History of Indian Music
भारतीय संगीत का इतिहास: एक विस्तृत अध्ययन
History of Indian Music :-भारतीय संगीत केवल ध्वनियों का एक संग्रह नहीं है, बल्कि यह हमारी सभ्यता, संस्कृति, आध्यात्मिकता और दर्शन का एक जीवंत प्रतिबिंब है। हजारों वर्षों से विकसित होता यह संगीत हमारी आत्मा का पोषण करता रहा है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान, भावना तथा सौंदर्य को हस्तांतरित करता रहा है। यह एक ऐसी कला है जो समय के साथ बदलती रही है, लेकिन इसकी मूल आत्मा और सिद्धांत अपरिवर्तित रहे हैं। भारतीय संगीत की यह यात्रा हमें वेदों के प्राचीन मंत्रों से लेकर आधुनिक युग के वैश्विक मंचों तक ले जाती है।
1. प्राचीन काल (वैदिक काल से गुप्त काल तक: लगभग 1500 ईसा पूर्व से 600 ईस्वी तक)
भारतीय संगीत के इतिहास की जड़ें अत्यंत गहरी हैं, जो वैदिक काल से भी पहले की मानी जाती हैं। यह वह समय था जब संगीत का विकास धार्मिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक साधना के एक अभिन्न अंग के रूप में हुआ।
1.1 उत्पत्ति और वैदिक संगीत
भारतीय संगीत का उद्गम वेदों से माना जाता है, विशेषकर सामवेद से। सामवेद, चार वेदों में से एक, मुख्य रूप से यज्ञों और अनुष्ठानों के दौरान गाए जाने वाले मंत्रों का संग्रह है। इन मंत्रों को विशेष धुनों और स्वरों में गाने का विधान था, जिसे सामगान कहा जाता है। सामगान का उद्देश्य मंत्रों की शक्ति को बढ़ाना और देवताओं को प्रसन्न करना था।
- शैली और विशेषज्ञता:
- सामगान की संरचना: सामगान में तीन से सात स्वरों का प्रयोग होता था। प्रारंभ में तीन स्वर (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) प्रमुख थे, जो बाद में सात स्वरों में विकसित हुए। सामगान में स्वरों का उच्चारण और उनकी ध्वनि की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता था, क्योंकि यह माना जाता था कि गलत उच्चारण से अनुष्ठान का प्रभाव कम हो सकता है।
- उद्गातृ की भूमिका: सामगान का गायन विशेष रूप से प्रशिक्षित पुरोहितों द्वारा किया जाता था, जिन्हें उद्गातृ कहा जाता था। उद्गातृ अपनी गायन शैली और मंत्रों के सही उच्चारण के लिए जाने जाते थे।
- आध्यात्मिक संबंध: इस काल का संगीत मुख्य रूप से धार्मिक अनुष्ठानों और यज्ञों से जुड़ा था। संगीत को मोक्ष प्राप्ति का एक मार्ग माना जाता था, और इसका अभ्यास आध्यात्मिक शुद्धि के लिए किया जाता था।
- मार्गी संगीत: वैदिक काल के संगीत को ‘मार्गी संगीत’ कहा जाता था, जिसका अर्थ है ‘मोक्ष का मार्ग’ या ‘ईश्वरीय संगीत’। यह संगीत नियमों और सिद्धांतों से बंधा था और इसमें कोई बदलाव स्वीकार्य नहीं था।
- खोजें और उदाहरण:
- सप्त स्वरों का विकास: सामगान से ही भारतीय संगीत के सात मूल स्वरों (सप्त स्वरों – सा, रे, ग, म, प, ध, नि) की स्थापना हुई। इन स्वरों को श्रुतियों (सूक्ष्म स्वर अंतराल) पर आधारित माना गया। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में 22 श्रुतियों का उल्लेख मिलता है, जो स्वरों के बीच के सूक्ष्म अंतर को दर्शाती हैं। उदाहरण के लिए, ‘सा’ स्वर पर चार श्रुतियाँ, ‘रे’ पर तीन, ‘ग’ पर दो, ‘म’ पर चार, ‘प’ पर चार, ‘ध’ पर तीन और ‘नि’ पर दो श्रुतियाँ मानी जाती हैं।
- ग्राम और मूर्छना: भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में ग्राम (स्वरों का समूह, जैसे षड्ज ग्राम, मध्यम ग्राम, गांधार ग्राम) और मूर्छना (ग्राम के स्वरों को आरोह-अवरोह क्रम में व्यवस्थित करना, जिससे विभिन्न रागों का प्रारंभिक रूप बनता है) की अवधारणाएँ विकसित हुईं। ये अवधारणाएँ आधुनिक राग प्रणाली का आधार बनीं।
- उदाहरण: षड्ज ग्राम की एक मूर्छना ‘उत्तरायता’ हो सकती है: सा रे ग म प ध नि सा। इसे विभिन्न स्वरों से शुरू करके अन्य मूर्छनाएँ बनाई जा सकती थीं।
- वाद्य यंत्र: प्राचीन काल में विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता था।
- तत् वाद्य (तार वाले): वीणा (जैसे चित्रा वीणा जिसमें 7 तार होते थे, विपंची वीणा जिसमें 9 तार होते थे), एकतंत्री वीणा।
- अवनद्ध वाद्य (चमड़े से मढ़े हुए, ताल वाद्य): मृदंग, दुंदुभि, पटह, भेरी।
- घन वाद्य (धातु के, ताल वाद्य): झांझ, करताल, शंख।
- सुषिर वाद्य (फूँक वाले): वेणु (बाँसुरी), शंख।
- मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में भी संगीत से जुड़े अवशेष (जैसे नृत्य करती हुई लड़की की मूर्ति, ढोलक जैसी आकृतियाँ) मिले हैं, जो सिंधु घाटी सभ्यता में संगीत के प्रचलन को दर्शाते हैं।
- भरत मुनि का नाट्यशास्त्र: ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से ईसा की तीसरी शताब्दी के बीच लिखे गए भरत मुनि के नाट्यशास्त्र को भारतीय संगीत का सबसे महत्वपूर्ण और आधारभूत ग्रंथ माना जाता है। इसमें नाट्य, नृत्य और संगीत (गांधर्व) के सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन है।
- संगीत संबंधी अध्याय: नाट्यशास्त्र के 28वें से 33वें अध्याय तक संगीत शास्त्र का विस्तृत उल्लेख किया गया है। इसमें स्वर, श्रुति, ग्राम, मूर्छना, जाति गायन (जो आधुनिक रागों का प्रारंभिक रूप था), वाद्य प्रकार, वाद्य वादन विधि, गायक और वादकों के गुण-अवगुण आदि की जानकारी मिलती है।
- जाति गायन: नाट्यशास्त्र में 18 जातियों का वर्णन है, जो रागों की पूर्ववर्ती थीं। ये जातियाँ स्वरों के निश्चित संयोजनों और नियमों पर आधारित थीं।
- अन्य प्राचीन ग्रंथ:
- बृहद्देशी (मतंग मुनि): 9वीं शताब्दी में मतंग मुनि द्वारा रचित यह ग्रंथ ‘देशी संगीत’ (लोक संगीत) और ‘राग’ शब्द का सर्वप्रथम व्यवस्थित वर्णन करता है। इसमें रागों के लक्षण और उनके मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर चर्चा की गई है।
- संगीत रत्नाकर (शारंगदेव): 13वीं शताब्दी में शारंगदेव द्वारा रचित यह ग्रंथ भारतीय संगीत का एक विश्वकोश माना जाता है। इसमें प्राचीन और मध्यकालीन संगीत परंपराओं का विस्तृत वर्णन है, जिसमें स्वर, राग, ताल, वाद्य और नृत्य के सिद्धांतों का समावेश है।
2. मध्यकालीन काल (लगभग 12वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक)
यह काल भारतीय संगीत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जहाँ कई नए आयाम जुड़े और संगीत की शैलियों में विविधता आई। इस दौरान उत्तर और दक्षिण भारत में संगीत की दो अलग-अलग परंपराएँ विकसित हुईं।
2.1 हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत का विभाजन
मध्यकाल में, विशेषकर दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य के आगमन के साथ, भारतीय संगीत पर फ़ारसी और इस्लामी संस्कृतियों का गहरा प्रभाव पड़ा। इस प्रभाव के कारण संगीत की दो प्रमुख शैलियाँ विकसित हुईं:
- हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत:
- क्षेत्र: यह उत्तर भारत (जम्मू-कश्मीर से लेकर दक्षिण में दक्कन तक) में विकसित हुआ।
- विशेषताएँ: इस पर फ़ारसी और इस्लामी संगीत का गहरा प्रभाव पड़ा, जिससे रागों में अधिक लचीलापन, अलंकरणों (जैसे गमक, मींड, कण) का व्यापक प्रयोग और प्रदर्शन में improvisation (तत्काल रचना) पर अधिक जोर दिया गया। इसमें गायन शैली में अधिक स्वतंत्रता होती है।
- प्रमुख शैलियाँ: ध्रुपद, धमार, ख्याल, तराना, ठुमरी, दादरा, ग़ज़ल।
- कर्नाटक शास्त्रीय संगीत:
- क्षेत्र: यह दक्षिण भारत (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश) में विकसित हुआ।
- विशेषताएँ: इसने अपनी प्राचीन शुद्धता और नियमों को अधिक बनाए रखा। इसमें कृति (एक निश्चित रचना) पर अधिक जोर दिया जाता है, जहाँ रचनाकार द्वारा निर्धारित स्वर और लय का पालन किया जाता है। इसमें गणितीय शुद्धता और जटिल लयकारी पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
- प्रमुख शैलियाँ: कृति, वर्णम, तिल्लाना, पदम।
2.2 शैली और विशेषज्ञता
मध्यकाल में कई नई गायन शैलियाँ विकसित हुईं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:
- ध्रुपद:
- विशेषताएँ: यह सबसे प्राचीन और गंभीर गायन शैली है, जिसमें आलाप पर विशेष जोर दिया जाता है। इसमें लय और ताल की शुद्धता तथा स्वरों की गंभीरता महत्वपूर्ण होती है। ध्रुपद में चार भाग होते हैं: स्थायी (राग का मुख्य भाग, मध्य सप्तक के निचले हिस्से में), अंतरा (ऊँचे सप्तक में गाया जाने वाला भाग), संचारी (राग का विस्तार, तीनों सप्तकों में घूमना), और आभोग (अंतिम भाग, जिसमें रचनाकार का नाम या छाप होती है)। इसमें गमक और मीड का विशेष प्रयोग होता है, जबकि तानों और मुर्की का प्रयोग वर्जित है। यह पखावज वाद्य के साथ गाया जाता है।
- वाणियाँ: ध्रुपद की चार प्रमुख वाणियाँ (शैलियाँ) थीं: गौहर वाणी, खंडार वाणी, डागर वाणी और नौहार वाणी, जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्ट प्रस्तुति शैली थी।
- प्रमुख गायक: स्वामी हरिदास, तानसेन, बैजू बावरा, डागर बंधु।
- ख्याल:
- विशेषताएँ: यह मध्यकाल में ध्रुपद से विकसित हुई एक अधिक स्वतंत्र और कल्पनाशील शैली है। इसमें आलाप, तान, बोलतान, कण और मुर्की का व्यापक प्रयोग होता है, जिससे गायक को अपनी कल्पना और रचनात्मकता दिखाने का अधिक अवसर मिलता है। ख्याल दो प्रकार के होते हैं:
- विलंबित ख्याल: धीमी लय में गाया जाता है, जिसमें राग का विस्तार और भाव प्रदर्शन महत्वपूर्ण होता है।
- द्रुत ख्याल: तेज लय में गाया जाता है, जिसमें जटिल तानों और लयकारियों का प्रदर्शन होता है।
- उत्पत्ति: अमीर खुसरो को ख्याल शैली का जनक माना जाता है, हालांकि इसका व्यवस्थित विकास बाद में हुआ।
- विशेषताएँ: यह मध्यकाल में ध्रुपद से विकसित हुई एक अधिक स्वतंत्र और कल्पनाशील शैली है। इसमें आलाप, तान, बोलतान, कण और मुर्की का व्यापक प्रयोग होता है, जिससे गायक को अपनी कल्पना और रचनात्मकता दिखाने का अधिक अवसर मिलता है। ख्याल दो प्रकार के होते हैं:
- धमार:
- विशेषताएँ: यह भी ध्रुपद के समान एक गंभीर शैली है, लेकिन यह विशेष रूप से धमार ताल (14 मात्रा) में गाई जाती है और अक्सर होली के गीतों से जुड़ी होती है। इसमें श्रृंगार रस की प्रधानता होती है।
- तराना:
- विशेषताएँ: यह एक तेज गति की गायन शैली है जिसमें निरर्थक बोलों (जैसे नोम, तोम, दिर दिर तदानी) का प्रयोग होता है। यह गायकों की तकनीकी दक्षता और लय पर पकड़ को दर्शाता है। अमीर खुसरो को इसका भी जनक माना जाता है।
- ठुमरी:
- विशेषताएँ: यह एक भावनात्मक और श्रृंगार रस प्रधान उपशास्त्रीय शैली है। इसमें बोलों के भाव पर विशेष जोर दिया जाता है और स्वरों में लचीलापन होता है। यह अक्सर दादरा, कहरवा, दीपचंदी जैसी हल्की तालों में गाई जाती है।
- दादरा, चैती, कजरी, होरी: ये लोक संगीत से प्रभावित उपशास्त्रीय शैलियाँ हैं, जो विभिन्न त्योहारों और मौसमों से जुड़ी होती हैं।
2.3 खोजें और उदाहरण
- मुगल काल का प्रभाव: मुगल शासकों ने संगीत को बहुत संरक्षण दिया, जिससे भारतीय संगीत में फ़ारसी और मध्य एशियाई तत्वों का समावेश हुआ।
- अकबर का शासनकाल: सम्राट अकबर (1556-1605) के दरबार में संगीत को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला। उनके नवरत्नों में से एक तानसेन (रामतानु पांडे) भारतीय संगीत के इतिहास के सबसे महान संगीतकारों में से एक थे।
- तानसेन का योगदान: तानसेन ने ध्रुपद गायकी में महारत हासिल की। उन्होंने कई नए रागों की रचना की, जिनमें मियाँ की मल्हार, दरबारी कान्हड़ा, गूजरी टोड़ी, मियाँ की टोड़ी प्रमुख हैं। उन्होंने कई ध्रुपद बंदिशों और ग्रंथों की भी रचना की, जैसे ‘संगीत सार’ और ‘रागमाला’। तानसेन ने भारतीय संगीत को एक नई दिशा दी और उनकी शैली ने कई घरानों को प्रभावित किया।
- जहाँगीर और शाहजहाँ: इन शासकों ने भी संगीत को संरक्षण दिया, हालाँकि औरंगजेब के शासनकाल में संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे कई संगीतकार दरबारों से निकलकर छोटे राज्यों में चले गए और संगीत का विकास जारी रहा।
- अकबर का शासनकाल: सम्राट अकबर (1556-1605) के दरबार में संगीत को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला। उनके नवरत्नों में से एक तानसेन (रामतानु पांडे) भारतीय संगीत के इतिहास के सबसे महान संगीतकारों में से एक थे।
- वाद्य यंत्रों का विकास:
- सितार: यह वीणा और फ़ारसी तंबूरा के मिश्रण से विकसित हुआ। अमीर खुसरो को इसके आविष्कार का श्रेय दिया जाता है।
- तबला: यह पखावज को दो भागों में विभाजित करके विकसित किया गया, जिससे अधिक लचीली और विविध लयकारी संभव हुई।
- सारंगी: यह एक तार वाला वाद्य है जो मानव आवाज के सबसे करीब माना जाता है।
- शहनाई: यह एक सुषिर वाद्य है जो शुभ अवसरों पर बजाया जाता है।
- इन वाद्यों ने मध्यकालीन संगीत की शैलियों को और समृद्ध किया।
- भक्ति आंदोलन का प्रभाव: 12वीं से 17वीं शताब्दी तक चले भक्ति आंदोलन ने संगीत को जन-जन तक पहुँचाया। संतों ने अपनी भक्ति को अभिव्यक्त करने के लिए संगीत का सहारा लिया।
- कबीर: उनके दोहे और भजन आज भी गाए जाते हैं।
- मीराबाई: उनकी कृष्ण भक्ति से ओत-प्रोत भजन (पद) भारतीय संगीत की अनमोल धरोहर हैं।
- सूरदास: उनके ‘सूरसागर’ में कृष्ण लीलाओं का वर्णन करते हुए कई पद हैं, जो शास्त्रीय संगीत में भी गाए जाते हैं।
- तुलसीदास: उनके रामचरितमानस और हनुमान चालीसा के पाठ और गायन ने संगीत को भक्ति से जोड़ा।
- चैतन्य महाप्रभु: उन्होंने कीर्तन परंपरा को लोकप्रिय बनाया, जिसमें समूह में भक्ति गीत गाए जाते थे।
- इस काल में संगीत और साहित्य का अद्भुत संगम हुआ।
3. आधुनिक काल (18वीं शताब्दी से वर्तमान तक)
आधुनिक काल में भारतीय संगीत ने नए आयामों को छुआ, जहाँ शिक्षा का प्रसार हुआ, घराने परंपरा मजबूत हुई और वैश्विक मंच पर इसे पहचान मिली।
3.1 शैली और विशेषज्ञता
- घराने परंपरा का विकास:
- अवधारणा: आधुनिक काल में संगीत के शिक्षण और प्रदर्शन के लिए विभिन्न घराने विकसित हुए। ‘घराना’ शब्द का अर्थ है ‘परिवार’ या ‘वंश’। यह एक संगीत शैली या परंपरा को संदर्भित करता है जो एक विशेष गुरु या परिवार से उत्पन्न होती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है। प्रत्येक घराने की अपनी विशिष्ट गायन या वादन शैली, राग प्रस्तुति का तरीका, आलाप, तान और अलंकरणों का प्रयोग होता है। यह गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है, जहाँ शिष्य अपने गुरु के साथ रहकर संगीत की बारीकियों को सीखता है।
- ख्याल गायकी का प्रभुत्व: इस काल में ख्याल गायकी शास्त्रीय संगीत की सबसे प्रचलित विधा बन गई, और अधिकांश घरानों ने ख्याल को अपनी प्रमुख शैली के रूप में अपनाया।
- प्रमुख घराने और उनकी विशेषताएँ:
- ग्वालियर घराना:
- विशेषताएँ: यह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का सबसे प्राचीन घराना माना जाता है। इसकी गायकी सीधी-सादी, स्पष्ट और दमदार होती है। इसमें खुली आवाज़, लयकारी पर विशेष जोर, और बोल-बाँट (शब्दों को लय में बाँटना) प्रमुख विशेषताएँ हैं। इसमें राग के शुद्ध स्वरूप को बनाए रखने पर बल दिया जाता है।
- प्रमुख कलाकार: हद्दू खाँ, हस्सू खाँ, बालकृष्ण बुआ इचलकरंजीकर, पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर (जिन्होंने इस शैली को लोकप्रिय बनाया), पंडित ओंकारनाथ ठाकुर।
- आगरा घराना:
- विशेषताएँ: इस घराने की गायकी दमदार आवाज़, नोम-तोम आलाप (राग के स्वरों को ‘नोम-तोम’ जैसे निरर्थक शब्दों में गाना), लयकारी और बोल-बाँट के लिए प्रसिद्ध है। इसमें ध्रुपद और ख्याल दोनों शैलियों का प्रभाव दिखाई देता है।
- प्रमुख कलाकार: उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ (जिन्हें ‘आफ़ताब-ए-मौसिकी’ कहा जाता है), विलायत हुसैन खाँ।
- किराना घराना:
- विशेषताएँ: यह घराना स्वरों की शुद्धता, मींड (एक स्वर से दूसरे स्वर तक बिना रुकावट के जाना), आलाप (स्वरों का धीमा और भावपूर्ण विस्तार) और भाव प्रदर्शन पर विशेष ध्यान देता है। इसकी गायकी अत्यंत मधुर और भावनात्मक होती है।
- प्रमुख कलाकार: उस्ताद अब्दुल करीम खाँ (संस्थापक), सवाई गंधर्व, गंगूबाई हंगल, भीमसेन जोशी, रोशनआरा बेगम, हीराबाई बड़ोदकर।
- जयपुर-अतरौली घराना:
- विशेषताएँ: यह घराना जटिल तानों, लयकारी, और राग के अप्रचलित या वक्र (टेढ़े-मेढ़े) प्रयोगों के लिए प्रसिद्ध है। इसमें बंदिशों में विभिन्न प्रकार की लयकारियों का प्रदर्शन किया जाता है।
- प्रमुख कलाकार: अल्लादिया खाँ (संस्थापक), केसरबाई केरकर, किशोरी अमोनकर, मल्लिकार्जुन मंसूर।
- पटियाला घराना:
- विशेषताएँ: इस घराने की गायकी भावपूर्ण, गमक प्रधान और तेज तानों के लिए जानी जाती है। इसमें पंजाबी लोक संगीत का प्रभाव भी दिखाई देता है।
- प्रमुख कलाकार: उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ, निर्मला देवी, परवीन सुल्ताना।
- दिल्ली घराना:
- विशेषताएँ: ख्याल गायकी की पुरानी शैली को बनाए रखने पर जोर। इसमें बोल-बाँट और लयकारी का सुंदर मिश्रण होता है।
- प्रमुख कलाकार: उस्ताद चाँद खाँ, नसीर अहमद खाँ।
- रामपुर-सहसवान घराना:
- विशेषताएँ: यह घराना ध्रुपद और ख्याल दोनों शैलियों का मिश्रण प्रस्तुत करता है। इसमें गंभीर आलाप और तेज तानों का प्रयोग होता है।
- प्रमुख कलाकार: उस्ताद मुश्ताक हुसैन खाँ, उस्ताद निसार हुसैन खाँ।
- ग्वालियर घराना:
3.2 खोजें और उदाहरण
- संगीत शिक्षा का प्रसार: ब्रिटिश काल में संगीत को उतना संरक्षण नहीं मिला, लेकिन 20वीं सदी में दो महान संगीतज्ञों ने संगीत शिक्षा को व्यवस्थित किया और इसे आम लोगों तक पहुँचाया:
- पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर (1872-1931):
- योगदान: इन्होंने संगीत को मंदिरों और दरबारों से निकालकर आम जनता तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। उन्होंने 1901 में लाहौर में गंधर्व महाविद्यालय की स्थापना की, जो भारत का पहला संगीत विद्यालय था। इसके बाद उन्होंने देश भर में इसकी कई शाखाएँ खोलीं।
- स्वरलिपि पद्धति: उन्होंने अपनी स्वयं की स्वरलिपि पद्धति भी विकसित की, जो सरल और सहज थी, जिससे छात्रों को संगीत सीखने में आसानी हुई।
- राष्ट्रवाद: उन्होंने संगीत को राष्ट्रवाद से जोड़ा और ‘वंदे मातरम’ को सार्वजनिक रूप से गाकर लोकप्रिय बनाया।
- पंडित विष्णु नारायण भातखंडे (1860-1936):
- योगदान: इन्होंने भारतीय संगीत के रागों और तालों को वैज्ञानिक तरीके से वर्गीकृत किया। उन्होंने विभिन्न प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन कर रागों को थाट (स्वरों के 10 समूह, जिनसे रागों का वर्गीकरण होता है) प्रणाली में व्यवस्थित किया।
- स्वरलिपि पद्धति: उन्होंने भातखंडे स्वरलिपि पद्धति का निर्माण किया, जो आज भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में व्यापक रूप से प्रयोग की जाती है। यह एक सरल और तार्किक पद्धति है।
- ग्रंथ: उन्होंने ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’ (6 भागों में), ‘हिंदुस्तानी संगीत पद्धति’, ‘लक्षण गीत संग्रह’ जैसे कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जो संगीत शिक्षा के लिए आधारभूत बन गए।
- संस्थान: उन्होंने लखनऊ में ‘भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय’ (पूर्व में ‘मैरिस कॉलेज ऑफ हिंदुस्तानी म्यूजिक’) की स्थापना की।
- पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर (1872-1931):
- लोकप्रिय संगीत का उदय: 20वीं शताब्दी के बाद से, तकनीकी विकास ने संगीत के प्रसार में क्रांति ला दी।
- रेडियो और ग्रामोफोन: 20वीं सदी की शुरुआत में रेडियो और ग्रामोफोन रिकॉर्ड के आगमन से संगीत दूर-दराज के इलाकों तक पहुँचा।
- फिल्मी संगीत: भारतीय सिनेमा के विकास के साथ फिल्मी संगीत का उदय हुआ, जिसने शास्त्रीय, लोक और पश्चिमी संगीत के तत्वों को मिलाकर एक नई शैली बनाई, जो अत्यधिक लोकप्रिय हुई।
- टेलीविजन और डिजिटल माध्यम: टेलीविजन और बाद में इंटरनेट, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने संगीत को हर घर तक पहुँचा दिया है, जिससे विभिन्न शैलियों का विकास और प्रसार हुआ है।
- वैश्विक पहचान: भारतीय संगीत को आज विश्व स्तर पर पहचान मिली है।
- पंडित रविशंकर (सितार): उन्होंने पश्चिमी संगीतकारों के साथ सहयोग किया और भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिमी दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाया।
- उस्ताद अली अकबर खाँ (सरोद): उन्होंने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को पहचान दिलाई।
- उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ (शहनाई): उन्होंने शहनाई को शास्त्रीय मंच पर स्थापित किया और विश्व भर में अपनी कला का प्रदर्शन किया।
- ज़किर हुसैन (तबला): उन्होंने तबले को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया और विभिन्न फ्यूजन परियोजनाओं में भाग लिया।
- आज भारतीय संगीतकार पश्चिमी संगीत के साथ फ्यूजन (संलयन) कर रहे हैं, जिससे नई और रोमांचक संगीत शैलियाँ उभर रही हैं।
भारतीय संगीत की मुख्य विशेषताएं
भारतीय संगीत की कुछ मूलभूत विशेषताएँ इसे विश्व के अन्य संगीत रूपों से अलग बनाती हैं:
- राग:
- परिभाषा: राग भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा है। यह स्वरों का एक ऐसा समूह है जो एक विशेष मनोदशा या भावना (रस) को व्यक्त करता है। प्रत्येक राग के अपने नियम और पहचान होती है।
- संरचना: एक राग में कम से कम पाँच स्वर होने चाहिए। इसमें आरोह (स्वरों का चढ़ता क्रम) और अवरोह (स्वरों का उतरता क्रम) होता है।
- वादी-संवादी: प्रत्येक राग में एक वादी (मुख्य स्वर) और एक संवादी (सहायक मुख्य स्वर) होता है, जो राग के स्वरूप को निर्धारित करते हैं।
- पकड़ और चलन: राग की पहचान के लिए कुछ विशेष स्वर समूह होते हैं जिन्हें पकड़ कहते हैं, और राग के विस्तार के तरीके को चलन कहते हैं।
- रस और समय: रागों को विभिन्न रसों (जैसे श्रृंगार, वीर, करुण, शांत) और विशिष्ट समय (जैसे सुबह, शाम, रात) से जोड़ा जाता है।
- ताल:
- परिभाषा: ताल संगीत में समय और लय को नियंत्रित करता है। यह एक निश्चित आवर्तन (साइकिल) में तालियों (ताली) और खाली (खाली) के माध्यम से मापा जाता है।
- मात्रा और विभाग: प्रत्येक ताल में निश्चित संख्या में मात्राएँ (समय की सबसे छोटी इकाई) और विभाग (मात्राओं का समूह) होते हैं।
- सम: ताल की पहली मात्रा को सम कहते हैं, जो संगीत का प्रारंभिक बिंदु होता है और जिस पर अक्सर जोर दिया जाता है।
- उदाहरण: कुछ प्रमुख तालें हैं:
- तीनताल: 16 मात्राएँ (4+4+4+4) – धिन धिन धा धा | धिन धिन धा धा | धिन धिन ता ता | धिन धिन धा धा
- एकताल: 12 मात्राएँ (2+2+2+2+2+2)
- झपताल: 10 मात्राएँ (2+3+2+3)
- रूपक ताल: 7 मात्राएँ (3+2+2)
- स्वर:
- शुद्ध और विकृत: भारतीय संगीत में 7 शुद्ध स्वर (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) और 5 विकृत स्वर होते हैं (रे कोमल, ग कोमल, म तीव्र, ध कोमल, नि कोमल), कुल मिलाकर 12 स्वर होते हैं।
- श्रुति: स्वरों के बीच के सूक्ष्म अंतराल को श्रुति कहते हैं।
- अलंकरण (गमक):
- आलाप: राग के स्वरों का धीमा, लयबद्ध और भावपूर्ण विस्तार, जिसमें ताल का बंधन नहीं होता। यह राग के स्वरूप को स्थापित करता है।
- तान: स्वरों का तीव्र और द्रुत गति से किया गया विस्तार। यह गायक या वादक की तकनीकी दक्षता को दर्शाता है।
- कण: किसी मुख्य स्वर को छूते हुए या स्पर्श करते हुए अगले स्वर पर जाना, जिससे मुख्य स्वर की सुंदरता बढ़ जाती है।
- मीड: एक स्वर से दूसरे स्वर तक बिना किसी रुकावट या खंडन के smoothly जाना, जिससे स्वरों में प्रवाहमयता आती है।
- गमक: स्वरों को कंपन या आंदोलन के साथ गाना या बजाना, जिससे एक विशेष प्रकार की लहरदार ध्वनि उत्पन्न होती है। यह संगीत में ओज और गंभीरता लाता है।
- गुरु-शिष्य परंपरा: भारतीय संगीत में ज्ञान का हस्तांतरण गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से होता आया है। इसमें शिष्य अपने गुरु के घर में रहकर संगीत की शिक्षा प्राप्त करता है, जहाँ गुरु न केवल संगीत सिखाते हैं, बल्कि जीवन के मूल्यों और अनुशासन का भी पाठ पढ़ाते हैं। यह एक व्यक्तिगत और गहन शिक्षण पद्धति है।
- दर्शन और आध्यात्मिकता: भारतीय संगीत का गहरा संबंध दर्शन और आध्यात्मिकता से है। इसे ‘नाद ब्रह्म’ (ध्वनि ही ईश्वर है) के रूप में देखा जाता है। संगीत का अभ्यास मन को शांत करने, एकाग्रता बढ़ाने और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का एक साधन माना जाता है।
भारतीय संगीत का इतिहास एक सतत विकास की कहानी है, जहाँ प्राचीन सिद्धांतों को बनाए रखते हुए नए विचारों और शैलियों को अपनाया गया है। यह एक जीवंत परंपरा है जो आज भी विकसित हो रही है और दुनिया भर के श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर रही है।