए बड़े राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बनाना आसान होता है।
  • आसान प्रबंधन: केवल एक उत्पाद पर ध्यान केंद्रित करने से प्रबंधन सरल हो जाता है क्योंकि विशेषज्ञता एक ही प्रकार के इनपुट और ज्ञान पर केंद्रित होती है।

दोष (Disadvantages):

  • उच्च जोखिम: बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव या उस विशेष फसल/पशुधन में रोग लगने पर भारी वित्तीय नुकसान का जोखिम होता है क्योंकि आय का कोई अन्य स्रोत नहीं होता।
  • मिट्टी का क्षरण: एक ही फसल को बार-बार उगाने से मिट्टी के पोषक तत्व असंतुलित हो सकते हैं और मृदा जनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
  • संसाधनों का असंतुलित उपयोग: खेत के सभी संसाधनों (जैसे विभिन्न प्रकार की भूमि) का समान रूप से उपयोग नहीं हो पाता।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरणीय समस्याएं जैसे जल प्रदूषण और जैव विविधता का नुकसान हो सकता है।

उदाहरण और डेटा (भारत में):

  • पंजाब और हरियाणा में गेहूं और चावल की विशिष्ट खेती व्यापक है। यूनिफाइड पोर्टल फॉर एग्रीकल्चरल स्टैटिस्टिक्स (UPAg) के तीसरे अग्रिम अनुमान 2024-25 के अनुसार, भारत में चावल का उत्पादन 149.07 मिलियन टन और गेहूं का उत्पादन 117.51 मिलियन टन अनुमानित है, जिसमें इन राज्यों का प्रमुख योगदान है।
  • महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों में गन्ने और कपास की विशिष्ट खेती की जाती है। 2024-25 के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार, गन्ने का उत्पादन 450.12 मिलियन टन और कपास का उत्पादन 30.69 मिलियन गांठें (प्रत्येक 170 किलोग्राम) अनुमानित है।
  • केरल, असम और कर्नाटक में चाय, कॉफी और रबर के बड़े बागान विशिष्ट खेती के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

3. शुष्क खेती (Dry Farming) 💧🏜️

परिभाषा: शुष्क खेती उन क्षेत्रों में की जाने वाली कृषि प्रणाली है जहाँ वार्षिक वर्षा 75 सेमी (30 इंच) से कम होती है और सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं होती या बहुत सीमित होती है। इसका मुख्य उद्देश्य मिट्टी में सीमित नमी का अधिकतम उपयोग करना और सूखा-प्रतिरोधी फसलें उगाना होता है।

विशेषताएँ:

  • कम वर्षा वाले क्षेत्र: मुख्य रूप से अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रों जैसे राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में प्रचलित है।
  • नमी संरक्षण: मिट्टी में नमी को बनाए रखने के लिए विशेष तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जैसे खेत की गहरी जुताई, पलवार (mulching), और समोच्च जुताई (contour ploughing)
  • कम जल-गहन फसलें: ज्वार, बाजरा, रागी (मोटे अनाज), दालें (जैसे अरहर, मूंग, उड़द) और कुछ तिलहन (जैसे मूंगफली, सूरजमुखी) जैसी कम पानी वाली फसलें उगाई जाती हैं।
  • एकल फसल (Monocropping): आमतौर पर वर्षा की अनिश्चितता के कारण एक वर्ष में केवल एक ही फसल उगाई जाती है।

गुण (Advantages):

  • कम पानी की आवश्यकता: उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त जहाँ पानी की कमी है और सिंचाई के साधन सीमित हैं।
  • कम निवेश: सिंचाई बुनियादी ढांचे (नहरों, नलकूपों) की आवश्यकता नहीं होती, जिससे प्रारंभिक और परिचालन निवेश कम होता है।
  • पारिस्थितिक रूप से स्थायी: सही ढंग से करने पर यह पर्यावरण के लिए अधिक टिकाऊ हो सकती है क्योंकि यह प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर करती है और जल संसाधनों पर दबाव कम करती है।
  • कम इनपुट लागत: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग कम हो सकता है।

दोष (Disadvantages):

  • उत्पादन में अस्थिरता: वर्षा की अनिश्चितता के कारण फसल उत्पादन अत्यधिक अस्थिर होता है, जिससे किसानों की आय अनिश्चित रहती है।
  • कम उपज: प्रति हेक्टेयर उपज आमतौर पर सिंचित खेती की तुलना में काफी कम होती है।
  • सीमित फसल विकल्प: केवल शुष्क-प्रतिरोधी फसलें ही उगाई जा सकती हैं, जो फसल विविधीकरण को सीमित करती हैं।
  • अकाल का खतरा: सूखे की गंभीर स्थिति में फसल पूरी तरह से नष्ट हो सकती है, जिससे किसानों पर गंभीर वित्तीय संकट और खाद्य असुरक्षा आती है।

उदाहरण और डेटा (भारत में): भारत का लगभग 68% शुद्ध बोया गया क्षेत्र (लगभग 80 मिलियन हेक्टेयर) वर्षा-आधारित है, जिसमें से एक महत्वपूर्ण हिस्सा शुष्क खेती के अंतर्गत आता है। यह क्षेत्र भारत के कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग 40% और दालों का 83%, तिलहन का 70% और मोटे अनाजों का 85% योगदान देता है। (स्रोत: ICAR-CRIDA)। राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश शुष्क खेती के प्रमुख क्षेत्र हैं।

4. मिश्रित खेती (Mixed Farming) 🌾🐄🤝

परिभाषा: मिश्रित खेती वह प्रणाली है जहाँ फसल उत्पादन (जैसे अनाज, दालें) और पशुपालन (जैसे मवेशी, भेड़, मुर्गी पालन) दोनों को एक साथ और पूरक तरीके से किया जाता है। कृषि आय का कम से कम 10% और अधिकतम 49% पशुधन से आता है, जो इसे केवल पशुपालन से अलग करता है।

विशेषताएँ:

  • फसल और पशुधन का एकीकरण: फसलें पशुओं के लिए चारा प्रदान करती हैं, और पशु गोबर के रूप में खाद प्रदान करते हैं, जिससे कृषि प्रणाली आत्मनिर्भर बनती है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था: एक प्रकार की गतिविधि का अपशिष्ट दूसरे के लिए इनपुट बन जाता है (उदाहरण: फसल अवशेष पशु चारा, पशु खाद फसलों के लिए)। यह पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देता है।
  • पूरे वर्ष रोजगार: फसल और पशुधन दोनों में काम होने के कारण किसान और उसके परिवार को पूरे वर्ष श्रम का उपयोग होता है।
  • आय का विविधीकरण: आय के कई स्रोत होते हैं, जो वित्तीय जोखिम को कम करते हैं और आय में स्थिरता प्रदान करते हैं।

गुण (Advantages):

  • आय में स्थिरता: फसल खराब होने पर पशुधन से या पशुधन को नुकसान होने पर फसल से आय मिलती रहती है, जिससे आय का जोखिम कम होता है।
  • संसाधनों का कुशल उपयोग: भूमि, श्रम और पूंजी का बेहतर उपयोग होता है, जैसे अपशिष्ट का पुनर्चक्रण।
  • मिट्टी की उर्वरता में सुधार: पशुधन के गोबर से जैविक खाद मिलती है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती है।
  • पूरे वर्ष रोजगार: किसान और उसके परिवार को पूरे वर्ष काम मिलता है, जिससे बेरोजगारी कम होती है।
  • आत्मनिर्भरता: परिवार की विभिन्न जरूरतों (भोजन, दूध, आदि) को पूरा करने में मदद करती है, जिससे बाहरी बाजारों पर कम निर्भरता होती है।

दोष (Disadvantages):

  • उच्च पूंजी निवेश: फसल और पशुधन दोनों के लिए उपकरण, शेड, बाड़ आदि में निवेश की आवश्यकता होती है, जो प्रारंभिक लागत बढ़ा सकता है।
  • अधिक प्रबंधन कौशल: विभिन्न गतिविधियों (फसल और पशुधन) का एक साथ प्रबंधन करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिसके लिए विविध ज्ञान और कौशल की आवश्यकता होती है।
  • रोग फैलने का जोखिम: यदि एक क्षेत्र में रोग फैलता है (उदाहरण के लिए, पशु रोग), तो वह दूसरे (जैसे फसल) को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकता है।
  • श्रम-गहन: दोनों गतिविधियों के लिए पर्याप्त और विविध श्रम की आवश्यकता होती है।

उदाहरण और डेटा (भारत में): भारत में मिश्रित खेती बड़े पैमाने पर प्रचलित है, खासकर छोटे और मध्यम किसानों के बीच। राष्ट्रीय पशुधन जनगणना 2019 के अनुसार, भारत में कुल पशुधन आबादी 535.78 मिलियन है। पशुधन क्षेत्र ने 2022-23 में भारत के कुल सकल मूल्य वर्धित (GVA) में 5.50% और कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के GVA में 30.23% का योगदान दिया। यह आंकड़ा मिश्रित खेती के महत्व को दर्शाता है, जहां किसान अपनी फसल आय को पशुधन से पूरक करते हैं।

5. सिंचित खेती (Irrigated Farming) 💦🏞️

परिभाषा: सिंचित खेती वह कृषि प्रणाली है जहाँ फसलों को प्राकृतिक वर्षा के अलावा कृत्रिम रूप से पानी (जैसे नहरों, कुओं, नलकूपों, तालाबों, या बांधों से) प्रदान किया जाता है। यह उन क्षेत्रों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहाँ वर्षा अनियमित या अपर्याप्त होती है।

विशेषताएँ:

  • नियमित जल आपूर्ति: फसलों को उनकी वृद्धि के लिए आवश्यक पानी की नियमित और नियंत्रित आपूर्ति सुनिश्चित होती है, जिससे फसल खराब होने का जोखिम कम होता है।
  • उच्च उत्पादकता: पानी की उपलब्धता के कारण उच्च उपज वाली किस्मों और गहन कृषि को बढ़ावा मिलता है।
  • फसल चक्र में लचीलापन: किसान एक वर्ष में कई फसलें (जैसे दो या तीन फसलें) उगा सकते हैं, जिससे भूमि का अधिकतम उपयोग होता है।
  • विविध फसलें: धान, गेहूं, गन्ना जैसी पानी की अधिक आवश्यकता वाली और अधिक लाभदायक फसलें उगाई जा सकती हैं।

गुण (Advantages):

  • स्थिर और उच्च उपज: पानी की कमी के कारण फसल खराब होने का जोखिम कम होता है, और उत्पादन स्थिर तथा अधिक होता है, जिससे किसानों की आय निश्चित होती है।
  • आय में वृद्धि: उच्च उत्पादन के कारण किसानों की आय बढ़ती है और वे अपनी उपज को बाजार में बेचकर अधिक लाभ कमा सकते हैं।
  • कई फसलें लेना संभव: एक वर्ष में दो या तीन फसलें लेकर भूमि का अधिकतम उपयोग किया जा सकता है, जिससे प्रति इकाई क्षेत्र से आय बढ़ती है।
  • फसल चयन में लचीलापन: किसान अपनी पसंद की कोई भी फसल उगा सकते हैं, न कि केवल वर्षा-निर्भर फसलें, जिससे बाजार की मांगों को पूरा किया जा सकता है।
  • खाद्य सुरक्षा: देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि यह अनिश्चित वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उत्पादन सुनिश्चित करती है।

दोष (Disadvantages):

  • उच्च प्रारंभिक निवेश: नहरों, कुओं, नलकूपों, पंप सेटों आदि के निर्माण और रखरखाव में भारी निवेश की आवश्यकता होती है।
  • जलभराव और लवणता: अत्यधिक या अनुचित सिंचाई से मिट्टी में जलभराव (waterlogging) और लवणता (salinity) की समस्या हो सकती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता घट सकती है।
  • भूजल का अत्यधिक दोहन: नलकूपों से अत्यधिक पानी निकालने से भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आती है, जिससे भविष्य में जल संकट पैदा हो सकता है।
  • जल-जनित रोग: स्थिर या रुके हुए पानी के कारण मच्छरों और अन्य जल-जनित बीमारियों (जैसे मलेरिया) के लिए प्रजनन स्थल बन सकता है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: जल संसाधनों पर भारी दबाव और पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है यदि जल प्रबंधन टिकाऊ न हो।

उदाहरण और डेटा (भारत में): भारत में सिंचित क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है। कृषि और किसान कल्याण विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार, 2022-23 में भारत का शुद्ध सिंचित क्षेत्र 79.31 मिलियन हेक्टेयर था, जबकि सकल सिंचित क्षेत्र 122.29 मिलियन हेक्टेयर था, जो सकल बोए गए क्षेत्र का 55.75% था। नलकूप (49.34%) और नहरें (22.85%) सिंचाई के प्रमुख स्रोत हैं। पंजाब (0.7%), हरियाणा (6.9%), और उत्तर प्रदेश (12.9%) में सिंचाई कवरेज बहुत अधिक है, जिससे इन राज्यों में कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई है। (स्रोत: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, जून 2025)।

6. रेंचिंग खेती (Ranching Farming) 🐎🐑

परिभाषा: रेंचिंग खेती एक प्रकार का बड़े पैमाने पर पशुधन पालन है, मुख्य रूप से मांस, ऊन या खाल के लिए पशुओं (जैसे मवेशी, भेड़, घोड़े) को खुले, विशाल चरागाहों पर चराने पर केंद्रित होता है। यह अक्सर अर्ध-शुष्क या शुष्क क्षेत्रों में प्रचलित होता है जहाँ फसल उगाना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं होता।

विशेषताएँ:

  • बड़े पैमाने पर भूमि उपयोग: इसके लिए विशाल भूखंडों की आवश्यकता होती है, जिन्हें ‘रेंच’ कहा जाता है। यह सघन खेती के विपरीत है।
  • न्यूनतम मानव हस्तक्षेप: पशुओं को अक्सर बड़े क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से घूमने दिया जाता है, और उनकी देखभाल कम सघन होती है।
  • कम श्रम-गहन: फसल खेती की तुलना में कम मानव श्रम की आवश्यकता होती है क्योंकि जानवरों को चारे के लिए बहुत कम हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।
  • जलवायु-निर्भर: चरागाहों की गुणवत्ता वर्षा पर बहुत अधिक निर्भर करती है, जिससे मौसम की चरम घटनाओं का सीधा प्रभाव पड़ता है।
  • कम पूंजी गहन (प्रति पशु): इमारतों, बाड़ों या सघन देखभाल पर कम निवेश की आवश्यकता होती है।

गुण (Advantages):

  • कम श्रम लागत: कम मजदूरों की आवश्यकता होती है, क्योंकि पशुओं को बड़े क्षेत्रों में चरने दिया जाता है।
  • प्राकृतिक चराई: पशु प्राकृतिक चरागाहों पर चरते हैं, जिससे चारे की खरीद की लागत कम होती है।
  • कम पर्यावरणीय प्रभाव (सघन कृषि की तुलना में): यदि ठीक से प्रबंधित किया जाए तो यह पारिस्थितिकी तंत्र के साथ अधिक सामंजस्यपूर्ण हो सकती है क्योंकि यह प्राकृतिक घास के मैदानों का उपयोग करती है।
  • बड़े पैमाने पर उत्पादन: एक साथ बड़ी संख्या में पशुओं का पालन किया जा सकता है, जिससे मांस, ऊन आदि का अधिक उत्पादन संभव होता है।
  • कम रोग प्रसार: सघन पालन की तुलना में जानवरों में बीमारियों का प्रसार कम होता है क्योंकि वे खुले और कम भीड़भाड़ वाले वातावरण में रहते हैं।

दोष (Disadvantages):

  • विशाल भूमि की आवश्यकता: यह उन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं है जहाँ भूमि दुर्लभ या महंगी है, जिससे इसका विस्तार सीमित हो जाता है।
  • चरागाहों का अत्यधिक चराई: यदि ठीक से प्रबंधित न किया जाए तो अत्यधिक चराई से भूमि का क्षरण, मिट्टी का कटाव और जैव विविधता का नुकसान हो सकता है।
  • उत्पादन में धीमी वृद्धि: पशुओं का वजन बढ़ने में अधिक समय लग सकता है क्योंकि वे प्राकृतिक रूप से चरते हैं और सघन आहार नहीं लेते।
  • बाजार तक पहुंच की चुनौती: दूरदराज के क्षेत्रों में रेंच स्थित होने के कारण बाजार तक पहुंचना और उत्पादों का परिवहन करना मुश्किल हो सकता है।
  • मौसम पर निर्भरता: सूखा या अत्यधिक ठंड जैसी कठोर मौसम स्थितियां पशुओं के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं और मृत्यु दर बढ़ा सकती हैं।

उदाहरण और डेटा (भारत में): भारत में, ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका जैसे देशों में प्रचलित बड़े पैमाने की “रेंचिंग” प्रणाली उस रूप में मौजूद नहीं है, क्योंकि भूमि जोत बहुत छोटे हैं और पशुधन पालन अक्सर फसल खेती के साथ एकीकृत होता है (मिश्रित खेती)। हालांकि, कुछ अर्ध-शुष्क और पहाड़ी क्षेत्रों में, विशेषकर राजस्थान, गुजरात, और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में, चरवाहे समुदाय बड़े पैमाने पर भेड़ और बकरियों का पालन-पोषण करते हैं, जहाँ वे अपने पशुओं को मौसमी चरागाहों पर चराते हैं। यह एक प्रकार की खानाबदोश पशुपालन (Nomadic Herding) प्रणाली है, जिसे रेंचिंग का एक पारंपरिक रूप माना जा सकता है। भारत की 20वीं पशुधन जनगणना (2019) के अनुसार, देश में 74.26 मिलियन भेड़ और 148.88 मिलियन बकरियां थीं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा इन चराई-आधारित प्रणालियों पर निर्भर है। यह दिखाता है कि यद्यपि पश्चिमी शैली के रेंच नहीं हैं, पशुधन का बड़े पैमाने पर चराई-आधारित पालन भारत में एक महत्वपूर्ण कृषि गतिविधि है।

खेती के ये विभिन्न प्रकार और प्रणालियाँ यह दर्शाती हैं कि मानव ने विविध पर्यावरणीय परिस्थितियों में अपनी खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कितनी अनुकूलनशीलता दिखाई है। प्रत्येक प्रणाली के अपने विशिष्ट लाभ और कमियां हैं, और इष्टतम विकल्प अक्सर स्थानीय जलवायु, मिट्टी, जल उपलब्धता, बाजार पहुंच और किसान के संसाधनों पर निर्भर करता है।

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