कक्षा 12 हिन्दी आरोह कुँवर नारायण: कविता के बहाने, बात सीधी थी पर : Class 12 Hindi Kunwar Narayan Kavita Ke Bahane Baat Sidhi thi Par

Class 12 Hindi Kunwar Narayan Kavita Ke Bahane Baat Sidhi thi Par : कक्षा 12 हिंदी के लिए कुंवर नारायण की कविता ‘कविता के बहाने’ में कविता की असीमित उड़ान और ‘बात सीधी थी पर’ में सरल भाषा के महत्व को समझें। यह लेख छात्रों को दोनों कविताओं के केंद्रीय भाव और आधुनिक प्रासंगिकता को समझने में मदद करेगा।

कक्षा 12 हिन्दी आरोह कुँवर नारायण: कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

कुँवर नारायण

जन्म : 19 सितंबर, सन्‌ 1927, उत्तर प्रदेश

प्रमुख रचनाएँ : चक्रव्यूह (1956), परिवेश: हम तुम, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों (काव्य संग्रह); आत्मजयी (प्रबंध काव्य); आकारों के आस-पास (कहानी संग्रह); आज और आज से पहले (समीक्षा); मेरे साक्षात्कार (सामान्य)।

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प्रमुख पुरस्कार : साहित्य अकादेमी पुरस्कार, कुमारन आशान पुरस्कार, व्यास सम्मान, प्रेमचंद पुरस्कार, लोहिया सम्मान, कबीर सम्मान, ज्ञानपीठ पुरस्कार।

निधन : सन्‌ 2017, दिल्ली में

न जाने कब से बंद / एक दिन इस तरह खुला घर का दरवाज़ा / जैसे गर्द से ढँकी / एक पुरानी किताब

गर्द से ढँकी हर पुरानी किताब खोलने की बात कहने वाले कुँवर नारायण ने सन्‌ 1950 के आस-पास काव्य-लेखन की शुरुआत की। उन्होंने कविता के अलावा चिंतनपरक लेख, कहानियाँ और सिनेमा तथा अन्य कलाओं पर समीक्षाएँ भी लिखी हैं, किंतु कविता की विधा उनके सृजन-कर्म में हमेशा प्राथमिकता प्राप्त रही। नयी कविता के दौर में, जब प्रबंध काव्य का स्थान प्रबंधत्व की दावेदार लंबी कविताएँ लेने लगीं तब कुँवर नारायण ने आत्मजयी जैसा प्रबंध काव्य रचकर भरपूर प्रतिष्ठा प्राप्त की। आलोचक मानते हैं कि उनकी “कविता में व्यर्थ का उलझाव, अखबारी सतहीपन और वैचारिक धुंध के बजाय संयम, परिष्कार और साफ़-सुधरापन है।” भाषा और विषय की विविधता उनकी कविताओं के विशेष गुण माने जाते हैं। उनमें यथार्थ का खुरदरापन भी मिलता है और उसका सहज सौंदर्य भी। सीधी घोषणाएँ और फैसले उनकी कविताओं में नहीं मिलते क्योंकि जीवन को मुकम्मल तौर पर समझने वाला एक खुलापन उनके कवि-स्वभाव की मूल विशेषता है। इसीलिए संशय, क्षमा और प्रश्नाकुलता उनकी कविता के बीज शब्द हैं।

कुँवर जी पूरी तरह नागर संवेदना के कवि हैं! विवरण उनके यहाँ नहीं के बराबर है, पर वैयक्तिक और सामाजिक ऊहापोह का तनाव पूरी व्यंजकता से सामने आता है। एक पंक्ति में कहें तो इनकी तटस्थ वीतराग दृष्टि नोच-खसोट, हिंसा-प्रतिहिंसा से सहमे हुए एक संवेदनशील मन के आलोड़नों के रूप में पढ़ी जा सकती है।

यहाँ पर कुँवर नारायण की दो कविताएँ ली गई हैं। पहली कविता है- कविता के बहाने जो इन दिनों संग्रह से ली गई है। आज का समय कविता के वजूद को लेकर आशंकित है। शक है कि यांत्रिकता के दबाव से कविता का अस्तित्व नहीं रहेगा। ऐसे में यह कविता-कविता की अपार संभावनाओं को टटोलने का एक अवसर देती है। कविता के बहाने यह एक यात्रा है जो चिड़िया, फूल से लेकर बच्चे तक की है। एक ओर प्रकृति है दूसरी ओर भविष्य की ओर कदम बढ़ाता बच्चा। कहने की आवश्यकता नहीं कि चिड़िया की उड़ान की सीमा है, फूल के खिलने के साथ उसकी परिणति निश्चित है, लेकिन बच्चे के सपने असीम हैं। बच्चों के खेल में किसी प्रकार की सीमा का कोई स्थान नहीं होता। कविता भी शब्दों का खेल है और शब्दों के इस खेल में जड़, चेतन; अतीत, वर्तमान और भविष्य सभी उपकरण मात्र हैं। इसीलिए जहाँ कहीं रचनात्मक ऊर्जा होगी वहाँ सीमाओं के बंधन खुद-ब-खुद टूट जाते हैं। वो चाहें घर की सीमा हो, भाषा की सीमा हो या फिर समय की ही क्यों न हो।

दूसरी कविता है बात सीधी थी पर जो कोई दूसरा नहीं संग्रह में संकलित है। कविता में कथ्य और माध्यम के द्वंद्व को उकेरते हुए भाषा की सहजता की बात की गई है। हर बात के लिए कुछ खास शब्द नियत होते हैं ठीक वैसे ही जैसे हर पेंच के लिए एक निश्चित खाँचा होता है। अब तक जिन शब्दों को हम एक-दूसरे के पर्याय के रूप में जानते रहे हैं उन सब के भी अपने विशेष अर्थ होते हैं। अच्छी बात या अच्छी कविता का बनना सही बात का सही शब्द से जुड़ना होता है और जब ऐसा होता है तो किसी दबाव या अतिरिक्त मेहनत की ज़रूरत नहीं होती।


कविता के बहाने

कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने।
कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने!
बाहर, भीतर
इस घर, उस घर
कविता के पंख लगा उड़ने के माने
चिड़िया क्या जाने?

कविता एक खिलना है फूलों के बहाने।
कविता का खिलना भला फूल क्या जाने!
बाहर, भीतर
इस घर, उस घर
बिना मुरझाए महकने के माने
फूल क्या जाने?

कविता एक खेल है बच्चों के बहाने।
बाहर, भीतर
यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
बच्चा ही जाने।

बात सीधी थी पर

बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
ज़रा टेढ़ी फँस गई।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आए-
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई।

सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाए
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनाई दे रही थी
तमाशबीनों की शाबाशी और वाह वाह।

आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी!
हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया।

ऊपर से ठीकठाक
पर अंदर से
न तो उसमें कसाव था
न ताकत!

बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछते देख कर पूछा-
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?”

यहां कुँवर नारायण की कविताओं ‘कविता के बहाने’ और ‘बात सीधी थी पर’ से संबंधित प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं:

कविता: कविता के बहाने

1. इस कविता के बहाने बताएँ कि सब घर एक कर देने के माने क्या है?

‘कविता के बहाने’ कविता में सब घर एक कर देने के माने” का अर्थ है:

  • भेदभाव रहित एकता: जिस प्रकार बच्चे खेलते समय जाति, धर्म, रंग, लिंग, अमीरी-गरीबी या किसी भी सामाजिक भेद को भूलकर सभी घरों को अपना मान लेते हैं और सब बच्चों के साथ एक होकर खेलते हैं, ठीक उसी प्रकार कविता भी किसी भेदभाव को नहीं मानती।
  • सार्वभौमिकता: कविता देश, काल, परिस्थिति या किसी भौगोलिक सीमा में बँधी नहीं रहती। वह किसी विशेष घर, समाज या संस्कृति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे विश्व के पाठकों तक पहुँचती है और उन्हें एक मानवीय भावना से जोड़ती है।
  • मानवीय संवेदना का विस्तार: कविता मनुष्य की संवेदनाओं का विस्तार करती है। वह सभी लोगों के सुख-दुख, प्रेम, पीड़ा और आशाओं को साझा करती है, जिससे पाठक स्वयं को किसी एक समूह या घर तक सीमित न मानकर, पूरी मानवता से जुड़ा हुआ महसूस करता है।
  • सीमाओं का अतिक्रमण: कविता भाषा, संस्कृति और समय की सीमाओं को तोड़ देती है। जैसे बच्चे खेल-खेल में सारे घरों को अपना बना लेते हैं, वैसे ही एक अच्छी कविता विभिन्न भाषाओं और समय का अतिक्रमण कर सभी को अपना बना लेती है।

संक्षेप में, “सब घर एक कर देने के माने” कविता की सार्वभौमिकता, समभाव और मानवीय एकता स्थापित करने की शक्ति को दर्शाता है, ठीक वैसे ही जैसे बच्चे खेलते हुए बिना किसी भेद-भाव के सबको अपना मान लेते हैं।

2. ‘उड़नेऔर खिलनेका कविता से क्या संबंध बनता है?

कविता में ‘उड़ने’ और ‘खिलने’ का कविता से गहरा लाक्षणिक संबंध बनता है:

  • उड़नेका कविता से संबंध:
    • भावों की उड़ान: चिड़िया की भौतिक उड़ान की एक सीमा होती है, लेकिन कविता की उड़ान कल्पनाओं, भावों और विचारों की असीमता को दर्शाती है। कविता के माध्यम से कवि और पाठक कल्पना के पंख लगाकर कहीं भी पहुँच सकते हैं—भूतकाल, भविष्यकाल, किसी भी स्थान पर।
    • समय और स्थान का अतिक्रमण: चिड़िया एक निश्चित समय और स्थान तक ही उड़ सकती है, लेकिन कविता समय और स्थान की सीमाओं को लांघकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी, एक देश से दूसरे देश तक पहुँचती है। उसकी उड़ान अनंत होती है।
    • संवाद और पहुँच: जैसे पक्षी उड़कर विभिन्न स्थानों पर जाते हैं, वैसे ही कविता भी विचारों और संदेशों को लेकर विभिन्न लोगों तक पहुँचती है।
  • खिलनेका कविता से संबंध:
    • विकास और विस्तार: फूल खिलते हैं, अपनी सुंदरता और सुगंध बिखेरते हैं, लेकिन फिर मुरझा जाते हैं। कविता का ‘खिलना’ उसके रचनात्मक विस्तार और प्रभाव के फैलाव को दर्शाता है। कविता अपने अर्थों, भावों और सौंदर्य को विस्तृत करती है।
    • शाश्वतता और अमरता: फूल का खिलना क्षणभंगुर होता है, लेकिन कविता का ‘खिलना’ उसके ‘बिना मुरझाए महकने’ से जुड़ा है। इसका अर्थ है कि कविता का सौंदर्य, उसकी प्रासंगिकता और उसका प्रभाव शाश्वत होता है। वह समय के साथ फीकी नहीं पड़ती, बल्कि हमेशा नए अर्थों और अनुभूतियों के साथ जीवित रहती है।
    • आनंद और सौंदर्य: जैसे फूल अपनी सुंदरता और सुगंध से आनंद बिखेरते हैं, वैसे ही कविता भी अपने शब्दों, भावों और अर्थों से पाठकों को सौंदर्य और आनंद प्रदान करती है।

संक्षेप में, ‘उड़ने’ कविता की असीम कल्पना और सार्वभौमिक पहुँच को दर्शाता है, जबकि ‘खिलने’ कविता की शाश्वत सुंदरता और स्थायी प्रभाव को व्यक्त करता है।

3. कविता और बच्चे को समानांतर रखने के क्या कारण हो सकते हैं?

कविता और बच्चे को समानांतर रखने के कई महत्वपूर्ण कारण हैं, जो दोनों की स्वाभाविक विशेषताओं को उजागर करते हैं:

  • सीमाहीनता और बंधनमुक्ति: बच्चे खेलते समय किसी सीमा, भेदभाव या नियम को नहीं मानते। उनके खेल में कोई घर पराया नहीं होता, सब ‘एक’ हो जाते हैं। ठीक वैसे ही, कविता भी किसी भाषा, धर्म, संस्कृति, भूगोल या समय की सीमा में नहीं बँधती। वह सार्वभौमिक होती है और हर किसी तक पहुँच सकती है।
  • असीम कल्पना: बच्चों की कल्पना असीम होती है। वे खेल-खेल में किसी भी चीज़ को कुछ भी बना सकते हैं। कविता भी शब्दों के माध्यम से असीमित कल्पनाओं और भावों की दुनिया रचती है, जहाँ कुछ भी संभव है।
  • सहजता और spontaneity: बच्चे अपने खेल में अत्यंत सहज और स्वाभाविक होते हैं। उनकी क्रियाओं में कोई बनावट नहीं होती। कविता भी जब सच्ची और सहज भावनाओं से लिखी जाती है, तो वह सबसे अधिक प्रभावशाली होती है।
  • निष्पक्षता और निर्मलता: बच्चों का मन निर्मल और निष्पक्ष होता है। वे भेदभाव नहीं करते। कविता भी अपने मूल स्वरूप में निष्पक्ष और निर्मल होती है, जो बिना किसी पूर्वाग्रह के सत्य और भावनाओं को अभिव्यक्त करती है।
  • आनंद और उमंग: बच्चों का खेल आनंद और उमंग से भरा होता है। कविता भी अपने सृजन और पठन दोनों में एक विशेष प्रकार का आनंद और उत्साह प्रदान करती है।
  • रचनात्मक ऊर्जा: बच्चे रचनात्मक ऊर्जा से भरपूर होते हैं, वे नए-नए खेल और तरीके ईजाद करते हैं। कविता भी एक रचनात्मक विधा है जो नए विचार, नए बिंब और नई भाषा गढ़ती है।

संक्षेप में, कुँवर नारायण ने कविता और बच्चे को समानांतर रखकर यह दर्शाया है कि दोनों में सीमाहीनता, सहजता, रचनात्मकता और भेदभाव रहित सार्वभौमिकता का गुण होता है। बच्चे के खेल की तरह, कविता भी अपने सहज प्रवाह में सभी बंधनों को तोड़कर मानवीय संबंधों और संवेदनाओं को एक कर देती है।

4. कविता के संदर्भ में “बिना मुरझाए महकने के माने क्या होते हैं?

कविता के संदर्भ में “बिना मुरझाए महकने के माने” कविता की अमरता, शाश्वतता और चिर-नवीनता को दर्शाता है:

  • अमरता और स्थायी प्रभाव: फूल खिलकर कुछ समय बाद मुरझा जाते हैं और उनकी सुगंध समाप्त हो जाती है। लेकिन कविता का प्रभाव ऐसा नहीं होता। एक अच्छी कविता समय के साथ अपनी प्रासंगिकता और प्रभाव नहीं खोती, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसका महत्व बना रहता है। वह हमेशा जीवंत बनी रहती है।
  • शाश्वत सौंदर्य और सुगंध: कविता की ‘महक’ उसके अर्थों की गहराई, उसके भावों की सुंदरता और उसके संदेश की प्रासंगिकता है। यह महक कभी समाप्त नहीं होती, बल्कि हर नए पाठक और हर नए दौर में उसे नए सिरे से महसूस किया जा सकता है। यह ‘महक’ कविता द्वारा दिया गया आनंद, प्रेरणा और चिंतन है।
  • चिर-नवीनता: समय बीतने के साथ भी कविता पुरानी या बासी नहीं होती। वह हर युग में नए संदर्भों और अर्थों के साथ पढ़ी और समझी जाती है, जिससे वह हमेशा ‘ताज़ी’ और ‘महकती’ हुई महसूस होती है।
  • कालजयी रचना: यह उस रचना की बात है जो समय के प्रभाव से अप्रभावित रहती है और जिसका महत्व कभी कम नहीं होता।

संक्षेप में, “बिना मुरझाए महकने” का अर्थ है कि कविता फूल की क्षणभंगुर सुंदरता के विपरीत कालजयी होती है, उसका सौंदर्य और प्रभाव कभी खत्म नहीं होता, बल्कि वह हमेशा प्रासंगिक और सुगंधित बनी रहती है।


कविता: बात सीधी थी पर

5. “भाषा को सहूलियतसे बरतने से क्या अभिप्राय है?

“भाषा को सहूलियत से बरतने” से अभिप्राय है:

  • भाषा का सहज और सरल प्रयोग: अपनी बात को कहने के लिए ऐसे शब्दों और वाक्य-विन्यास का प्रयोग करना जो स्वाभाविक और बोधगम्य हों, जिनमें अनावश्यक क्लिष्टता या जटिलता न हो।
  • कथ्य के अनुसार भाषा का चयन: हर बात या विचार को व्यक्त करने के लिए कुछ खास शब्द और शैली सबसे उपयुक्त होती है। ‘सहूलियत से बरतना’ मतलब सही बात के लिए सही शब्द का चुनाव करना, जैसे सही पेंच के लिए सही खाँचा होता है।
  • स्वाभाविक प्रवाह: बात को कहने में अनावश्यक बल या दिखावा न हो। भाषा सहजता से प्रवाहित हो और पाठक या श्रोता तक बिना किसी अवरोध के पहुँच जाए।
  • कृत्रिमता से बचाव: भाषा को आवश्यकता से अधिक अलंकृत करने, पांडित्य प्रदर्शन करने या अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए शब्दों को तोड़ने-मरोड़ने से बचना।
  • स्पष्टता और प्रभावशीलता: भाषा का ऐसा प्रयोग करना जिससे बात सीधी और स्पष्ट रूप से सामने आए, और अपना अभीष्ट प्रभाव डाले, बजाय इसके कि वह उलझ जाए या अर्थहीन हो जाए।

संक्षेप में, “भाषा को सहूलियत से बरतना” का अर्थ है कथ्य की स्पष्टता और प्रभावशीलता के लिए भाषा का सहज, सरल और उपयुक्त प्रयोग करना, जिसमें बनावट या जटिलता न हो।

6. बात और भाषा परस्पर जुड़े होते हैं, किंतु कभी-कभी भाषा के चक्कर में सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती हैकैसे?

बात (कथ्य) और भाषा (माध्यम) परस्पर जुड़े होते हैं क्योंकि भाषा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा बात को अभिव्यक्त किया जाता है। एक अच्छी बात तभी प्रभावी होती है जब उसे सही भाषा में कहा जाए। किंतु, कभी-कभी भाषा के चक्कर में सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है, इसके कई कारण हैं:

  • अनावश्यक शाब्दिक आडंबर: जब कवि या वक्ता अपनी बात को प्रभावशाली दिखाने के लिए अनावश्यक रूप से क्लिष्ट, अलंकृत या अप्रचलित शब्दों का प्रयोग करता है, तो बात सीधी न रहकर उलझ जाती है।
  • दिखावे की प्रवृत्ति: अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करने या ‘तमाशबीनों की वाह वाह’ पाने की लालसा में जब बात को अनावश्यक रूप से घुमाया-फिराया जाता है, तो उसकी सरलता नष्ट हो जाती है।
  • सही शब्द का अभाव: कभी-कभी व्यक्ति अपनी बात के लिए उपयुक्त शब्द नहीं ढूँढ पाता और गलत शब्दों का प्रयोग करता है, जिससे बात का मूल अर्थ विकृत हो जाता है या वह अप्रभावी हो जाती है।
  • स्वाभाविकता का अभाव: जब बात कहने में सहजता और स्वाभाविकता नहीं होती, बल्कि ज़ोर-ज़बरदस्ती से शब्दों को बिठाया जाता है, तो बात की ‘चूड़ी मर जाती है’ और वह भाषा में ‘बेकार घूमने’ लगती है (अर्थहीन हो जाती है)।
  • संदेश और माध्यम में असंतुलन: यदि बात सीधी और सरल है, लेकिन उसे जटिल या गूढ़ भाषा में प्रस्तुत किया जाए, तो माध्यम (भाषा) इतना हावी हो जाता है कि मूल संदेश (बात) लोगों तक पहुँच ही नहीं पाता या गलत ढंग से पहुँचता है।

कवि ने ‘पेंच’ और ‘कील’ के बिंबों से इसे समझाया है: जैसे एक पेंच को सही खाँचे में सही तरीके से कसने की बजाय, उसे ज़बरदस्ती टेढ़े या गलत खाँचे में कसने की कोशिश की जाए, तो पेंच की चूड़ी मर जाती है और वह बेकार हो जाता है। ठीक वैसे ही, जब सीधी बात को अनावश्यक शाब्दिक जटिलताओं या जबरन की शैली में कहने का प्रयास किया जाता है, तो बात अपना अर्थ और प्रभाव खो देती है और ‘बेकार घूमने’ लगती है।

7. बात (कथ्य) के लिए नीचे दी गई विशेषताओं का उचित बिंबों/मुहावरों से मिलान करें।

बात की विशेषताएँउचित बिंब/मुहावरे
1. बात का कथ्य का अस्पष्ट होनाग) बात की चूड़ी मर जाना
2. बात का प्रभावहीन हो जानाघ) बात में कसाव न होना
3. बात में सहजताक) सहूलियत से बरतना
4. बात का मुश्किल हो जानाख) बात का पेचीदा हो जाना

मिलान का स्पष्टीकरण:

  • बात का कथ्य का अस्पष्ट होनाबात की चूड़ी मर जाना: जब पेंच की चूड़ी मर जाती है, तो वह कसने लायक नहीं रहता और ढीला घूमता रहता है, उसका कोई अर्थ नहीं रहता। उसी तरह, जब बात का मूल कथ्य अस्पष्ट हो जाता है, तो वह भी अर्थहीन हो जाती है।
  • बात का प्रभावहीन हो जानाबात में कसाव न होना: कसने के बाद पेंच में कसाव (मज़बूती) आता है। अगर बात में कसाव नहीं है, तो उसमें ताकत नहीं है, वह प्रभावशाली नहीं है। वह केवल ऊपरी तौर पर ठीक लगती है, पर उसका कोई गहरा असर नहीं होता।
  • बात में सहजतासहूलियत से बरतना: ‘सहूलियत से बरतना’ का अर्थ है भाषा का सरल, सहज और उपयुक्त प्रयोग करना, जिससे बात बिना किसी बाधा के सीधे मन तक पहुँच जाए। यही सहजता है।
  • बात का मुश्किल हो जानाबात का पेचीदा हो जाना: जब सीधी बात को भाषा के अनावश्यक चक्कर में फँसाया जाता है, तो वह समझने में जटिल और मुश्किल हो जाती है, यानी ‘पेचीदा’ हो जाती है।

बात के इर्द-गिर्द

1. बात से जुड़े कई मुहावरे प्रचलित हैं। कुछ मुहावरों का प्रयोग करते हुए लिखें और व्याख्या करें।

‘बात’ से जुड़े कई मुहावरे हिंदी भाषा में प्रचलित हैं, जो विभिन्न स्थितियों और अर्थों को व्यक्त करते हैं। यहाँ कुछ उदाहरण और उनकी व्याख्या दी गई है:

  • बात का धनी होना:
    • प्रयोग: रमेश अपनी बात का धनी है, एक बार जो कह देता है, उससे कभी नहीं मुकरता।
    • व्याख्या: इसका अर्थ है अपने वचन का पक्का होना, कही हुई बात पर कायम रहना, ईमानदार होना। ऐसा व्यक्ति जो एक बार जो वादा कर दे या कह दे, उसे निभाता ज़रूर है।
  • बात का बतंगड़ बनाना:
    • प्रयोग: छोटी सी बात का बतंगड़ क्यों बना रहे हो, सुलझा लो मामला।
    • व्याख्या: इसका अर्थ है छोटी सी मामूली बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना, अनावश्यक रूप से बड़ा मुद्दा बना देना या झगड़े का रूप दे देना।
  • बात बिगड़ जाना:
    • प्रयोग: दोनों पक्षों में समझौता होने वाला था, लेकिन उनकी एक छोटी सी ग़लती से सारी बात बिगड़ गई।
    • व्याख्या: इसका अर्थ है किसी काम का बनते-बनते रुक जाना, किसी मामले का खराब हो जाना या स्थिति का प्रतिकूल हो जाना।
  • बातें बनाना:
    • प्रयोग: तुम हमेशा बातें बनाते रहते हो, काम कब करोगे?
    • व्याख्या: इसका अर्थ है व्यर्थ की बातें करना, बहाने बनाना, गप्पें मारना या काम से बचने के लिए तर्क देना।
  • बात काटना:
    • प्रयोग: बड़े-बुजुर्गों की बात काटना अच्छा नहीं माना जाता।
    • व्याख्या: इसका अर्थ है किसी के बोलते हुए बीच में ही टोक देना, उसकी बात पूरी न होने देना, या उसकी बात से असहमत होना।
  • बात पर आना:
    • प्रयोग: बहुत घुमा-फिरा लिया, अब सीधी बात पर आओ।
    • व्याख्या: इसका अर्थ है मुख्य विषय या मुद्दे पर आना, इधर-उधर की बातें छोड़कर मूल विषय पर चर्चा करना।
  • बात रखना:
    • प्रयोग: उसने मेरी बात रखकर मुझे बहुत सहारा दिया।
    • व्याख्या: इसका अर्थ है किसी के अनुरोध, सलाह या इच्छा का सम्मान करना और उसे स्वीकार करना/मानना।

2. ज़ोर ज़बरदस्ती से बात की चूड़ी मर गई और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।

व्याख्या:

यह पंक्तियाँ कुँवर नारायण की कविता ‘बात सीधी थी पर’ से ली गई हैं। इन पंक्तियों में कवि ने कथ्य (बात) और भाषा (माध्यम) के बीच के संबंध को ‘पेंच’ और ‘पेचकस’ के बिंब के माध्यम से समझाया है।

  • बात की चूड़ी मर गई: इसका अर्थ है कि जब किसी सीधी-सरल बात को व्यक्त करने के लिए अनावश्यक रूप से क्लिष्ट, आडंबरपूर्ण या अनुपयुक्त भाषा का प्रयोग किया जाता है, तो बात का मूल अर्थ, प्रभाव और सहजता समाप्त हो जाती है। जैसे किसी पेंच को गलत खाँचे में या ज़ोर-ज़बरदस्ती से कसने पर उसकी चूड़ी (धागा) खराब हो जाती है और वह फिर अपनी जगह पर फिट नहीं बैठता, वैसे ही बात का प्राकृतिक कसावऔर शक्ति खत्म हो जाती है।
  • और वह भाषा में बेकार घूमने लगी: इसका तात्पर्य यह है कि जब बात अपना मूल अर्थ और प्रभाव खो देती है, तो वह केवल शब्दों का आडंबर बनकर रह जाती है। वह भाषा के भीतर तो होती है, लेकिन उसका कोई ठोस अर्थ या संप्रेषण शक्ति नहीं होती। वह पाठक या श्रोता के मन में कोई छाप नहीं छोड़ पाती, बल्कि एक अनुपयोगी वस्तु की तरह व्यर्थ में घूमती (अर्थहीन लगती) रहती है। कहने का अर्थ है कि भाषा के कृत्रिम प्रयोग से बात अपनी सहजता और शक्ति खोकर केवल शब्दों का समूह भर रह जाती है, जिसका कोई सार्थक उद्देश्य सिद्ध नहीं होता।

संक्षेप में, यह पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि जब कवि या वक्ता अपनी बात को सहजता से कहने के बजाय उस पर भाषा का अनावश्यक बोझ डालता है, तो बात अपना प्रभाव और अर्थ खोकर निरर्थक हो जाती है। यह भाषा की सहजता के महत्व पर बल देती हैं।

MCQs from Kunwar Narayan’s Poems

Instructions: Choose the best option for each question. The correct answer is marked with a checkmark (✓).

कविता: कविता के बहाने

  1. ‘कविता के बहाने’ कविता किस संग्रह से ली गई है?
    a) चक्रव्यूह
    b) कोई दूसरा नहीं
    c) आत्मजयी
    d) इन दिनों (✓)
  2. कवि ने ‘कविता की उड़ान’ को किससे बेहतर बताया है?
    a) फूल के खिलने से
    b) चिड़िया की उड़ान से (✓)
    c) बच्चे के खेल से
    d) विचारों की उड़ान से
  3. कविता के ‘बिना मुरझाए महकने’ का क्या अर्थ है?
    a) कविता में फूल जैसी सुगंध होना
    b) कविता का कभी पुराना न होना
    c) कविता का प्रभाव और सौंदर्य शाश्वत होना (✓)
    d) कविता का हर जगह फैलना
  4. ‘सब घर एक कर देने के माने’ से कवि का क्या तात्पर्य है?
    a) सभी घरों को तोड़ देना
    b) सभी घरों में घुस जाना
    c) भेदभाव रहित एकता और सार्वभौमिकता (✓)
    d) घरों को मिलाकर एक बड़ा घर बनाना
  5. कविता और बच्चे में क्या समानता दर्शाई गई है?
    a) दोनों का खेलना
    b) दोनों का नादान होना
    c) दोनों में सीमाओं का बंधन न होना (✓)
    d) दोनों का कल्पनाशील होना

कविता: बात सीधी थी पर

  1. कवि ने सीधी बात के टेढ़ी फँसने का क्या कारण बताया है?
    a) कवि का अज्ञानी होना
    b) भाषा के चक्कर में पड़ना (✓)
    c) बात का खुद टेढ़ा होना
    d) श्रोताओं का समझदार न होना
  2. कवि ने बात को सुलझाने के लिए भाषा के साथ क्या-क्या किया?
    a) उसे सहज बनाया
    b) उसे बदला नहीं
    c) उलटा पलटा, तोड़ा मरोड़ा, घुमाया फिराया (✓)
    d) उसे त्याग दिया
  3. कवि को किस करतब पर तमाशबीनों की शाबाशी और वाह-वाह सुनाई दे रही थी?
    a) सीधी बात कहने पर
    b) पेंच को बेतरह कसने पर (भाषा को उलझाने पर) (✓)
    c) बात को सरल बनाने पर
    d) नए शब्द गढ़ने पर
  4. ‘बात की चूड़ी मर गई’ का क्या अभिप्राय है?
    a) बात का खो जाना
    b) बात का स्पष्ट हो जाना
    c) बात का प्रभावहीन और अर्थहीन हो जाना (✓)
    d) बात का बहुत मुश्किल हो जाना
  5. हार कर कवि ने बात को कील की तरह कहाँ ठोंक दिया?
    a) दीवार में
    b) उसी जगह (भाषा में) (✓)
    c) अपने मन में
    d) कागज़ पर
  6. अंत में बात ने शरारती बच्चे की तरह कवि से क्या प्रश्न पूछा?
    a) क्या तुमने कविता लिखना सीख लिया?
    b) क्या तुमने मुझे समझ लिया?
    c) “क्या तुमने भाषा को सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?” (✓)
    d) क्या तुम मुझसे डर गए?
  7. ‘बात में कसाव न होना’ का क्या अर्थ है?
    a) बात का छोटा होना
    b) बात का सीधा होना
    c) बात का प्रभावहीन या शक्तिहीन होना (✓)
    d) बात का स्पष्ट न होना

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