भारत में खाद्यान्न उत्पादन के लक्ष्य एवं भविष्य में संभावनाएँ Food grain production targets and future prospects in India

Food grain production targets and future prospects in India: भारत विश्व में सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादकों में से एक है, और इसकी कृषि व्यवस्था देश की विशाल आबादी की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। स्वतंत्रता के बाद से, विशेषकर हरित क्रांति के आगमन के साथ, भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हासिल की है, जिससे वह आयात पर निर्भर देश से एक खाद्य-अधिशेष और निर्यातक राष्ट्र बन गया है।

भारत में खाद्यान्न उत्पादन के वर्तमान लक्ष्य

भारत सरकार लगातार बढ़ती आबादी और वैश्विक खाद्य मांगों को पूरा करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन के महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करती रहती है। ये लक्ष्य कृषि उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय सुनिश्चित करने और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने पर केंद्रित होते हैं।

  • हालिया लक्ष्य (2024-25): केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री के अनुसार, फसल वर्ष 2024-25 के लिए कुल खाद्यान्न उत्पादन का राष्ट्रीय लक्ष्य 341.55 मिलियन टन निर्धारित किया गया है। यह लक्ष्य पिछले वर्षों के अनुमानित उत्पादन से काफी अधिक है। इसे खरीफ, रबी और जायद तीनों सीजनों में विभाजित किया गया है:
    • खरीफ सीजन: 159.97 मिलियन टन
    • रबी सीजन: 164 मिलियन टन
    • जायद सीजन: 16.43 मिलियन टन
  • आगामी लक्ष्य (2025-26): सरकार ने 2025-26 फसल वर्ष के लिए 354.64 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन का लक्ष्य रखा है, जो 2024-25 के लक्ष्य से लगभग 4% अधिक है।

इन लक्ष्यों में गेहूं, चावल, मोटे अनाज, और दालें जैसी सभी प्रमुख फसलें शामिल होती हैं। दालों और तिलहन के उत्पादन में वृद्धि पर विशेष जोर दिया जा रहा है ताकि आयात पर निर्भरता को कम किया जा सके।

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भारत में खाद्यान्न उत्पादन की भविष्य में संभावनाएँ

भारत में खाद्यान्न उत्पादन के भविष्य की संभावनाएं उज्ज्वल हैं, लेकिन इनमें कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना भी करना होगा।

सकारात्मक संभावनाएँ (Positive Prospects)

  1. जनसंख्या वृद्धि और घरेलू मांग: भारत की बढ़ती आबादी खाद्यान्न के लिए एक बड़ा और स्थिर घरेलू बाजार सुनिश्चित करती है। यह किसानों को उत्पादन जारी रखने के लिए प्रोत्साहन देता है।
  2. सरकारी नीतियां और समर्थन: सरकार किसानों को बीज, उर्वरक, ऋण, फसल बीमा (जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना), और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी सहायता प्रदान कर रही है, जो उत्पादन को बढ़ावा देती है।
  3. तकनीकी प्रगति और नवाचार:
    • उच्च उपज वाली किस्में (HYVs): अनुसंधान और विकास से उच्च उपज वाली, रोग-प्रतिरोधी और जलवायु-लचीली फसलों की नई किस्में विकसित की जा रही हैं।
    • कृषि मशीनीकरण: ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और अन्य आधुनिक कृषि उपकरणों का बढ़ता उपयोग उत्पादन दक्षता बढ़ा रहा है।
    • प्रेसीजन फार्मिंग: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), और ड्रोन जैसी तकनीकें सटीक कृषि को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे संसाधनों का कुशल उपयोग हो रहा है।
    • डिजिटल विस्तार सेवाएं: मोबाइल ऐप और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म किसानों को वास्तविक समय में बाजार की जानकारी, मौसम के पूर्वानुमान और कृषि सलाह प्रदान कर रहे हैं।
  4. कृषि विविधीकरण (Crop Diversification): किसान अब खाद्यान्न के साथ-साथ बागवानी, तिलहन, दालें और अन्य उच्च-मूल्य वाली फसलों की ओर भी बढ़ रहे हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो रही है और कृषि प्रणाली अधिक लचीली बन रही है।
  5. निर्यात के अवसर: वैश्विक खाद्य बाजारों में भारत के लिए अपने कृषि उत्पादों के निर्यात के विशाल अवसर हैं, जिससे देश की विदेशी मुद्रा आय बढ़ सकती है।

चुनौतियाँ और सुधार के क्षेत्र (Challenges and Areas for Improvement)

  1. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: अनियमित मानसून, अत्यधिक वर्षा, सूखा, और तापमान में वृद्धि खाद्यान्न उत्पादन के लिए गंभीर खतरा बनी हुई है। इससे फसलें खराब हो सकती हैं और उत्पादकता में कमी आ सकती है।
  2. जल संसाधनों का ह्रास: भूजल का अत्यधिक दोहन और सिंचाई के लिए पानी की कमी भविष्य में खाद्यान्न उत्पादन के लिए एक बड़ी चुनौती है। कुशल जल उपयोग प्रणालियों जैसे ड्रिप सिंचाई और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना आवश्यक है।
  3. मृदा स्वास्थ्य का क्षरण: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है और मृदा प्रदूषण बढ़ रहा है। जैविक खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है।
  4. छोटे और खंडित खेत: भारत में अधिकांश खेत छोटे और बिखरे हुए हैं, जिससे आधुनिक कृषि तकनीकों और मशीनीकरण को अपनाना मुश्किल हो जाता है।
  5. बुनियादी ढाँचे का अभाव: कटाई के बाद के नुकसान (post-harvest losses) को कम करने के लिए पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग, प्रसंस्करण इकाइयों और परिवहन सुविधाओं का अभाव है।
  6. बाजार पहुंच और मूल्य अस्थिरता: किसानों को अक्सर अपनी उपज के लिए उचित मूल्य नहीं मिल पाता है और वे बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील होते हैं। प्रभावी विपणन नेटवर्क और मूल्य स्थिरीकरण नीतियां आवश्यक हैं।
  7. कृषि अनुसंधान और विस्तार: अनुसंधान और विकास में अधिक निवेश की आवश्यकता है ताकि जलवायु-लचीली और उच्च उपज वाली किस्में विकसित की जा सकें, और किसानों तक नई जानकारी पहुंचाने के लिए कृषि विस्तार सेवाओं को मजबूत करना होगा।

कुल मिलाकर, भारत में खाद्यान्न उत्पादन का भविष्य उत्साहजनक है, विशेषकर जब हम सरकारी प्रयासों, तकनीकी प्रगति और किसानों की कड़ी मेहनत को देखते हैं। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और संसाधन प्रबंधन जैसी चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करना इस विकास की निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण होगा।

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