Class 11 crop Production Types of Agriculture
कृषि के प्रकारों को समझने के लिए विभिन्न आधारों पर उनका वर्गीकरण किया जा सकता है। ये वर्गीकरण भौगोलिक स्थितियों, उत्पादन के उद्देश्य, उपयोग की जाने वाली तकनीकों और श्रम व पूंजी के निवेश पर निर्भर करते हैं।
यहाँ कृषि के कुछ प्रमुख प्रकार दिए गए हैं:
1. उद्देश्य के आधार पर (Based on Purpose)
- निर्वाह कृषि (Subsistence Farming):
- यह कृषि का सबसे प्राचीन रूप है जहाँ किसान और उसका परिवार अपने दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए फसलें उगाते हैं।
- उत्पादन मुख्य रूप से घरेलू उपभोग के लिए होता है, और बाजार में बेचने के लिए बहुत कम अधिशेष बचता है।
- इसमें आमतौर पर छोटे खेत, पारंपरिक उपकरण और सीमित तकनीक का उपयोग किया जाता है।
- इसे आगे दो प्रकारों में बांटा जा सकता है:
- गहन निर्वाह कृषि (Intensive Subsistence Farming): घनी आबादी वाले क्षेत्रों में की जाती है जहाँ सीमित भूमि पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए अधिक श्रम और साधारण औजारों का उपयोग किया जाता है। चावल अक्सर मुख्य फसल होती है।
- आदिम निर्वाह कृषि (Primitive Subsistence Farming): इसमें स्थानांतरित कृषि (Shifting Cultivation) और खानाबदोश पशुपालन (Nomadic Herding) शामिल हैं।
- स्थानांतरित कृषि: इसमें वन भूमि के एक छोटे टुकड़े को साफ करके (काटकर और जलाकर) खेती की जाती है। कुछ वर्षों तक फसलें उगाने के बाद, जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, तो किसान नई जगह पर चले जाते हैं। इसे “काटो और जलाओ” कृषि भी कहते हैं। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में यह प्रचलित है।
- खानाबदोश पशुपालन: इसमें पशुपालक अपने पशुओं (भेड़, बकरी, ऊंट, याक) के साथ चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं।
- वाणिज्यिक कृषि (Commercial Farming):
- इस प्रकार की कृषि का मुख्य उद्देश्य बाजार में उत्पादों को बेचकर लाभ कमाना होता है।
- उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है और आधुनिक तकनीकों, मशीनों, उच्च उपज वाली किस्मों (HYVs) के बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का व्यापक उपयोग किया जाता है।
- इसमें शामिल हैं:
- वाणिज्यिक अनाज कृषि (Commercial Grain Farming): बड़े क्षेत्रों में अनाज (जैसे गेहूं और मक्का) का उत्पादन बाजार में बेचने के लिए किया जाता है।
- मिश्रित कृषि (Mixed Farming): इसमें फसल उगाना और पशुपालन दोनों साथ-साथ किए जाते हैं। किसान अपनी आय के लिए फसल और पशुधन दोनों पर निर्भर होते हैं।
- रोपण कृषि (Plantation Agriculture): यह वाणिज्यिक कृषि का एक प्रकार है जहां बड़े क्षेत्रों में एकल नकदी फसल (जैसे चाय, कॉफी, रबर, गन्ना, केला, मसाले) उगाई जाती है। इसमें बड़ी पूंजी निवेश, आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक प्रबंधन की आवश्यकता होती है।
2. जल उपलब्धता के आधार पर (Based on Water Availability)
- सिंचित कृषि (Irrigated Farming):
- यह कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ सिंचाई सुविधाओं (नहरों, कुओं, नलकूपों, तालाबों) के माध्यम से फसलों को नियमित रूप से पानी उपलब्ध कराया जाता है।
- यह उच्च उत्पादन और फसल सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
- वर्षा-आधारित कृषि / शुष्क भूमि कृषि (Rain-fed Farming / Dryland Farming):
- यह कृषि पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर करती है। यह उन क्षेत्रों में प्रचलित है जहाँ वर्षा कम होती है या अनियमित होती है।
- इसमें ऐसी फसलें उगाई जाती हैं जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है (जैसे ज्वार, बाजरा, दालें)।
- जल संरक्षण की तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
- आर्द्रभूमि कृषि (Wetland Agriculture): यह उच्च वर्षा वाले या अच्छी तरह से सिंचित क्षेत्रों में की जाती है, जहां पानी की प्रचुरता होती है। धान, जूट, गन्ना प्रमुख फसलें हैं।
3. कृषि प्रणाली के आधार पर (Based on Farming System)
- विशेषीकृत खेती (Specialized Farming): इसमें किसान अपनी कुल आय का 50% से अधिक केवल एक प्रकार की फसल या पशुधन से प्राप्त करता है।
- विविध खेती (Diversified Farming): इसमें किसान कई प्रकार की फसलों और/या पशुधन का उत्पादन करता है ताकि किसी एक उत्पाद के बाजार में उतार-चढ़ाव से होने वाले जोखिम को कम किया जा सके।
- कार्बनिक खेती / जैविक खेती (Organic Farming): इसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) का उपयोग किए बिना प्राकृतिक तरीकों (जैसे खाद, फसल चक्र, जैविक कीट नियंत्रण) से खेती की जाती है।
- समोच्च खेती (Contour Farming): पहाड़ी ढलानों पर समोच्च रेखाओं (समान ऊंचाई वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखाएं) के साथ हल चलाकर खेती करना, जो मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद करता है।
- सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming): पहाड़ी ढलानों को सीढ़ीदार खेतों में परिवर्तित करके खेती करना, जो पानी को रोकने और मिट्टी के कटाव को कम करने में मदद करता है।
- सहयोगी खेती (Cooperative Farming): इसमें कई किसान स्वेच्छा से मिलकर अपनी भूमि, श्रम और पूंजी को साझा करते हैं ताकि बड़े पैमाने पर खेती का लाभ उठा सकें और बेहतर सौदेबाजी की शक्ति प्राप्त कर सकें।
- अनुबंध खेती (Contract Farming): इसमें एक कंपनी या प्रोसेसर किसानों के साथ एक अनुबंध करता है, जिसमें वे विशिष्ट फसलें उगाने और उन्हें पूर्व-निर्धारित मूल्य पर बेचने के लिए सहमत होते हैं।
- संविदा खेती (Corporate Farming): बड़ी कंपनियाँ सीधे कृषि भूमि खरीदकर या पट्टे पर लेकर बड़े पैमाने पर आधुनिक तकनीकों और प्रबंधन के साथ खेती करती हैं।
4. फसल ऋतुओं के आधार पर (Based on Cropping Seasons – in India)
भारत में मुख्य रूप से तीन फसल ऋतुएँ हैं:
- खरीफ फसल (Kharif Crops):
- मानसून की शुरुआत के साथ (जून-जुलाई) बोई जाती हैं और सितंबर-अक्टूबर में काटी जाती हैं।
- इन फसलों को उगने के लिए अधिक गर्मी और नमी की आवश्यकता होती है।
- उदाहरण: धान (चावल), मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूंगफली।
- रबी फसल (Rabi Crops):
- अक्टूबर-नवंबर में शीत ऋतु की शुरुआत में बोई जाती हैं और मार्च-अप्रैल में ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत में काटी जाती हैं।
- इन फसलों को उगने के लिए अपेक्षाकृत ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है।
- उदाहरण: गेहूं, जौ, चना, मटर, सरसों, अलसी, आलू।
- जायद फसल (Zaid Crops):
- यह रबी और खरीफ फसल ऋतुओं के बीच, ग्रीष्मकाल (मार्च-जून) में बोई जाने वाली छोटी अवधि की फसलें हैं।
- ये फसलें जल्दी पक जाती हैं।
- उदाहरण: तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, सब्जियां (जैसे लौकी, करेला), और चारा फसलें।
कृषि के ये विभिन्न प्रकार देश की विविध भौगोलिक, जलवायु और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को दर्शाते हैं।