नाद, स्वर (शुद्ध एवं विकृत), सप्तक, राग, लय, ताल, खाली, ताली, मात्रा, आवर्तन, आरोह, अवरोह, पकड़ Definition of Indian Music Terms

Definition of Indian Music Terms

भारतीय संगीत की परिभाषाएँ

भारतीय शास्त्रीय संगीत के अध्ययन के लिए कुछ मूलभूत पारिभाषिक शब्दों को समझना अत्यंत आवश्यक है। ये शब्द संगीत की संरचना, उसके नियमों और प्रस्तुति के विभिन्न पहलुओं को परिभाषित करते हैं।

1. नाद (Naad)

  • परिभाषा: नाद ध्वनि का वह रूप है जो संगीत के लिए उपयोगी हो। यह नियमित और स्थिर कंपन वाली ध्वनि होती है, जिसे कानों को सुनने में मधुर और सुखद लगे। संगीत में केवल वही ध्वनि नाद कहलाती है जो निश्चित ऊँचाई (पिच) और स्पष्टता रखती हो।
  • विशेषताएँ: नाद के दो मुख्य प्रकार होते हैं:
    • आहत नाद: वह नाद जो दो वस्तुओं के टकराने से उत्पन्न होता है (जैसे किसी वाद्य यंत्र को बजाने से)।
    • अनाहत नाद: वह नाद जो बिना किसी आघात के उत्पन्न होता है (जैसे ब्रह्मांडीय ध्वनि या योगियों द्वारा सुनी जाने वाली आंतरिक ध्वनि)। संगीत में मुख्य रूप से आहत नाद का ही प्रयोग होता है।

2. स्वर (Swar)

  • परिभाषा: नाद का वह निश्चित और स्थिर रूप जो संगीत में अपनी एक विशेष पहचान रखता है और सुनने में मधुर व रंजक होता है, उसे स्वर कहते हैं। स्वर ही रागों की रचना का आधार होते हैं।
  • प्रकार: भारतीय संगीत में कुल 12 स्वर होते हैं, जिन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा जाता है:
    • शुद्ध स्वर (Shuddh Swar): ये वे सात मूल स्वर हैं जो अपनी प्राकृतिक और अचल स्थिति में होते हैं। ये हैं:
      • षड्ज (सा)
      • ऋषभ (रे)
      • गांधार (ग)
      • मध्यम (म)
      • पंचम (प)
      • धैवत (ध)
      • निषाद (नि)
      • इनमें से ‘सा’ और ‘प’ अचल स्वर हैं, यानी ये कभी अपनी जगह नहीं बदलते।
    • विकृत स्वर (Vikrit Swar): ये वे स्वर हैं जो अपनी शुद्ध स्थिति से ऊपर या नीचे होते हैं। इनकी संख्या पाँच है:
      • कोमल स्वर: जब कोई स्वर अपनी शुद्ध स्थिति से थोड़ा नीचे उतर जाता है (जैसे रे कोमल, ग कोमल, ध कोमल, नि कोमल)। इन्हें स्वर के नीचे एक छोटी आड़ी रेखा (रे​,ग​,ध​,नि​) से दर्शाया जाता है।
      • तीव्र स्वर: जब कोई स्वर अपनी शुद्ध स्थिति से थोड़ा ऊपर चढ़ जाता है (केवल मध्यम स्वर तीव्र होता है)। इसे स्वर के ऊपर एक खड़ी रेखा (म') से दर्शाया जाता है।

3. सप्तक (Saptak)

  • परिभाषा: सात शुद्ध स्वरों (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) के समूह को सप्तक कहते हैं। भारतीय संगीत में एक सप्तक में कुल 12 स्वर होते हैं (7 शुद्ध और 5 विकृत)।
  • प्रकार: मुख्य रूप से तीन प्रकार के सप्तक होते हैं:
    • मंद सप्तक (Mandara Saptak): यह सबसे नीचा सप्तक होता है। इसके स्वरों को स्वर के नीचे एक बिंदु (⋅सा​,⋅रे​) से दर्शाया जाता है।
    • मध्य सप्तक (Madhya Saptak): यह सामान्य गायन या वादन का सप्तक होता है। इसके स्वरों पर कोई चिह्न नहीं होता (सा,रे,ग)।
    • तार सप्तक (Taar Saptak): यह सबसे ऊँचा सप्तक होता है। इसके स्वरों को स्वर के ऊपर एक बिंदु (सा⋅,रे⋅) से दर्शाया जाता है।

4. राग (Raag)

  • परिभाषा: राग स्वरों का एक ऐसा व्यवस्थित और मधुर संयोजन है जो श्रोताओं के मन में एक विशेष भावना (रस) उत्पन्न करता है और जिसका एक निश्चित आरोह-अवरोह और पकड़ होती है। ‘राग’ शब्द का अर्थ है ‘जो रंग दे’ या ‘जो मन को रंजित करे’।
  • विशेषताएँ:
    • इसमें कम से कम पाँच स्वर होने चाहिए।
    • इसमें आरोह और अवरोह निश्चित होता है।
    • प्रत्येक राग में एक वादी (मुख्य स्वर) और एक संवादी (सहायक मुख्य स्वर) होता है।
    • राग में ‘सा’ स्वर कभी वर्जित नहीं होता।
    • रागों को विभिन्न रसों (जैसे श्रृंगार, वीर, करुण, शांत) और विशिष्ट समय (जैसे सुबह, शाम, रात) से जोड़ा जाता है।
  • उदाहरण: राग यमन, राग भैरव, राग भूपाली, राग दुर्गा आदि।

5. लय (Lay)

  • परिभाषा: संगीत में गति या चाल की एकरूपता को लय कहते हैं। यह संगीत के प्रवाह को नियंत्रित करती है और इसे एक निश्चित गति प्रदान करती है।
  • प्रकार: लय मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है:
    • विलंबित लय (Vilambit Lay): बहुत धीमी गति।
    • मध्य लय (Madhya Lay): मध्यम गति।
    • द्रुत लय (Drut Lay): तेज गति।

6. ताल (Taal)

  • परिभाषा: ताल संगीत में समय और लय को मापने का एक व्यवस्थित तरीका है। यह एक निश्चित आवर्तन (साइकिल) में तालियों और खाली के माध्यम से मापा जाता है। ताल संगीत को एक संरचना और अनुशासन प्रदान करता है।
  • विशेषताएँ:
    • प्रत्येक ताल में निश्चित संख्या में मात्राएँ और विभाग होते हैं।
    • ताल की पहली मात्रा को सम कहते हैं, जो ताल का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होता है।
  • उदाहरण: तीनताल, दादरा ताल, कहरवा ताल, झपताल आदि।

7. खाली (Khaali)

  • परिभाषा: ताल में जिस विभाग पर हाथ से ताली नहीं बजाई जाती, बल्कि केवल हाथ को हवा में घुमाकर या कलाई को मोड़कर संकेत दिया जाता है, उसे खाली कहते हैं। खाली का प्रयोग ताल में विविधता लाने और उसे अधिक स्पष्ट बनाने के लिए किया जाता है।
  • चिह्न: खाली को ‘0’ (शून्य) से दर्शाया जाता है।
  • उदाहरण: तीनताल में 9वीं मात्रा पर खाली होती है।

8. ताली (Taali)

  • परिभाषा: ताल में जिस विभाग पर हाथ से ताली बजाकर संकेत दिया जाता है, उसे ताली कहते हैं। ताली ताल के विभिन्न महत्वपूर्ण बिंदुओं को दर्शाती है और लय को बनाए रखने में मदद करती है।
  • चिह्न: ताली को संख्या (1, 2, 3, आदि) से दर्शाया जाता है। पहली ताली (सम) को ‘X’ या ‘1’ से दर्शाया जाता है।
  • उदाहरण: तीनताल में 1, 5 और 13वीं मात्रा पर ताली होती है।

9. मात्रा (Maatra)

  • परिभाषा: ताल की सबसे छोटी इकाई को मात्रा कहते हैं। यह समय को मापने की एक मूलभूत इकाई है।
  • महत्व: किसी भी ताल की कुल मात्राएँ निश्चित होती हैं, और इन्हीं मात्राओं के आधार पर ताल की गति और संरचना निर्धारित होती है।
  • उदाहरण: तीनताल में 16 मात्राएँ होती हैं, कहरवा ताल में 8 मात्राएँ होती हैं।

10. आवर्तन (Aavartan)

  • परिभाषा: ताल की पहली मात्रा (सम) से शुरू होकर अंतिम मात्रा तक पहुँचने और फिर से सम पर वापस आने के एक पूरे चक्र को आवर्तन कहते हैं। यह ताल का एक पूरा चक्र होता है।
  • महत्व: गायक या वादक एक आवर्तन में अपनी प्रस्तुति को पूरा करके फिर से सम पर आते हैं, जिससे संगीत में एक निश्चित संरचना और पुनरावृत्ति बनी रहती है।

11. आरोह (Aaroh)

  • परिभाषा: स्वरों के चढ़ते हुए क्रम को आरोह कहते हैं। इसमें स्वरों को नीचे से ऊपर की ओर गाया या बजाया जाता है।
  • उदाहरण: राग भूपाली का आरोह: सा रे ग प ध सा’

12. अवरोह (Avaroh)

  • परिभाषा: स्वरों के उतरते हुए क्रम को अवरोह कहते हैं। इसमें स्वरों को ऊपर से नीचे की ओर गाया या बजाया जाता है।
  • उदाहरण: राग भूपाली का अवरोह: सा’ ध प ग रे सा

13. पकड़ (Pakad)

  • परिभाषा: पकड़ राग के कुछ विशेष और छोटे स्वर समूह होते हैं जो उस राग की पहचान होते हैं। ये स्वर समूह राग के स्वरूप को तुरंत स्पष्ट कर देते हैं और उसे अन्य रागों से अलग करते हैं।
  • महत्व: पकड़ राग का एक संक्षिप्त परिचय होती है और इसे सुनकर ही राग की पहचान की जा सकती है।
  • उदाहरण: राग यमन की पकड़: नि रे ग म’ ध नि सा’

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