Class 11 Indian Agriculture History Ancient to Modern : इस लेख में भारतीय कृषि का इतिहास विस्तार से जानेंगे । हम प्राचीन भारतीय कृषि (Indian Agriculture History) सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक काल की उन्नत कृषि पद्धतियों को समझेंगे। मध्यकालीन कृषि में हुए परिवर्तनों और नई फसलों के आगमन पर प्रकाश डालेंगे। साथ ही आधुनिक कृषि , विशेष रूप से हरित क्रांति ने भारत में कृषि को कैसे बदला, इसका विश्लेषण करेंगे। यह लेख छात्रों और कृषि प्रेमियों के लिए कृषि का विकास समझने और भारत की कृषि विरासत से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। भारतीय कृषि का सफर कैसे आगे बढ़ा और इसने हमारे देश की खाद्य सुरक्षा में क्या भूमिका निभाई इसे समझेंगे ।
कृषि परिचय: इतिहास (प्राचीन भारतीय कृषि व आधुनिक कृषि)
कृषि मानव सभ्यता के विकास का आधार रही है। भारत में इसका इतिहास अत्यंत समृद्ध और प्राचीन है, जहाँ सदियों से कृषि पद्धतियों का विकास हुआ है। यह अध्याय कृषि के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझने में मदद करेगा जो छात्रों के लिए उनकी परीक्षाओं में उपयोगी होगा।
प्राचीन भारतीय कृषि 🌾
भारत में कृषि का इतिहास 9,000 ईसा पूर्व से भी अधिक पुराना है। सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान भी उन्नत कृषि पद्धतियाँ मौजूद थीं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि भारत कृषि नवाचारों का प्रारंभिक केंद्र रहा है।
1. नवपाषाण काल और सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 9000 ईसा पूर्व – 1500 ईसा पूर्व)
- प्रारंभिक फसलें: सबसे पहले गेहूं, जौ, मटर, तिल और खजूर जैसी फसलें उगाई गईं। कपास की खेती का सबसे पहला प्रमाण भी सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 5वीं-4वीं सहस्राब्दी ईसा पूर्व) में मिलता है, जिससे भारत दुनिया में कपास का अग्रणी उत्पादक बन गया।
- पशुपालन: भेड़, बकरी, मवेशी (गाय और बैल) और जल भैंस को पालतू बनाया गया था। हाथी का भी सबसे पहले पालतूकरण इसी अवधि में हुआ। पशुधन का उपयोग जुताई, ढुलाई, दूध और खाद के लिए किया जाता था।
- सिंचाई तकनीकें: सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने लगभग 4500 ईसा पूर्व तक सिंचाई प्रणालियों का विकास कर लिया था। इसमें कृत्रिम जलाशय (जैसे गुजरात के गिरनार में लगभग 3000 ईसा पूर्व) और नहर प्रणाली (लगभग 2600 ईसा पूर्व) शामिल थी। यह जल प्रबंधन की उनकी समझ को दर्शाता है।
- कृषि उपकरण: लकड़ी के हल का उपयोग किया जाता था, जो बैलों द्वारा खींचे जाते थे। जुताई के लिए बैलों का उपयोग सिंधु घाटी सभ्यता में 2500 ईसा पूर्व तक प्रचलित था।
- भंडारण: अनाजों को बड़े अन्नागारों में संग्रहीत किया जाता था, जो खाद्य सुरक्षा के प्रति उनकी जागरूकता को दर्शाता है।
- मिश्रित कृषि: सिंधु घाटी की अर्थव्यवस्था मिश्रित कृषि पर आधारित थी, जिसमें फसल उगाना और पशुपालन दोनों शामिल थे।
2. वैदिक काल (लगभग 1500 ईसा पूर्व – 600 ईसा पूर्व)
- प्रमुख फसलें: इस काल में गेहूं (godhuma), जौ (yava), चावल (sali/varichi), दालें और तिलहन (जैसे तिल – tila, अलसी – atasi) प्रमुख फसलें थीं। चावल को विशेष महत्व दिया जाता था, खासकर पूर्वी क्षेत्रों में।
- हल का प्रयोग: लकड़ी के हलों का व्यापक उपयोग होता था, जिन्हें बैलों की जोड़ी (sira) द्वारा खींचा जाता था। ऋग्वेद में हल के उपयोग का उल्लेख है।
- कृषि पद्धतियाँ: बुवाई (बीज को हल से बनी खांचों – sita – में डालना), कटाई (हंसिया – datra – से), गहाई और ओसाई जैसी प्रथाएँ प्रचलित थीं।
- सिंचाई: वर्षा पर निर्भरता के साथ-साथ, कुओं, तालाबों और नहरों का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता था।
- खाद का उपयोग: फसलों की उर्वरता बनाए रखने के लिए गोबर की खाद का प्रयोग होता था।
- फसल चक्र: भूमि की उर्वरता बनाए रखने और कीटों को नियंत्रित करने के लिए फसल चक्र की अवधारणा भी प्रचलित थी। उदाहरण के लिए, कुछ ग्रंथों में सर्दियों में दालें और गर्मियों में चावल बोने का उल्लेख है।
- कृषि ज्ञान: वैदिक ग्रंथों में मिट्टी की उर्वरता, बीज चयन और उपचार, बुवाई और कटाई के मौसम, फसल चक्र और खाद के उपयोग पर ज्ञान मिलता है।
3. महाजनपद काल और मौर्य साम्राज्य (लगभग 600 ईसा पूर्व – 185 ईसा पूर्व)
- राजकीय प्रोत्साहन: मौर्य साम्राज्य में कृषि को अत्यधिक महत्व दिया गया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कृषि प्रशासन, भूमि वर्गीकरण, सिंचाई, और मौसम के पूर्वानुमान पर विस्तृत जानकारी मिलती है।
- भूमि वर्गीकरण: मिट्टी के प्रकार और उनकी उत्पादकता के आधार पर भूमि को वर्गीकृत किया जाता था।
- विस्तृत सिंचाई नेटवर्क: मौर्य शासकों ने नहरों और जलाशयों सहित व्यापक सिंचाई प्रणालियों के निर्माण को प्रोत्साहित किया, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई।
- अशोक का योगदान: सम्राट अशोक ने वृक्षारोपण और बागवानी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया।
4. गुप्त काल और उसके बाद (लगभग 320 ईस्वी – 1200 ईस्वी)
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: इस काल में कृषि-पराशर जैसे ग्रंथों की रचना हुई, जो कृषि विज्ञान पर केंद्रित थे। इनमें वर्षा, मिट्टी के प्रकार, बीज, फसल चक्र और कीट नियंत्रण पर विस्तार से बताया गया है।
- कृषि विस्तार: नए क्षेत्रों को कृषि के अधीन लाया गया, जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई।
- फसलों की विविधता: चावल, गेहूं, जौ, दालें, गन्ना, कपास, सब्जियां और फल जैसी विभिन्न फसलें उगाई जाती थीं।
- सिंचाई में सुधार: उन्नत जल भंडारण प्रणालियां और सिंचाई तकनीकें विकसित की गईं।
मध्यकालीन कृषि (लगभग 1200 ईस्वी – 1757 ईस्वी) 🏰
मध्यकालीन भारत में विभिन्न सल्तनतों और मुगल साम्राज्यों के अधीन कृषि में महत्वपूर्ण बदलाव और विस्तार हुए।
- नई फसलों का आगमन: इस अवधि में मक्का, तम्बाकू, मिर्च, आलू, अनानास और पपीता जैसी नई फसलें विशेष रूप से पुर्तगालियों और अन्य यूरोपीय व्यापारियों के माध्यम से भारत आईं । इन फसलों ने धीरे-धीरे भारतीय कृषि और खानपान का हिस्सा बन गईं।
- इस्लामी प्रभाव: मध्य एशिया और फारस से कुछ नई कृषि पद्धतियाँ और सिंचाई तकनीकें आईं जैसे फ़ारसी पहिया (रहट) जो कुओं से पानी उठाने में अधिक कुशल था।
- सिंचाई का विस्तार: शासकों ने नहरों के विशाल नेटवर्क का निर्माण किया, विशेष रूप से फिरोज शाह तुगलक और मुगल सम्राटों जैसे शाहजहाँ द्वारा, जिससे कृषि योग्य भूमि का विस्तार हुआ।
- राजस्व प्रणाली: भूमि राजस्व प्रणाली को अधिक व्यवस्थित किया गया। अकबर के अधीन ज़ब्त प्रणाली (Ain-i-Dahsala) एक महत्वपूर्ण भूमि सर्वेक्षण और राजस्व निर्धारण प्रणाली थी, जिससे कृषि उत्पादन और भूमि का बेहतर रिकॉर्ड रखा जाने लगा।
- फसल विविधीकरण: किसानों ने विभिन्न प्रकार की खाद्य और नकदी फसलें (जैसे गन्ना, कपास, नील, अफीम) उगाईं।
- फसल चक्र और अंतःफसलन: भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिए फसल चक्र और एक ही खेत में कई फसलें उगाने की प्रथा (जिसे अंतःफसलन या इंटरक्रॉपिंग कहते हैं) प्रचलित थी, जिससे भूमि का अधिकतम उपयोग होता था।
- क्षेत्रीय विशेषज्ञता: विभिन्न क्षेत्रों ने अपनी जलवायु और मिट्टी की विशेषताओं के आधार पर विशिष्ट फसलों में विशेषज्ञता हासिल की।
आधुनिक कृषि 🌱
आधुनिक कृषि का उद्भव ब्रिटिश काल से शुरू हुआ और स्वतंत्रता के बाद इसमें तीव्र गति से विकास हुआ।
1. ब्रिटिश काल (1757 ईस्वी – 1947 ईस्वी)
- कृषि का व्यवसायीकरण: अंग्रेजों ने भारतीय कृषि को व्यावसायिक फसलों (जैसे नील, कपास, अफीम, चाय, कॉफी और जूट) के उत्पादन की ओर मोड़ा, जिनकी ब्रिटेन के उद्योगों और यूरोपीय बाजारों में उच्च मांग थी। इससे खाद्य फसलों के उत्पादन में कमी आई, जिससे अकाल की स्थिति और खराब हुई।
- भूमि राजस्व नीतियां: स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी जैसी नई भूमि राजस्व प्रणालियाँ पेश की गईं। इन प्रणालियों ने किसानों पर भारी कर का बोझ डाला और उन्हें अक्सर साहूकारों पर निर्भर रहना पड़ा, जिससे भू-दासता और भूमिहीनता में वृद्धि हुई।
- सिंचाई नेटवर्क का विस्तार: कुछ क्षेत्रों में, विशेष रूप से पंजाब और कुछ अन्य क्षेत्रों में, बड़ी नहर परियोजनाओं का विकास किया गया, जिसका उद्देश्य मुख्य रूप से व्यावसायिक फसलों की खेती को बढ़ावा देना था।
- आधारभूत संरचना का विकास: रेलवे और सड़कों का निर्माण किया गया, जिससे कृषि उत्पादों को बंदरगाहों तक ले जाना और निर्यात करना आसान हो गया। हालांकि, यह विकास मुख्य रूप से ब्रिटिश आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए था।
- पारंपरिक कृषि पर प्रभाव: पारंपरिक, आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाएँ बाधित हुईं। किसानों को बाजार की अस्थिरता और कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। कृषि एक व्यवसाय से अधिक जीवनशैली से एक बाजार-उन्मुख गतिविधि में बदल गई।
- तकनीकी पिछड़ापन: ब्रिटिश काल में कृषि में आधुनिक तकनीकी नवाचारों का व्यापक रूप से अभाव था। अधिकांश किसान अभी भी लकड़ी के हल और पारंपरिक तरीकों का उपयोग कर रहे थे।
. स्वतंत्रता के बाद की कृषि (1947 ईस्वी – वर्तमान)
स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र को पुनर्जीवित करने और खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए।
- भूमि सुधार (1950-60 के दशक): भूमि वितरण में असमानताओं को दूर करने के लिए जमींदारी उन्मूलन, हदबंदी कानून (भूमि स्वामित्व पर सीमा), और चकबंदी (छोटे-छोटे भूखंडों को बड़े, व्यवहार्य इकाइयों में मिलाना) जैसे सुधार लागू किए गए। हालांकि, इनकी सफलता अलग-अलग राज्यों में भिन्न रही।
- हरित क्रांति (1960-70 के दशक): यह भारतीय कृषि का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी चरण था।
- उच्च उपज वाली किस्में (HYVs): गेहूं और चावल की उच्च उपज वाली (High-Yielding Varieties) किस्मों का विकास और व्यापक उपयोग।
- उर्वरक और कीटनाशक: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग, जिससे मिट्टी की उर्वरता और कीट नियंत्रण में मदद मिली।
- सिंचाई का विस्तार: नलकूपों, नहरों और बांधों के माध्यम से सिंचाई सुविधाओं का तेजी से विस्तार।
- परिणाम: भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बन गया, सूखे और अकाल का खतरा कम हुआ। हालांकि, इसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव (जैसे भूजल का अत्यधिक दोहन, मिट्टी की उर्वरता में कमी) और क्षेत्रीय असमानताएं भी पैदा हुईं।
- अन्य क्रांतियाँ:
- श्वेत क्रांति (ऑपरेशन फ्लड – 1970): दूध उत्पादन को बढ़ाने और भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बनाने पर केंद्रित।
- पीली क्रांति: तिलहन उत्पादन में वृद्धि पर जोर।
- नीली क्रांति: मत्स्य पालन में वृद्धि।
- स्वर्ण क्रांति: बागवानी (फल, सब्जियां, फूल) में वृद्धि।
- कृषि में मशीनीकरण: ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेशर और अन्य आधुनिक कृषि उपकरणों का बढ़ता उपयोग, जिससे श्रम की आवश्यकता कम हुई और दक्षता बढ़ी।
- कृषि अनुसंधान और शिक्षा: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) जैसे संस्थानों द्वारा कृषि अनुसंधान, नई किस्मों के विकास और किसानों तक जानकारी पहुंचाने पर जोर दिया गया। कृषि विश्वविद्यालय स्थापित किए गए।
- सरकारी नीतियाँ और समर्थन:
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP): किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए।
- ऋण सुविधाएँ: सहकारी बैंकों और वाणिज्यिक बैंकों के माध्यम से किसानों को संस्थागत ऋण उपलब्ध कराना।
- बीमा योजनाएँ: फसल बीमा योजनाएँ प्राकृतिक आपदाओं से किसानों को सुरक्षा प्रदान करती हैं।
- सिंचाई परियोजनाएँ: विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से कृषि योग्य भूमि तक पानी की पहुँच बढ़ाना।
- समकालीन चुनौतियाँ:
- जलवायु परिवर्तन: सूखे, बाढ़, अनियमित वर्षा और तापमान में वृद्धि का कृषि पर नकारात्मक प्रभाव।
- मृदा स्वास्थ्य: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा स्वास्थ्य का क्षरण और जल प्रदूषण।
- जल संकट: भूमिगत जलस्तर में गिरावट और सिंचाई के लिए पानी की कमी।
- किसानों की आय: छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय स्थिरता सुनिश्चित करना और उन्हें बाजार से जोड़ना।
- खेती का विखंडन: छोटी और बिखरी हुई जोत का आकार आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने में बाधा डालता है।
- प्रौद्योगिकी का एकीकरण: डिजिटल कृषि, प्रेसिजन कृषि, जैव प्रौद्योगिकी और कृषि ड्रोन जैसी नई तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाना।
निष्कर्ष 🚀
भारत में कृषि का एक समृद्ध और गतिशील इतिहास है। प्राचीन काल में, भारतीय कृषि स्थिरता, प्रकृति के साथ सामंजस्य और गहन स्थानीय ज्ञान पर आधारित थी। मध्यकाल में नई फसलों और सिंचाई तकनीकों का समावेश हुआ। ब्रिटिश काल ने कृषि का व्यवसायीकरण किया, लेकिन किसानों का शोषण भी किया। स्वतंत्रता के बाद, हरित क्रांति ने भारत को खाद्य आत्मनिर्भरता दिलाई लेकिन इसके साथ नई चुनौतियाँ भी आईं। भविष्य में टिकाऊ कृषि पद्धतियों, जल प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और किसानों की आय को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना भारतीय कृषि के लिए महत्वपूर्ण होगा।